बुधवार, 4 मई 2011

देसिल बयना – 79 : दही काढ़ते काँटा चुभा

-- करण समस्तीपुरी



जमाना बदल गया है। जनानी बदल गयी है। सब-कुछ बदल गया है। भला हुआ कि निरालाजी पहिलहि आके लिख गये, “वह तोड़ती पत्थड़…!” वर्ना आज-कल तो फूल तोड़ने में पसीना निकल आता है….! महाकवि को कुछ और कवित्त गढ़ना पड़ता। और तो और बाबूजी का स्वभाव भी बदल गया था। ई पहली बार हुआ था कि कुटुमैती-मेहमानी से बिना बताये देर से आयें और डाँट-डपट तक ना पड़े। और दफ़े तो बाबूजी पाछे, आगे-आगे डंडा सिंघजी ही खबर ले लेते थे।


बाबूजी के चेहरा पर कौनो विकार नहीं देखे तो हम भी चुप-चाप पैड़ छू कर आंगन में ससर (खिसक) गये। महतारी ने सबसे पहले फुलसुंघी भौजी का हाल-समाचार पूछा तब हमको घोर अचरज हुआ। फिर बाद में पता चला कि हमरे पहुँचे से पहिलहि छबीली मामी तार-फोन कर दी थी। “अच्छा….! इसीलिये बाबूजी के बगल में डंडा सिंघ दुखहरण विराजमान नहीं थे। बाबूजी छबीली मामी को बहुत आदर देते थे।


बोर्ड का इम्तिहान के कारण बटोरन भाई के ब्याह में जा नहीं सके थे। इम्तिहान खतम होते गेहुँ कटनी और दौनी का टाइम आ गया। छबीली मामी केतना बार समाद भेज चुकी थी। आखिर सतुआनि (बैसाखी) लगाके ननिहर जाने का औडर मिल गया। महतारी सनेस में सत्तु का एगो मोटरी भी बांध दी थी।


हमरे देखते ही घसीटन मामू देहरिये पर से चिल्लाये। छबीली मामी धरफ़र कर आयी। पर्दा के पाछे से बड़की भौजी का चेहरा झलका था। चुड़ियाँ कुछ ज्यादे खनकी थी….! मतलब उ अकेले तो नहिये होगी।


दलान पर बैठना चाहे तो मामी पहुँची (कलाई) पकड़ के आंगन ले गयी। बड़की भौजी से तो पुराना परिचय था। बड़ी हंसमुख थी। और छोटकी भौजी…. ! बाप रे ! उके देह में तो बकोटा भर मांस भी नहीं था। नामे के तरह फुलसुंघी थी।


मौसी के औडर से पहिलहि बड़की भौजी चली गयी नश्ता-पानी के जुगाड़ में और छोटकी माने कि फुलसुंघी भौजी वहीं देहरी पर बैठ कर हथपंखा झलने लगी। देह में तो दम नहीं था पंखा का हिलायेगी…. बेचारी पंखा पकड़ के खुदे हिल रही थी। हमको दया आ गया। उ ना… ना… करते रही और हम उके हाथ से पंखा छीन कर पूरबा-पछिया डोला दिये।


हमको तो लगा था कि बटोरन भाई के ब्याह के बाद बड़की भौजी को आराम हो गया होगा। मगर हम बेरिया से अगला दोपहर तक देखे। आहि रे बल्लैया के… सगरो काम तो उ अकेले ही करती है। फुलसुंघी भौजी को तो भोरे साग चुने में भी गिलास भर पानी पीना पड़ा था। बड़की भौजी और छबीली मामी दोनो सिनेह से कही थी, “बबुआन घर से है… देखते नहीं हो कैसन कोमल है….! गाँव-देहात के काम-काज का आदत नहीं है। इहां लकड़ी-धुकरी पर कैसे कलेउ पकायेगी….? कहीं खोंच-खरोंच, धुआँ-धुक्कर लग जायेगा तो….!” हमभी मन में ही कहे, “वाह रे नया जमाना के नयकी दुल्हिनिया……!”


मतलब कि मामी फुलसुंघी भौजी को दीया का धाह भी नहीं लगने देती थी। उ तो कलेउ का टाइम था और बड़की भौजी नहाने चली गयी थी इसीलिये बोली, “ए छोटकी दुल्हिन….! जरा सीका पर से दही के छांछ लाके बाबू को देना…!”


भौजी दही निकालने के लिये छटाक भर का चम्मच भी लेके आयी थी। छबीली मामी बोली, “ए दुल्हिनिया ! ई शहर-बजार के फ़ोकटिया हीरो नहीं है, जो दू चम्मच दही में नाक बहे लगेगा। छांछ में हाथ डाल के उड़ेल दो।”


फुलसुंघी भौजी एक लप दही हमरे थाली में डाल के दुबारा हाथ डाली कि उनकी चिख निकल गयी….’आह….!’ छांछ हाथ से छूटकर तीन टुकड़ा हो गया। भौजी अंगुली पकड़ के मैय्या-बप्पा करने लगी। बाहर से घसीटन मामू भी दौड़े आये। बड़की भौजी भी जैसे-तैसे साड़ी लपेट कर भागी आयी। हमभी खाना छोड़कर जूठे हाथ से ही फ़टाक से फुलसुंघी भौजी का हाथ पकड़कर अंगुली का मुआइना करने लगे। ले बल्लैया के…. भौजी के चौथी अंगुली से खून बिलबिला रहा है।”


“अरे… ई खून कैसे निकल रहा है… का हुआ कुछ बताओ तो….!” घसीटन मामू बोले। भौजी कह रही थी, “उ…उं…. काँटा जैसा था कुछ…. उं……उं…….. बहुत तेज चुभ गया है…. उं….उं….उं…… उं…..!”


हम गौर से देखे लगे। ओह…. सच्चे! भौजी की अंगुली में अभी तक फूस का एक तिनका जैसा कुछ चिपका हुआ था। हमको समझते देर नहीं लगी। फूल जैसी कोमल फुलसुंघी भौजी का दरद देखकर गुस्सा भी आ गया, “ई ससुर… गंवार आदमी सब….! बरतन-उरतन ठीक से साफ़-उफ़ करता नहीं है। लगता है गाय-भैंस को खिलाया होगा… वही घास-फूस का तिनका बरतन में चिपका रहा। उसी में दूध दूह लिया। आपलोग को भी छान के लेना चाहिये। सो नहीं…. तो सीधे औंट-पौर के रख दिये…!”


उधर घसीटन मामू भी छबीली मामी पर ही बरसने लगे, “हजार बार कहे हैं… इ का देह है काम करे वाला जो इससे खटवाती है…..!” मामू का परवचन कुछ देर चला था। बड़की भौजी तुलसी पत्ता का रस निचोड़ के फुलसुंघी भौजी के अंगुली पर लगाने के बाद कोठरी में लेजाकर माथा में बनफ़ूल का तेल घस रही थी।


मामू भी परवचन करके जाने लगे। छबीली मामी एकदम हक्का-बक्का हमरे पास ही खडी थी। बड़ी संताप से बोली, “बबुआ…. हमतो नयकी से अपने कौनो काम नहीं कहते हैं। कुछ करते भी दिखी तो उसे हटा के खुदे लग जाते हैं। अब हमरे मत्थे ई कलंक लगना था। इसीलिये दही काढ़ते काँटा चुभ गया।


खैर एक सप्ताह तक सुक्खु वैदजी के बूटी और मलहम के परताप से भौजी की अंगुली तो ठीक हो गयी मगर हम आज भी जब किसी को 'नेक काम करके दुख पाते हुए' देखते हैं तो छबीली मामी की बात याद आ जाती है, “आह… दही काढ़ते काँटा चुभ गया।

18 टिप्‍पणियां:

  1. भाई करन आज तो हमको भी छोटकी मामी याद आ गईं.... उनसे गप्प जितना ले लो... चापाकल से एक लोटा पानी भरने में उनकी कमर लचक जाती थी.... सुन्दर बयाना... मिथिला की पूरी संस्कृति की झलक है इसमें...

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  2. बहुत दिनो बाद देसिल बयना पढी हमेशा की तरह रोचक। शुभकामनायें।

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  3. घसीटन मामू
    फूलसुंघी भौजी
    और दही काढते काँटा चुभा................... बिल्कुल गाँवठी प्रस्तुति

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  4. मन को मोह गयी पोस्ट .....

    गंवई-गाँव की भाषा , चित्ताकर्षक शैली और मन में बसने वाले पात्र .....लालित्य पूर्ण कथा

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  5. दही काढ़ते काँटा चुभ गया..........

    ये कहावत तो पहली बार सुनी.बहुत बढ़िया लगी.

    पोस्ट बहुत रोचक और मज़ेदार.

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  7. हम त कहबे किये हैं कारन बाबू कि ई सब बयना सुनकर एकदम से पुरनका दिरिस सब आख के आगे डोमकच करे लगता है... अब हम का कहें, घर घर देखा-एक्के लेखा..
    फूल कुवारी का खिस्सा इयाद पड़ गया जिसको सात गद्दा पर सुताया गया था तैयो ऊ रात भर करवट बदलते काट दी. बाद में पता चला कि सतमाँ गद्दा के तर में एगो मकई का दाना रखा हुआ था अउर फूलकुवारी का पीठ पर लाल निसान पड़ गया था..
    मजेदार देसिल बयना... आज त हम देरियो नहीं किये हैं, टाइमली हैं!!

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  8. आज समझ भी आ गई यह पोस्ट और मन को भी भा गई.:)

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  9. बबुआ हमरे देह में तो आग लग गया फुलसुंघी भौजी के सुकुमारियत का खिस्सा सुनके...

    ऐसा बहुत सारा खिस्सा देखे हैं...और ऐसे प्रसंगों से घर गिरहस्थी टूटते भी देखे हैं...आज के जुग में पैसा ही सम्मान दिलाता है...अफसोसनाक है...क्या कहें...

    फकरा बड़ा बढ़िया याद दिलाये...

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  10. करण बाबू,
    बहुत दिन के बाद आए हैं आपके आंगन में। जनते ही थे कि बीमार हो गए थे।

    इस बार का देसिल बयना, बड़ा मज़ेदार रहा। और इसको पढ के लगा कि अब हमरे दुख कम हो जाएंगे। वैसे भी जब से ऑपरेशन हुआ ठाढ़ हो कर खाना बना नहीं पाते, और आज कल गैस के चुल्हा पर बैठ कर खाना बनता नहीं। ...

    त १२ के बाद तो दुल्हिन हमरा हेल्प त करिए देगी ... है न...? आ कि उसको भी साग चुने में गिलास भर पानी पीना पड़ेगा ... :):)

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  11. @ हस्यफुहार,
    हा...हा...हा...हा.... ! एगो और देसिल बयना है, 'गयी बात बहू के हाथ'.

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  12. फूलसुंघी भौजी jaisan naam oeisan kaam.

    bahut sunder chitran....

    jai baba banaras...

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  13. बहुत ही जानदार देसिल बयना। इसमें गांव की मिट्टी ई सोंधी-सोंधी खुश्बू है।

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