रविवार, 1 मई 2011

भारतीय काव्यशास्त्र-64

भारतीय काव्यशास्त्र-64

आचार्य परशुराम राय

पिछले अंक में कविप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के भेदों पर सोदाहरण चर्चा की गयी थी। इस अंक में कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के चार भेदों- वस्तु से वस्तु व्यंग्य, वस्तु से अलंकार व्यंग्य, अलंकार से वस्तु व्यंग्य और अलंकार से अलंकार व्यंग्य पर चर्चा की जाएगी।

वैसे कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के अन्तर्गत कविप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि को लिया जा सकता था पर कविप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि की अपेक्षा सहृदयों को कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि अधिक चमत्कारपूर्ण लगती है। क्योंकि कविनिबद्ध वक्ता में राग आदि का आवेश होने के कारण उसकी उक्ति में अधिक चमत्कार देखने को मिलता है, इसलिए इसको कविप्रौढोक्तिसिद्ध से अलग मानना ठीक रहेगा।

अब कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के एक-एक भेद का उदाहरण लेकर चर्चा करते हैं। सर्वप्रथम इसके प्रथम भेद वस्तु से वस्तु ध्वनि का उदाहरण लेते हैं। इसमें वसन्त का वर्णन किया गया है-

जे लंकागिरिमेहलासु खलिआ संभोगखिण्णोरई-

फारुप्फुल्लफणावलीकवलणे पत्ता दरिद्दतणम्।

ते एह्णिं मलआणिला विरहणीणीसाससंपक्किणो

जाता झत्ति सिसुत्तणे वि वहला तारुण्णपुण्णा विअ॥

(ये लङ्कागिरिमेखलासु स्खलिता: सम्भोगखिन्नोरगी-

स्फारोत्फुल्लफणावलीकवलने प्राप्ता दरिद्रत्वम्।

त इदानीं मलयानिला विरहिणीनि:श्वाससम्पर्किणो

जाता झटिति शिशुत्वेsपि बहलास्तारुण्यपूर्णा इव॥ इति संस्कृतम्)

अर्थात् लंकागिरि (हेमकूट पर्वत) की तलहटियों मे साँपों के डर से धीरे-धीरे चलनेवाली हवाएँ सम्भोग से थकी प्यासी सर्पिणियों के फैले हुए फनों से भक्षण कर लिए जाने से कम हो गयी थीं। आज मलय गिरि की वे हवाएँ वसन्त के शैशव (आरम्भ) में ही विरहिणियों के निःश्वासों के सम्पर्क में आकर तरुण और प्रचुर हो गयी हैं।

यहाँ निःश्वासों के सम्पर्क से शक्ति अर्थात् ऐश्वर्य प्राप्तकर मलयानिल क्या-क्या करेंगे, पता नहीं, यह वस्तु श्लोक में कही वस्तु से व्यंग्य है।

अब वस्तु से अलंकार व्यंग्य का उदाहरण लेते हैं-

सहि विरइऊण माणस्य मञ्झ धीरत्तणेण आसासम्।

पिअदंसणाविहलंखलखणम्मि सहसत्ति तेण ओसरिअम्॥

(सखि विरचय्य मानस्य मम धीरत्वेनाश्वासम्।

प्रियदर्शनविशृङ्खलक्षणे सहसेति तेनापसृतम्॥ इति संस्कृतम्॥)

अर्थात् हे सखि, तेरे द्वारा दिये गये धैर्य से मैंने अपने मान (ईर्ष्या के कारण उद्दीप्त रोष) को खूब आश्वस्त किया था, पर प्रियतम के दर्शन होने पर मेरे मान के पैर डगमगाने लगे और वह धैर्य अचानक गायब हो गया।

यहाँ श्लोक में प्रतिपादित वस्तु से बिना मनाए ही मान गयी, यह व्यंग्य है, अर्थात कारण के अभाव में कार्य का होने से विभावना अलंकार व्यंग्य है। अथवा प्रियतम के दर्शन से मिले सौभाग्य के बल को धैर्य सहन नहीं कर सकता, यह भी व्यंग्य निकलता है जो उत्प्रेक्षा अलंकार है। अतएव इस श्लोक मे वस्तु से अलंकार व्यंग्य है।

तीसरे भेद अलंकार से वस्तु व्यंग्य के लिए निम्नलिखित उदाहरण लेते हैं-

ओल्लोल्लकरअरअणख्खएहिं तुह लोअणेसु मह दिण्णम्।

रत्तंसुअं पसाओ कोवेण पुणो इमेण अक्कमिआ।।

(आद्रर्द्रिकरजरदनक्षतैस्तव लोचनयोर्मम दत्तम्।

रक्तांशकुं प्रसादः कोपेन पुनरिमे नाक्रान्ते।। इति संस्कृतच्छाया)

अर्थात् प्रतिनायिका के साथ सम्भोग के समय तुम्हारे शरीर पर लगे नाखून और दाँत के निशानों ने मेरी आँखों को जो लाल रंग का आवरण-पट प्रदान किया है, उससे ये लाल हुई हैं, क्रोध के कारण नहीं।

तुम आँखें क्यों लाल कर रही हो, इस प्रश्न के उत्तर के रूप में कहे होने के कारण यहाँ उत्तरालंकार है (जहाँ प्रतिवचन के सुनने मात्र से प्रश्न वाक्य की कल्पना कर ली जाती है, वहाँ उत्तरालंकार होता है)। इस अलंकार से यहाँ यह वस्तु ध्वनित हो रही है कि दाँत और नाखून के निशानों को छिपाने के लिए तुम मेरा आलिंगन कर रहे हो। इस प्रकार यहाँ अलंकार से वस्तु ध्वनि व्यंग्य है।

अव कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिसिद्ध अर्थशक्त्युत्थ ध्वनि के अन्तिम भेद अलंकार से अलंकार ध्वनि का उदाहरण लेते हैं-

महिलासहस्सभरिए तुह हिअए सुहअ सा अमाअन्ती।

अणुदिणमणण्णकम्मा अंगं तणुअं वि तणुएइ।।

(महिलासहस्रभरिते तव हृदये सुभग सा अमान्ती।

अनुदिनमनन्यकर्मा अङ्गं तन्वपि तनयति ॥इति संस्कृतम्)

अर्थात् हे सुभग, अनेक महिलाओं से भरे तुम्हारे हृदय में समा न सकने के कारण वह तन्वी प्रतिदिन सारे काम छोड़कर अपने दुबले शरीर को और कृश कर रही है।

यहाँ हेत्वालंकार (काव्यलिंग अलंकार) से विशेषोक्ति अलंकार व्यंग्य है। क्योंकि जहाँ युक्ति द्वारा कारण देकर वाक्य के अर्थ का समर्थन किया जाय, वहाँ काव्यलिंग या हेतु अलंकार होता है। अतएव उक्त श्लोक में काव्यलिंग अलंकार है। इससे यह व्यंजित होता है कि शरीर को कृश (दुबला) करने पर भी तुम्हारे हृदय में नहीं रह पा रही है, कारण के रहते हुए भी कार्य नहीं हो पा रहा है, अतएव विशेषोक्ति अलंकार व्यंग्य हुआ (कारण के होते हुए भी कार्य का न होना विशेषोक्ति अलंकार कहलाता है)। इस प्रकार यहाँ अलंकार से अलंकार व्यंग्य हुआ।

अगले अंक में उभयशक्त्युत्थ ध्वनि और संलक्ष्यक्रमव्यंग्य ध्वनि संबन्धी विषय पर शेष चर्चा की जाएगी।

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9 टिप्‍पणियां:

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  2. आपकी पोस्ट को सुबह में पढकर कोलज के दिनों की याद हो आती है. बहुत अच्छी श्रंखला. आभार.

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  3. भारतीय काव्यशास्त्र पर वृहद जानकारी से अवगत कराने के लिए आपका विशेष आभार।
    धन्यवाद।
    कभी-कभी मेरे पोस्ट पर भी आकर मार्ग-दर्शन करने की कृपा करें।
    आभारी रहूंगा।

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  4. बहुत ज्ञानवर्धक पोस्ट..आभार

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  5. इस महत्कर्म के लिए बारम्बार साधुवाद

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  6. आचार्यवर आभार आपका, आप ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं हम उसमें डुबकी लगा रहे हैं।

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  7. आचार्य जी की कक्षा का नियमित विद्यार्थी हूँ!! हाज़िर हैं श्रीमान!!

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  8. ज्ञानवर्धक पोस्ट
    आभार

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