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शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

शिवस्वरोदय – 69


शिवस्वरोदय – 69

आचार्य परशुराम राय

इस अंक को प्रारम्भ करने के पहले यह बता देना आवश्यक है कि निम्नलिखित श्लोकों में प्राणायाम की प्रक्रिया और उससे होनेवाले लाभ की चर्चा की गयी है। पर, पाठकों से अनुरोध है कि वे प्राणायाम किसी सक्षम व्यक्ति से सीखकर ही अभ्यास करें, विशेषकर जिनमें कुम्भक प्राणायाम को सम्मिलित करना हो। प्राणायाम की अनगिनत प्रक्रियाएँ हैं और उनके प्रयोजन भी भिन्न हैं। विषय पर आने के पहले एकबार फिर पाठकों से अनुरोध है कि कुम्भक युक्त प्राणायाम एक सक्षम साधक के सान्निध्य और मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।

पूरकः कुम्भकश्चैव रेचकश्च तृतीयकः।

ज्ञातव्यो योगिभिर्नित्यं देहसंशुद्धिहेतवे।।376।।

भावार्थ – इस श्लोक में प्राणायाम के अंगों और उससे होनेवाले लाभ की ओर संकेत किया गया है। प्राणायाम में पूरक, कुम्भक और रेचक तीन क्रियाएँ होती हैं। योगी लोग इसे शरीर के विकारों को दूर करने के कारण के रूप में जानते हैं। अतएव इसका प्रतिदिन अभ्यास करना चाहिए। पूरक का अर्थ साँस को अपनी पूरी क्षमता के अनुसार अन्दर लेना है। रेचक का अर्थ है साँस को पूर्णरूपेण बाहर छोड़ना। तथा कुम्भक का अर्थ है पूरक करने के बाद साँस को यथाशक्ति अन्दर या रेचक क्रिया के बाद साँस को बाहर रोकना। इसीलिए यह (कुम्भक) दो प्रकार का होता है- अन्तः कुम्भक और बाह्य कुम्भक।

English Translation – In this verse steps of breathing exercise and its benefits have been stated. There are three steps of breathing exercise- inhaling the breath with full capacity is called Purak, exhaling it fully is called Rechak and holding the breath inside after inhaling and outside after exhaling, as much as someone can do, is called Kumbhak (Antah and Bahya Kumbhak respectively). This exercise is known to Yogis for purification the body.

पूरकः कुरुते वृद्धिं धातुसाम्यं तथैव च।

कुम्भके स्तम्भनं कुर्याज्जीवरक्षाविवर्द्धनम्।।377।।

भावार्थ – पूरक से शरीर की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषण मिलता है और शरीर की रक्त, वीर्य आदि सप्त धातुओं में सन्तुलन आता है। कुम्भक से उचित प्राण-संचार होता है और जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है।

English Translation – Inhalation nourishes and develops the body; and maintains balance in seven primary substances, i.e. blood, fat, seminal fluid etc. Holding of the breath regulates and increases vital energy in our body.

रेचको हरते पापं कुर्याद्योगपदं व्रजेत्।

पश्चातसंग्रामवत्तिष्ठेल्लयबन्धं च कारयेत्।।378।।

भावार्थ – रेचक करने से शरीर का पाप मिटता है, अर्थात् शरीर और मन के विकार दूर होते हैं। इसके अभ्यास से साधक योगपद प्राप्त करता है (अर्थात् योगी हो जाता है) और शरीर में सर्वांगीण सन्तुलन स्थापित होता है तथा साधक मृत्युजयी बनता है।

English Translation – Exhalation removes sins from the body, it means it removes impurities from the body and mind. Its practitioner attains enlightenment and gets his body balanced in all respect and thus overcomes death.

कुम्भयेत्सहजं वायुं यथाशक्ति प्रकल्पयेत्।

रेचयेच्चन्द्रमार्गेण सूर्येणापूरयेत्सुधीः।।379।।

भावार्थ – सुधी व्यक्ति को दाहिने नासिका रन्ध्र से साँस को अन्दर लेना चाहिए, फिर यथाशक्ति सहज ढंग से कुम्भक करना चाहिए और इसके बाद साँस को बाँए नासिका रन्ध्र से छोड़ना चाहिए।

English Translation – A wise person should therefore inhale the breath through right nostril, hold it as long as he can do easily and thereafter exhale it through left nostril.

चन्द्रं पिबति सूर्यश्च सूर्यं पिबति चन्द्रमाः।

अन्योन्यकालभावेन जीवेदाचन्द्रतारकम्।।380।।

भावार्थ – जो लोग चन्द्र नाड़ी से साँस अन्दर लेकर सूर्य नाड़ी से रेचन करते हैं और फिर सूर्य नाड़ी से साँस अन्दर लेकर चन्द्र नाड़ी से उसका रेचन करते हैं, वे जब तक चन्द्रमा और तारे रहते हैं तब तक जीवित रहते हैं (अर्थात् दीर्घजीवी होते हैं)। यह अनुलोम-विलोम या नाड़ी-शोधक प्राणायाम की विधि है।

English Translation – The person, who inhales the breath through left nostril and exhales through right nostril; and again inhales through right nostril and exhales through left nostril, remains alive till the moon and stars exist. In other words his longevity goes up like anything.

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शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

शिवस्वरोदय – 66


शिवस्वरोदय – 66

आचार्य परशुराम राय

प्रातः पृष्ठगते रवौ च निमिषाच्छायाङ्गुलीश्चाधरं

दृष्ट्वान्धेनमृतिस्त्वनन्तरमहोच्छायां नरः पश्यति।

तत्कर्णांसकरास्य पार्श्वहृदयाभावे क्षणार्थात्स्वयं

दिङ्मूढो हि नरः शिरोविगमतो मासांस्तु षड्जीवति।।361।।

भावार्थ – सबेरे सूर्योदय के बाद सूर्य की ओर पीठ करके खड़ा होना चाहिए और अपनी छाया पर मन को केन्द्रित करना चाहिए। यदि छाया की उँगलियाँ न दिखाई पड़े, तो तुरन्त मृत्यु समझना चाहिए। यदि पूरी छाया न दिखाई पड़े, तो भी तत्काल मृत्यु समझनी चाहिए। कान, सिर, चेहरा, हाथ, पीठ या छाती का भाग न दिखाई पड़े, तो भी समझना चाहिए कि मृत्यु एकदम सन्निकट है। लेकिन यदि छाया का सिर न दिखे और दिग्भ्रम हो, तो उस व्यक्ति का जीवन केवल छः माह समझना चाहिए।

English Translation – Someone stands straight in the morning after sunrise keeping the Sun on the back side and concentrates mind on the shadow. If fingers of the shadow are not visible, he should understand that his death is present there. If whole shadow is not visible, he is to die immediately. If ears, head, face, hands, back or chest part is not visible in the shadow, then also he is to die then and there. But if head of shadow is not visible and at the same he suffers from paranoia of directions, his life is left for six months.

एकादिषोडषा हानिर्यदि भानुर्निरन्तरम्।

वहेद्यस्य भवेन्मृत्युः शेषाहेन मासिकम्।।362।।

भावार्थ – किसी व्यक्ति का दाहिना स्वर लगातार सोलह दिन तक चलता रहे, तो उसका जीवन महीने के बचे शेष दिनों तक, अर्थात् केवल 14 दिन समझना चाहिए।

English Translation – If the breath of a person runs through right nostril continuously for sixteen days, his life is left only for fourteen days.

सम्पूर्णं वहते सूर्यश्चन्द्रमा नैव दृश्यते।

पक्षेण जायते मृत्युः कालज्ञेनानुभाषितम्।।363।।

भावार्थ – कालज्ञान रखनेवाले योगियों का मत है कि यदि दाहिना स्वर लगातार चले तथा बाँया स्वर बिलकुल न चले, तो समझना चाहिए कि उस व्यक्ति की मृत्यु पन्द्रह दिन में हो जाएगी।

English Translation – If breath of a person flows through right nostril for a long without break and no breath through left nostril, his death takes place in 15 days according to Swara Siddhas.

मूत्रं पुरीषं वायुश्च समकालं प्रवर्तते।

तदाSसौ चलितो ज्ञेयो दशाह्ने म्रियते ध्रुवम्।।364।।

भावार्थ – शौच के समय यदि किसी व्यक्ति का मल, मूत्र और अपान वायु एक साथ निकले, तो समझना चहिए कि उसकी मृत्यु दस दिन में होगी।

English Translation - If a person passes stool, urine and wind simultaneously, he dies in ten days.

सम्पूर्णं वहते चन्द्रः सूर्यो नैव च दृश्यते।

मासेन जायते मृत्युः कालज्ञेनानुभाषितम्।।365।।

भावार्थ – कालज्ञानियों का मत है कि यदि किसी व्यक्ति का बाँया स्वर लगातार चले और दाहिना स्वर बिलकुल न चले, तो समझना चाहिए कि उसकी मृत्यु एक माह में होगी।

English Translation – Similarly, if a person breaths through left nostril continuously for a long and no breath through right nostril, he dies in one month, as stated by Swar Siddhas.

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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

शिवस्वरोदय – 64

शिवस्वरोदय – 64

आचार्य परशुराम राय

इन श्लोकों में बहुत ही प्रभावी छायोपासना की विधि बताई गयी है। यह साधना प्रातःकाल या सायंकाल सूर्य की उपस्थिति में करनी चाहिए। पाठकों से अनुरोध है कि किसी सक्षम गुरु-सान्निध्य के बिना स्वयं इसका अभ्यास न करें। इस साधना के परिणाम स्वरूप कुछ ऐसी अनुभूतियाँ हो सकती हैं, जो मानसिक संतुलन को अव्यवस्थित कर सकती हैं। जो सक्षम गुरु होता है, वह इस साधना के पहले की तैयारी करवाता है। इस साधना का अभ्यास करने के पहले साधक का भयमुक्त होना आवश्यक है।

कालो दूरस्थितो वापि येनोपायेन लक्ष्यते।

तं वदामि समासेन यथादिष्टं शिवागमे।।351।।

भावार्थ – हे देवि, अब मैं तुम्हें शैवागम (आगम अर्थात् तंत्र) में बतायी गयी छाया उपासना की विधि संक्षेप में बताता हूँ, जिससे मनुष्य त्रिकालज्ञ हो जाता है।

English Translation – O Goddess, now I tell you the method of Chhayopasana (a tantric practice on own shadow) in brief, as it has been described in Shaiva Tantra. Its practice enables a man to go beyond time zone.

Here readers of this post are requested not to practice this without help of a master who is competent in this field.

एकान्तं विजनं गत्वा कृत्वादित्यं च पृष्ठतः।

निरीक्षयेन्निजच्छायां कण्ठदेशे समाहितः।।352।।

भावार्थ – एकान्त निर्जन स्थान में जाकर और सूर्य की ओर पीठ करके खड़ा हो जाए या बैठ जाए। फिर अपनी छाया के कंठ भाग को देखे और उस पर मन को थोड़ी देर तक केन्द्रित करे।

English Translation – The person, who is willing to practice it, should select solitude and should stand or sit keeping the sun on the back side. Thereafter he should look at the neck of his shadow and meditate on it.

ततश्चाकाशमीक्षेत ह्रीं परब्रह्मणे नमः।

अष्टोत्तरशतं जप्त्वा ततः पश्यति शंकरम्।।353।।

भावार्थ – इसके बाद आकाश की ओर देखते हुए ह्रीं परब्रह्मणे नमः मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए अथवा तबतक जप करना चाहिए, जबतक आकाश में भगवान शिव की आकृति न दिखने लगे।

English Translation – Then after some time the practitioner should look at the sky reciting the mantra OM HRIM PARABRAHMANE NAMAH 108 times or unless he visualize the image of Lord Shiva in the sky.

शुद्धस्फटिकसंकाशं नानारूपधरं हरम्।

षण्मासाभ्यासयोगेन भूचराणां पतिर्भवेत्।

वर्षद्वयेन ते नाथ कर्त्ता हर्त्ता स्वयं प्रभुः।।354।।

भावार्थ – छः मास तक इस प्रकार अपनी छाया की उपासना करने पर साधक को शुद्ध स्फटिक की भाँति आलोक युक्त भगवान शिव की आकृति का दर्शन होता है। इसके बाद साधक समस्त प्राणी जगत का स्वामी हो जाता है और यदि वह दो वर्षों तक इस प्रकार साधना करता है, तो वह साक्षात् शिव हो जाता है।

English Translation – After doing of this practice for six months the practitioner visualizes Lord Shiva in the form of white light like Crystal (Sphatic) stone. On getting this view the practitioner becomes master of all the creatures in the world and after practice of two years he becomes Shiva himself.

त्रिकालज्ञत्वमाप्नोति परमानन्दमेव च।

सतताभ्यासयोगेन नास्ति किञ्चित्सुदुर्लभम्।।355।।

भावार्थ – इसका नियमित अभ्यास करने से मनुष्य त्रिकालज्ञ हो जाता है और परमानन्द में अवस्थित होता है। इसका निरन्तर अभ्यास करनेवाले योगी के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं होता।

English Translation – When it is practiced regularly, the practitioner becomes competent to know all the three phases of time- present, past and future, and absorbed in the cosmic bliss. Its continuous practice makes everything available to the practitioner he needs.

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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

शिवस्वरोदय - 20

शिवस्वरोदय - 20

आचार्य परशुराम राय

इस अंक में स्वर विशेष के प्रवाह-काल में किए जाने वाले कार्य विशेष का उल्लेख किया जा रहा है।

तिष्ठेत्पूर्वोत्तरे चन्द्रो भानु: पश्चिमदक्षिणे।

दक्षनाडया: प्रसारे तु न गच्छेद्याम्यपश्चिमे॥ (75)

अन्वय - चन्द्र: पूर्वोत्तरे तिष्ठेत् भानु: पश्चिमदक्षिणे। (अतएव) दक्षनाडया: प्रसारे याम्यपश्चिमे तु न गच्छेत्।

भावार्थ - चन्द्रमा का सम्बन्ध पूर्व और उत्तर दिशा से है और सूर्य का दक्षिण और पश्चिम दिशा से। अतएव दाहिनी नाक से साँस चलते समय दक्षिण और पश्चिम दिशा की यात्रा प्रारम्भ नहीं करनी चाहिए।

English Translation:- The moon is related to East and North, whereas the sun is related to South and West. Therefore one should not undertake any journey towards south and west directions during the flow of breath through right nostril.

वमाचारप्रवाहे तु न गच्छेत्पूर्वउत्तरे।

परिपंथिभयं तस्य गतोऽसौ न निवर्तते॥ (76)

अन्वय - वामाचार प्रवाहे तु पूर्वउत्तरे न गच्छेत्। (यत:) तस्य परिपंथिभयं असौ गत: न निवर्तते।

भावार्थ - इडा् नाड़ी के प्रवाह के समय उत्तर एवं पूर्व दिशा की यात्रा आरम्भ नहीं करनी चाहिए। 'क्योंकि इड़ा के प्रवाह काल में यात्रा के आरम्भ करने पर रास्ते में डाकुओं द्वारा लुटने का भय होता है या यात्रा से वह घर नहीं लौट पाता।

English Translation:- In the same way we should not start our journey to North and East direction during the flow of breath through left nostril. Because if we start our journey during the flow of breath through left nostril to the north and east directions, we may be robbed on the way or we may loose our life.

तत्र तस्मान्न गंतव्यं बुधै: सर्वहितैषिभि:।

तदा तत्र तु संयाते मृत्युरेव न संशय:॥ (77)

अन्वय - तस्मात् बुधै: सर्वहितैषिभि: तत्र न गंतव्यम्। तदा तु संयाते मृत्यु एव न तत्र संशय:।

भावार्थ - अतएव बुद्धिमान लोग सफलता पाने के उद्देश्य से वर्जित नाड़ी के प्रवाह के दौरान वर्जित दिशा की यात्रा प्रारम्भ नहीं करते, अन्यथा मृत्यु अवश्यंभावी है।

English Translation:- Therefore wise persons do not start their journey to the directions prohibited during the flow of breath through the particular nadi, otherwise death is caused.

शुक्लपक्षे द्वितीयायामर्के वहति चन्द्रमा:।

दृश्यते लाभद: पुसां सौम्ये सौख्यं प्रजायते। (78)

अन्वय - शुक्लपक्षे द्वितीयायाम् अर्के (यदि) चन्द्रमा वहति, पुसां सौम्ये लाभद: दृश्यते सौख्यं (च) प्रजायते।

भावार्थ - यदि शुक्ल पक्ष की द्वितीया को सूर्योदय के समय चन्द्र स्वर प्रवाहित हो, तो लाभ और मित्र के मिलने की संभावना अधिक होती है।

English Translation:- In case, breath flows through left nostril at sunrise on the second day of bright fortnight, there is strong possibility of gain and meeting with friends.

सूर्योदय यदा सूर्यश्चन्द्रश्चन्द्रोदये भवेत्।

सिध्यन्ति सर्वकार्याणि दिवारात्रिगतान्यपि॥ (79)

अन्वय - यदा सूर्योदये सूर्य: चन्द्रोदये (च) चन्द्र: भवेत्, (तदा) दिवारात्रिगतान्यपि सर्वाणि कार्याणि सिध्यन्ति।

भावार्थ - जब सूर्योदय के समय सूर्य स्वर और चन्द्रोदय के समय चन्द्र स्वर बहे, तो उस दिन किए गए सभी कार्य सफल होते हैं।

English Translation:- When the breath flows through right nostril at the time of sunrise and through left nostril at the time of moon-rise, the work done on the day is completed successfully.

चन्द्रकाले यदा सूर्यश्चन्द्र: सूर्योदये भवेत्।

उद्वेग: कलहो हानि: शुभं सर्व निवारयेत्॥ (80)

अन्वय - यदा चन्द्रकाले सूर्य: सूर्योदये चन्द्र: भवेत् (तदा) उद्वेग:, कलह:, हानि: (भवेत्) शुभं सर्वं निवारयेत्।

भावार्थ - लेकिन जब सूर्योदय के समय चन्द्र नाड़ी और चन्द्रोदय के समय सूर्य नाड़ी प्रवाहित हो, तो उस दिन किए सारे कार्य संघर्षपूर्ण और निष्फल होते हैं।

English Translation:- But when the breath flows through left nostril at the sunrise and through right nostril at the time of moon-rise, any work done on the day never completed successfully.

सूर्यस्यवाहे प्रवदन्ति विज्ञा: ज्ञानं ह्रगमस्य तु निश्चयेन।

श्वासेन युक्तस्य तु शीतरश्मे:, प्रवाहकाले फलमन्यथा स्यात्॥ (81)

अन्वय - विज्ञा: अगमस्य हिज्ञानं प्रवदन्ति (यत्) सूर्य वाहे निश्चयेन (किन्तु) शीतरश्मे: श्वासेन युक्तस्य प्रवाहकाले अन्यथा फलं स्यात्॥

भावार्थ - विद्वान लोग कहते हैं कि सूर्य स्वर के प्रवाह काल में किए गए कार्यों में अभूतपूर्व सफलता मिलती है, जबकि चन्द्रस्वर के प्रवाह काल में किए गए कार्यों में ऐसा कुछ नहीं होता।

English Translation:- Wise persons say that great success is attained in the work done during the flow of breath through right nostril, whereas if the same is done during the flow of breath through left nostril, the result is otherwise.

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

शिवस्वरोदय-16

शिवस्वरोदय-16

आचार्य परशुराम राय

अनेन लक्षयेद्योगी चैकचित्तः समाहितः।

सर्वमेवविजानीयान्मार्गे वै चन्द्रसूर्ययोः।।54।।

अन्वय – एकचित्तः योगी चन्द्रसूर्ययोः मार्गे लक्षयेत् अनेन (सः) समाहितः

(भूत्वा) सर्वमेव विजानीयात्।

भावार्थ – एकाग्रचित्त होकर योगी चन्द्र और सूर्य नाड़ियों की गतिविधियों के द्वारा

सबकुछ जान लेता है।

English translation – A Yogi, who has controlled his mind by meditating on

Chandra Nadi and Surya Nadi, becomes omniscient.

ध्यायेत्तत्त्वं स्थिरे जीवे अस्थिरे न कदाचन।

इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्य महालाभो जयस्तथा।।55।।

अन्वय – स्थिरे जीवे तत्त्वं ध्यायेत् कदाचन न (ध्यायेत्)। (अनेन) तस्य इष्टसिद्धिः महालाभः जयः तथा भवेत्।

भावार्थ – जब मन एकाग्र हो तो तत्त्व चिन्तन करना चाहिए। किन्तु जब मन अस्थिर हो तो ऐसा करना उचित नहीं है। जो ऐसा करता है उसे इष्ट-सिद्धि, हर प्रकार के लाभ और सर्वत्र विजय उपलब्ध होते हैं।

English Translation – One should do meditation when the mind is still. But when the mind is chaotic (disturbed) then meditation should not be done. One who follows these achieves the desired results in his life.

चन्द्रसूर्यसमभ्यासं ये कुर्वन्ति सदा नराः।

अतीतानागतज्ञानं तेषां हस्तगतं भवेत्।।56।।

अन्वय – ये नराः चन्द्रसूर्यसमभ्यासं कुर्वन्ति अतीतानागतज्ञानं तेषां हस्तगतं भवेत्।

भावार्थ – जो मनुष्य (साधक) अभ्यास करके चन्द्र और सूर्य नाडियों में सन्तुलन

बना लेते हैं, वे त्रिकालज्ञ हो जाते हैं।

English translation – If a man makes balance between Chandra Nadi and Surya Nadi by practicing meditation in this order, he becomes omniscient.

वामे चाSमृतरूपा स्याज्जगदाप्यायनं परम्।

दक्षिणे चरभागेन जगदुत्पादयेत्सदा।।57।।

अन्वय - वामे अमृतरूपा (इडा) चरभागेन जगत् परं अप्यायनं स्यात् दक्षिणे च (पिंगला) सदा जगत् उत्पादयेत्।

भावार्थ – बायीं ओर स्थित इडा नाडी अमृत प्रवाहित कर शरीर को शक्ति और पोषण प्रदान करती है तथा दाहिनी ओर स्थित पिंगला नाडी शरीर को विकसित करती है।

English Translation – When Ida Nadi flows it showers nectar and provides strength and nutrition to our body, but flow of Pingala Nadi develops it.

मध्यमा भवति क्रूरा दुष्टा सर्वत्र कर्मसु।

सर्वत्र शुभकार्येषु वामा भवति सिद्धिदा।।58।।

अन्वय – मध्यमा (सुषुम्ना) सर्वत्र कर्मषु दुष्टा क्रूरा भवति वामा (इडा च) शुभकार्येषु सर्वत्र सिद्धिदा भवति।

भावार्थ – मध्यमा अर्थात सुषुम्ना किसी भी काम के लिए सदा क्रूर और असफलता प्रदान करने वाली है (आध्यात्मिक साधना या उपासना आदि को छोड़कर)। अर्थात् उत्तम भाव से किया कार्य भी निष्फल होता है। जबकि इडा नाडी के प्रवाह काल में किये गये शुभकार्य सदा सिद्धिप्रद होते हैं।

English Translation - Flow of Sushumna is always disastrous for any work (other than spiritual practices), even when it is done in good spirit. However, any auspicious work done during the flow of Ida Nadi gives desired results.

निर्गमे तु शुभा वामा प्रवेशे दक्षिणा शुभा।

चन्द्रः समस्तु विज्ञेयो रविस्तु विषमः सदा।।59।।

अन्वय – निर्गमे वामा शुभा (भवति) प्रवेशे (च) दक्षिणा शुभा (भवति)। चन्द्रः तु समः रविः तु सदा विषमः विज्ञेयः।

भावार्थ – बाएँ स्वर के प्रवाह के समय घर से बाहर जाना शुभ होता है और दाहिने स्वर के प्रवाह काल में अपने घर में या किसी के घर में प्रवेश शुभ दायक होता है। चन्द्र स्वर को सदा सम और सूर्य स्वर को विषम समझना चाहिए। अर्थात् चन्द्र स्वर को स्थिर और सूर्य स्वर को चंचल या गतिशील मानना चाहिए।

English Translation – During the flow of Chandra Nadi one should prefer to go out of own or other’s house, whereas entrance to any house, whether own or others, one must prefer Surya Nadi. Chandra Nadi is always considered stable and Surya Nadi unstable.

चन्द्रः स्त्री पुरुषः सूर्यश्चन्द्रो गौरोSसितो रविः।

चन्द्रनाडी प्रवाहेण सौम्यकार्याणि कारयेत्।।60।।

अन्वय – यह श्लोक अन्वित क्रम में है। अतएव इसका अन्वय करना आवश्यक नहीं है।

भावार्थ – चन्द्र नाडी का प्रवाह स्त्री रूप या शक्ति स्वरूप तथा सूर्य नाडी का प्रवाह

पुरुष रूप या शिव स्वरूप माना जाता है। चन्द्र नाडी गौर तथा सूर्य नाडी

             श्याम वर्ण की मानी जाती है। चन्द्र नाडी के प्रवाह काल में सौम्य कार्य करना        उचित है।

English Translation – The flow of Chandra Nadi has feminine nature or energy body and the flow of Surya Nadi has of male nature, in other words it is called Purush or Shiva. The Chandra Nadi is said to be bright and Surya Nadi dark. For the work of peaceful nature one should prefer Chandra Nadi.

सूर्यनाडीप्रवाहेण रौद्रकर्माणि कारयेत्।

सुषुम्नायाः प्रवाहेण भुक्तिमुक्ति फलानि च।।61।।

अन्वय – यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय आवश्यक नहीं है।

भावार्थ – सूर्य नाडी के प्रवाह काल में श्रमपूर्ण कठोर कार्य करना चाहिए और

सुषुम्ना के प्रवाह काल में इन्द्रिय सुख तथा मोक्ष प्रदान करने वाले कार्य

करना चाहिए।

English Translation - For any hard work we should prefer the flow of Surya Nadi (right nostril) and the work, which is pleasant to our senses or causes liberation from birth and death, should be performed during the flow of sushumna.

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शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

अंक-16 शिवस्वरोदय

अंक-16 शिवस्वरोदयआचार्य परशुराम राय

प्रकटं         प्राणसञ्चारं           लक्ष्येद्देहमध्यतः।

इडापिङ्गलासुषुम्नाभिर्नाडीभिस्तिसृभिबुधः।।48।।

अन्वय इडा-पिङ्गला-सुषु्म्नाभिः तिसृभिः नाडीभिः बुधः देहमध्यतः प्राणसञ्चारं प्रकटं लक्ष्येत्।

भावार्ध इडा, पिङ्गला और सुषुम्ना तीनों नाड़ियों की सहायता से शरीर के मध्य भाग में प्राणों के संचार को प्रत्यक्ष करना चाहिए। यहाँ शरीर के मध्य के दो अर्थ निकलते हैं- पहला नाभि और दूसरा मेरुदण्ड

Enlish Translation - Swara-Sadhakas should visualize Prana (energy)  in the middle of their body with the help of three Nadis, i.e. Ida, Pingala and Shushumna. Here middile of the body means navel region and spinal column. Some Sadhaks consider it as navel region or Manipur Chakra and some all the five Chakra – Muladhar, Swadhishthan, Manipur, Anahat and Vishudhha, and further Ajnya and Sahasrar, where they make efforts to become one with the Pranas and thereafter beyond them towards pure consciousness.

इडा    वामेव    विज्ञेया    पिङ्गला    दक्षिणे     स्मृता।

इडानाडीस्थिता वामा ततो व्यस्ता च पिङ्गला।।49।।

अन्वय इडा नाड़ी वामे विज्ञेया पिङ्गला (च) दक्षिणे स्मृता। (अतएव) इडा वामा पिङ्गला ततो व्यस्ता (इति कथ्यते)।

भावार्थ इडा नाडी बायीं ओर स्थित है तथा पिङ्गला दाहिनी ओर। अतएव इडा को वाम क्षेत्र और पिंगला को दक्षिण क्षेत्र कहा जाता है।

English Translation – Ida is located in the left side of our body and Pingala in the right side. Therefore, Ida is also known as left region and Pingala as right region.

इडायां तु स्थितश्चन्द्रः पिङ्गलायां च भास्करः।

सुषुम्ना   शम्भुरूपेण   शम्भुर्हंसस्वरूपतः।।50।।

अन्वय चन्द्रः इडायां तु स्थितः भास्करः पिङ्गलायां च सुषुम्ना शम्भुरूपेण। शम्भु हंसस्वरूपतः।

भावार्थ चंद्रमा इडा नाडी में स्थित है और सूर्य पिङ्गला नाडी में तथा सुषुम्ना स्वयं शिव-स्वरूप है। भगवान शिव का वह स्वरूप हंस कहलाता है, अर्थात् जहाँ शिव और शक्ति एक हो जाते हैं और श्वाँस अवरुद्घ हो जाती है। क्योंकि-

English Translation – The moon resides in Ida Nadi and the sun in Pingala Nadi. Sushumna is itself known as Lord Shiva. Lord Shiva is here called Hamsa, i.e. Prana Vayu flows through Sushumna in stead of Ida and Pingala and thereafter it gets related to the cosmic energy and a man can survive without taking breath.

हकारो   निर्गमे   प्रोक्त   सकारेण   प्रवेशणम्।

हकारः शिवरूपेण सकारः शक्तिरुच्यते।।51।।

अन्वय (श्वासस्य) निर्गमे हकारः प्रोक्तः प्रवेशणं सकारेण (च)। हकारः शिवरूपेण सकारः शक्तिः उच्यते।

भावार्य - तंत्रशास्त्र और योगशास्त्र की मान्यता है कि जब हमारी श्वाँस बाहर निकलती है तो “हं” की ध्वनि निकलती है और जब श्वाँस अन्दर जाती है तो “सः (सो)” की। हं को शिव- स्वरूप माना जाता है और सः या सो को शक्ति-रूप।

English Translation – It is said in scriptures that when breath goes out it sounds like Ham and when it enters our body it sounds like Sah or So. Ham is known as Shiva and Sah or So as His Shakti.

शक्तिरूपस्थितश्चन्द्रो       वामनाडीप्रवाहकः।

दक्षनाडीप्रवाहश्च शम्भुरूपो दिवाकरः।।52।।

अन्वय वामनाडीप्रवाहकः चन्द्रः शक्तिरूपस्थितः दक्षनाडीप्रवाहः च दिवाकरः शम्भुरूपः।

भावार्थ - वायीं नासिका से प्रवाहित होने वाला स्वर चन्द्र कहलाता है और शक्ति का रूप माना जाता है। इसी प्रकार दाहिनी नासिका से प्रवाहित होने वाला स्वर सूर्य कहलाता है, जिसे शम्भु (शिव) का रूप माना जाता है।

English Translation – The breath, which runs through left nostril, is called the moon and also known as Shakti. And the breath, which runs through right nostril, is called the sun and also known as Shiva.

श्वासे     सकारसंस्थे     तु     यद्दाने    दीयते    बुधैः।

तद्दानं जीवलोकेSस्मिन् कोटिकोटिगुणं भवेत्।।53।।

अन्वय सकारसंस्थे तु बुधैः यद् दाने दीयते तद् दानं अस्मिन् जीवलोके कोटि-कोटिगुणं भवेत्।

भावार्थ श्वास लेते समय विद्वान लोग जो दान देते हैं, वह दान इस संसार में कई करोड़गुना हो जाता है।

English Translation - Any donation given while breathing in is multiplied by crores, i.e. doner gets fruits worth crore times of what donates.

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

अंक-13 :: स्वरोदय महिमा

अंक-13

स्वरोदय महिमा

आचार्य परशुराम राय

इस अंक में भगवान शिव ने माँ पार्वती को विभिन्न प्रकार से स्वर की महिमा समझाई है।

ब्रह्माण्ड-खण्ड-पिण्डाद्याः स्वरेणैव हि निर्मिताः।

सृष्टि संहारकर्त्ता च स्वर‑ साक्षान्महेश्वरः।।20।।

अन्वय -- स्वरेण एव हि ब्रह्माण्ड-खण्ड-पिण्डाद्या:

निर्मिता: स्वर: च सृष्टिसंहारकर्ता साक्षात् महेश्वर:।

भावार्थ -- ये विराट और लघु ब्रह्माण्ड और इनमें स्थित सभी वस्तुएं स्वर से निर्मित हैं और स्वर ही सृष्टि के संहारक साक्षात् महेश्वर (शिव) हैं।

English Translation:- These endless and small universes and each and every thing thereon are created by the Swara. And this very Swara itself is Lord Maheshwar, the destroyer of the creation.

स्वरज्ञानात्परं    गुह्मम्    स्वरज्ञनात्परं     धनम्।

स्वरज्ञानत्परं ज्ञानं नवा दृष्टं नवा श्रुतम्।।21।।

अन्वय -- स्वरज्ञानात् परं गुह्यं (ज्ञानं), स्वरज्ञानात् परं धन,

स्वरज्ञानात् परं ज्ञानं नवा दृष्टं नवा श्रुतम्।

भावार्थ& स्वर के ज्ञान से बढ़कर कोई गोपनीय ज्ञान, स्वर-ज्ञान से बढ़कर कोई धन और स्वर ज्ञान से बड़ा कोई दूसरा ज्ञान न देखा गया और न ही सुना गया है।

English Translation:- Knowledge of Swara is the most secret knowledge, the most precious wealth and the most advanced knowledge in the world. Such a knowledge and wealth other than the knowledge of Swara have been neither seen nor heard so far.

शत्रून्हन्यात्       स्वबले     तथा     मित्र     समागमः।

लक्ष्मीप्राप्तिः स्वरबले कीर्तिः स्वरबले सुखम्।।22।।

अन्वय -- स्वरबले शत्रून् हन्यात् तथा मित्रसमागम

स्वरबले लक्ष्मी-कीर्ति-सुखप्राप्ति:।

भावार्थ& -- स्वर की शक्ति से शत्रु पराजित हो जाता है, बिछुड़ा मित्र मिल जाता है। यहाँ तक कि माता लक्ष्मी की कृपा, यश और सुख, सब कुछ मिल जाता है।

English Translation:- An enemy is killed, a lost friend is reunited, wealth, fame, pleasure, every thing is obtained by the power acquired by practice of Swara Sadhana.

कन्याप्राप्ति      स्वरबले      स्वरतो      राजदर्शनम्।

स्वरेण देवतासिद्धिः स्वरेण क्षितिपो वशः।।23।।

अन्वय -- स्वरबले कन्याप्राप्ति:, स्वरतो राजदर्शनम् स्वरेण देवतासिद्धि: स्वरेण क्षितिपो वश:।

भावार्थ& -- स्वर ज्ञान द्वारा पत्नी की प्राप्ति, शासक से मिलन, देवताओं की सिद्धि मिल जाती है और राजा भी वश में हो जाता है।

English Translation:- By applying knowledge of Swara one can get married with a beautiful and well cultured bride, can see a highest administrator or King and can make gods and kings in favour.

स्वरेण गम्यते  देशो  भोज्यं स्वरबले    तथा।

लघुदीर्घं स्वरबले मलं चैव निवारयेत्।।24।।

अन्वय -- स्वरेण देश: गम्यते स्वरले भोज्यं तथा स्वरबले लघुदीर्घं

मलं च एव निवारयेत्।

भावार्थ& -- अनुकूल स्वर के समय यात्रा करनी चाहिए, स्वादिष्ट भोजन करना चाहिए तथा मल-मूत्र विसर्जन भी अनुकूल स्वर के काल में ही करना चाहिए।

English Translation:- Our all actions like traveling, taking food, passing stool and urine etc. should be done while suitable Swara is running i.e. Ida (left nostril breath) or Pingala (the right nostril breath).

सर्वशास्त्रपुराणादि                स्मृतिवेदांगपूर्वकम्।

स्वरज्ञानात्परं तत्त्वं नास्ति किंचिद्वरानने।।25।।

अन्वय -- हे वरानने, स्वर ज्ञानात्परं सर्वशास्त्रपुराणादिस्मृतिवेदांगपूर्वकं

तत्वं किंचिद् न अस्ति।

भावार्थ& -- हे वरानने, सभी शास्त्रों, वेदों, वेदान्तों, पुराणों और स्मृतियों द्वारा बताया गया कोई ज्ञान या तत्व स्वर ज्ञान से बढ़कर नहीं है।

English Translation:- O Beautiful Goddess all kinds of knowledge acquired by the study of different Shastras, Vedas. Vedantas, Puranas and Smritis cannot equate with the knowledge of Swara.

नामरूपादिकाः   सर्वे   मिथ्या   सर्वेषु     विभ्रमः।

अज्ञान मोहिता मूढ़ा यावत्तत्त्वे न विद्यते।।26।।

अन्वय -- यावत् तत्वे (पूर्णतया ज्ञानं) न विद्यते, (तावत्) अज्ञानमोहिता: मूढ़ा: सर्वेषु सर्वे नामादिका: मिथ्या विभ्रम: (जायते)।

भावार्थ& -- जब तक तत्वों का पूर्ण ज्ञान नहीं हो जाता, तब तक हम अज्ञान के वशीभूत होकर नाम आदि के मिथ्या भवजाल में फंसे रहते हैं।

English Translation:- Unless a man gets perfect knowledge of tattvas, he is hypnotized by name, fame etc. due to ignorance.

इदं    स्वरोदयं    शास्त्रं      सर्वशास्त्रोत्तमोत्तमम्।

आत्मघट प्रकाशार्थं प्रदीपकलिकोपमम्।।27।।

अन्वय -- सर्वशास्त्रोत्तमोत्तमम् इदं स्वरोदयं शास्त्रम् (यत्) आत्मघटं

प्रकाशार्थं प्रदीपकलिकोपमम्

भावार्थ& -- स्वरोदय शास्त्र सभी उत्तम शास्त्रों में श्रेष्ठ है जो हमारे आत्मारूपी घट (घर) को दीपक की ज्योति के रूप में आलोकित करता है।

English Translation:- Swarodaya Science is the most advanced science of all that are placed at the highest. It enlightens all dimensions of our being.

यस्मै    कस्मै    परस्मै    वा    न   प्रोक्तं    प्रश्नहेतवे।

तस्मादेतत्स्वयं ज्ञेयमात्मनोवाऽत्मनात्मनि।।28।।

अन्वय -- यस्मै, कस्मै, परस्मै वा प्रश्नहेतवे (मात्रमेव) न प्रोक्तं,

तस्माद् एतद् स्वयं आत्मना आत्मानि आत्मन: ज्ञेयम्।

भावार्थ& -- इस परम विद्या का उद्देश्य मात्र भौतिक जगत सम्बन्धी अथवा अन्य उपलब्धियों से जुड़े प्रश्नों के उत्तर पाना नहीं है। बल्कि आत्म-साक्षात्कार हेतु इस विद्या को स्वयं सीखना चाहिए और निष्ठापूर्वक इसका अभ्यास करना चाहिए।

English Translation:- This most secret knowledge is not meant for getting solutions of worldly problems or for removal of obstacles in our daily routine life. This should be learnt and practiced with devotion for self enlightenment.

न    तिथिर्न    च    नक्षत्रं    न    वारो    ग्रहदेवताः।

न च विष्टिर्व्यतीपातो वैधृत्याद्यास्तथैव च।।29।।

अन्वय -- न तिथि:, न नक्षत्रं न वार: (न) ग्रहदेवता:, न च विष्टि:,

व्यतीपात: वैधृति-आद्या: तथैव च।

भावार्थ& स्वरज्ञानी को किसी काम को प्रारम्भ करने के लिए ज्योतिषीय दृष्टिकोण से शुभ तिथि, नक्षत्र, दिन, ग्रहदेवता, भद्रा, व्यतिपात और योग (वैधृति आदि) आदि के विचार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। अर्थात् कार्य के अनुकूल स्वर और तत्व के उदय काल में कभी भी कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है।

English Translation:- A person, who is well acquainted with the knowledge of Swara Science, including practices, needs not to wait for an auspicious moment like day Nakshatra, Tithi, planet swami, Yoga etc required from the astrological point of view to start a work. What he needs is to choose swara and rising of Tattavas therein suitable for the work in hand and that moment will be always auspicious only.

कुयोगो  नास्तिको  देवि  भविता   वा कदाचन।

प्राप्ते स्वरबले शुद्धे सर्वमेव शुभं फलम्।।30।।

अन्वय -- हे देवि, (कश्चित) कदाचन कुयोगो नास्तिको भविता, (अपि)

शुद्धे स्वरबले प्राप्ते (तस्मै) सर्वम् एवं शुभं फलम् प्राप्तम्।

भावार्थ& हे देवि, यदि कोई व्यक्ति दुर्भाग्य से कभी नास्तिक हो जाये, तो स्वरोदय ज्ञान प्राप्त कर लेने पर वह पुन: पावन हो जाता है और उसे भी शुभ फल ही मिलते हैं।

English Translation:- O Goddess, in case, a person becomes atheist due to one or the other reason, he can also be pious man and he will achieve all kinds of happiness and good fortune.

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

स्वरोदय विज्ञान - 10

स्वरोदय विज्ञान – 10


आचार्य परशुराम राय

स्वरोदय विज्ञान के कतिपय अंकों में पाठकों ने स्वरोदय विज्ञान की साधना के विषय में जिज्ञासा व्यक्त की थी। उसी के परिणामस्वरूप यह अंक लिखने का विचार आया, अन्यथा नौवे अंक के बाद इस विषय पर अत्यन्त प्रामाणिक एवं प्राचीन ग्रंथ 'शिवस्वरोदय' का हिन्दी भाष्य सहित ब्लॉग पर प्रकाशित करने का विचार था। अब यह कार्य इस अंक के बाद किया जाएगा।

स्वरोदय विज्ञान में जो दावे किए गए हैं, वे कहाँ तक सत्य हैं, इसका निर्णय इस विज्ञान के सक्षम साधकों के सान्निध्य में उनके निर्देशों के अनुरूप साधना करने के बाद ही किया जा सकता है। यही वैज्ञानिक तरीका भी है। जब कुछ पाठकों की प्रतिक्रियाएँ स्वरोदय विज्ञान की साधना के सम्बन्ध में आयीं, तो मैंने भी इस दिशा में अपनी खोज बढ़ा दी। इंटरनेट पर कुछ सम्पर्क-सूत्र मिले हैं, जिन्हें यहाँ दिया जा रहा है।

इंटरनेट पर वेबसाइट http://swarayoga.org/ पर अंग्रेजी भाषा में इस सम्बन्ध में बहुत सी जानकारियाँ दी गयीं हैं, यथा - स्वरचक्र (Swara Cycle), स्वर लयबद्धता से लाभ (Benefits of Swar Rhythms), भौतिक शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के स्वर चक्र (Physical Subtle and causal body Swar Cycles), स्वर बदलने के तरीके (Methods to change Swara), जन्म नाड़ी और तत्व गणक (Birth Nadi and Element Calculator), पंचांग गणक (Panchang Calculator), स्वर पंचाग गणक (Swar Panchang Calculator), जन्म काल में कारण शरीर का स्वर गणक (Causal Body Swar Calculator during birth), आदि को बड़े ही सुन्दर और सरल ढंग से समझाया गया है। भाषा में अशुद्धियाँ होने के बावजूद भी विषय सुगम्य है। यह संगठन सन्यासिन चरणाश्रित जी महाराज द्वारा संचालित होता है। बंगलोर स्थित रामाचन्द्रपुरम में एक स्वर योग केन्द्र भी ये संचालित करते हैं जहाँ जिज्ञासुओं को स्वर योग की साधना सिखायी जाती है। वेबसाइट पर उपलब्ध सूचना के अनुसार प्रारम्भिक साधना प्रक्रिया 06 घंटें - प्रात: 10.00 बजे से अपराह्न 4 बजे तक सिखायी जाती है। पर्याप्त जिज्ञासुओं के आने की पुष्टि के बाद ही प्रशिक्षण के लिए दिन निश्चित किया जाता है। इस पर दिए गए सम्पर्क सूत्र (आत्मवन्दना जी, दूरभाष सं0 080 - 23422575) पर बात करने के बाद पता चला कि स्वर योग की उच्च साधना हेतु साधकों के अभाव में उच्च स्वर साधना का प्रशिक्षण फिलहाल आयोजित नहीं किया गया है।

दूसरी वेबसाइट श्री प्रेम निर्मल जी द्वारा दी गयी है। इनका पता नीचे दिया जा रहा है:-

http://www.premnirmal.com/

TAO, Krishna Building,

Laxmi Industrial Complex,

Vartak Nagar,

Pokhran Road, - I,

THANE

फोन सं0 25363118, 9892572804 भारती जी 9224127682 श्री प्रेम निर्मल जी

इस वेबसाइट पर स्वर योग कार्यशाला के भाग हैं। भाग-1 में प्रारम्भिक प्रशिक्षण 6 सत्रों का है जिसमें निम्नलिखित विषय अभ्यास के लिए रखे गए हैं -

(1) परिचय (2) सूर्य और चन्द्र नाड़ियाँ एवं ग्रहों से इनका सम्बन्ध (3) दाहिने और बाएँ मस्तिष्क के सम्बन्ध और कार्य (4) पाँच प्राण और उप प्राण (5) स्वर के तीन भेद (6) नासाछिद्र (Nostril) और चन्द्र (7) स्वरों को बदलने का तरीका (8) स्वर को कब बदलें (9) स्वर के अनुसार विशेष कार्य (10) सुषुम्ना क्रियाशीलन और इसकी विशेषता (11) स्वर योग और पंच महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) (12) पंच महाभूतों का निरीक्षण, पहिचान और अनुभव करना (13) स्वर योग का शरीर और मस्तिष्क से सम्बन्ध (14) स्वर योग के विभिन्न व्यावहारिक प्रयोग (15) स्वरयोग द्वारा बीमारियों को दूर करना (16) स्वर योग द्वारा शरीर और मन को स्वस्थ रखना।

उक्त प्रशिक्षण के बाद सक्षम साधकों के लिए उच्च कार्यशाला में स्थान दिया जाता है। यह आठ सत्रों का होता है और इसमें निम्नलिखित विषयों और साधनाओं का अभ्यास कराया जाता है-

(1) तत्वदर्शी से तत्वविद् (2) स्वर योग और शिशु का जन्म (3) स्वर योग और मन को पढ़ना (Mind reading) (4) स्वरयोग और छायोपासना, (5) स्वर योग और नाड़ियों और चक्रों से सम्बन्धित उच्च मानसिक (Super psychic) ज्योतिष विज्ञान तथा वास्तु (6) स्वर योग और आन्तरिक गुरु तत्व का जागरण (7) स्वर योग और जीवन, आयुष्य एवं मृत्यु और (8) स्वर योग, अभिज्ञा और ज्ञानोदय (enlightenment½

उक्त दोनों पाठयक्रमों का प्रशिक्षण 14 सत्रों में दिया जाता है। एक सत्र तीन घंटें का होता है। उक्त दूरभाषों पर आगामी कार्यशाला की जानकारी ली जा सकती है।

इसके अतिरिक्त परमहंस सत्यानन्द जी के उत्तराधिकारी परमहंस निरंजनानन्द जी द्वारा बिहार में संस्थापित योग भारती (विश्वविद्यालय) में भी इसकी साधना सिखायी जाती है। पत्राचार द्वारा सम्पर्क किया जा सकता हैं या वेबसाइट से दूरभाष संख्या प्राप्त की जा सकती हैं।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

अंक-9 :: स्वरोदय विज्ञान :: आचार्य परशुराम राय

अंक-9

स्वरोदय विज्ञान

मेरा फोटोआचार्य परशुराम राय

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आवश्यकतानुसार स्वर को बदलने के कुछ सरल तरीके नीचे दिए जा रहे हैं।:-

(क) जिस स्वर को चलाना हो उसके उलटे करवट सिर के नीचे हाथ रखकर लेटने से स्वर बदल जाता है, अर्थात् यदि दाहिनी नासिका से स्वर प्रवाहित करना हो तो बायीं करवट थोड़ी देर तक लेटने से पिंगला नाड़ी चलने लगेगी। वैसे ही, दाहिनी करवट लेटने से इडा नाड़ी चलने लगती है।

(ख) जिस नासिका से साँस प्रवाहित करना चाहते हैं एक नाक बंद कर उस नाक से दस-पन्द्रह बार साँस दबाव के साथ धीरे-धीरे छोड़े और लें तो स्वर बदल जाता है।

(ग) फर्श पर बैठकर एक पैर मोड़कर घुटने को बगल में थोड़ी देर तक दबाए रहें और दूसरा फर्श पर सीधा रखें तो थोड़ी देर में जो पैर सीधा है उस नासिका से साँस चलने लगेगी।

(घ) फर्श पर बैठकर एक हाथ जमीन पर रखें और उसी ओर के कंधें को दीवार से लगाकर थोड़ी देर तक दबाए रखने से स्वर बदल जाता है।

(ड.) लम्बे समय तक यदि किसी एक स्वर को चलाने की आवश्यकता पड़े तो उक्त तरीकों से स्वर बदल कर शुध्द रूई की छोटी गोली बनाकर साफ कपड़े से लपेट कर सिली हुई गुलिका द्वारा एक नाक को बन्द कर देना चाहिए।

जिस प्रकार विभिन्न कार्यों का सम्पादन करने के लिए स्वर बदलने की आवश्यकता पड़ती है, वैसे ही तत्वों को बदलने की भी आवश्यकता भी पड़ती है। स्वरोदय विज्ञान के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति में एक स्वर की एक घंटें की अवधि के दौरान सर्वप्रथम वायु तत्व आठ मिनट तक प्रवाहित होता है, जिसकी लम्बाई नासिका पुट से आठ अंगुल (6 इंच) मानी गयी है। इसके बाद अग्नि तत्व बारह मिनट तक प्रवाहित होता है जिसकी लम्बाई चार अंगुल या 3 इंच तक होती है। तीसरे क्रम में पृथ्वी तत्व 20 मिनट तक प्रवाहित होता है और इसकी लम्बाई बारह अंगुल या नौ इंच तक होती है। इसका विवरण इसके पहले दिया जा चुका है। यहाँ संदर्भ के लिए इसलिए लिया गया है ताकि यह समझा जा सके कि तत्वों के प्रवाह को बदलने के उनकी लम्बाई का ज्ञान और अभ्यास होना आवश्यक है और यदि हम स्वर की लम्बाई को तत्वों के अनुसार कर सकें तो स्वर में वह तत्व प्रवाहित होने लगता है।

स्वरोदय विज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म एवं जटिल विज्ञान है। इसका अभ्यास इस विज्ञान के सुविज्ञ गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए। क्योंकि इसके अभ्यास द्वारा अत्यन्त अप्रत्याशित और अलौकिक अनुभव होते हैं, जो हमारे मानसिक संतुलन को बिगाड़ सकते है। इस निबन्ध का उद्देश्य मात्र स्वरोदय विज्ञान से परिचय कराना है और साथ ही यह बताना कि अपने दैनिक जीवन में, जैसा कि ऊपर संकेत किया गया है, इसकी सहायता निरापद ढंग से कैसे ली जा सकती है अर्थात् जिसके लिए इस विज्ञान के गहन साधना की आवश्यकता नहीं है।

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शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

अंक-8 :: स्वरोदय विज्ञान :: आचार्य परशुराम राय

अंक-8

स्वरोदय विज्ञान

मेरा फोटोआचार्य परशुराम राय

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दैनिक जीवन में जैसे कार्य का प्रारम्भ उपर्युक्त ढंग से करके स्वास्थ्य लाभ एवं सफलता प्राप्त करने की बात कही गई है, वैसे ही स्वरों के साथ उनमें प्रवाहित होने वाले पंच तत्वों का विचार करना भी अत्यन्त आवश्यक है। अन्यथा असफलता ही हाथ लगेगी। अतएव स्वरों के साथ उक्त विधान का प्रयोग करते समय उनमें प्रवाहित होने वाले तत्वों की पहिचान करना और तद्नुसार कार्य करना आवश्यक है।

भौतिक उन्नति या दीर्घकालिक सुख से सम्बन्धित कार्य या स्थायी शान्तिप्रद कार्यों में प्रवृत्त होते समय यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि उपयुक्त स्वर में पृथ्वी तत्व का उदय हो। अन्यथा अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेगा। शास्त्रों का कथन है कि पृथ्वी तत्व की प्रधानता के साथ हमारा मन भौतिक सुख के कार्यों के प्रति अधिक आकर्षित होता है। किसी भी स्वर में जल तत्व के उदय के समय किया गया कार्य तत्काल फल देने वाला होता है, भले ही फल अपेक्षाकृत कम हो। जल तत्व की प्रधानता होने पर परिणाम जल की तरह चंचल और उतार-चढ़ाव से भरा होता है। इसलिए इस समय ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिसमें अधिक भाग-दौड़ करना पड़े। अग्नि तत्व का धर्म दाहकता है। इसलिए इसके उदयकाल में कोई भी कार्य प्रारम्भ करने से बचना चाहिए क्योंकि असफलता के अलावा कुछ भी हाथ नहीं आयेगा। यहाँ तक कि इस समय किसी बात पर अपनी राय भी नहीं देनी चाहिए, अन्यथा अप्रत्याशित कठिनाई में फॅंसने की नौबत भी आ सकती है। धन-सम्पत्ति से संबंधित दुश्चिन्ताएं, परेशानियाँ, वस्तुओं का खोना आदि घटनाएँ अग्नितत्व के उदयकाल में ही सबसे अधिक होती हैं। वायु तो सर्वाधिक चंचल है। अतएव इसके उदयकाल में किया गया कार्य कभी भी सफल नहीं हो सकता। स्वामी सत्यानन्द जी ने अपनी पुस्तक 'स्वर-योग' में एक अद्भुत उदाहरण दिया है और वह हमें वायु तत्व के समय कार्य का चुनाव करने में सहायक हो सकता है। उन्होंने लिखा है कि यदि भीड़-भाड़ वाले प्लेटफार्म पर छूटती गाड़ी पकड़ने के लिए झपटते समय और वायु तत्व का उदय हो तो आप ट्रेन पकड़ने में सफल हो सकते हैं। आकाश तत्व के उदय काल में ध्यान करने के अलावा कोई भी कार्य सफल नहीं होगा, यह ध्यान देने योग्य बात है।

संक्षेप में, यह ध्यान देने की बात है कि इडा और पिंगला स्वर में पृथ्वी तत्व और जल तत्व का उदयकाल कार्य के स्वभाव के अनुकूल स्वर का चुनाव सदा सुखद होगा। इडा स्वर में अग्नि तत्व और वायु तत्व का उदयकाल अत्यन्त सामान्य फल देने वाला तथा पिंगला में विनाशकारी होता हैं। आकाश तत्व का उदय काल केवल ध्यान आदि कार्यों में सुखद फलदाता है।

'शिव स्वरोदय' का कथन है कि दिन में पृथ्वी तत्व और रात में जल तत्व का उदयकाल सर्वोत्तम होता है। इससे मनुष्य स्वस्थ रहता है और सफलता की संभावना सर्वाधिक होती है।

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शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

अंक-6 :: स्वरोदय विज्ञान :: आचार्य परशुराम राय

अंक-6

स्वरोदय विज्ञान

मेरा फोटोआचार्य परशुराम राय

तत्वों के स्वरों में उदय के समय इन्हें पहचानने की एक और बड़ी रोचक युक्ति बताई गई है। इसके अनुसार यदि दर्पण पर अपनी श्वास प्रवाहित की जाये तो उसके वाष्प से आकृति बनती है उससे हम स्वर में प्रवाहित होने वाले तत्व को पहचान सकते हैं। पृथ्वी तत्व के प्रवाह काल में आयत की सी आकृति बनती हैं, जल तत्व में अर्ध्द चन्द्राकार, अग्नि तत्व में त्रिकोणात्मक आकृति, वायु के प्रवाह के समय कोई निश्चित आकृति नहीं बनती। केवल वाष्प के कण बिखरे से दिखते हैं।

स्वरों के प्रवाह की लम्बाई के विषय में थोड़ी और बातें बता देना यहाँ आवश्यक है और वह यह कि हमारे कार्यों की विभिन्नता के अनुसार इनकी लम्बाई या गति प्रभावित होती है। जैसे गाते समय 12 अंगुल, खाना खाते समय 16 अंगुल, भूख लगने पर 20 अंगुल, सामान्य गति से चलते समय 18 अंगुल, सोते समय 27 अंगुल से 30 अंगुल तक, मैथुन करते समय 27 से 36 अंगुल और तेज चलते समय या शारीरिक व्यायाम करते समय इससे भी अधिक हो सकती है। यदि बाहर निकलने वाली साँस की लम्बाई नौ इंच से कम की जाए तो जीवन दीर्घ होता है और यदि इसकी लम्बाई बढ़ती है तो आन्तरिक प्राण दुर्बल होता है जिससे आयु घटती है। शास्त्र यहाँ तक कहते हैं कि बाह्य श्वास की लम्बाई यदि साधक पर्याप्त मात्रा में कम कर दे तो उसे भोजन की आवश्यकता नहीं पड़ती है और यदि कुछ और कम कर ले तो वह हवा में उड़ सकता है।

अब थोड़ी सी चर्चा तत्वों और नक्षत्रों के सम्बन्ध पर आवश्यक है। यद्यपि इस सम्बन्ध में स्वामी राम मौन हैं। इसका कारण हो सकता है स्थान का अभाव क्योंकि अपनी पुस्तक में उन्होंने केवल एक अध्याय इसके लिए दिया है। फिर भी पाठकों की जानकारी के लिए शिव स्वरोदय के आधार पर यहाँ तत्वों और नक्षत्रों के सम्बन्ध नीचे दिये जा रहे हैं। पृथ्वी तत्व का सम्बन्ध रोहिणी, अनुराधा, ज्येष्ठा, उत्तराषाढ़, श्रवण, धनिष्ठा और अभिजित से, जल तत्व का आर्द्रा, श्लेषा, मूल, पूर्वाषाढ़, शतभिषा, उत्तरा भाद्रपद और रेवती से, अग्नि तत्व का भरणी, कृत्तिका, पुष्य, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, स्वाती और पूर्वा भाद्रपद तथा वायु तत्व का अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, चित्रा और विशाखा से है।

इस विज्ञान पर आगे चर्चा के पहले शरीर में प्राणिक ऊर्जा के प्रवाह की दिशा की जानकारी आवश्यक है। यौगिक विज्ञान के अनुसार मध्य रात्रि से मध्याह्न तक प्राण नसों में प्रवाहित होता है, अर्थात् इस अवधि में प्राणिक ऊर्जा, सर्वाधिक सक्रिय होती है और मध्याह्न से मध्य रात्रि तक प्राण का प्रवाह शिराओं में होता है। मध्याह्न और मध्य रात्रि में प्राण का प्रवाह दोनों नाड़ी तंत्रों में समान होता है। इसी प्रकार सूर्यास्त के समय प्राण ऊर्जा का प्रवाह शिराओं में और सूर्योदय के समय मेरूदण्ड में सबसे अधिक होता है। इसीलिए शास्त्रों में ये चार संध्याएँ कहीं गयी हैं जो आध्यात्मिक उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी गयी हैं। यदि व्यक्ति पूर्णतया स्वस्थ है तो उक्त क्रम से नाड़ी तंत्रों में प्राण का प्रवाह संतुलित रहता है अन्यथा हमारा शरीर बीमारियों को आमंत्रित करने के लिये तैयार रहता है। यदि इडा नाड़ी अपने नियमानुसार प्रवाहित होती है तो चयापचय जनित विष शरीर से उत्सर्जित होता रहता है, जबकि पिंगला अपने क्रम से प्रवाहित होकर शरीर को शक्ति प्रदान करती है। योगियों ने देखा है और पाया है कि यदि साँस किसी एक नासिका से 24 घंटें तक चलती रहे तो यह शरीर में किसी बीमारी के होने का संकेत है। यदि साँस उससे भी लम्बे समय तक एक ही नासिका में प्रवाहित हो तो समझना चाहिए कि शरीर में किसी गम्भीर बीमारी ने आसन जमा लिया है और यदि यह क्रिया दो से तीन दिन तक चलती रहे तो निस्संदेह शीघ्र ही शरीर किसी गंभीरतम बीमारी से ग्रस्त होने वाला है। ऐसी अवस्था में उस नासिका से साँस बदल कर दूसरी नासिका से तब तक प्रवाहित किया जाना चाहिए जब तक प्रात:काल के समय स्वर अपने उचित क्रम में प्रवाहित न होने लगे। इससे होने वाली बीमारी की गंभीरता कम हो जाती है और व्यक्ति शीघ्र स्वास्थ्य लाभ करता है। image

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

अंक-5 :: स्वरोदय विज्ञान :: आचार्य परशुराम राय

अंक-5

स्वरोदय विज्ञान

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image जैसे सूर्य और चन्द्र इस जगत को प्रभावित करते हैं, वैसे ही सूर्य स्वर और चन्द्र स्वर हमारे शरीर को प्रभावित करते हैं। कहा जाता है कि चन्द्र स्वर शरीर को अमृत से सींचता हैं और सूर्य स्वर उसकी नमी को सुखा देता है। जब दोनों स्वर मूलाधार चक्र, जहाँ कुण्डलिनी शक्ति सोती है, पर मिलते हैं तो उसे अमावस्या की संज्ञा दी गई है।

प्रकृति द्वारा प्रदत्त शरीर में स्वर पद्धति के अनुसार चौबीस घंटें में इनका बारह राशियों से सम्बन्ध का ज्ञान भी बड़ा रोचक है। चन्द्र स्वर का उदय वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों में होता है तथा सूर्य स्वर का मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुंभ राशियों में। स्वरोदय विज्ञान के साधक स्वरों की प्राकृतिक पद्धति को बदल देते हैं और सूर्योदय से सूर्यास्त तक चन्द्र स्वर तथा सूर्यास्त से सूर्योदय तक सूर्य स्वर प्रवाहित करते हैं। शास्त्र कहते हैं कि जो ऐसा करने में सक्षम होता है वह योगी है।

एक दिन में साँस की छ: ऋतुएं होती हैं। प्रात:काल बसन्त है, मध्याह्न ग्रीष्म, अपराह्न वर्षा, सांयकाल शरद, मध्यरात्रि शीत और रात्रि का आखिरी हिस्सा हेमन्त ऋतु कहलाती है।

ये स्वर पाँच महाभूतों को अपने में धारण किए रहते हैं या यों कहा जाए कि पंच महाभूत एक निश्चित क्रम में नियत अवधि तक चन्द्र और सूर्य स्वर में प्रवाहित होते हैं। इसके पहले कि इस विषय पर चर्चा की जाये, यौगिक दृष्टि से शरीर विज्ञान पर थोड़ी चर्चा आवश्यक है। हमारे शरीर में स्थित शक्ति-केन्द्र, जिन्हें योग में चक्र, आधार या कुण्ड के नाम से जाना जाता है, के विषय में प्रसंगवश यहाँ परिचय दिया जा रहा है। वैसे तो शरीर में अनेक चक्र हैं, किन्तु इनमें सात-मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार चक्र मुख्य हैं। पंच महाभूतों की स्थिति क्रम से प्रथम पाँच चक्रों में मानी जाती है, जिसका विवरण नीचे देखा जा सकता है:-

चक्र

मूलाधार

स्वाधिष्ठान

मणिपुर

अनाहत

विशुद्ध

पंच महाभूत

पृथ्वी

जल

अग्नि

वायु

आकाश

स्वरोदय विज्ञान के अनुसार पंच महाभूतों की स्थिति उपर्युक्त स्थिति से थोड़ी भिन्न है। शिव स्वरोदय के अनुसार पृथ्वी जंघों में, जल तत्व पैरों में, अग्नि दोनों कंधों में, वायु नाभि में और आकाश मस्तक में स्थित हैं। स्वामी राम के अनुसार पृथ्वी पैरों (Feet) में, जल घुटनों में, अग्नि दोनों कंधों के बीच में स्थित हैं। शेष दो तत्वों की स्थिति के विषय में कोई अन्तर नहीं है। उक्त विवरण एक दृष्टि में नीचे की सारिणी में दर्शाया जा रहा है:-

पंच महाभूत

पृथ्वी

जल

अग्नि

वायु

आकाश

स्थिति

जंघा

पैर

कंधें

नाभि

मस्तक

ये पाँचों तत्व दोनों स्वरों में समान रूप से प्रवाहित होते हैं। यदि हम शारीरिक और मानिसिक रूप से स्वस्थ हैं तो इनकी दिशा, लम्बाई, अवधि और क्रम निश्चित होते है, इन्हीं की सहायता से स्वरों में तत्वों की पहिचान की जाती है। इनकी दिशा, लम्बाई, अवधि एवं इनके प्रवाह का क्रम नीचे की सारिणी में देखा जा सकता है।

तत्व

पृथ्वी

जल

अग्नि

वायु

आकाश

प्रवाह की दिशा

मध्य

नीचे की ओर

ऊपर की ओर

तिरछी

(न्यून कोण)

सभी दिशाओं में

लम्बाई

12 अंगुल

16 अंगुल

4 अंगुल

8 अंगुल

--

अवधि

20 मिनट

16 मिनट

12 मिनट

8 मिनट

4 मिनट

प्रवाह का क्रम

तृतीय

चतुर्थ

द्वितीय

प्रथम

पंचम

पिंगला नाड़ी से स्वर प्रवाहित होने पर पृथ्वी तत्व का सूर्य से, जल का शनि से, अग्नि का मंगल से और वायु का राहु से सम्बन्ध माना जाता है तथा इड़ा नाड़ी में पृथ्वी का गुरू से, जल का चन्द्रमा से, अग्नि का शुक्र से और वायु का बुध से।image