शनिवार, 7 अगस्त 2010

बादल अम्बर के विरहाकुल

12012010005 बादल अम्बर के विरहाकुल!

 

  

मनोज कुमार

आज फ़ुरसत में मैं बैठा हुआ आलोचक का मैं अर्थ ढूंढ रहा था। कुछ तो शरीफ़ क़िस्म के अर्थ मिले। जैसे समीक्षक (reviewer) और विपक्षधर (oppositionist)। कुछ ठीक-ठाक से अर्थ वाले मिले जैसे महिमा मर्दक (deglamorizer) और निंदक (disparager)। महान संत ने भी कहा था कि “निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छबाए।”


पर जो मुझे सबसे रोचक लगा वह है छिद्रान्वेषक (faultfinder)| छिद्रान्वेषण का अर्थ खोजने पर मिला “किसी व्यक्ति या बात के दोष ढ़ूढना, खुचुर निकालना।” खुचुर शब्द लगता है खुचर से बना है, और खुचर का अर्थ दिया गया है “झूठ-मूठ किसी की ग़लती या दोष दिखाने के लिए कही हुई बात।” तो मैं अपनी इस खोज के परिणाम पर पहुंचा और पाया कि अंततोगत्वा यह बात झूठ-मूठ ही होती है।

हम इस प्रकार के अदमी से रोज़ बा-वास्ता होते हैं। निंदक तो ठीक है, पर ये जो प्राणी है, जो छिद्रान्वेषक होता है, वह खुद कभी संतुष्ट रहता ही नहीं, यह मुझे प्रतीत होता है। आप मेरी बात न माने! मुझे खुशी होगी। पर कोई चीज़ पूर्ण हो सकती है क्या? अब देखिए शायर “चौदहवीं का चांद” कहता है तो एक ऐसे सौन्दर्य की कल्पना सामने आती है, जिस सौन्दर्य में बस पूर्णता आने ही वाली हो! वह बेहद खूबसूरत-सा होगा! अगर पूनम का चांद कहता, तो … शायद और कुछ सोचने की गुंजाइश ही नहीं रहती। पर छिद्रान्वेषी महाराज कहेंगे, अरे पूनम का चांद थोड़े ही उसका सौन्दर्य।


एक मेरे जान पहचान के व्यक्ति थे। कहीं से बढिया मांस बनाना सीख कर आए। उन्होंने अपने एक दोस्त को खाने पर निमंत्रित किया। खाने के पश्चात्‌ मित्र ने राय ज़ाहिर की, “हां, सब ठीक था, हल्दी
थोड़ी कम थी।”


दूसरे रविवार को उस दोस्त को फिर बुलाया। उसने खाने के उपरांत कहा, “सब ठीक था, पर जिस पर मांस काटा गया था, उसकी लकड़ी का टुकड़ा मांस पर चिपका रह गया। तीसरे रविवार को उन्होंने पूरी सतर्कता से मांस बनाया और मित्र को खिलाया। मित्र ने खाने के बाद कहा, “हां, ठीक ही था पर यह मांस दांत में फंस गया।”


अब इसका क्या जवाब है? ऐसे लोग सीधे मुंह स्वीकार कर ही नहीं सकते कि अच्छा था। कुछ न कुछ दोष निकालते ही रहेंगे।

इसी भाव को अपनी आज की प्रस्तुत कविता में मैंने लिखा है
सब देख रहे एक-दूजे को
कर दी है किसने भूल कहां!

तो आज के फ़ुरसत में … मेरी डायरी के प्रथम पृष्ठ पर लिखी यह कविता प्रस्तुत है। यानी मेरी पहली कविता। तब मैं मैट्रिक में पढता था।

बादल अम्बर के विरहाकुल!

विश्‍व विटप की डाली पर है,

मेरा वह प्यारा फूल कहां!

है सुख की शीतल छांव कहां,

चुभते पग-पग पर शूल यहां!

 

जग में बस पीड़ा ही पीड़ा,

दुख ज्वाला में जलते तारे।

शशि के उर में करुण वेदना,

प्रिय चकोर हैं दूर हमारे।।

बड़ी विचित्र रचना इस जग की,

कांटों में खिलते फूल यहां।

है सुख की शीतल छांव कहां,

चुभते पग-पग पर शूल यहां!

 

नीर बरसते झम-झम झम-झम,

बादल अम्बर के विरहाकुल।

टकरा-टकरा कर उपलों से,

तट छूने को लहरें व्याकुल।

कैसे पार लगेगी नौका,

हैं धाराएं प्रतिकूल यहां।

है सुख की शीतल छांव कहां,

चुभते पग-पग पर शूल यहां!

 

सुमनों में अब वह सुरभि नहीं,

कोकिल की कूक में दर्द भरा।

मरघट की सी नीरवता में,

है डूब रही सम्पूर्ण धरा।।

सब देख रहे इक-दूजे को,

कर दी है किसने भूल कहां।

है सुख की शीतल छांव कहां,

चुभते पग-पग पर शूल यहां!

*** *** *** ***

59 टिप्‍पणियां:

  1. किसी व्यक्ति या बात के दोष ढ़ूढने तक तो ठीक है .. पर झूठ-मूठ किसी की ग़लती या दोष दिखाने के लिए कही हुई बात को क्‍या कहा जाए .. आपकी रचना बहुत सुंदर है ..

    सब देख रहे इक-दूजे को,

    कर दी है किसने भूल कहां।

    है सुख की शीतल छांव कहां,

    चुभते पग-पग पर शूल यहां!

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  2. बहुत ही भावभरी कविता है!
    --
    यानि आपके भीतर काव्य के कीटाणु प्रारम्भ से ही है!
    आज बस इनको पल्लवित-पोषित करने की जरूरत है!
    --
    बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

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  3. @ संगीता पुरी जी

    धन्यवाद!
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...
    मनोज

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  4. @ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी

    आभार आपका!
    आपकी इस भाव भरी टिप्पणी के लिए।
    अब तो ये किटाणु विषाणू बन गए हैं।

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  5. आपका काव्य
    और आलेख
    आपके गहन अध्ययन को
    उजागर कर पाने में सक्षम है ....
    अभिवादन स्वीकारें

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  6. समीक्षक और आलोचक में अधिक अंतर नहीं है. विपक्षधर और महिमा मर्दक एक दूसरे के धुर विरोधी हैं. छिद्रान्वेशक की बुद्धि, विवेक और व्यक्तित्व का समग्र विकास ही नहीं होता. छिद्रान्वेशक, विपक्षधर और महिमा मर्दक सब अपने-अपने कूप में विचरण करते हैं. और देखा जाए तो ये अपना ही नुकसान करते रहते हैं.

    इस सुन्दर कविता का पुनः रसास्वादन कराने के लिए आपको धन्यवाद।

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  7. @ MUFLIS जी
    आप काफ़ी दिनों बाद आए हमारे ब्लॉग पर।
    धन्यवाद!
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...
    मनोज

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  8. @ हरीश प्रकाश गुप्त
    बहुत अच्छी व्याख्या दी आलोचक और अन्य शब्दों को।
    धन्यवाद!
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...
    मनोज

    उत्तर देंहटाएं
  9. दोनो आइटम धांसू हैं। ऊपर का हिस्सा ज्यादा रुचिकर लगा- अपनी सोच के अनुसार है न मामला। नीचे वाला भी चकाचक है। धांसू च फ़ांसू!

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  10. बड़ी विचित्र रचना इस जग की, कांटों में खिलते फूल यहां। है सुख की शीतल छांव कहां, चुभते पग-पग पर शूल यहां!

    बेशक बहुत सुन्दर लिखा और सचित्र रचना ने उसको और खूबसूरत बना दिया है.

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  11. बहुत सुंदर विश्लेषण। पता नहीं क्यों सच्ची और ख़री-खरी कहने में ऐसे लोगों की जबां कतराती रहती है।

    पहली कविता के रसास्वादन के लिए धन्यवाद। बहुत ही सुंदर भावाभिव्यक्ति और खूबसूरत चित्रों का मेल।


    विश्‍व विटप की डाली पर है,

    मेरा वह प्यारा फूल कहां!

    है सुख की शीतल छांव कहां,

    चुभते पग-पग पर शूल यहां!

    उत्तर देंहटाएं
  12. आलोचना अपने मूल रूप में अब शायद ही कहीं मिले। इसलिए,माना जा रहा है कि नामवर सिंह हिंदी के आख़िरी आलोचक हैं।

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  13. @ शिक्षामित्र जी
    बिल्कुल सही कहा है आपने।
    नामवर सिंह जी के बारे में।
    धन्यवाद!
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...

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  14. आपने छिद्रान्वेषक का अर्थ खूब कहा है....

    आपकी पहली रचना ही बहुत गज़ब की है....
    विश्व विटप....सुन्दर बिम्ब ..
    यानि कि आप मेट्रिक से ही अपने पुष्प को ढूँढ रहे थे :)
    बरसते झम-झम झम-झम, बादल अम्बर के विरहाकुल। टकरा-टकरा कर उपलों से, तट छूने को लहरें व्याकुल। कैसे पार लगेगी नौका, हैं धाराएं प्रतिकूल यहां। है सुख की शीतल छांव कहां, चुभते पग-पग पर शूल यहां |

    बहुत सुन्दर शब्दों में भावों कि अभिव्यक्ति ....चित्रों से सुशोभित अच्छी रचना

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  15. @ संगीता स्वरुप ( गीत )
    जी ,
    ढूंढते-ढूंढते "फ़ूल" बन गया।
    आज भी नहीं मिला।
    धन्यवाद!
    प्रो

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  16. @ समवेत स्वर/Samvet Swar जी
    आपका पहली बार हमारे ब्लॉग पर आगमन हुआ। स्वागत।
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...
    मनोज

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  17. @ अनूप शुक्ल जी
    आपके शब्द मनोबल बढाते हैं।
    धन्यवाद!
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...
    मनोज

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  18. @ संजय भास्कर जी
    @ प्रवीण पाण्डेय जी

    धन्यवाद!
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...
    मनोज

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  19. manoj jee kisee kee galtee batana aur nikalna iseme bhee logo ko bada sukh milta hai.........apne ko shresht batane ka mouka koi kyo hath se jane de.............ise mansikta se aae din paalaa padta rahta hai...........

    badee bhavmay kavita hai...........lekhan ka to badaa lamba safar paar kiya hai aapne.........

    aapkee laghu katha chatree ko le badee mazedar rahee.........
    abhee to savan barsaat sabhee hai ek aadh kadee aur ho jae.........

    उत्तर देंहटाएं
  20. @ Apanatva जी
    जी, छिद्रान्वेषक यही तो करते हैं।
    आपने भी खूब याद दिलाया। छाता लेकर हाज़िर होना ही पड़ेगा।
    धन्यवाद!
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...

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  21. बादल अम्बर के विरहाकुल।

    टकरा-टकरा कर उपलों से,

    तट छूने को लहरें व्याकुल

    MANBHAVAN aur GAMBhir V,isliye utkridht Rachna....

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  22. जीवन इन विडंबनाओं से मुक्त हो,तब ही शूल का फूल बनना संभव।

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  23. मनोज जी, आपकी पहली रचना बहुत पसन्द आयी-----और समीक्षक शब्द के बहाने की गयी बेहतरीन चर्चा भी---।

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  24. ठीक कहा है आजकल निंदक तो मिलते ही नहीं छिद्रान्वेषकही मिलते हैं :)
    कविता बहुत खूबसूरत है.

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  25. सुमनों में अब वह सुरभि नहीं,

    कोकिल की कूक में दर्द भरा।

    मरघट की सी नीरवता में,

    है डूब रही सम्पूर्ण धरा।।

    बेहद सुन्दर मनोज जी !

    उत्तर देंहटाएं
  26. बहुत सुंदर कविता, अति सुंदर लेख. धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  27. सुमनों में अब वह सुरभि नहीं,
    कोकिल की कूक में दर्द भरा।
    मरघट की सी नीरवता में,
    है डूब रही सम्पूर्ण धरा।।
    ....samajik bidambana ke dharatal se upji gahri Bhavpurn rachna....
    Dusaron mein dosh dhudhna saral hai aur aise log bahutayat mein milte hain... lekin hamen apna kaam achhi tarah karte rahana chahiya ....kam se kam mera to yahi manana hai...
    Haardik shubhkamnayne

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  28. छिद्रान्वेषक……………सही कहा पग पग पर मिलते हैं बात की खाल निकालना तो कोई इनसे सीखे ना खुद संतुष्ट होते हैं और ना ही दूसरे को होने देते हैं पर पीडा मे इन्हें आत्मिक शांति मिलती है वो भी पीडा जब मानसिक दी जाये तब तो कहना ही क्या…………………बहुत ही सुन्दर विश्लेषण किया है और कविता के तो कहने ही क्या ……………॥बेहद सुन्दर भाव हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  29. सर्वप्रथम, रचना तो बहुत उम्दा है, उसके लिए बधाई स्वीकारें.

    आगे, छिद्रान्वेषण/ छिद्रान्वेषक - मुझे भी बहुत पसंद आया. कल ही कहीं पढ़ा भी था और देखा भी. :)

    यह पुरानी बात हुई:

    “निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छबाए।”

    आजकल तो निंदक के लिए आप कुती बनाये न बनायें, बस, आपका अच्छा मकान बनने की भनक मिल जाये तो पड़ोस में वो खुद की बिल्डिंग अपने आप तान लेते हैं. बहुत सरल जमाना हो गया है. :)

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  30. बहुत अच्छा लगा आपका अर्थ ढूंढना :)

    मैं समझता था कि एक मैं ही हूँ जो छिद्रान्वेषक टाइप के लोगों से त्रस्त हूँ…
    लेकिन जानकर खुशी हुई कि कई लोगों की खुचुर निकाली जाती है :P
    कैसे पार लगेगी नौका, हैं धाराएं प्रतिकूल यहां। है सुख की शीतल छांव कहां, चुभते पग-पग पर शूल यहां!
    वाह वाह !!

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  31. सुंदर विश्लेषण ,और अच्छे भाव वाली रचना ।

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  32. यानि आपने बड़ी छोटी उम्र में बड़ी सुन्दर कविता लिखी ।

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  33. आपकी यह पोस्ट शानदार है, लेकिन क्या करिएगा लोगों को नामवर सिंह बनने का बड़ा शौक है। जो नामवर नहीं बन पाते वे मैनेजर पांडेय बनकर भी काम चला लेते हैं. और जो दोनों नहीं बन पाते वे लुद्दी के माफिक पैदा हो ही जाते हैं
    काफी अहम मसला उठाया है आपने

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  34. छिद्रान्वेषण वाला मामला बढ़िया रहा।

    मैट्रिक के दौरान लिखी यह कविता भी सुंन्दर है।

    बढि़या पोस्ट।

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  35. bahut hi gaharaai tak chhune wali kavita .bahut hi sarthak aur samyanukul.man karta hai is kavita ko sahej kar rakh lun.bahut achhi prastuti.
    poonam

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  36. Jivan apani pahichan ki khoj hai. Is jivan Darshan ko is kavita me bimbon ke madhyam se bahut hi uttam dhang se abhivyakt kiya gaya hia. Vaise is kavita Manoj Kumarji ke mukharvind se kai bar sun chuka aur har bar yah kavita utana hi anand pradan ki. Aj phir ise padhakar Kavigoshthiyon ke purani yaden taji ho gayin.

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  37. ठीक कहा है आजकल निंदक तो मिलते ही नहीं छिद्रान्वेषकही मिलते हैं!

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  38. सटीक व सशक्त रचना इंगित कर रही है ये रोग पुराना है.:)

    छिद्रान्वेषण....करने के लिये छिद्रान्वेषक तो मुफ़्त में मिलते हैं यानि उधार बैठे हैं.:)

    रामराम

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  39. बहुत सुन्दर व भावपूर्ण रचना है। बधाई स्वीकारें।

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  40. Dr. Rupchandra ji is right. you are a genius sir not only now but from your childhood.

    After 12th I never read poem like this which need so much understanding and sensibility to do justice with it. I still need time to and some more reading of this for the same.

    Congrats...

    kavyalok.com

    Please visit, register, give your post and comments.

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  41. इस सुन्दर कविता का रसास्वादन कराने के लिए आपको धन्यवाद।

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  42. बहुत सुन्दर शब्दों में भावों कि अभिव्यक्ति ....चित्रों से सुशोभित अच्छी रचना

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  43. कविता बहुत अच्छी है...जिसकी आपसे पूरी उम्मीद थी. :)
    बाकि जो ऊपर व्याख्या आपने की है, वो तो सटीक है ही

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  44. मनोज जी,
    आपकी पहली बात पर पहली बात ये है कि एक कलकार ने बहुत सुंदर चित्र बनाया..बड़ा ही जीवंत..और रख दिया चौराहे पर इस निवेदन के साथ कि किसी को कोई कमी दिखे तो उस जगह घेरा डाल दें... शाम तक पूरे चित्र में घेरे ही घेरे थे...
    “आजकल तो निंदक के लिए आप कुती बनाये न बनायें,”  समीर जी की रेखांकित बात पर ग़ौर करें, हाथी चले बाज़ार और वह रेखांकित जीव भूँके हज़ार.. (मज़ाक)
    दूसरी बात पर तो आपने कुछ कहने की गुंजायश ही नहीं रखी... मैट्रिक की कविता और आज भी सामयिक. कहाँ कहाँ गाड़ कर रखे हैं ख़ज़ाने आपने. धन्य हुआ!!

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  45. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  46. आपकी रचना निस्संदेह बहुत अच्छी है चित्रों से इसे सजीव कर दिया आपको बधाई......।

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  47. सब देख रहे इक-दूजे को,

    कर दी है किसने भूल कहां।

    है सुख की शीतल छांव कहां,

    चुभते पग-पग पर शूल यहां!
    मनोज जी,
    बेहद ख़ूबसूरत कविता है यह . छिद्रान्वेषण की प्रकृति आलोचक की विशेषता नहीं उसकी कमजोरी का परिचायक है ,ऐसा मेरा मानना है . इस रचना के माध्यम समालोचकों के एक वर्ग-विशेष पर कटाक्ष प्रभावशाली बन पड़ा है.

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  48. Manoj ji...
    सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

    isiliye dobara chala aaya padne

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  49. Khuchur nikalne vala Khurpechiya is kavita per kahega- Kavita bahut achchi likhi per vo baat kahan :-)

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  50. ये सही है मनोज जी ... जिसने कमी निकालनी है वो कोई न कोई बात निकाल ही लेगा ....
    आपकी रचना बहुत ही सुंदर है ... लय में छन्द मय ...

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  51. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  53. "सब देख रहे इक-दूजे को,
    कर दी है किसने भूल कहां।
    है सुख की शीतल छांव कहां,
    चुभते पग-पग पर शूल यहां!"
    मनोज जी बिलकुल सही कहा है .प्रोत्साहित करनेवाली बात तो ये होती है कि आप किसी भी रचना का सुंदर और सकारात्मक पक्ष देखें.
    कमियां तो अच्छाइयों कि फिसलन मात्र है.कहीं भी ,किसी से भी हो सकती है.एक अच्छा एवं स्वस्थ सन्देश देती रचना.

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