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गुरुवार, 26 मई 2011

आंच-70 :: आलोचना और आलोचना-धर्मिता

आलोचना और आलोचना-धर्मिता

आचार्य परशुराम राय

गत शनिवार को फुरसत में मेरे परमप्रिय मित्र श्री मनोज कुमार जी ने एक बहुत ही सशक्त प्रश्न उठाया था कि क्या पाठक का विकल्प आलोचक है। काफी पाठकों ने इस लेख को सराहा था। मुझे भी बहुत अच्छा लगा था। लेकिन इंटरनेट देवता के अप्रसन्न होने के कारण मैं सम्भवतः कोई टिप्पणी नहीं कर पाया। लेकिन लेख को पढ़कर लगा कि इस विषय पर अपनी थाती और विद्वज्जनों से समय-समय पर हुई चर्चाओं के आधार पर पुनः एकबार कुछ कहा-सुना जाए। इस ब्लाग पर आज समीक्षा के लिए नियत दिन भी है, हमारे बॉस की अनुमति भी है। इसलिए आज आलोचना और आलोचना धर्मिता पर मैंने चर्चा करने का मन बनाया है। देखता हूँ कि जो मैं कहना चाहता हूँ, वह उसी तरह कह पाता हूँ कि नहीं।

मिश्र-बन्धुओं से लेकर आजतक समय-समय पर हिन्दी आलोचना के कई मानदंड आए और उसमें से काफी तिरोहित हो गए। यदि यह कहा जाय कि अबतक हिन्दी आलोचना का कोई निश्चित मानदंड नहीं है, तो गलत नहीं होगा। आज की आलोचना पद्धति पाश्चात्य आलोचना की लगभग अनुकृति है। चाहे हम कितना भी दम्भ भरें, लेकिन इस सत्य से मुख नहीं मोड़ सकते। मेरा कहना यह कदापि नहीं है कि आधुनिक पाश्चात्य आलोचना पद्धति का अनुकरण करना गलत है। क्योंकि पाश्चात्य आलोचना के जो मानदंड सुकरात और अरस्तू ने निर्धारित किए थे, उन्हें पाश्चात्य जगत कब का नकार चुका है। आज उनके यहाँ भी आलोचना के निर्धारित मानदंड नहीं हैं। पर यह भी नहीं है कि वे बिलकुल निरंकुश हैं। भाषा और व्याकरण जैसा कुछ सम्बन्ध साहित्य और आलोचना का है। जैसे पहले भाषा अस्तित्व में आयी और उसमें अन्तर्निहित शब्द, पद, वाक्य आदि के अनुशासन को भाषाविदों ने निरीक्षण करके उन्हें संग्रहीत किया, जिसे हम व्याकरण के नाम से जानते हैं। कालान्तर में भाषा के प्रयोग में परिवर्तन होते रहे, जिसे हम भाषा-विज्ञान में भाषा का विकास कहते हैं। प्रयोग में प्रचलित होने के कारण भाषाविदों द्वारा उन्हें व्याकरण के अन्दर समाविष्ट किया गया। जैसे यदि हम द्विवेदी युग को देखें, तो देवता शब्द का विभिन्न विभक्तियों में बहुवचन देवतों लिखा जाता था। पर आज हम देवताओं प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार भारतीय साहित्य और पाश्चात्य साहित्य में समय-समय पर लिखे जानेवाले साहित्य को समझने के लिए मानदंड बदलते रहे हैं। यही कारण है कि भारतीय काव्यशास्त्र में कई सम्प्रदायों और सिद्धान्तों का जन्म हुआ, यथा- अलंकार सम्प्रदाय, रीति सम्प्रदाय, रस सम्प्रदाय, ध्वनि सम्प्रदाय, वक्रोक्ति सम्प्रदाय और औचित्य सम्प्रदाय। इन सम्प्रदायों के अन्तर्गत प्रतिपादित सिद्धांतों की सीमा रेखा परवर्ती आचार्य खींचते रहे। इनपर चर्चा भारतीय काव्यशास्त्र स्तम्भ में की जा चुकी है। अतएव उन्हें संदर्भ के कारण संक्षेप में यहाँ लिया गया है। ये ही सिद्धांत संस्कृत साहित्य और हिन्दी साहित्य को परखने के लिए या उनका मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग में आते रहे। किन्तु विदेशी संस्कृति के समागम के कारण अन्य विचार-धाराओं की तरह वहाँ के साहित्य और आलोचना के मानदंडों का भी आयात हुआ और भारतीय साहित्यिक मूल्यांकन की दृष्टि में बदलाव आया।

इसी प्रकार पाश्चात्य देशों में भी साहित्य को परखने के लिए समय-समय पर विभिन्न वादों और सिद्धांतों का अस्तित्व देखने में आता है, यथा- बिम्बवाद, प्रतीकवाद, अभिव्यंजनावाद, व्यावहारिक समीक्षा-सिद्धांत, वस्तुवादी मानदंड और भाववादी मानदंड। इनपर भी आँच के अंक-55 में चर्चा की जा चुकी है। वैसे बहुत से विदेशी समालोचकों को भारतीय काव्यशास्त्र ने भी आकर्षित किया और लगभग सभी प्रमुख काव्यशास्त्र के ग्रंथों पर अंग्रेजी भाषा में कमेंट्री लिखी गयी। कुल मिलाकर जिस प्रकार अन्य ज्ञान-विज्ञान, वाणिज्य आदि क्षेत्रों में आयात-निर्यात होता रहा है, उसी प्रकार साहित्यिक विचार-धाराओं का भी आयात-निर्यात हुआ। इसके प्रति असहिष्णु होने की आवश्यकता नहीं है। किसी विचार-धारा में यदि कोई उत्तम विचार-धारा है, तो उसे स्वीकार करने में किसी को असुविधा नहीं होनी चाहिए। इसका एक उदाहरण महाकवि कालिदास द्वारा विरचित कुमारसम्भव के एक आधे श्लोक पर एक अज्ञात कवि की आलोचना को देखें-

एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः

इस श्लोकार्ध का अर्थ है- एक दोष गुण के समूह में उसी प्रकार डूब जाता है जैसे चन्द्रमा की किरणों में उसकी कालिमा छिप जाती है। यह हिमालय के सन्दर्भ में कहा गया है कि हिमालय में शीतलता की अधिकता एक दोष है, पर उसमें इतने अधिक गुण हैं कि शीतलताधिक्य का एक अवगुण वैसे ही तिरोहित हो जाता है, जैसे चन्द्रमा की किरणों में उसकी कालिमा। पर एक अज्ञात कवि ने उलटकर ऐसी बात कही कि पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रह सकता-

एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोरिति यो बभाषे।

न तेन दृष्टं कविना समस्तं दारिद्र्यदोषो गुणराशिहारी।।

अर्थात् एक दोष गुण के समूह में उसी प्रकार डूब जाता है जैसे चन्द्रमा की किरणों में उसकी कालिमा, ऐसा जिस कवि ने कहा उसने ठीक से देखा नहीं। क्योंकि दरिद्रता एक ऐसा दोष है जो गुणों के समूह को निगल जाता है। और मैं समझता हूँ कि महाकवि कालिदास भले ही कविकुल-गुरु हों, महान हों, लेकिन प्रस्तुत सन्दर्भ में बिना किसी पूर्वाग्रह के इस अज्ञात कवि की बात स्वीकार करने में किसी को कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

यदि हम थोड़ा प्राचीन ग्रंथों पर ध्यान देते हैं तो पाते हैं कि बहुत से अर्वाचीन कवियों ने कथानक में परिवर्तन किया है। जैसे महाकवि तुलसीदास जी ने रामकथा के अपने वर्णन मे कई परिवर्तन किए हैं, यथा सीता-हरण के सन्दर्भ में लक्ष्मण जी रेखा खींचकर कहते हैं कि वे किसी भी हालत में उस रेखा को लाँघकर बाहर न जायँ। जबकि महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं कि रावण के आने पर माता सीता रावण का आतिथ्य-सत्कार करती हैं और कहती हैं कि आप विश्राम करें, मेरे स्वामी और भी बहुत से खाद्य पदार्थ लेकर आ रहे होंगे।

यहाँ यह द्रष्टव्य है कि महाकवि तुलसीदास जी द्वारा किए गए परिवर्तन के कई कारण हो सकते हैं। साधनागत आध्यात्मिक कारण भी हो सकते हैं या सामाजिक कारण, यथा साधुवेश में ठगी का प्रचलन अधिक बढ़ जाने के कारण लोगों को सजग होने की ओर संकेत के उद्देश्य से परिवर्तन करने की आवश्यकता महसूस की गयी हो। इसी प्रकार रश्मिरथी में “दिनकर” ने भी महाभारत के मूल कथानक में परिवर्तन किया है। महाकवि कालिदास ने अपने नाटक अभिज्ञानशाकुन्तलम् में भी इसी प्रकार का परिवर्तन किया है। यहाँ इन बातों का उल्लेख करने का उद्देश्य यह है कि चाहे पाठक हो या समीक्षक हो, किसी रचना का अध्ययन करते समय बहुत सारे तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए। समीक्षक या आलोचक किसी पाठक का विकल्प नहीं है। लेकिन आलोचक यदि समर्थ और तटस्थ है तो पाठक को एक रचना को समझने में सहायक अवश्य हो सकता हैरामचरितमानस के जितने पाठक हैं, उनमें से कितने ऐसे हैं जो तुलसीदास जी द्वारा कथित मानस के रहस्यों को समझ पाते हैं। अनेक व्यास उसपर प्रवचन करते आ रहे हैं। लोग उन्हें सुनते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि व्यासों के अभाव में भी जनगण मानस का पाठ करता है और अपनी समझ के अनुसार उसे समझता है। रामचरितमानस का उदाहरण इसलिए लिया गया है कि हिन्दी साहित्य का ऐसा कोई भी दूसरा ग्रंथ नहीं है कि जिसे पढ़नेवालों की संख्या इतनी बड़ी हो।

आलोचना और आलोचना-धर्मिता पर कुछ कहने के पहले यह जानना आवश्यक है कि कवि के लिए क्या आवश्यक है। कवि की रचना उत्तम कैसे बनती है। इस सन्दर्भ में महादेवी जी की एक बात याद आती है- जिस रचना में यथार्थ और आदर्श की दूरी को जितनी कम हो वह उतनी ही महान रचना होगी और उसका रचयिता महान रचनाकार। एक रचनाकार के लिए क्या जानना आवश्यक है, इस पर संक्षेप में चर्चा कर लेते हैं। महान काव्यशास्त्री आचार्य मम्मट द्वारा उल्लेख किए गए तथ्य इस सन्दर्भ में काफी प्रासंगिक हैं-

कवि में अन्तर्निहित प्रतिभा (शक्ति), लोक-व्यवहार का ज्ञान, शास्त्र तथा काव्य आदि के पर्यालोचन से उत्पन्न निपुणता और काव्यज्ञ गुरु की शिक्षा के अनुसार काव्य-रचना का अभ्यास ये तीनों मिलकर काव्य के विकास का एक कारण है

लोक-व्यवहार का यहाँ तात्पर्य है स्थावर, जंगम जगत के व्यवहार का ज्ञान, शास्त्र का अर्थ- छन्द, व्याकरण, शब्दकोश (अमरकोश आदि), कला (चौंसठ कलाएँ), चतुर्वर्ग (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) को प्रतिपादित करनेवाले ग्रंथों, शालिहोत्र आदि द्वारा विरचित पशु-पक्षियों के लक्षणों को प्रतिपादित करनेवाले ग्रंथों, पुराणेतिहास आदि ग्रंथों का समुचित अध्ययन या उन विषयों का ज्ञान। तो यह निश्चित है कि आलोचक या समीक्षक को भी इन विषयों का ज्ञान होना आवश्यक है। तभी वह काव्य की वास्तविक भावभूमि पर जाकर काव्य को हृदयंगम कर सकता है, उसके मर्म को जान सकता है तथा उसपर उचित और तटस्थ विचार दे सकता है, चाहे समीक्षा के रूप में या किसी अन्य रूप में।

ब्लाग-जगत में लिखी जाने वाली अधिकांश ललित रचनाओं में यह देखने को मिलता है कि लोग उतने सजग नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर यहाँ एक बात कहना चाहूँगा- एक ब्लाग पर एक कविता कभी पढ़ी थी। कविता बहुत अच्छी थी। कवि का नाम और कविता का शीर्षक मुझे याद नहीं है। उसमें उन्होंने टेबुल पर पड़ी फाइलों से चेहरे पर उदासी (कुछ और भी हो सकता है) टपकने का उल्लेख किया था। अब ध्यान देने की बात है कि टपकना ऊपर से नीचे की ओर होता है, न कि नीचे से ऊपर की ओर। दूसरी बात ध्यान देने की है कि उदासी टपकती नहीं है, बल्कि पसरती है। इसी प्रकार एक ब्लाग पर एक कविता में कवि ने विहग शब्द प्रयोग किया है। उस पर एक अत्यन्त सजग पाठक ने तमाम व्याकरणगत दोषों (टंकणगत त्रुटियों) की ओर संकेत करते हुए टिप्पणी की है कि विहग के स्थान पर विहंग होना चाहिए। जबकि विहग और विहंग दोनों तत्सम शब्द हैं और सही हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे रचनाकार हो, पाठक हो या आलोचक हो, उनके अध्ययन का विस्तार निरन्तर होना चाहिए। तभी रचनाकार उत्तम रचना कर सकता है और आलोचक रचना की सर्वांगीण समीक्षा कर सकता है। एक पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति न तो अच्छा रचनाकार बन सकता है और न ही आलोचक।

इस निबन्ध में ब्लाग-जगत के जिन रचनाकारों और टिप्पणीकारों का उल्लेख किया गया है, इस अनुरोध के साथ मैं उनसे हृदय से आभार सहित क्षमा-याचना करता हूँ कि वे इसे अन्यथा न लें ।

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शनिवार, 7 अगस्त 2010

बादल अम्बर के विरहाकुल

12012010005 बादल अम्बर के विरहाकुल!

 

  

मनोज कुमार

आज फ़ुरसत में मैं बैठा हुआ आलोचक का मैं अर्थ ढूंढ रहा था। कुछ तो शरीफ़ क़िस्म के अर्थ मिले। जैसे समीक्षक (reviewer) और विपक्षधर (oppositionist)। कुछ ठीक-ठाक से अर्थ वाले मिले जैसे महिमा मर्दक (deglamorizer) और निंदक (disparager)। महान संत ने भी कहा था कि “निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छबाए।”


पर जो मुझे सबसे रोचक लगा वह है छिद्रान्वेषक (faultfinder)| छिद्रान्वेषण का अर्थ खोजने पर मिला “किसी व्यक्ति या बात के दोष ढ़ूढना, खुचुर निकालना।” खुचुर शब्द लगता है खुचर से बना है, और खुचर का अर्थ दिया गया है “झूठ-मूठ किसी की ग़लती या दोष दिखाने के लिए कही हुई बात।” तो मैं अपनी इस खोज के परिणाम पर पहुंचा और पाया कि अंततोगत्वा यह बात झूठ-मूठ ही होती है।

हम इस प्रकार के अदमी से रोज़ बा-वास्ता होते हैं। निंदक तो ठीक है, पर ये जो प्राणी है, जो छिद्रान्वेषक होता है, वह खुद कभी संतुष्ट रहता ही नहीं, यह मुझे प्रतीत होता है। आप मेरी बात न माने! मुझे खुशी होगी। पर कोई चीज़ पूर्ण हो सकती है क्या? अब देखिए शायर “चौदहवीं का चांद” कहता है तो एक ऐसे सौन्दर्य की कल्पना सामने आती है, जिस सौन्दर्य में बस पूर्णता आने ही वाली हो! वह बेहद खूबसूरत-सा होगा! अगर पूनम का चांद कहता, तो … शायद और कुछ सोचने की गुंजाइश ही नहीं रहती। पर छिद्रान्वेषी महाराज कहेंगे, अरे पूनम का चांद थोड़े ही उसका सौन्दर्य।


एक मेरे जान पहचान के व्यक्ति थे। कहीं से बढिया मांस बनाना सीख कर आए। उन्होंने अपने एक दोस्त को खाने पर निमंत्रित किया। खाने के पश्चात्‌ मित्र ने राय ज़ाहिर की, “हां, सब ठीक था, हल्दी
थोड़ी कम थी।”


दूसरे रविवार को उस दोस्त को फिर बुलाया। उसने खाने के उपरांत कहा, “सब ठीक था, पर जिस पर मांस काटा गया था, उसकी लकड़ी का टुकड़ा मांस पर चिपका रह गया। तीसरे रविवार को उन्होंने पूरी सतर्कता से मांस बनाया और मित्र को खिलाया। मित्र ने खाने के बाद कहा, “हां, ठीक ही था पर यह मांस दांत में फंस गया।”


अब इसका क्या जवाब है? ऐसे लोग सीधे मुंह स्वीकार कर ही नहीं सकते कि अच्छा था। कुछ न कुछ दोष निकालते ही रहेंगे।

इसी भाव को अपनी आज की प्रस्तुत कविता में मैंने लिखा है
सब देख रहे एक-दूजे को
कर दी है किसने भूल कहां!

तो आज के फ़ुरसत में … मेरी डायरी के प्रथम पृष्ठ पर लिखी यह कविता प्रस्तुत है। यानी मेरी पहली कविता। तब मैं मैट्रिक में पढता था।

बादल अम्बर के विरहाकुल!

विश्‍व विटप की डाली पर है,

मेरा वह प्यारा फूल कहां!

है सुख की शीतल छांव कहां,

चुभते पग-पग पर शूल यहां!

 

जग में बस पीड़ा ही पीड़ा,

दुख ज्वाला में जलते तारे।

शशि के उर में करुण वेदना,

प्रिय चकोर हैं दूर हमारे।।

बड़ी विचित्र रचना इस जग की,

कांटों में खिलते फूल यहां।

है सुख की शीतल छांव कहां,

चुभते पग-पग पर शूल यहां!

 

नीर बरसते झम-झम झम-झम,

बादल अम्बर के विरहाकुल।

टकरा-टकरा कर उपलों से,

तट छूने को लहरें व्याकुल।

कैसे पार लगेगी नौका,

हैं धाराएं प्रतिकूल यहां।

है सुख की शीतल छांव कहां,

चुभते पग-पग पर शूल यहां!

 

सुमनों में अब वह सुरभि नहीं,

कोकिल की कूक में दर्द भरा।

मरघट की सी नीरवता में,

है डूब रही सम्पूर्ण धरा।।

सब देख रहे इक-दूजे को,

कर दी है किसने भूल कहां।

है सुख की शीतल छांव कहां,

चुभते पग-पग पर शूल यहां!

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