शुक्रवार, 6 मई 2011

शिवस्वरोदय – 42

शिवस्वरोदय – 42

- आचार्य परशुराम राय

अष्टमे सिद्धयश्चैव नवमे निधयो नव।

दशमे दशमूर्तिश्च छाया चैकादशे भवेत्।।226।।

अन्वय – श्लोक अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय की आवश्यकता नहीं है।

भावार्थ – यदि श्वास की लम्बाई आठ अंगुल कम हो जाय, तो साधक को आठ सिद्धियों की प्राप्ति होती है, नौ अंगुल कम होने पर नौ निधियाँ प्राप्त होती हैं, दस अंगुल कम होने पर अपने शरीर को दस विभिन्न आकारों में बदलने की क्षमता आ जाती है और ग्यारह अंगुल कम होने पर शरीर छाया की तरह हो जाता है, अर्थात् उस व्यक्ति की छाया नहीं पड़ती है।

English Translation – If the length of breath is reduced eight fingers by yaugic practices, the practitioner acquires eight kinds of yaugic accomplishments (siddhis); if it is reduced by nine fingers, he/she becomes master of nine kinds of treasure; if ten fingers, he becomes competent to change his body in ten different shapes and if it is reduced by eleven fingers, the shadow of his body does not appears on the earth.

द्वादशे हंसचारश्च गङ्गामृतरसं पिबेत्।

आनखाग्रं प्राणपूर्णे कस्य भक्ष्यं च भोजनम्।।227।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – श्वास की लम्बाई बारह अंगुल कम होने पर साधक अमरत्व प्राप्त कर लेता है, अर्थात् साधना के दौरान ऐसी स्थिति आती है कि श्वास की गति रुक जाने के बाद भी वह जीवित रह सकता है, और जब साधक नख-शिख अपने प्राणों को नियंत्रित कर लेता है, तो वह भूख, प्यास और सांसारिक वासनाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है।

English Translation – In case the length of breath is reduced by twelve fingers (about nine inches) by yogic practices, the practitioner tastes nectar and becomes immortal and when he becomes able to control his life energy from toes to the top of head, he/she never feels thirst or hunger and becomes free from all kinds of worldly attractions.

एवं प्राणविधिः प्रोक्तः सर्वकार्यफलप्रदः।

ज्ञायते गुरुवाक्येन न विद्याशास्त्रकोटिभिः।।228।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ - ऊपर बताई गई प्राण-विधियाँ सभी कार्यों में सफलता प्रदान करती हैं। लेकिन प्राण को नियंत्रित करने की विधियाँ गुरु के सान्निध्य औरर कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है, विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन मात्र से नहीं।

English Translation – All above said conditions of breath give full success in every work stated therein. But it is not possible by study of different books on spiritual sciences, they are only possible by initiation by a master and his grace.

प्रातःश्चन्द्रो रविः सायं यदि दैवान्न लभ्यते।

मध्याह्नमध्यरात्रश्च परतस्तु प्रवर्त्तते।।229।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – यदि सबेरे चन्द्र स्वर और सायंकाल सूर्य स्वर संयोग से न प्रवाहित हों, तो वे दोपहर में या अर्धरात्रि में प्रवाहित होते हैं।

English Translation – If by the way breath does not flow from left nostril in the morning and from the right nostril at evening, it flows at noon and mid-night respectively.

दूरयुद्धे जयीचन्द्रः समासन्ने दिवाकरः।

वहन्नाड्यागतः पादः सर्वसिद्धिप्रदायकः।।230।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – दूर देश में युद्ध करनेवाले को चन्द्र स्वर के प्रवाहकाल में युद्ध के लिए प्रस्थान करना चाहिए और पास में स्थित देश में युद्ध करने की योजना हो तो सूर्य स्वर के प्रवाहकाल में प्रस्थान करना चाहिए। इससे विजय मिलती है। अथवा प्रस्थान के समय जो स्वर चल रहा हो, वही कदम पहले उठाकर युद्ध के लिए प्रस्थान करने से भी वह विजयी होता है।

English Translation – If someone is desirous of victory in a war at a distant place, he has to start when breath is running through left nostril. But when the place of war is a neighbor country, one must start when breath runs through right nostril or he should take first step of the side through which his breath is passing at the time of start.

यात्रारम्भे विवाहे च प्रवेशे नगरादिके।

शुभकार्याणि सिद्धयन्ति चन्द्रचारेषु सर्वदा।।231।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – यात्रा, विवाह अथवा किसी नगर में प्रवेश के समय चन्द्र स्वर चल रहा हो, तो सदा सारे कार्य सफल होते हैं, ऐसा स्वर-वैज्ञानिकों का मत है।

English Translation – Masters of this science are of opinion that at the time of journey, marriage and entering a city (including a village too), flow of breath through left nostril is always beneficial in all respect.

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6 टिप्‍पणियां:

  1. यह कक्षा भी ज्ञान वर्धक रही आचार्य जी की.
    आभार.

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  2. aadarniy sir
    bahut hi gyan vardhak jankaari jo hamesha hi aapke blog se milti rahi hai aur hamare liye to bahut hi achhi baat hai ki ghar baithe -baithe itana gyan aapse chura leti hun.-------;)
    apne bachcho ko batane ke liye kyon ki kachchi mitti ko sahi ruup shuru se hi diya jaaye to bhavishy mevah sahi aakaar le leta hai
    hardik abhinanadan
    poonam

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  3. आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं ! आपको सादर अभिवादन !

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  4. बहुत अच्छी और उपयोगी जानकारी।

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  5. बहुत अच्छी और उपयोगी जानकारी देने के लिए आपका आभार।

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