सोमवार, 23 मई 2011

नवगीत - मुक्त क्रीड़ामग्न होकर खिलखिलाना

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श्यामनारायण मिश्रश्यामनारायण मिश्र

ऊब जाओ  यदि  कहीं   ससुराल में

एक दिन के वास्ते ही गांव आना।

 

लोग   कहते   हैं   तुम्हारे  शहर में

हो   गये   दंगे   अचानक ईद को।

हाल  कैसे  हैं   तुम्हारे   क्या   पता

रात भर तरसा विकल मैं दीद को।

और,  वैसे  ही   सरल  है  आजकल

आदमी का ख़ून गलियों में बहाना।

 

शहर के ऊंचे मकानों के तले

रेंगते    कीड़े   सरीख़े   लोग।

औ’ उगलते हैं विषैला धुंआ

ये निरन्तर दानवी उद्योग।

छटपटाती  चेतना   होगी   तुम्हारी

ढ़ूंढ़्ने को मुक्त सा कोई ठिकाना।

 

बाग़  में  फूले   कदम्बों   के   तले

झूलने की लालसा होगी तुम्हारी।

पांव  लटका  बैठ मड़वे के किनारे

भूल जाओगी शहर की ऊब सारी।

बैठकर    चट्टान    पर    निर्झर    तले

मुक्त क्रीड़ामग्न होकर खिलखिलाना।

17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूबसूरत नवगीत ... ताज़गी देता हुआ

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  2. बाग़ में फूले कदम्बों के तले झूलने की लालसा होगी तुम्हारी। पांव लटका बैठ मड़वे के किनारे भूल जाओगी शहर की ऊब सारी। बैठकर चट्टान पर निर्झर तले मुक्त क्रीड़ामग्न होकर खिलखिलाना।

    बहुत सुन्दर नवगीत्।

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  3. बहुत सुन्दर भाव प्रवण गीत है।

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  4. लोग कहते हैं तुम्हारे शहर में
    हो गये दंगे अचानक ईद को।
    हाल कैसे हैं तुम्हारे क्या पता
    रात भर तरसा विकल मैं दीद को।
    बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण गीत! बढ़िया लगा!

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  5. उन्मुक्य अहसास ....उत्तम रचना

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  6. हमेशा की तरह दिल को छूता ही नहीं,सहलाता है यह नवगीत!!

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  7. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 24 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

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  8. बहुत सुन्दर नवगीत...एकदम ताज़गी भरा...

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  9. काश ऐसे ही समय बीते, निश्चिन्त।

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  10. कदम्ब के तले झूलना, झरने की कल कल ...
    गाँव का मनोहारी चित्रण शहर वालों को खींच ही लायेगा!

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  11. छटपटाती चेतना होगी तुम्हारी

    ढ़ूंढ़्ने को मुक्त सा कोई ठिकाना।

    बहुत सुंदर

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  12. बहुत खूबसूरत
    मानों गाँव की यात्रा पर निकले हों

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  13. ससुराल में इतने सुख कहाँ...बस बीवी को ना बताना...जो ताना-बाना आपने बुना है...बरबस गाँव की ओर खींच रहा है...बच्चों की छुट्टियाँ भी हो गईं हैं...

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  14. सुन्दर।

    गांव और शहर की तुलना करते समय गांव का नोस्टाल्जिया बहुधा मन मोहता है। पर कभी कभी भय होता है कि वह गांव कहीं बचा है या नहीं!

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  15. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |
    आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||
    --
    बुधवारीय चर्चा मंच

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