शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

अंक-5 :: स्वरोदय विज्ञान :: आचार्य परशुराम राय

अंक-5

स्वरोदय विज्ञान

मेरा फोटोआचार्य परशुराम राय

image जैसे सूर्य और चन्द्र इस जगत को प्रभावित करते हैं, वैसे ही सूर्य स्वर और चन्द्र स्वर हमारे शरीर को प्रभावित करते हैं। कहा जाता है कि चन्द्र स्वर शरीर को अमृत से सींचता हैं और सूर्य स्वर उसकी नमी को सुखा देता है। जब दोनों स्वर मूलाधार चक्र, जहाँ कुण्डलिनी शक्ति सोती है, पर मिलते हैं तो उसे अमावस्या की संज्ञा दी गई है।

प्रकृति द्वारा प्रदत्त शरीर में स्वर पद्धति के अनुसार चौबीस घंटें में इनका बारह राशियों से सम्बन्ध का ज्ञान भी बड़ा रोचक है। चन्द्र स्वर का उदय वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों में होता है तथा सूर्य स्वर का मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुंभ राशियों में। स्वरोदय विज्ञान के साधक स्वरों की प्राकृतिक पद्धति को बदल देते हैं और सूर्योदय से सूर्यास्त तक चन्द्र स्वर तथा सूर्यास्त से सूर्योदय तक सूर्य स्वर प्रवाहित करते हैं। शास्त्र कहते हैं कि जो ऐसा करने में सक्षम होता है वह योगी है।

एक दिन में साँस की छ: ऋतुएं होती हैं। प्रात:काल बसन्त है, मध्याह्न ग्रीष्म, अपराह्न वर्षा, सांयकाल शरद, मध्यरात्रि शीत और रात्रि का आखिरी हिस्सा हेमन्त ऋतु कहलाती है।

ये स्वर पाँच महाभूतों को अपने में धारण किए रहते हैं या यों कहा जाए कि पंच महाभूत एक निश्चित क्रम में नियत अवधि तक चन्द्र और सूर्य स्वर में प्रवाहित होते हैं। इसके पहले कि इस विषय पर चर्चा की जाये, यौगिक दृष्टि से शरीर विज्ञान पर थोड़ी चर्चा आवश्यक है। हमारे शरीर में स्थित शक्ति-केन्द्र, जिन्हें योग में चक्र, आधार या कुण्ड के नाम से जाना जाता है, के विषय में प्रसंगवश यहाँ परिचय दिया जा रहा है। वैसे तो शरीर में अनेक चक्र हैं, किन्तु इनमें सात-मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार चक्र मुख्य हैं। पंच महाभूतों की स्थिति क्रम से प्रथम पाँच चक्रों में मानी जाती है, जिसका विवरण नीचे देखा जा सकता है:-

चक्र

मूलाधार

स्वाधिष्ठान

मणिपुर

अनाहत

विशुद्ध

पंच महाभूत

पृथ्वी

जल

अग्नि

वायु

आकाश

स्वरोदय विज्ञान के अनुसार पंच महाभूतों की स्थिति उपर्युक्त स्थिति से थोड़ी भिन्न है। शिव स्वरोदय के अनुसार पृथ्वी जंघों में, जल तत्व पैरों में, अग्नि दोनों कंधों में, वायु नाभि में और आकाश मस्तक में स्थित हैं। स्वामी राम के अनुसार पृथ्वी पैरों (Feet) में, जल घुटनों में, अग्नि दोनों कंधों के बीच में स्थित हैं। शेष दो तत्वों की स्थिति के विषय में कोई अन्तर नहीं है। उक्त विवरण एक दृष्टि में नीचे की सारिणी में दर्शाया जा रहा है:-

पंच महाभूत

पृथ्वी

जल

अग्नि

वायु

आकाश

स्थिति

जंघा

पैर

कंधें

नाभि

मस्तक

ये पाँचों तत्व दोनों स्वरों में समान रूप से प्रवाहित होते हैं। यदि हम शारीरिक और मानिसिक रूप से स्वस्थ हैं तो इनकी दिशा, लम्बाई, अवधि और क्रम निश्चित होते है, इन्हीं की सहायता से स्वरों में तत्वों की पहिचान की जाती है। इनकी दिशा, लम्बाई, अवधि एवं इनके प्रवाह का क्रम नीचे की सारिणी में देखा जा सकता है।

तत्व

पृथ्वी

जल

अग्नि

वायु

आकाश

प्रवाह की दिशा

मध्य

नीचे की ओर

ऊपर की ओर

तिरछी

(न्यून कोण)

सभी दिशाओं में

लम्बाई

12 अंगुल

16 अंगुल

4 अंगुल

8 अंगुल

--

अवधि

20 मिनट

16 मिनट

12 मिनट

8 मिनट

4 मिनट

प्रवाह का क्रम

तृतीय

चतुर्थ

द्वितीय

प्रथम

पंचम

पिंगला नाड़ी से स्वर प्रवाहित होने पर पृथ्वी तत्व का सूर्य से, जल का शनि से, अग्नि का मंगल से और वायु का राहु से सम्बन्ध माना जाता है तथा इड़ा नाड़ी में पृथ्वी का गुरू से, जल का चन्द्रमा से, अग्नि का शुक्र से और वायु का बुध से।image

14 टिप्‍पणियां:

  1. वैज्ञानिकता लिए हुए यह पोस्ट बहुत ही उपयोगी रही!

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  2. सुंदर प्रस्तुति!
    राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है।

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  3. बहुत उपयोगी जानकारी है। यदि हम इसका व्यवहार करें तो जीवन की दिशा बदल सकती है। आभार।

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  4. आचार्यवर,
    नमस्कार !
    असमंजस में हूँ कि यह अद्भुत ज्ञान अभी सिर्फ संचित करूँ या व्यवहार में भी लाऊं......!! बिनु गुरु भाव निधि तरी न कोई............ !!!

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  5. बहुत उपयोगी जानकारी पढने को मिली।

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  6. Pathakon ko is post ko padhane apane vicharon se avagat karane ke liye hardik abhar.

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  7. बहुत ही श्रेष्ठ कार्य हो रहा है यह. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  8. सुन्दर और उपयोगी लेख.धन्यवाद.

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