गुरुवार, 19 मई 2011

आँच-69- हम आँधी में उड़ते पत्ते

समीक्षा

आँच-69

हम आँधी में उड़ते पत्ते

हरीश प्रकाश गुप्त

पिछले दिनों मनोज कुमार जी ने जयकृष्ण तुषार जी के ब्लाग “छान्दसिक अनुगायन” का लिंक दिया। यह ब्लाग अभी तक मेरी पहुँच से दूर था। इस ब्लाग पर मैंने जयकृष्ण तुषार जी के नवगीत पढ़े तो ये मुझे बहुत आकर्षक लगे। काव्यत्व से सराबोर। नितांत संश्लिष्ट और हृदयस्पर्शी। भाव इतने गहन कि पाठक को भाव विभोर कर दें। जयकृष्ण तुषार जी इलाहाबाद से हैं, जहाँ साहित्य की जड़ें बहुत गहरी हैं। इस नगरी से साहित्यकारों का विशेष लगाव रहा है या फिर इस नगरी का अपना आकर्षण, जो भी हो, यहाँ साहित्य समागम होते रहे हैं और यहाँ के साहित्य प्रेमियों को स्वनामधन्य साहित्यकारों का सान्निध्य प्राप्त हुआ है। तुषार जी भी उनसे पृथक नहीं हैं। इसका प्रमाण उनकी रचनाएं हैं जो उनकी प्रतिभा को प्रतिबिम्बित करती हैं। आज की आँच के लिए उनके एक नवगीत “हम आँधी में उड़ते पत्ते” को चर्चा के लिए लिया जा रहा है जो अभी हाल ही में उनके ब्लाग “छान्दसिक अनुगायन” पर प्रकाशित हुआ था।

“हम आँधी में उड़ते पत्ते” देश के सामान्य जन की पीड़ा को अभिव्यक्त करने वाला नवगीत है जो अन्तर्मन को केवल स्पर्श ही नहीं करता बल्कि झकझोरता भी है। इस देश का आम आदमी आज भी गरीबी, लाचारी और बेबसी का जीवन जीता है। दो जून की रोटी के लिए दिन रात एक करना पड़ता है। समस्याओं से उबरने के प्रयासों में ही तन, मन और जो थोड़ा बहुत धन जुटा पाता है, वह खप जाता है। अगले दिन का सूरज फिर उसी तरह समस्याओं के साथ उदय होता है। यह स्थिति केवल ग्रामीण जीवन की ही नहीं बल्कि शहरों में भी बहुतायत लोग ऐसा ही जीवन जी रहे हैं। साधन, सुख और सुविधाएं आज भी उनके लिए कल्पना और आशा से परे वस्तुएं हैं।

विकास हुआ है, लेकिन उसका लाभ केवल कुछ मुट्ठी भर लोगों तक ही पहुँचा है। जिनको लाभ मिला है, वे क्रमशः समृद्ध हुए और जिनको नहीं मिला उनका जीवन यथावत रहा। कहीं समृद्धि है तो इतनी अधिक कि समेटते नहीं बनती, तो कहीं इतना अधिक आपदा ग्रस्त जीवन कि जिन्दगी स्वयं ही मुँह मोड़ लेती है, या फिर इतनी गरीबी और लाचारी कि पेट भरने के लिए मुश्किल से ही जुगत हो पाती है। गीत में कालाहांडी – आपदा, बस्तर – गरीबी और भिलाई – समृद्धि के ही बिम्बात्मक प्रयोग हैं, जो नया सा अर्थ देते हैं। इस असमानता ने सामाजिक विषमता को पैदा किया है। जिसकी पीड़ा कवि के हृदय में है और वह साम्यवाद की झण्डाबरदारी करते हुए इस विषमता को दूर करना चाहता है। तभी वह कहता है कि

“सबके हाथ

बराबर रोटी

बांटो मेरे भाई”।

विषमता से दुखी कवि की यह छटपटाहट है जो शब्दों में मुखर हुई है। असमानता इस प्रकार पसरी है कि किसी का जीवन सुख सुविधाओं में बीतता है तो किसी का कठिनाइयों में। कुछ क्षेत्र, जाति और वर्ग विशेष के नाम पर जन्मजात ही प्रतिष्ठा के अधिकारी बन जाते हैं। उन्हें सब कुछ बना बनाया मिलता है, तो ज्यादातर को अपने आधार के लिए खुद ही कमर तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। आधुनिकता और विकास का जिसे लाभ मिला उसे तो ठीक, लेकिन आम जन के लिए तो यह विकास भी भट्टा – पारसोल की तरह कठिन समस्याएं लेकर ही आता है और तब यह विकास सुखद बयार की तरह न लगकर आँधी की तरह साबित होता है। परिवर्तन की अंधी दौड़ में संस्कार विलुप्त हो रहे हैं, बिलकुल कजरौटे की तरह जो पहले कभी बच्चों के बिस्तर पर सिरहाने रखे जाया करते थे। इस भ्रष्ट तंत्र में पूरा लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, इसके पहले ही कुछ चतुर सुजान लोग चुपके से इसका बड़ा हिस्सा हजम कर जाते हैं और किसी को पता तक नहीं चल पाता। आम आदमी बद से बदतर होता जाता है और आज भी कठिनाइयों और समस्याओं से ग्रस्त है। इसके बावजूद वह आशाओं का दामन नहीं छोड़ता। वे जीवित रहती हैं। इसके साथ ही जीवन की कठिनतम परिस्थितियों में भी संघर्ष की जिजीविषा अँधेरे में ढिबरी और दियासलाई ढूंढने के रूप में बरकरार रहती है।

प्रस्तुत नवगीत में भाव बहुत ही सघन हैं। शब्द योजना सहज और अनुकूलतम है। बिम्बों में आकर्षण है क्योंकि वे नवीन अर्थों से सम्पन्न हैं। कालाहांडी, बस्तर और भिलाई क्रमशः आपदा, गरीबी और लाचारी तथा समृद्धि के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं -

इसी देश में

कालाहांडी, बस्तर

और भिलाई।

और संस्कारों के लोप के रूप में -

बच्चों के

सिरहाने से

गायब होते कजरौटे।

कठिनाइयों में भी संघर्ष –

अँधेरे में

ढूंढ रहे हम

ढिबरी, दियासलाई।

आदि बहुत अच्छे प्रयोग हैं। कवि की निष्ठा देशज है और पीड़ा की सह-अनुभूति भी। कवि के पास केवल प्रश्न ही नहीं है वरन समधान भी हैं और ये हृदय की गहराई से उद्भूत हैं। गीत की प्रांजलता उत्तम है। कवि जहां गीत के भावपक्ष के प्रति अत्यंत सजग रहा है, वहीं उसकी पैनी दृष्टि गीत के शिल्प पर भी समान रूप से रही है। इसीलिए सामान्य शब्दों में गीत मुखर हो उठा है। इस प्रकार कवि की कलम से एक सुघढ़ नवगीत का रसास्वादन करने को मिला है जिसमें दोष-दर्शन अति दुष्कर कार्य है।

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13 टिप्‍पणियां:

  1. तुषार जी के गीतों से मेरा परिचय भी हाल में ही हुआ है लेकिन उनके गीत से अत्यंत प्रभावित हूँ... नया स्वर.. नई व्यंजन है उनके गीत में... नए विम्ब लेके आते हैं उनके गीत.. आज अनच पर देख कर और भी अच्छा लगा... आज के समीक्षा तुषार जी के गीतों को और भी समझने में मदद करेगी..

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  2. कठिनाइयों में भी संघर्ष –
    अँधेरे में
    ढूंढ रहे हम
    ढिबरी, दियासलाई।
    बिल्कुल सही! सच्चाई को बड़े ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है आपने! लाजवाब समीक्षा!

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. समीक्षक ने गीत के सभी पहलुओं को बड़े ही सशक्त ढंग से प्रकाशित किया है।

    समीक्षक एवं कवि, दोनों को साधुवाद,

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  5. तुषार जी के गीत बहुत मार्मिक हैं और पाठक को प्रभावित करते हैं। समीक्षा से उनके नवगीत को विस्तार मिला है।

    आँच की धारा यूँ ही बहती रहे, यही अपेक्षा है,

    आभार,

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  6. भाई जय कृष्ण राय तुषार जी को पढ़ना सदैव ही एक सुखद अनुभूति देता है| आप के नवगीतों के तो हम दीवाने हैं भाई|

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  7. तुषार जी को जानना अच्छा लगा और समीक्षा तो होती ही है शानदार्।

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  8. तुषार जी की कुछ रचनाएँ पढ़ीं हैं.काफी प्राभ्व्शाली होती हैं.आपकी समीक्षा ने उन्हें और समझने में मदद की.

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  9. तुषार जी की लेखनी से निकाला गीत धरती का गीत है जो आम जान की पीडाओं से अनुप्राणित है.इनके बारे में जानना बहुत ही सुखद अनुभव है.

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  10. तुषार जी के नवगीतों का तो मैं जबरदस्त फ़ैन हूं।
    आज की समीक्षा की अंतिम पंक्ति सब कुछ कह देती है
    ** ~ कवि की कलम से एक सुघढ़ नवगीत का रसास्वादन करने को मिला है जिसमें दोष-दर्शन अति दुष्कर कार्य है।”

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  11. जयकृष्ण तुषार जी!
    निःसन्देह बहुत अच्छे साहित्यकार हैं!

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  12. दूसरे के हिस्से की रोटी को पचाने के लिए ही जिम और हेल्थ क्लब बनें हैं...नहीं तो ये अपने पेट पर उगते सूरज सी विराजमान हो जाती है...पता नहीं कब ये समझेंगे हम...सरल शब्दों में अपनी बात कहना कठिन बात है...बच्चन जी की भांति तुषार जी ने भी शब्दों पर अपनी महारत दिखा दी...हरीश जी की समीक्षा ने पढ़ने को विवश कर दिया...

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