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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

शिवस्वरोदय – 73


शिवस्वरोदय 73
आचार्य परशुराम राय
पिछले अंक में शिवस्वरोदय का समापन हुआ। यह निश्चित किया गया था कि कुछ ऐसे पहलुओं पर चर्चा की जाय, जिनका बिना किसी गुरु के अभ्यास किया जा सकता है और वे निरापद तथा लाभप्रद भी हो। इसी उद्देश्य से यह अंक लिखा जा रहा है। जबतक सक्षम गुरु न मिल जाय या गहन साधना करने की उत्कण्ठा न हो, इस विज्ञान में बताई गयी निम्नलिखित बातों का नियमित पालन किया जा सकता है। इससे आपको दैनिक जीवन के कार्यों में सफलता मिलेगी, आपके आत्मविश्वास का स्तर काफी ऊँचा रहेगा, हीन भावना से मुक्त रहेंगे और आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा।   
1.     प्रातः उठकर विस्तर पर ही बैठकर आँख बन्द किए हुए पता करें कि किस नाक से साँस चल रही है। यदि बायीं नाक से साँस चल रही हो, तो दक्षिण या पश्चिम की ओर मुँह कर लें। यदि दाहिनी नाक से साँस चल रही हो, तो उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करके बैठ जाएँ। फिर जिस नाक से साँस चल रही है, उस हाथ की हथेली से उस ओर का चेहरा स्पर्श करें।
2.    उक्त कार्य करते समय दाहिने स्वर का प्रवाह हो, तो सूर्य का ध्यान करते हुए अनुभव करें कि सूर्य की किरणें आकर आपके हृदय में प्रवेश कर आपके शरीर को शक्ति प्रदान कर रही हैं। यदि बाएँ स्वर का प्रवाह हो, तो पूर्णिमा के चन्द्रमा का ध्यान करें और अनुभव करें कि चन्द्रमा की किरणें आपके हृदय में प्रवेश कर रही हैं और अमृत उड़ेल रही हैं।
3.    इसके बाद दोनों हाथेलियों को आवाहनी मुद्रा में एक साथ मिलाकर आँखें खोलें और जिस नाक से स्वर चल रहा है, उस हाथ की हथेली की तर्जनी उँगली के मूल को ध्यान केंद्रित करें, फिर हाथ मे निवास करने वाले देवी-देवताओं का दर्शन करने का प्रयास करें और साथ में निम्नलिखित श्लोक पढ़ते रहें-
कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करमूले तु गोविन्द प्रभाते करदर्शनम्।।
अर्थात कर (हाथ) के अग्र भाग में लक्ष्मी निवास करती हैं, हाथ के बीच में माँ सरस्वती और हाथ के मूल में स्वयं गोविन्द निवास करते हैं।
4.    तत्पश्चात् निम्नलिखित श्लोक का उच्चारण करते हुए माँ पृथ्वी का स्मरण करें और साथ में पीले रंग की वर्गाकृति (तन्त्र और योग में पृथ्वी का बताया गया स्वरूप) का ध्यान करें-
समुद्रवसने    देवि     पर्वतस्तनमण्डले।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।।
फिर जो स्वर चल रहा हो, उस हाथ से माता पृथ्वी का स्पर्श करें और वही पैर जमीन पर रखकर विस्तर से नीचे उतरें।
इसके दूसरे भाग में अपनी दिनचर्या के निम्नलिखित कार्य स्वर के अनुसार करें-
1.     शौच सदा दाहिने स्वर के प्रवाहकाल में करें और लघुशंका (मूत्रत्याग) बाएँ स्वर के प्रवाहकाल में।
2.    भोजन दाहिने स्वर के प्रवाहकाल में करें और भोजन के तुरन्त बाद 10-15 मिनट तक बाईँ करवट लेटें।
3.    पानी सदा बाएँ स्वर के प्रवाह काल में पिएँ।
4.    दाहिने स्वर के प्रवाह काल में सोएँ और बाएँ स्वर के प्रवाह काल में उठें।
स्वरनिज्ञान की दृष्टि से निम्नलिखत कार्य स्वर के अनुसार करने पर शुभ परिणाम देखने को मिलते हैं-
1.     घर से बाहर जाते समय जो स्वर चल रहा हो, उसी पैर से दरवाजे से बाहर पहला कदम रखकर जाएँ।
2.    दूसरों के घर में प्रवेश के समय दाहिने स्वर का प्रवाह काल उत्तम होता है।
3.    जन-सभा को सम्बोधित करने या अध्ययन का प्रारम्भ करने के लिए बाएँ स्वर का चुनाव करना चाहिए।
4.    ध्यान, मांगलिक कार्य आदि का प्रारम्भ, गृहप्रवेश आदि के लिए बायाँ स्वर चुनना चाहिए।
5.    लम्बी यात्रा बाएँ स्वर के प्रवाहकाल में और छोटी यात्रा दाहिने स्वर के प्रवाहकाल में प्रारम्भ करनी चाहिए।
6.    दिन में बाएँ स्वर का और रात्रि में दाहिने स्वर का चलना शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टि से सबसे अच्छा माना गया है।
इस प्रकार धीरे-धीरे एक-एक कर स्वर विज्ञान की बातों को अपनाते हुए हम अपने जीवन में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर सकते हैं। इस विषय को यही विराम दिया जा रहा है। स्वर-रूप भगवान शिव और माँ पार्वती आप सभी के जीवन को सुखमय और समृद्धिशाली बनाएँ।******

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

शिवस्वरोदय – 69


शिवस्वरोदय – 69

आचार्य परशुराम राय

इस अंक को प्रारम्भ करने के पहले यह बता देना आवश्यक है कि निम्नलिखित श्लोकों में प्राणायाम की प्रक्रिया और उससे होनेवाले लाभ की चर्चा की गयी है। पर, पाठकों से अनुरोध है कि वे प्राणायाम किसी सक्षम व्यक्ति से सीखकर ही अभ्यास करें, विशेषकर जिनमें कुम्भक प्राणायाम को सम्मिलित करना हो। प्राणायाम की अनगिनत प्रक्रियाएँ हैं और उनके प्रयोजन भी भिन्न हैं। विषय पर आने के पहले एकबार फिर पाठकों से अनुरोध है कि कुम्भक युक्त प्राणायाम एक सक्षम साधक के सान्निध्य और मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

पूरकः कुम्भकश्चैव रेचकश्च तृतीयकः।

ज्ञातव्यो योगिभिर्नित्यं देहसंशुद्धिहेतवे।।376।।

भावार्थ – इस श्लोक में प्राणायाम के अंगों और उससे होनेवाले लाभ की ओर संकेत किया गया है। प्राणायाम में पूरक, कुम्भक और रेचक तीन क्रियाएँ होती हैं। योगी लोग इसे शरीर के विकारों को दूर करने के कारण के रूप में जानते हैं। अतएव इसका प्रतिदिन अभ्यास करना चाहिए। पूरक का अर्थ साँस को अपनी पूरी क्षमता के अनुसार अन्दर लेना है। रेचक का अर्थ है साँस को पूर्णरूपेण बाहर छोड़ना। तथा कुम्भक का अर्थ है पूरक करने के बाद साँस को यथाशक्ति अन्दर या रेचक क्रिया के बाद साँस को बाहर रोकना। इसीलिए यह (कुम्भक) दो प्रकार का होता है- अन्तः कुम्भक और बाह्य कुम्भक।

English Translation – In this verse steps of breathing exercise and its benefits have been stated. There are three steps of breathing exercise- inhaling the breath with full capacity is called Purak, exhaling it fully is called Rechak and holding the breath inside after inhaling and outside after exhaling, as much as someone can do, is called Kumbhak (Antah and Bahya Kumbhak respectively). This exercise is known to Yogis for purification the body.

पूरकः कुरुते वृद्धिं धातुसाम्यं तथैव च।

कुम्भके स्तम्भनं कुर्याज्जीवरक्षाविवर्द्धनम्।।377।।

भावार्थ – पूरक से शरीर की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषण मिलता है और शरीर की रक्त, वीर्य आदि सप्त धातुओं में सन्तुलन आता है। कुम्भक से उचित प्राण-संचार होता है और जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है।

English Translation – Inhalation nourishes and develops the body; and maintains balance in seven primary substances, i.e. blood, fat, seminal fluid etc. Holding of the breath regulates and increases vital energy in our body.

रेचको हरते पापं कुर्याद्योगपदं व्रजेत्।

पश्चातसंग्रामवत्तिष्ठेल्लयबन्धं च कारयेत्।।378।।

भावार्थ – रेचक करने से शरीर का पाप मिटता है, अर्थात् शरीर और मन के विकार दूर होते हैं। इसके अभ्यास से साधक योगपद प्राप्त करता है (अर्थात् योगी हो जाता है) और शरीर में सर्वांगीण सन्तुलन स्थापित होता है तथा साधक मृत्युजयी बनता है।

English Translation – Exhalation removes sins from the body, it means it removes impurities from the body and mind. Its practitioner attains enlightenment and gets his body balanced in all respect and thus overcomes death.

कुम्भयेत्सहजं वायुं यथाशक्ति प्रकल्पयेत्।

रेचयेच्चन्द्रमार्गेण सूर्येणापूरयेत्सुधीः।।379।।

भावार्थ – सुधी व्यक्ति को दाहिने नासिका रन्ध्र से साँस को अन्दर लेना चाहिए, फिर यथाशक्ति सहज ढंग से कुम्भक करना चाहिए और इसके बाद साँस को बाँए नासिका रन्ध्र से छोड़ना चाहिए।

English Translation – A wise person should therefore inhale the breath through right nostril, hold it as long as he can do easily and thereafter exhale it through left nostril.

चन्द्रं पिबति सूर्यश्च सूर्यं पिबति चन्द्रमाः।

अन्योन्यकालभावेन जीवेदाचन्द्रतारकम्।।380।।

भावार्थ – जो लोग चन्द्र नाड़ी से साँस अन्दर लेकर सूर्य नाड़ी से रेचन करते हैं और फिर सूर्य नाड़ी से साँस अन्दर लेकर चन्द्र नाड़ी से उसका रेचन करते हैं, वे जब तक चन्द्रमा और तारे रहते हैं तब तक जीवित रहते हैं (अर्थात् दीर्घजीवी होते हैं)। यह अनुलोम-विलोम या नाड़ी-शोधक प्राणायाम की विधि है।

English Translation – The person, who inhales the breath through left nostril and exhales through right nostril; and again inhales through right nostril and exhales through left nostril, remains alive till the moon and stars exist. In other words his longevity goes up like anything.

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शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

शिवस्वरोदय - 68


शिवस्वरोदय - 68

आचार्य परशुराम राय

शरीरं नाशयन्त्येते दोषा धातुमलास्तथा।

समस्तु वायुर्विज्ञेयो बलतेजोविवर्धनः।।371।।

भावार्थ – धातु और मल-मूत्र के दोष शरीर का नाश कर देते हैं। प्राण वायु के संतुलन से इन दोषों में कमी आती है, जिससे शारीरिक शक्ति और तेज बढ़ते हैं।

English Translation – Disturbances in seminal fluid and excreta cause vital harm to our body. Balance in respiratory system strengthens the body and increases its glow.

रक्षणीयस्ततो देहो यतो धर्मादिसाधनम्।

योगाभ्यासात्समायान्ति साधुयाप्यास्तु साध्यताम्।

असाध्या जीवितं घ्नन्ति न तत्रास्ति प्रतिक्रिया।।372।।

भावार्थ – अतएव धर्म आदि के साधनरूप इस शरीर की रक्षा करनी चाहिए। योगाभ्यास के लिए शरीर को नियमित रूप से तैयार करना चाहिए। क्योंकि असाध्य रोग जीवन को नष्ट कर देते हैं और योगाभ्यास के अतिरिक्त इन असाध्य रोगों का दूसरा कोई उपचार भी नहीं है।

English Translation – The body, being medium for doing the work properly, should be therefore protected by yogic practices. Otherwise incurable diseases will destroy our body and there is no means other than yogic practices to get them cured.

येषां हृदि स्फुरति शाश्वतमद्वितीयं

तेजस्तमोनिवहनाशकरं रहस्यम्।

तेषामखण्डशशिरम्यसुकान्तिभाजां

स्वप्नोSपि नो भवति कालभयं नराणाम्।।373।।

भावार्थ – जिन मनुष्यों के हृदय में इस शाश्वत् अद्वितीय रहस्य (स्वरोदय विज्ञान) का स्फुरण होता है, उसपर महादेव भागवान शिव की कृपा होती है। इससे उसका शरीर चन्द्रमा की तरह आलोकित हो जाता है और स्वप्न में भी उसे मृत्यु का भय नहीं होता।

English Translation – The individuals are fortunate to get eternal bliss when this eternal and unique knowledge of this science is realized by them. This realization makes their body glowing like moon and protects them from the fear of death.

इडा गङ्गेति विज्ञेया पिङ्गला यमुना नदी।

मध्ये सरस्वतीं विद्यात्प्रयागादिसमस्तथा।।374।।

भावार्थ – इडा नाड़ी को गंगा, पिंगला को यमुना और इनके मध्य में स्थित सुषुम्ना नाड़ी को सरस्वती के नाम से जाना जाता है। जहाँ इन तीनों नाड़ियों का मिलन होता है उसे प्रयाग (भ्रूमध्य) कहते हैं।

English Translation – Ida channel is known as river Ganges, Pingala as Yamuna and Sushumna as river Saraswati. Their confluence is the greatest pilgrimage Prayag and that is centre place between eye-brows.

आदौ साधनमाख्यातं सद्यः प्रत्ययकारकम्।

बद्धपद्मासनो योगी बन्धयेदुड्डियानकम्।।375।।

भावार्थ – शीघ्र सिद्धि देनेवाली साधना की प्रक्रिया बताते हैं - सबसे पहले योगी को पद्मासन में बैठकर उड्डियान बन्ध लगाना चाहिए।

English Translation – Now the technique of practice, which enables the practitioners to attain yogic accomplishments quickly - first, the practitioner should master Uddiyan Bandh by sittin Lotus Posture.

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

शिवस्वरोदय – 54


शिवस्वरोदय – 54
-    आचार्य परशुराम राय
चन्द्रनाडी यदा प्रश्ने गर्भे कन्या तदा भवेत्।
सूर्यो भवेत् तदा पुत्रो द्वयोर्गर्भो विहन्यते।।293।।
भावार्थ – यदि गर्भ के सम्बन्ध में कोई प्रश्न करे और स्वर-योगी (उत्तर देनेवाले) का उस समय यदि चन्द्र स्वर प्रवाहित हो, तो गर्भस्थ संतान कन्या और यदि सूर्य-स्वर प्रवाहित हो, तो पुत्र होता है। किन्तु यदि सुषुम्ना प्रवाहित हो, तो गर्भपात समझना चाहिए।
English Translation – In case, someone asks about the issue being born as a result of pregnancy and at that time if the breath of Swar-yogi (answering authority) is flowing through left nostril, the answer will be that a female child is going to be born and if the breath is in the right nostril, birth of a male child can be predicted. But if breath is flowing through both the nostrils, prediction of abortion should be made.     
पृथिव्यां पुत्री जले पुत्रः कन्यका तु प्रभञ्जने।
तेजसि गर्भपातः स्यान्नभस्यपि नपुंसकः।।294।।
भावार्थ – यदि प्रश्न के समय स्वर में पृश्वी या वायु तत्त्व प्रवाहित हो, तो गर्भस्थ संतान कन्या, जल तत्त्व प्रवाहित हो, तो पुत्र, अग्नि तत्त्व का प्रवाहकाल होने पर गर्भपात और आकाश तत्त्व का प्रवाह-काल होने पर नपुंसक संतान उत्पन्न होने का योग समझा जाय।
English Translation – If Prithvi Tattva or Vayu Tattva is present in the breath at the time of query about the issue, birth of a female is predicted and if there is Jala Tattva, it is son. But in presence of Agni Tattva in the breath, prediction will be abortion and in presence of Akash Tattva, birth of eunuch is indicated. 
चन्द्रे स्त्री पुरुषः सूर्ये मध्यमार्गे नपुंसकः।
गर्भप्रश्ने यदा दूतः पूर्णे पुत्रः प्रजायते।।295।।
भावार्थ – प्रश्न काल में चन्द्र स्वर का प्रवाह हो तो लड़की होने की, सूर्य स्वर का प्रवाह हो तो लड़का होने की और यदि सुषुम्ना स्वर प्रवाहित हो तो नपुंसक संतान की उत्पत्ति समझनी चाहिए। उस समय यदि प्रश्नकर्त्ता का स्वर पूर्ण रूप से प्रवाहित हो तो पुत्र पैदा होने की भविष्यवाणी करनी चाहिए। 
English Translation – If the breath is present in the left nostril at the time of query about an issue being born, a female child is predicted, presence of breath in right nostril indicates birth of a male child and if both nostrils are running, birth of an eunuch is predicted. But if at the time of query, the questioner has his breath full and free in any of the nostrils, birth of a male child is indicated.
शून्ये  शून्यं  युगे  युग्मं गर्भपातश्च संक्रमे।
तत्ववित्स विजानीयात् कथितं तत्तु सुन्दरि।।296।।
भावार्थ – हे सुन्दरि, यदि शून्य स्वर के प्रवाह-काल में गर्भाधान नहीं होता, पर दोनों स्वर संतुलित रूप से प्रवाहित हो रहे हों, तो जुड़वाँ संतान होती है। लेकिन स्वर का संक्रमण काल होने पर गर्भाधान होता तो है, पर उसका पतन हो जाता है, ऐसा तत्त्ववादियों की मान्यता है।
English Translation – O Beautiful Goddess, as a result of intercourse at the time of flow of breath through both nostrils, conception is not possible, but if balanced breath in both the nostrils is present, birth of twins takes place. But in case of conception during the transition of breath from one nostril to another indicates abortion as per wises.
गर्भाधानं मारुते स्याच्च दुःखी दिक्षु ख्यातो वारुणे सौख्ययुक्तः।
गर्भस्रावः स्वल्पजीवश्च वह्नौ भोगी भव्यः पार्थिवेनार्थयुक्तः।।297।।
भावार्थ – वायु तत्त्व के प्रवाहकाल में हुए गर्भाधान के परिणाम स्वरूप उत्पन्न संतान दीन-हीन और अभागी होती है, जल तत्त्व के प्रवाहकाल में गर्भाधान से उत्पन्न संतान सुखी और गौरवशाली होती है, अग्नि तत्त्व में गर्भाधान ठहरता नहीं, यदि ठहर गया तो इस प्रकार उत्पन्न संतान अल्पायु होती है, पर पृथ्वी तत्त्व के प्रवाहकाल में हुए गर्भाधान के परिणाम स्वरूप उत्पन्न संतान धन-धान्य से युक्त आनन्द का उपभोग करनेवाली होती है।
English Translation – If at the time of conception Vayu Tattva is present in the breath, the child being born will have miserable life, as a result of conception in presence of Jala Tattva indicates, a child is born with all name and fame and prosperity. In presence of Agni Tattva conception either impossible or in case it takes place, the child being born gets short life. But a child born as a result of conception during the flow of Prithvi Tattva in the breath, gets prosperity and all kinds of pleasure in its life.   
धनवान्  सौख्ययुक्तश्च  भोगवानर्थ  संस्थितिः।
स्यान्नित्यं वारुणे तत्त्वे व्योम्नि गर्भो विनश्यति।।298।।
भावार्थ – जल तत्त्व के प्रवाहकाल में गर्भाधान से उत्पन्न संतान धन-धान्य और ऐश्वर्य से सम्पन्न होती है। परन्तु आकाश तत्त्व के प्रवाहकाल का गर्भाधान नहीं ठहरता।
English Translation – A child born as a result conception during the presence of Jala Tattva in the breath, gets all kinds of prosperity and pleasures in his life. But in presence of Akash Tattva conception is not possible or abortion takes place.
महीन्द्रे  सुसुतोत्पत्तिर्वारुणे  दुहिता भवेत्।
शेषेषु गर्भहानिः स्याज्जातमात्रस्य वा मृतः।।299।।
भावार्थ – पृथ्वी तत्त्व के प्रवाहकाल के गर्भ से सुपुत्र उत्पन्न होता है और जल तत्त्व के प्रवाहकालिक गर्भ से कन्या का जन्म होता है। जबकि अन्य तीन तत्त्वों के प्रवाहकाल में गर्भ नहीं ठहरता और यदि ठहर गया, तो उससे उत्पन्न संतान अल्पायु होती है।
English Translation – As a result of conception during of presence  of Prithivi Tattva in the breath a worthy son will be born but in case of conception during presence of Jal Tattva, daughter will be born. Whereas during presence of other three Tattvas conception either does not take place or if it takes place, the child is born with short life. 
रविमध्यगतश्चन्द्रश्चन्द्रमध्यगतो   रविः।
ज्ञातव्यं गुरुतः शीघ्रं न वेदशास्त्रकोटिभिः।।300।।
भावार्थ – सूर्य स्वर के मध्य में चन्द्र स्वर उदय हो अथवा चन्द्र स्वर के मध्य में सूर्य स्वर उदय हो, तो ऐसे समय में तुरन्त गुरु से मिलकर मार्ग-दर्शन लेना चाहिए। क्योंकि ऐसे समय में करोड़ों वेद, शास्त्र आदि ग्रंथ भी किसी काम के नहीं होते।
      यह श्लोक प्रस्तुत संदर्भ से बिलकुल अलग है।
English Translation – When left breath starts before completion of right breath or right breath starts before completion of left breath without any external effort, then it is advised to get guidance from the master of this science. Because in such situation all scriptures, including  Vedas  and other Shastras, are of no use.
            Here it is mentioned that this verse given here is independent and it has no reference to the conception or otherwise.  

शुक्रवार, 6 मई 2011

शिवस्वरोदय – 42

शिवस्वरोदय – 42

- आचार्य परशुराम राय

अष्टमे सिद्धयश्चैव नवमे निधयो नव।

दशमे दशमूर्तिश्च छाया चैकादशे भवेत्।।226।।

अन्वय – श्लोक अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय की आवश्यकता नहीं है।

भावार्थ – यदि श्वास की लम्बाई आठ अंगुल कम हो जाय, तो साधक को आठ सिद्धियों की प्राप्ति होती है, नौ अंगुल कम होने पर नौ निधियाँ प्राप्त होती हैं, दस अंगुल कम होने पर अपने शरीर को दस विभिन्न आकारों में बदलने की क्षमता आ जाती है और ग्यारह अंगुल कम होने पर शरीर छाया की तरह हो जाता है, अर्थात् उस व्यक्ति की छाया नहीं पड़ती है।

English Translation – If the length of breath is reduced eight fingers by yaugic practices, the practitioner acquires eight kinds of yaugic accomplishments (siddhis); if it is reduced by nine fingers, he/she becomes master of nine kinds of treasure; if ten fingers, he becomes competent to change his body in ten different shapes and if it is reduced by eleven fingers, the shadow of his body does not appears on the earth.

द्वादशे हंसचारश्च गङ्गामृतरसं पिबेत्।

आनखाग्रं प्राणपूर्णे कस्य भक्ष्यं च भोजनम्।।227।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – श्वास की लम्बाई बारह अंगुल कम होने पर साधक अमरत्व प्राप्त कर लेता है, अर्थात् साधना के दौरान ऐसी स्थिति आती है कि श्वास की गति रुक जाने के बाद भी वह जीवित रह सकता है, और जब साधक नख-शिख अपने प्राणों को नियंत्रित कर लेता है, तो वह भूख, प्यास और सांसारिक वासनाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है।

English Translation – In case the length of breath is reduced by twelve fingers (about nine inches) by yogic practices, the practitioner tastes nectar and becomes immortal and when he becomes able to control his life energy from toes to the top of head, he/she never feels thirst or hunger and becomes free from all kinds of worldly attractions.

एवं प्राणविधिः प्रोक्तः सर्वकार्यफलप्रदः।

ज्ञायते गुरुवाक्येन न विद्याशास्त्रकोटिभिः।।228।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ - ऊपर बताई गई प्राण-विधियाँ सभी कार्यों में सफलता प्रदान करती हैं। लेकिन प्राण को नियंत्रित करने की विधियाँ गुरु के सान्निध्य औरर कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है, विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन मात्र से नहीं।

English Translation – All above said conditions of breath give full success in every work stated therein. But it is not possible by study of different books on spiritual sciences, they are only possible by initiation by a master and his grace.

प्रातःश्चन्द्रो रविः सायं यदि दैवान्न लभ्यते।

मध्याह्नमध्यरात्रश्च परतस्तु प्रवर्त्तते।।229।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – यदि सबेरे चन्द्र स्वर और सायंकाल सूर्य स्वर संयोग से न प्रवाहित हों, तो वे दोपहर में या अर्धरात्रि में प्रवाहित होते हैं।

English Translation – If by the way breath does not flow from left nostril in the morning and from the right nostril at evening, it flows at noon and mid-night respectively.

दूरयुद्धे जयीचन्द्रः समासन्ने दिवाकरः।

वहन्नाड्यागतः पादः सर्वसिद्धिप्रदायकः।।230।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – दूर देश में युद्ध करनेवाले को चन्द्र स्वर के प्रवाहकाल में युद्ध के लिए प्रस्थान करना चाहिए और पास में स्थित देश में युद्ध करने की योजना हो तो सूर्य स्वर के प्रवाहकाल में प्रस्थान करना चाहिए। इससे विजय मिलती है। अथवा प्रस्थान के समय जो स्वर चल रहा हो, वही कदम पहले उठाकर युद्ध के लिए प्रस्थान करने से भी वह विजयी होता है।

English Translation – If someone is desirous of victory in a war at a distant place, he has to start when breath is running through left nostril. But when the place of war is a neighbor country, one must start when breath runs through right nostril or he should take first step of the side through which his breath is passing at the time of start.

यात्रारम्भे विवाहे च प्रवेशे नगरादिके।

शुभकार्याणि सिद्धयन्ति चन्द्रचारेषु सर्वदा।।231।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।

भावार्थ – यात्रा, विवाह अथवा किसी नगर में प्रवेश के समय चन्द्र स्वर चल रहा हो, तो सदा सारे कार्य सफल होते हैं, ऐसा स्वर-वैज्ञानिकों का मत है।

English Translation – Masters of this science are of opinion that at the time of journey, marriage and entering a city (including a village too), flow of breath through left nostril is always beneficial in all respect.

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शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

अंक – 15 :: शिव स्वरोदय

आचार्य परशुराम राय

इस अंक में नाड़ियों की स्थिति तथा प्राणों के नाम सहित स्थान का विवरण दिया जा रहा हैः-

इडा वामे स्थिता भागे पिङ्गला दक्षिणे स्मृता।

सुषुम्ना मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुषि।।38।।

अन्वय – वामे भागे इडा स्थिता, दक्षिणे (भागे) पिङ्गला स्मृता, मध्यदेशे तु सुषुम्ना वाम चक्षुषि गान्धारी।

दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे च दक्षिणे।

यशस्विनी वामकर्णे आनने चाप्यलम्बुषा।।39।।

अन्वय – दक्षिणे (चक्षुषि) हस्तिजिह्वा, दक्षिणे कर्णे पूषा,

वाम कर्णे यशस्विनी आनने च अलम्बुषा।

कुहूश्च लिङ्गदेशे तु मूलस्थाने तु शङ्खिनी।

एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठन्ति दशनाडिकाः।।40।।

अन्वय –लिङ्गदेशे तु कुहूः मूलस्थाने तु च शङ्किनी।

एवं द्वारं समाश्रित्य दशनाडिकाः तिष्ठन्ति।

इडा पिङ्गला सुषुम्ना च प्राणमार्गे समाश्रिताः।

एता हि दशनाड्यस्तु देहमध्ये व्यवस्थिताः।।41।।

अन्वय –प्राणमार्गे इडा पिङ्गला सुषुम्ना च समाश्रिताः।

देहमध्ये तु एताः दश नाड्यः व्यवस्थिताः

img1100625044_1_1 भावार्थः - उक्त चार श्लोकों को अर्थ सुविधा की दृष्टि से एक साथ लिया जा रहा है। शरीर के बाएँ भाग में इडा नाड़ी, दाहिने भाग में पिंगला, मध्य भाग में सुषुम्ना, बाईं आँख में गांधारी, दाहिनी आँख में हस्तिजिह्वा, दाहिने कान में पूषा, बाएँ कान में यशस्विनी, मुखमण्डल में अलम्बुषा, जननांगों में कुहू और गुदा में शांखिनी नाड़ी स्थित है। इस प्रकार से दस नाड़ियाँ शरीर के उक्त अंगों के द्वार पर अर्थात् ये अंग जहाँ खुलते हैं, वहाँ स्थित हैं।

इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियाँ प्राण मार्ग में स्थित हैं। इस प्रकार दस नाडियाँ उक्त अंगों में शरीर के मध्य भाग में स्थित हैं। (38-41 तक)

English Translation:- For comprehensive points of view all th e four slokas are

(From 38-41) Translated together. Here locations of the Nadis are stated-

Nadis Location

Ida Left side of the body

Pingla Right side of the body

ShuShumna Middle of the body

Gandhari Left eye

Hastigikvva Right eye

Yashaswini Left ear

Pusha Right ear

Alambusha Mouth

Kuhu Genital organ

Shankihini Anal region

However, Ida, Pingala and ShuShumna exist in respiratory passage.

नामान्येतानि नाडीनां वातानान्तु वदाम्यहम्।

प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च।।42।।

नागः कूर्मोऽथकृकलो देवदत्तो धनञ्जयः।

हृदि प्राणो वसेन्नित्यमपानो गुह्यमण्डले।।43।।

समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमध्यगः।

व्यानो व्यापि शरीरेषु प्रधानाः दशवायवः।।44।।

प्राणाद्याः पञ्चविख्याताः नागाद्याः पञ्चवायवः।

तेषामपि पञ्चनां स्थानानि च वदाम्यहम्।।45।।

उद्गारे नाग आख्यातः कूर्मून्मीलने स्मृतः।

कृकलो क्षुतकृज्ज्ञेय देवदत्तो विजृंम्भणे।।46।।

जहाति मृतं वापिसर्वव्यापि धनञ्जयः।

एते नाडीषु सर्वासु भ्रमन्ते जीवरूपिणः।।47।।

भावार्थ - हे शिवे, नाड़ियों के बाद अब मैं तुम्हें इनसे संबंधित वायुओं (प्राणों) के विषय में बताऊँगा। इनकी भी संख्या दस है। दस में पाँच प्रमुख प्राण है और पाँच सहायक प्राण हैं। पाँच मुख्य वायु (प्राण) है- प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान। सहायक प्राण वायु हैं - नाग, कूर्म, कृकल (कृकर), देवदत्त और धनंजय। प्रमुख पाँच प्राणों की स्थिति निम्नवत है।

प्राण वायु स्थिति

प्राण हृदय

अपान उत्सर्जक अंग

समान नाभि

उदान कंठ

व्यान पूरे शरीर में

पाँच सहायक प्राण-वायु के कार्य निम्न लिखित हैं-

सहायक प्राण-वायु कार्य

नाग डकार आना

कूर्म पलकों का झपकना

कृकल छींक आना

देवदत्त जम्हाई आना

धनंजय यह पूरे शरीर में व्याप्त रहता है मृत्यु के बाद भी कुछ तक समय यह शरीर में बना रहता है।

इस प्रकार ये दस प्राण वायु दस नाड़ियो से होकर शरीर में जीव के रुप में भ्रमण करते रहते हैं, अर्थात् सक्रिय रहते हैं।

इन श्लोकों के अन्वय की आवश्यकता नहीं है। इसलिए यहाँ इनके अन्वय नहीं दिए जा रहे हैं। (42-47)

English Translation - O shive, after describing Nadis, now I am going to tell you about Pran-vayus connected with Nadis. They are ten in numbers. Five out of ten Vayus are main, whereas remaining five are sub-pranas. The main Pran-Vagus are – Prana, Apana, Samana, Udana and Vyana. And sub-pranas are- Naga, Kurma, Krikal (krikar), Devadatta and Dhananjaya. Locations of five main Prana. Vayus are as under:-

Prana Vayu Location

Prana Heart

Apana Excretory organs]

Samana Navel region

Udan Throat

Vyan Whole body

Functions of five sub-Pranas are mentioned here under:-

Sub-Pranas Functions

Nagh Belchinl

Kurma Dropping of eye-liols

Krikar Sneezing

Devadatta Yawning

Dhananjaya This exists in the whole body and it remains active for some time in the body even after death.

Thus, these ten Pran a Vayus remain active through the said ten Nadis and act in the body like living being.

These Shlokas do not need their prose order (anvaya) and therefore same are not given here. (42-47)

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

शिव स्वरोदय - शरीर में स्थित नाडियां

शिव स्वरोदय - शरीर में स्थित नाडियां

आचार्य परशुरामराय

प्रस्तुत अंक में शरीर में स्थित नाडियों के विषय में शिवस्वरोदय में वर्णित तथ्य दिए जा रहे हैं।

देहमध्ये स्थिता नाड्यो बहुरूपाः सुविस्तरात्।

ज्ञातव्याश्च बुधैर्नित्यं स्वदेहज्ञानहेतवे।।31।।

अन्वय – देहमध्ये स्थिताः ना़ड्यः सुविस्तरात् बहुरूपाः। बुधैः स्वदेहज्ञानहेतवे नित्यं ज्ञातव्याः।

भावार्थ - मनुष्य के शरीर में अनेक नाड़ियों का जाल बिछा हुआ है। बुद्धिमान लोगों को अपने शरीर को अच्छी तरह जानने के लिए इनके विषय में अवश्य जानना चाहिए।

English Translation – Many nerves are spread in the body. Wise persons should know about them. It enable to understand our body well.

नाभिस्थानककन्दोर्ध्वमंकुरा       इव      निर्गताः।

द्विसप्ततिसहस्त्राणि देहमध्ये व्यवस्थिताः।।32।।

अन्वय – नाभिस्थानककन्दोर्ध्वम् अंकुरा इव निर्गताः व्यवस्थिताः (नाड्यः) देहमध्ये द्विसप्ततिसहस्त्राणि।

भावार्थ – शरीर में नाभि केंद्र से ऊपर की ओर अंकुर की तरह निकली हुई हैं और पूरे शरीर में व्यवस्थित ढंग से फैली हुई हैं।

English Translation – These nerves raised from navel centre like sprout and spread through out our body in well arranged manner. However, here they are known as energy channels

नाडीस्था     कुण्डली     शक्तिर्भुजङ्गाकारशायिनी।

ततो दशोर्ध्वगा नाड्यो दशैवाधः प्रतिष्ठिताः।।33।।

अन्वय - नाडीस्था भुजङ्गाकारशायिनी कुण्डलीशक्तिः। ततो दश उर्ध्वगा नाड्यः दश एव अधः प्रतिष्ठिताः।

भावार्थ – इन नाड़ियों में सर्पाकार कुण्डलिनी शक्ति सोती हुई निवास करती है। वहां से दस नाड़ियां ऊपर की ओर गयी हैं और दस नीचे की ओर।

English Translation – Kundalini Shakti, the power which controls functions of our body and whole universe as well, resides in the shape of serpent in these energy channels in the dormant stage. However, its abode is Muladhar Chakra. There from ten energy channels goes upwards and ten downwards in our body.

द्वे द्वे तिर्यग्गते नाड्यो चतुर्विंशति सङ्ख्यया।

प्रधाना  दशनाड्यस्तु   दशवायुप्रवाहिकाः।।34।।

अन्वय – द्वे द्वे तिर्यग्गते नाड्यः सङ्ख्यया चतुर्विशति, (तेषु) दशवायुप्रवाहिकाः दशनाड्यस्तु प्रधानाः।

भावार्थ – दो-दो नाड़ियाँ शरीर के दोनों ओर तिरछी गयी हैं। इस प्रकार दस ऊपर, दस नीचे और चार शरीर के दोनों तिरछी जाने वाली नाड़ियाँ संख्या में चौबीस हैं। किन्तु उनमें दस नाडियाँ मुख्य हैं जिनसे होकर दस प्राण हमारे शरीर में निरन्तर प्रवाहित होते रहते हैं।

English Translation - Two pairs of energy channels go transversally towards ears. Thus, there are twenty four main energy channels in our body. Among them there are ten, which are more important and through them pranic energy flows.

तिर्यगूर्ध्वास्तथाSधःस्था        वायुदेहसमन्विताः।

चक्रवत्संस्थिता देहे सर्वाः प्राणसमाश्रिताः।।35।।

अन्वय - तिर्यग्-ऊर्ध्वाः तथा अधः देहे वायुसमन्विताः चक्रवत् सर्वाः (नाड्यः) देहे प्राणसमाश्रिताः संस्थिताः।

भावार्थ – ऊपर और नीचे विपरीत कोणों से निकलने वाली ये नाड़ियाँ शरीर में जहाँ आपस में मिलती हैं वहाँ ये चक्र का आकार बना लेती हैं। किन्तु इनका नियंत्रण प्राण शक्ति से ही होता है।

English Translation– Upwards, down wards and transversal running these channels cross each other. These crossing points are called centers and controlled by pranic energy.

तासां   मध्ये  दश  श्रेष्ठा  दशानां  तिस्र  उत्तमाः।

इडा च पिङ्गला चैव सषुम्ना च तृतीयका।।36।।

अन्वय – तासां मध्ये दश (नाड्यः) श्रेष्ठाः, दशानाम् (अपि) तिस्रः उत्तमाः – इडा

च पिङ्गला चैव सुषुम्ना च तृतीयका।

भावार्थ – इन चौबीस नाडियों में दस श्रेष्ठ हैं और उनमें भी तीन सर्वोत्तम हैं –

इडा, पिंगला और सुषुम्ना।

English Translation – As stated above there are ten important energy channels out of twenty four and out of ten, three energy channels are the most important and they are Ida, Pingala and Sushumna.

गांधारी   हस्तिजिह्वा  च  पूषा  चैव   यशस्विनी।

अलम्बुषा कुहूश्चैव शङ्खिनी दशमी तथा।।37।।

अन्वय – गांधारी, हस्तिजिह्वा च पूषा यशस्विनी चैव अलम्बुषा, कुहूः शङ्खिनी

चैव दशमी तथा।

भावार्थ – उक्त तीन नाड़ियों के अलावा सात नाड़ियाँ हैं – गांधारी, हस्तिजिह्वा,

पूषा, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू और शंखिनी।

English Translation – Other seven energy channels are Gandhari, Hastijihva, Pusha, Yashaswini, Alambusha, Kuhu and Shankhini.

अगले अंक में नाड़ियों के स्थान के बारे में चर्चा की जाएगी।

(चित्र :: आभार गूगल सर्च)

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

शिव स्वरोदय-12

शिव स्वरोदय-12

आचार्य परशुराम राय

अथ स्वरं प्रवक्ष्यामि शरीरस्थस्वरोदयम्।

हंसचारस्वरूपेण भवेज्ज्ञानं त्रिकालजम्।।10।।

अन्वयः अथ शरीरस्थ स्वरोदयं स्वरं प्रलक्ष्यामिं।

हंसचाररुपेण त्रिकालजं ज्ञानं भवेत्।

भावार्थः हे देवि, इसके बाद मैं अब तुम्हें शरीर में स्थित स्वरोदय को व्यक्त करने वाले स्वर के विषय में बताता हूँ। यह स्वर “हंस” रूप है अर्थात् जब साँस बाहर निकलती है तो ‘हं’ की ध्वनि होती है और जब साँस अन्दर जाती है तो ‘सः (सो)’ की ध्वनि होती है। इसके संचरण के स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर तीनों काल- भूत, भविष्य और वर्तमान हस्तामलवक हो जाते हैं।

English Translation : O Goddess , Now I am going to tell you about Swara which , existing the body, epresses the pattern of breathing. This swar Sounds Ham (हं) when it goes out of the body and ‘Sah’ (सः) when enters the body. A person who knows its existence as wel as it movement fully, he is aware of time factor- it may be present, past or future.

गुह्याद् गुह्यतरं सारमुपकार-प्रकाशनम्।

इदं स्वरोदयं ज्ञानं ज्ञानानां मस्तके मणिः।।11।।

अन्वयः- इदं स्वरोदयं ज्ञानं गुह्यात् गुहयतरम् सारम्

उपकार-प्रकाशनम् च ज्ञानानां मस्तके मणि (इन अस्ति)।

भावार्थः (हे देवि), स्वरोदय का ज्ञान अत्यन्त गोपनीय ज्ञानों से भी गोपनीय है। यह अपने ज्ञाता का हर प्रकार से हित करता है। यह स्वरोदय ज्ञान सभी ज्ञानों के मस्तक पर मणि के समान है, अर्थात् यह ज्ञानी के लिए अमूल्य रत्न से भी बढ़कर है।

English Translation : (O Goddess) this knowledge of Swaroday is the most secret knowledge among all secret knowledges. This is very beneficial to those who are in possession of this great knowledge. This knowledge has been said the greatest knowledge of all i.e. This is precious gem for a wise.

सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं ज्ञानं सुबोधं सत्यप्रत्ययम्।

आश्चर्यं नास्तिके लोके आधारं त्वास्तिके जने।।12।।

अन्वयः सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरम् (इदं) ज्ञानं सुबोधं सत्यप्रत्ययं च (अस्ति)।

(इदं) लोके नास्तिके आश्चर्यं आस्तिके जने तु आधारम् (अस्ति)।

भावार्थः- सूक्ष्म से भी सूक्ष्म होने पर भी यह ज्ञान सुबोध और सत्य का साधन है अर्थात् सत्य का बोध कराने वाला है। यह नास्तिकों को आश्चर्य में डालने वाला और आस्तिकों के लिए उनकी आस्था का आधार है।

Enlish Translation: This is Subthiest knowledge of all subtle knowledges, but still easily intelligible and also realization of the Truth. This is the most wonder among the wonders for atheist and solid ground for transformation to the theist.

शांते शुद्धे सदाचारे गुरूभक्त्यैकमानसे।

दृढ़चित्ते कृतज्ञे च देयं चैव स्वरोदयम्।।13।।

अन्वयः- शांते शुद्धे सदाचारे गुरुभक्त्या एकमानसे

दृढ़चित्ते कृतज्ञे च स्वरोदयं (ज्ञानं) देयम्।

भावार्थः- (हे देवि) जिस व्यक्ति की प्रकृति शांत हो गयी हो, जिसका चित्त शुद्ध हो, सदाचारी हो, अपने गुरु के प्रति एकनिष्ठ हो, जिसका निश्चय दृढ़ हो, ऐसे पुनीत आचरण वाले व्यक्ति को स्वरोदय ज्ञान की दीक्षा देनी चाहिए या ऐसा व्यक्ति स्वरोदय ज्ञान का अधिकारी होता है।

English Translation: A person of tranquil nature, pure mind, virtuous conduct fidelity to his master and courage only can be initiated in this tradition of knowledge.

दुष्टे च दुर्जने क्रुद्धे नास्तिके गुरुतल्पगे।

हीनसत्त्वे दुराचारे स्वरज्ञानं न दीयते।।14।।

अन्वयः- दुष्टे, दुर्जने, क्रुद्धे, नास्तिके, गुरूतल्पगे,

हीनसत्त्वे दुराचारे च स्वरज्ञानं न दीयते।

भावार्थः- दुष्ट, दुर्जन, क्रोधी, नास्तिक, कामुक, सत्त्वहीन और दुराचारी को स्वरोदय ज्ञान की दीक्षा कभी नहीं देनी चाहिए।

English Translation: A person who is an unrighteous, wicked, wild, atheist, full of lust or an unspirited, should not be initiated in Swarodaya.

शृणु त्वं कथितं देवि देहस्थ ज्ञानमुत्तमम्।

येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्त्वं प्रणीयते।।15।।

अन्वयः- हे देवि, त्वं देहस्थम् उत्तमं ज्ञानं शृणु,

येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रणीयते।

भावार्थः- हे देवि शरीर में स्थित इस उत्तम ज्ञान को सुनो, जिसे विशेष रुप जान लेने पर (व्यक्ति) सर्वज्ञ हो जाता है।

English Translation: O Goddess listen this greatest knowledge available in this body and it makes its seer omniscient.

स्वरे वेदाश्च शास्त्राणि स्वरे गांधर्वमुत्तमम्।

स्वरे च सर्वत्रैलोक्यं स्वरमात्मस्वरुपकम्।।16।।

अन्वयः- स्वरे वेदाः च शास्त्राणि च स्वरे उत्तमं गांधर्वं,

स्वरे च सर्वत्रैलोक्यं स्वरम् आत्मस्वरूपकम्।

भावार्थः सभी वेदों, शास्त्रों, संगीत आदि उत्तम ज्ञान स्वर में ही सन्निविष्ट है। हमारे अस्तित्व की तीनों अवस्थाएँ- चेतन, अवचेतन और अचेतन स्वर मे ही संगुम्फित हैं। (और क्या कहूँ?) स्वर ही आत्म-स्वरूप है।

English Translation: This Swara includes knowledge of all Vedas, Shastras, music etc. Three levels of our existence remain in Swara. Moreover this is the soul itself.

स्वरहीनः दैवज्ञो नाथहीनं यथा गृहम्।

शास्त्रहीनं यथा वक्त्रं शिरोहीनं च यद्वपुः।।17।।

अन्वयः स्वरहीनः दैवज्ञः यथा नाथहींन गृहं (भवति),

यथा शास्त्रहींन वक्त्रं शिरोहीनः वपुः च।

भावार्थः- स्वरोदय विज्ञान के ज्ञान के अभाव में एक ज्योतिषी वैसे ही है, जैसे बिना स्वामी का घर, शास्त्र-ज्ञान के बिना मुख और बिना शिर के शरीर। अर्थात् एक ज्योतिषि के लिए स्वर-ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है।

English Translation: An Astrloger without knowledge of Swarodays is like the house without master, voice without knowledge and body without head. As such, the knowledge of Swaroday to him (an astrologer) is the most useful for his profession.

नाडीभेदं तथा प्राणतत्त्वभेदं तथैव च।

सुषुम्नामिश्रभेदं च यो जानाति स मुक्तिगः।।18।।

अन्वयः नाड़ीभेदं तथा प्राणतत्त्वभेदं च तथैव (तेषां)

सुषुम्नामिश्रभेदं यः जानाति सः मुक्तिगः।

भावार्थः- नाड़ियों, प्राणों तथा तत्त्वों के भेद का यथावत ज्ञान और सुषुम्ना के साथ उनके संयोग को जो व्यक्ति विवेक पूर्वक जानता है, वह मुक्ति पाने का अधिकारी होता है।

English Translation: The knowledge of Nadis, Life Energies, Tattvas and their relation with Sushumna if a person has in their nature he is liberated from the worldly bondage.

साकारे वा निराकारे शुभवायुबलात्कृतम्।

कथयन्ति शुभं केचित्स्वरज्ञाने वरानने।।19।।

अन्वयः हे वरानने, स्वरज्ञाने शुभवायुबलात् साकारे निराकारे वा

(किं) शुभं कृतम् इति केचित् कथयन्ति।

भावार्थः- हे सुमुखि, स्वर का ज्ञान होने पर शुभ स्वर के प्रभाव से विद्वान दृष्ट और अदृष्ट जो शुभ है, उसका कथन करते है, अर्थात् दृष्ट और अदृष्ट रुप से क्या शुभ और क्या अशुभ है, बताते हैं।

English Translation: O Beautiful Goddess, wise men have the knowledge of Swarodaya, can tell visible or invisible good or bad effect with the help of breathing pattern arising at the time of question put before them by anybody.

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

शिव स्वरोदय

शिव स्वरोदय

 

आचार्य परशुराम राय

'शिव स्वरोदय' स्वरोदय विज्ञान पर अत्यन्त प्राचीन ग्रंथ है। इसमें कुल 395 श्लोक हैं। यह ग्रंथ शिव-पार्वती संवाद के रूप में लिखा गया है। शायद इसलिए कि सम्पूर्ण सृष्टि में समष्टि और व्यष्टि का अनवरत संवाद चलता रहता है और योगी अन्तर्मुखी होकर योग द्वारा इस संवाद को सुनता है, समझता है और आत्मसात करता हैं। इस ग्रंथ के रचयिता साक्षात् देवाधिदेव भगवान शिव को माना जाता है। यहाँ शिव स्वरोदय के श्लोकों का हिन्दी और अंग्रेजी में अनुवाद दिया जाएगा। आवश्यकतानुसार व्याख्या भी करने का प्रयास किया जाएगा। वैसे यह ग्रंथ बहुत ही सरल संस्कृत भाषा में लिखा गया है।

इसमें बतायी गयी साधनाओं का अभ्यास बिना किसी स्वरयोगी के सान्निध्य के करना वर्जित है। केवल निरापद प्रयोगों को ही पाठक अपनाएँ।

महेश्वरं नमस्कृत्य शैलजां गणनायकम्।

गुरुं च परमात्मानं भजे संसार तारकम्।।1।।

अन्वय -- महेश्वरं शैलजां गणनायकं संसारतारकं

गुरुं च नमस्कृत्य परमात्मानं भजे।

अर्थ:- महेश्वर भगवान शिव, माँ पार्वती, श्री गणेश और संसार से उद्धार करने वाले गुरु को नमस्कार करके परमात्मा का स्मरण करता हूँ।

English Translation : First I salute Lord Shiva , Divine Mother Parvati, Shri Ganesha and Guru, who liberates us from the worldly bondage, i.e. birth and death, I surrender to The Cosmic Soul.

देवदेव महादेव कृपां कृत्वा ममोपरि।

सर्वसिद्धिकरं ज्ञानं वदयस्व मम प्रभो।।2।।

अन्वय -- देवदेव महादेव यम प्रभो यमोपरि कृपां कृत्वा

सर्वसिद्धिकरं ज्ञानं वदयस्व।

अर्थ:- माँ पार्वती ने भगवान शिव से कहा कि हे देवाधिदेव महादेव, मेरे स्वामी, मुझ पर कृपा करके सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाले ज्ञान प्रदान कीजिए।

English Translation : Divine Mother Parvati said to Lord Shiva, “O lord of gods and my Master, you are requested to tell me the knowledge, which bestows all powers.”

कथं बह्माण्डमुत्पन्नं कथं वा परिवर्त्तते।

कथं विलीयते देव वद ब्रह्माण्डनिर्णयम्।।3।।

अन्वय -- देव, कथं ब्रहमाण्डं उत्पन्नं, कथं परिवर्तते, कथं

विलीयते वा ब्रहमाण्ड-निर्णयं च वद।

अर्थ:- हे देव, मुझे यह बताने की कृपा करें कि यह ब्रह्माण्ड कैसे उत्पन्न हुआ, यह कैसे परिवर्तित होता है, अन्यथा यह कैसे विलीन हो जाता है, अर्थात् इसका प्रलय कैसे होता है और ब्रह्माण्ड का मूल कारण क्या है?

English Translation : “O Lord, please tell me how this universe was created, how it gets changed, how it gets desolved and who decides this universe, i.e. what prime cause of this universe is.”

तत्त्वाद् ब्रह्याण्डमुत्पन्नं तत्त्वेन परिवर्त्तते।

तत्त्वे विलीयते देवि तत्त्वाद् ब्रह्मा़ण्डनिर्णयः।।4।

अन्वय-- ईश्वर उवाच - देवि, तत्वाद् ब्रह्माण्डम् उत्पन्नं, तत्वेन

परिवर्त्तते, तत्वे (एव) विलीयते, तत्वाद् (एव)

ब्रह्माण्डनिर्णय: (च)।

अर्थ:- भगवान बोले - हे देवि, यह ब्रह्माण्ड तत्व से उत्पन्न होता है, तत्व से परिवर्तित होता है, तत्व में ही विलीन हो जाता है और तत्व से ही ब्रह्माण्ड का निर्णय होता है, अर्थात् तत्व ही ब्रह्माण्ड का मूल कारण है। (इस प्रकार सृष्टि का अनन्त क्रम चलता रहता है)

English Translation : Lord Shiva said to Her, “O Divine Power, this universe was created by tattva (The Supreme Being), it is sustained by this and it is ultimately dissolved in this only. Tattva is the only cause of this creation, and thus the process of this creation continues without any end.”

तत्वमेव परं मूलं निश्चितं तत्त्ववादिभिः।

तत्त्वस्वरूपं किं देव तत्त्वमेव प्रकाशय।।5।।

अन्वय --देव्युवाच – देव, परं मूलं तत्वम् निश्चितम् एव कथम? तत्ववादिभि: तत्वस्वरूपं किम्? (तत्) तत्वं प्रकाशय।

अर्थ:- हे देव! किस प्रकार (सृष्टि, स्थिति, संहार एवं इनके निर्णय) का मूल कारण तत्व हैं? तत्ववादियों ने उसका क्या स्वरूप बताया है? वह तत्व क्या है?

English Translation : The Goddess said to Lord Shiva, “ O Lord, in what way The Tattva is is the prime cause (of creation, its changes, its dissolve and decision about all these three). How it has been described by the sages who are seer of it. What This Tattva is really.”

निरंजनो निराकार एको देवो महेश्वरः।

तस्मादाकाशमुत्पन्नमाकाशाद्वायुसंभवः।।6।।

अन्वय -- ईश्वर उवाच - निरञ्जन: निराकार: एक: देव: महेष्वर:

(तदेव तत् तत्वम्)। तस्माद् (एव) आकाशम् उत्पन्नम्

आकाशाद् वायु: सम्भव:।

अर्थ:- हे देवि, अजन्मा और निराकार एक मात्र देवता महेश्वर हैं, वे ही इस जगत प्रपंच के मूल कारण हैं। उन्हीं देव से सर्वप्रथम यह आकाश उत्पन्न हुआ और आकाश से वायु उत्पन्न हुआ।

English Translation : Lord Shiva said to Her, “O Goddess, Lord Maheshwar, who is without birth and form, is the only tattva and prime cause for creation, sustainability and dissolvability of this universe. First, the ether was created and thereafter air there from.”

वायोस्तेजस्ततश्चापस्ततः पृथ्वीसमुद्भवः।

एतानि पंचतत्त्वानि विस्तीर्णानि पंचधा ।।7।।

अन्वय --वायो: तेज: तत: आप: तत: पृथिव्या: (तत्वम्) समुद्भव: (भवति)। एतानि पञ्चतत्वानि विस्तीर्णानि पञचधा।

अर्थ:- वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथ्वी का उद्भव हुआ। इन पाँच प्रकार से ये पंच महाभूत विस्तृत होकर (समष्टि रूप से) सृष्टि करते हैं।

English Translation : “Tejas, the fire, was created by Vayu, the air. Tejas created by Apas, the water, and water created earth. And thus these five tattvas were evoluted.

तेभ्यो ब्रह्माण्डमुत्पन्नं तैरेव परिवर्त्तते।

विलीयते च तत्रैव तत्रैव रमते पुनः।।8।।

अन्वय -- तेभ्यो ब्रह्माण्डम् उत्पन्नं, तै: एव परिवर्तते, विलीयते

तत्रैव एव, तत्र एव च रमते पुन:।

अर्थ:- उन्हीं पंच महाभूतों से ब्रह्माण्ड उत्पन्न होता है, उन्हीं के द्वारा परिवर्तित होता है और उन्हीं में विलीन हो जाता है तथा सृष्टि का क्रम सतत् चलता रहता है।

English Translation : This universe is created by these five tattavas. They only cause changes in the universe and this is dissolved in the them to create changes further. Thus this creation continues endlessly.

पंचतत्त्वमये देहे पंचतत्त्वानि सुन्दरि।

सूक्ष्म रुपेण वर्त्तन्ते ज्ञायन्ते तत्त्वयोगिभिः।।9।।

अन्वय -- (हे) सुन्दरि, पंचतत्वमये देहे पंचतत्वानि सूक्ष्मरूपेण

वर्तन्ते, तत्वयोगिभि: ज्ञायन्ते।

अर्थ:- हे सुन्दरि, इन्हीं पाँच तत्वों से निर्मित हमारे शरीर में ये पाँचों तत्व सूक्ष्म रूप से सक्रिय रहते हैं, जिनसे हमारे शरीर में परिवर्तन होता रहता है। इनका पूर्ण ज्ञान तत्वदर्शी योगियों को ही होता है। यहाँ तत्वायोगी का अर्थ तत्व की साधना कर तत्वों के रहस्यों के प्रकाश का साक्षात् करने वाले योगियों से है।

English Translation : O Beauty Explorer Goddess, these tattavas exist in the subtle form in the body made of them only. They cause changes there too. They open their secrets before those yogis who meditate on them as per instructions of their masters (Guru).