सोमवार, 2 अगस्त 2010

संबंध-विच्छेद

संबंध-विच्छेद

मनोज कुमार

पिछले दिनों एक समाचार पत्र में पढ़ रहा था कि लंदन के समाचार पत्र डेली मेल के एक सर्वेक्षण के अनुसार प्रत्‍येक पांचवे व्‍यक्ति का दिल अपने साथी के लिए नहीं बल्कि किसी और के लिए धड़कता है। इस अध्‍ययन से यह बात सामने आई है कि अपने मौजूदा रिश्‍तों से खुश लोग भी न चाहते हुए किसी और का अहसास कर लेते हैं। जो लोग अपने अहसासों पर काबू नहीं रख पाते वे अक्‍सर किसी और संबंध में पड़ जाते हैं जिसमें उनका विवाह या मौजूदा रिश्‍ता टूट जाता है।

विवाह टूटने या टूटने के कगार पर पहुँचने के और भी कारण हैं, हो सकते हैं। यही बात मेरी इस कविता के सृजन का आधार बनी।

पति-पत्नी के रिश्तों की बारीकियों पर नज़र डालें तो एक बात तो तय है कि चाहे जितनी बातें कह ली जाएं, सुन ली जाएं, लेकिन आपसी विश्‍वास और पवित्र प्रेम ही वह धुरी है, जिस पर दाम्पत्य की बुनियाद टिक सकती है। बिना विश्‍वास के गृहस्थी की गाड़ी चला पाना असंभव है।

पवित्रता वह संपत्ति है जो प्रेम के बाहुल्‍य से पैदा होती है। इसे बेहतर बनाए रखने के लिए आपसी विश्‍वास, समझदारी, सामंजस्य, प्रेम और देखभाल निहायत ज़रूरी है। अहं, आलोचना, तुलना, शक, ना झुकना या समझौता न करने की ज़िद इस रिश्ते रूपी वृक्ष को दीमक की तरह बरबाद करता है।

पति-पत्नी का रिश्ता एक बड़ा पवित्र रिश्ता है। रवीन्‍द्र नाथ टैगोर ने कहा था पवित्रता वह संपत्ति है जो प्रेम के बाहुल्‍य से पैदा होती है। इसे बेहतर बनाए रखने के लिए आपसी विश्‍वास, समझदारी, सामंजस्य, प्रेम और देखभाल निहायत ज़रूरी है। अहं, आलोचना, तुलना, शक, ना झुकना या समझौता न करने की ज़िद इस रिश्ते रूपी वृक्ष को दीमक की तरह बरबाद करता है। ईगो या अहं दोनों के बीच टकराव की स्थिति पैदा करता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि इस झूठे अहं को दरकिनार किया जाय। एक दूसरे पर दोषारोपण करने से आवश्यक है कि वे बातें सोचें जिससे एकजुट रहा जाए। अहं का रिश्ता मन में रखने से रिश्ता फल-फूल नहीं सकता। अहं तो दो प्राणियों के बीच दीवार खड़ी कर देता है। इससे पहले कि अहं ठेस पहुंचाए. लोगों को संभल जाना चाहिए।

इस रिश्ते का सबसे क़ीमती उपहार समय है। एक-दूसरे को भरपूर समय देना चाहिए। आजकल अधिकांश पति-पत्नी दोनों स्वावलंबी हैं। रिश्ता निभाने में ज़रा सी दिक़्क़त आते ही तलाक़ देने –लेने पर उतारू हो जाते हैं। इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि अलग होना आसान है, पर साथ रहकर निभाना मुश्किल! हमें सूई बनना चाहिए, कैंची नहीं।

शादी विवाह अब जन्म जन्मांतर का रिश्ता नहीं रह गया है। जब तक विचार मिले तो एक साथ, विचारों में जरा सी भी खटास आए तो कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर तलाक लेने से नहीं चूकते। ऐसे में तलाक की अर्जी दाखिल करने वालों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है।

भारत में प्रति हज़ार में 11 शादियां टूटती हैं। यानी हर सौ में एक! एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में पचपन हज़ार तलाक़ के मामले लंबित हैं। शादी विवाह अब जन्म जन्मांतर का रिश्ता नहीं रह गया है। जब तक विचार मिले तो एक साथ, विचारों में जरा सी भी खटास आए तो कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर तलाक लेने से नहीं चूकते। ऐसे में तलाक की अर्जी दाखिल करने वालों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। कोर्ट से जुड़े जानकारों के मुताबिक प्रति माह तलाक के सैंकड़ों मुकदमे दायर हो रहे हैं। तलाक की अर्जी लगाने वाले दंपतियों में अधिकतर पढ़े लिखे और अच्छी नौकरी करने वाले हैं। विशेषज्ञों के अनुसार तलाक की नौबत बेहद मामूली वजह बन रही हैं।

अहं और आपसी विश्‍वास में कमी के कारण टकराव पैदा होता है और परिवार बिखरने की स्थिति में आ जाता है, यहां तक कि तलाक तक की नौबत तक आ जाती है| क्या तलाक बिगड़ते हुए रिश्तों को सुलझाने की सही दवा है? क्या शादी जैसे पवित्र रिश्ते की डोर इतनी कमज़ोर होती है कि आपसी कलह के चलते इस डोर को तोड़ा जा सकता है?

संबंध-विच्छेद

 


भंवर में फंसी

ज़िन्दगी की क़श्ती

किनारे तक जा न पाए

...तो ...?

इस हाय-तौबा से ...

कर लें किनारा?

 

थक-हार चुके हम

करके हर उपाय

अब और निभेगा नहीं!

 

रिसता ज़ख़्म

कुरेदने से बढ़ता ही गया

नासूर बन

छोड़ गया विकल्प एक ...

               .... अंतिम ...?

 

क्या था ऐसा

हमारे बीच

जो हम साथ चल सकते नहीं?

थी कमी

मुझमें?

... या तुझमें?

 

सुना है

हर ख़तरे से पहले

बजती है घंटी!

बजी तो होगी

न हमने सुना

न तुमने ही?

 

आख़िर वह वजह थी कौन सी?

कि विवश हो हम

होते गए दूर ...

एक दूसरे से...

 

प्यार ...?

 

था भरपूर

हमारे बीच।

पर ज़िम्मेदारियों की राख के भीतर

सुलग रहा था कहीं अंगार कोई

रहे हम अनजान उसकी तपिश से!

 

विश्‍वास ...?

 

हम करते नहीं एक दूसरे पर!

हमारे मध्य

शंकाओं के बीज

फल-फूल रहे हैं

 

आपसी समझ ...?

 

तार-तार हो गए

चादर की तरह

इसे ओढे

कब तक हम ढंकेगे

आपना मन?

 

अधिकार ...?

 

एक-दूसरे पर हम जताते रहे

इस बात से अनजान

कि एक … दूसरे पर

हावी होना चाहता है

दम घुटने की नौबत तक

ला छोड़ा

अहं के थपेड़ों ने!

 

समय ...?

 

समय तुम्हारे पास था नहीं,

शायद मेरे पास भी थी इसकी कमी

अब तो

समय से आगे बढ़ गए हैं हम!

 

यह छ्त ...?

 

इसी छत से

जिसके नीचे रहते रहे हम ... तुम

कभी बरसे थे फूल

आज भरा है सीलन

आती है बदबूदार हवाएं

और हम हैं मज़बूर

नमी से भरे इस घर के सीलन को

दूर नहीं कर पाए

 

अब

इस छत के नीचे घुटता है दम

आओ

चलो अलग हो जाएं !

 

जीवन की आपाधापी में

सुख-चैन छिन-सा गया

अब तो तनाव

और टकराव के सिवा

बचा क्या है?

 

करते नहीं हम सम्मान

एक दूसरे की भावनाओं का

रिश्तों का यह खोखला खेल

और खेला जाता नहीं....

चलो करें पटाक्षेप!!

*** ***

58 टिप्‍पणियां:

  1. इस रिश्ते का सबसे क़ीमती उपहार समय है।
    सार्थक और सुन्दर उक्ति
    रिश्ते को उकेरती सुन्दर कविता

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  2. रिश्तों की खींच-तान को शब्दों का जामा पहना दिया है आपने...
    कितने ही जीवन रोज़ इस सच्चाई से दो-चार होते हैं...
    ये कविता कम लगी हक़ीकत ज्यादा लग रही है...
    तारीफ़ जितनी भी करुँगी कम ही होगी...
    आभार...

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  3. रिश्तों की तलाश करता,यह पोस्ट बहुत अच्छा लगा.

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  4. बहुत से टूटे रिश्तों की दास्तान ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. रिश्ते को उकेरती सुन्दर कविता

    उत्तर देंहटाएं
  6. चिठ्ठा चर्चा में स्थान देने के लिए
    आपकी आभारी हूँ

    उत्तर देंहटाएं
  7. पोस्ट और रचना दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण हैं!
    --
    पढ़कर बहुतों को सोचने का अवसर मिलेगा!

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  8. aasha hai yah post bahut se logo ko rishto ki maryada ko nibhane ki prerana degi.

    is kavita ka ek alag andaj hai. kavita apne bhavo ko pathako tak sampreshit karne me safal hai.

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  9. संबंधों को विच्छेद तक की स्थिति में पहुंचाने के कारणों पर बखूबी प्रकाश डाला है ..प्रेम , विश्वास , अधिकार ...इन सभी पर सोचें तो सब जगह अहम ही है जो इस तरह रिश्तों को अलग कर्ता प्रतीत होता है...
    यह रचना मात्र एक रचना नहीं है वैवाहिक जीवन का दर्शन है...जिससे प्रेरणा लेनी चाहिए ...सुन्दर कृति के लिए आभार

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  10. ९८.८% शादियाँ तो फिर भी बची रहती हैं. लोग सिर्फ नकारात्मक क्यों देखते है? यह भी कहा जा सकता है की आज भी भारत में विवाह की सफलता की दर १००% से कुछ ही कम है.

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  11. @ ab inconvenienti जी
    १. अगर रिपोर्ट की मानें तो संयुक्त राज्य अमेरिका में डायवोर्स रेट प्रति हज़ार व्य्क्ति पर 3.6 है जबकि भारत में 11
    २. किसका सकारात्मक पक्ष ... संबंध विच्छेद का? इस पोस्ट और कविता में हमने संबंध विच्छेद के भावनात्मक पक्ष पर ध्यान देने-दिलाने का प्रयास किया है।
    ३. सुना है हिंदू विवाह अधिनियम 1955 को सरकार लचीला बनाने जा रही है ताकि तलाक प्रक्रिया आसान हो जाए!
    ४. अभी तक चले आए नियमों और कानूनों के चलते ही विश्व में भारतीयों की पारिवारिक एकता और अखंडता की बात होती थी। पूरा विश्व भारत को सभ्यता और आपसी रिश्तों के उच्च मापदंड के लिए अदर्श मानता रह है। परन्तु कहीं इस बदलाव के प्रति सकारात्मकता के कारण हम कुछ खो तो नहीं देंगे?

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  12. @ M VERMA जी
    धन्यवाद!
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...

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  13. @ 'अदा' जी
    बहुत दिनों के बाद, पता नहीं कितने दिनों के बाद आप हमारे ब्लॉग पर आईं। आपका मर्गदर्शन हमें प्रेरणा देता है।

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  14. @ शमीम जी
    धन्यवाद! प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...

    उत्तर देंहटाएं
  15. @ अजय कुमार जी,
    @ संजय भास्कर जी
    @ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी
    आपका धन्यवाद! प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...

    उत्तर देंहटाएं
  16. @ हरीश प्रकाश गुप्त जी
    अगर कविता अपने भावों को पाठकों तक संप्रेषित कर रही है तो यही मेरी संतुष्टि है।
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...

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  17. @ संगीता स्वरुप ( गीत ) जी
    आपने ठीक कहा। 'आज हम अपनी शर्तों पर जीना चाहते हैं और वे कहीं भी समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...

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  18. क्या आपने हिंदी ब्लॉग संकलन के नए अवतार हमारीवाणी पर अपना ब्लॉग पंजीकृत करा लिया है?

    इसके लिए आपको यहाँ चटका (click) लगा कर अपनी ID बनानी पड़ेगी, उसके उपरान्त प्रष्ट में सबसे ऊपर, बाएँ ओर लिखे विकल्प "लोगिन" पर चटका लगा कर अपनी ID और कूटशब्द (Password) भरना है. लोगिन होने के उपरान्त "मेरी प्रोफाइल" नमक कालम में अथवा प्रष्ट के एकदम नीचे दिए गए लिंक "मेरी प्रोफाइल" पर चटका (click) लगा कर अपने ब्लॉग का पता भरना है.

    हमारे सदस्य "मेरी प्रोफाइल" में जाकर अपनी फोटो भी अपलोड कर सकते हैं अथवा अगर आपके पास "वेब केमरा" है तो तुरंत खींच भी सकते हैं.

    http://hamarivani.blogspot.com

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  19. Manoj jee bahut hee sarthal post hai ye .............sahansheelta , dhairy kee kamee aur ab ineke sath sath aa khadee huee hai aatmnirbharta .

    janha tak samajh ka sawal hai theek hai par agar aapsee samajh nahee to ......?

    ye too nahee aur sahee aur nahee aur sahee kee vichardhara kanha le jaegee pata nahee............

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  20. एक-दूसरे पर

    हावी होना चाहता है ....

    अहं के थपेड़ों ने! ....ek jwalant samasya ko samne rakh diya. sandesh deti rachna......

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  21. एक हद तक अनछुए विषय को काव्य-रूप दिया है आपने... कतिपय वर्जनाओं में कसमसाते हृदय के उच्छावास को शब्द-रूप दिया है आपने. कविता का भाव-गाम्भीर्य बड़ा ही मुखर जान पड़ता है. एक-एक शब्द वजनदार हैं. शिल्प की दृष्टि से औसत. विम्ब-प्रतीक और छंद व्यवस्था से इतर कविता अपने भावों के सहारे सरलता से आगे बढ़ती है. धन्यवाद ! अब कोई ये नहीं कह सकता कि कवि देश-काल और समाज से निरपेक्ष होते हैं !!!

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  22. यह् विषय मुझे भी मथता रहा है। इसके साथ अब जुड़ गया है कुटुम्ब का क्षरण और उत्तरोत्तर वृद्धावस्था की बढ़ती समस्यायें।
    एक ही जीवन में बहुत बदलाव देख लिये हैं! :(

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  23. सकारात्मक यह है की कई मामलों में ऐसा होता है जब दोनों पक्षों के बीच विवाद और घृणा इतनी बढ़ जाती है की सुलह की सम्भावना शेष नहीं रहती, तब तलक ही एकमात्र रास्ता होता है. भारत में तलाक की व्यवस्था नहीं थी, तब भी ऐसी स्थिति आने पर पति महिला का परित्याग कर दिया करता था. और दूसरी पत्नी रखने को भी सामाजिक स्वीकृति थी.

    यह तो नकारात्मक ही होगा की जब सुलह की सारी सम्भावना समाप्त हो जाए, या जीवनसाथी हद से ज्यादा क्रूरता करे, प्रताड़ित करे, विवाहेत्तर सम्बन्ध हों, लाइलाज मानसिक विकार हो, आदतन जुआरी, शराबी या अपराधी हो, शादी धोखे से या झूठ बोल कर कराई गई हो इत्यादि इत्यादि. तब तलाक ही विकल्प बचता है.

    मनोज कुमार जी इसे पढ़ें, अमेरिका में तलक दर ४० से ५०% के बीच है. आपके स्त्रोत गलत हैं.
    http://en.wikipedia.org/wiki/Divorce#United_States/

    United States
    Main article: Divorce in the United States
    In 2008, 46% of all marriages involve a remarriage for one or both spouses. It is estimated that 40% of all marriages have ended in divorce as of 2008.[1] On average, first marriages that end in divorce last about eight years.[2] Of the first marriages for women from 1955 to 1959, about 79 percent marked their 15th anniversary, compared with only 57 percent for women who married for the first time from 1985 to 1989.[3] The median time between divorce and a second marriage was about three and a half years.[3]

    स्त्रोत :
    ^ Sratling, Cassandra (9 June 2009). "Blended families can overcome daunting odds". Burlington, Vermont: Burlington Free Press. pp. 9A.
    ^ a b c "Census Bureau Reports".
    ^ "Divorce and Marriage rates 2007". Cdc.gov. 2009-06-02. Retrieved 2010-06-11.

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  24. सबसे बड़ी बात है कि दोनों पक्षों की विवाह को निभाने की इच्छा हो तभी निभती है ...
    साथ रहकर एक दूसरे की जिंदगी नरक बना देने से तलाक ही ठीक है ...
    बहुत अच्छी कविता ...!

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  25. बहुत सुन्दर लिखा है आपने ! उम्दा प्रस्तुती!
    मित्रता दिवस की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ!

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  26. बहुत ही सुन्दरता से वैवाहिक जीवन के तमाम पहलुओं पर प्रकाश डाला है…………बस अब ये इंसानी सोच पर है कि वो किसे अपनाता है……………एक बेहतरीन प्रस्तुति रिश्तों की।

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  27. @ @ ab inconvenienti जी
    आपने जो आंकड़े दिए हैं और मैंने जो बात कही है वो भिन्न है।
    संयुक्त राज्य अमेरिका में डायवोर्स रेट प्रति हज़ार व्यक्ति पर 3.6 है।
    जबकि भारत में 11 शादियां टूटती हैं प्रति हज़ार शादियों में है।

    बांकी जो समस्या है उस पर मत-मतांतर तो हो ही सकते हैं। मैंने उस भावभूमि में जाकर संबंधविच्छेद के दर्द को महसूस करने की कोशीश की, वह भी एक कवि के रूप में।

    APRIL 05, 2010

    Divorce rate holding at low of 0.68% annual per capita (3.4 per 1000 US population)

    National Vital Statistics Report - Volume 58 Number 13.

    This latest, provisionally-reported rate is for the 12 months ending in June, 2009. It is reported at 3.4 divorces per 1000 population.

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  28. @ अपनत्व जी
    आपसे सहमत कि ये सही और नहीं सही की विचार धारा का द्व्न्द्व है और पता न्हीं ये हमें कहां ले जाएगा।


    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...

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  29. आप ने बहुत अच्छॆ विषय को चुना, ओर बहुत सुंदर ढंग से समझाया भी है, भई हम ति बस इतना जानते है कि जब हम मै समर्पण आ जाये तो पति पत्नी का रिश्ता कभी नही टूट सकता, ओर समर्पण अगर दो दोनो तरफ़ हो तो घर स्वर्ग सा सुंदर बन जाता है, लेकिन नारी मै थोडी समझ हो, थोडी समर्पन की भावना ज्यादा हो तो पुरा खान दान ही संवर जाता है.... लेकिन आज कल सब को बस पैसो की पडी है.....तो फ़िर समर्पण कहां, प्यार कहां सब कुछ तो मेरा है.... मेरा है..... मै बंट गया

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  30. @ ज्ञानदत्त पाण्डेय जी
    अस्वस्थ होने के बावज़ूद भी आप यहां आए और चर्चा को एक नया आयाम दिया। आपका धन्यवाद!
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...

    उत्तर देंहटाएं
  31. @ वाणी गीत जी
    बात सही कही है आपने कि दोनों पक्षों की विवाह को निभाने की इच्छा होनी चाहिए।
    आपका धन्यवाद!प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...

    उत्तर देंहटाएं
  32. @ Babli जी
    @ वन्दना जी
    @ राज भाटिय़ा जी

    धन्यवाद!
    प्रोत्साहन के लिए आभारी हूँ...
    मनोज

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  33. मेरा यह मानना है कि हारे हुए लोगों की तरह दोष हो न हो, अपने किए, पर पश्‍चाताप करना और बिगड़ी हुई स्थितियों को संभालने की कोशिश करना स्त्रियों का नैसार्गिक गुण होता है। वे समझौते और समर्पण की हद तक जाती है। कई बार खुद को ठगा सा भी पाती है।
    पर अहं और आपसी विश्‍वास में कमी के कारण टकराव पैदा होता है और परिवार बिखरने की स्थिति में आ जाता है, यहां तक कि तलाक तक की नौबत तक आ जाती है! परन्तु क्या तलाक बिगड़ते हुए रिश्तों को सुलझाने की सही दवा है?
    नहीं!

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  34. ओह यह कहना तो भूल ही गई, बहुत ही संवेदनशील कविता!

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  35. पवित्रता वह संपत्ति है जो प्रेम के बाहुल्‍य से पैदा होती है। इसे बेहतर बनाए रखने के लिए आपसी विश्‍वास, समझदारी, सामंजस्य, प्रेम और देखभाल निहायत ज़रूरी है। अहं, आलोचना, तुलना, शक, ना झुकना या समझौता न करने की ज़िद इस रिश्ते रूपी वृक्ष को दीमक की तरह बरबाद करता
    aapki yah baat shat -ptishat sahi hai.main bhi aapke in vicharo ke anukuul hi apne aapko paati hun.bahut hi samyik lekh ek yatharth se parichay karata hua.
    poonam

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  36. बड़ी ही गहन विवेचना और कविता से उतना ही सरल चित्रण।

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  37. सामयिक विषय पर एक सार्थक पोस्ट ........टिप्पणियों ने इस पोस्ट की सार्थकता को और भी सिद्ध कर दिया है.....जब इस विषय पर मैंने एक आलेख लिखा तो मुझे जिस एक तथ्य ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया था वो ये कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में विवाह विच्छेद की दर , और चलन में गजब का अंतर था ....ग्रामीण क्षेत्रो में तलाक अब भी ..दूर की कौडी है ...वर्ष के उत्कृष्ट पोस्टों की सूची में इसे सहेज रहा हूं । शुक्रिया

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  38. Manoj Kumar ji ne sambandh-vichchhed ke maulik karakon ki or bahut hi suvicharit dhang se kavita men chitrit kiya hai. Ankadon par matbhed yahan prasangik nahin hai. Prasangik hai samasyaon ka samadhan jise kavi ne vichar kiya hai. Yadi lega terms me sambadh-vichchhed se hat kar sochen to sambandhon me dooriyon ke karan ve hi hain jinhe kavi ne kavita me dikhaya hai.

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  39. @ महफूज़ अली जी
    आपकी बातों ने दिल छू लिया।

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  40. @ हास्यफुहार जी
    आपसे सहमत। और यह सही है कि इससे समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

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  41. @ ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ जी
    शुक्रिया आपके विचार प्रकट करने का और हौसला आफ़ज़ाई का।

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  42. @ JHAROKHA जी
    ऐसे मुद्दों पर आपकी इस बेबार राय ने हमारा मनोबल बढाया है। आपका आभार।

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  43. @ प्रवीण पाण्डेय जी
    आपके शब्द हमेशा ही प्रेरक होते हैं, इस बार भी+
    आभार।

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  44. @ अजय कुमार झा
    मैं आपसे सहमत हूं कि इस विषय से ग्रामीण क्षेत्र अभी अछुता है। आपका आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  45. @ Parashuram Rai जी
    आप हमेशा प्रेरणा स्रोत रहे हैं। आपकी आज्ञा के बगैर इस कविता को पोस्ट कर दिया।
    आपकी टिप्पणी से लगता है कि आपने इस पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी है। इस कविता को रचते वक़्त जिस भाव भूमि पर था, उसे और झेला नहीं जा रहा था। पता नहीं लोग विच्छेद कैसे झेल लेते हैं।
    आंकड़ों वाली आपकी बात से सहमत हूं। मेरा तो मानना है कि एक भी घर क्यों टूटे!

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  46. @ Mithilesh dubey जी
    प्रोत्साहन के लिए आभार।

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  47. आप सब का एक बार पुनः आभार।
    अब थोड़ी अपनी बात। निकट के रिश्ते के एक व्यक्ति की पत्नी ससुराल छोड़कर संबंध-विच्छेद की धमकी देकर चली गई। पति भी न तो उसे मनाने गया न वापस लाने। इस घटना ने मुझे उकसाया कि लोग कैसे कर लेते हैं संबंध-विच्छेद और कैसे रह लेते हैं उसके बाद। उसको जी कर, महसूस कर देखूं। कारणों को समझूं। सिर्फ़ दो दिन ही भावनाओं की उस पृष्ठभूमि पर जिया, न जाने कितनी मौत मरा, उन पलों में।
    उसी जीते-मरते पलॊं में इस कविता का सृजन हो गया।
    हां कविता थोड़ी लंबी हो गई। मेरे आलोचक मित्रों की नज़र में कसाव का अभाव है। ऐसा तो होना ही था। जैसे संबंध विच्छेद के पहले एक लंबा दौर होता है, टकराव का, बनते बिगड़ते माहौल का, तो उन पलों को जी कर लिखी गई कविता तो लंबी होनी ही थी। और अगर भावनाओं का कसाव होता तो संबंधों का बिखराव शायद न होता। इसलिए कविता को चाह कर भी कस न पाया।
    करण जी ने सही कहा है कि यह उच्छवास की कविता है। उच्छवास लंबी होती है। कविता भी है।
    इस आशा के साथ कि एक भी घर न टूटे, आपका एक बार फिर शुक्रिया।

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  48. बहुत सार्थक और सुंदर आलेख.

    रामराम

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  49. रिश्तों पर और सम्बन्ध विच्छेद पर अच्छा वृतांत.
    बहुत सी जिंदगियो को छू कर निकलता ये लेख, लोगो को इस से सीख लेनी चाहिए.

    सुंदर लेख

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  50. मनोज जी,
    आपने एक समाजशास्त्र के विषय को साहित्य के माध्यम से व्यक्त करने की चेष्टा की है और पूरी तरह सफल रहे हैं. हर पहलू को छुआ है आपने.. यह विषय मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत उद्वेलित करता है... कारण मेरे दो सबसे करीबी दोस्त पिछले दस वर्षों से इस पीड़ा को भोग रहे हैं..और मैं हूँ उसका मूक गवाह...इसलिए उनकी पीड़ा मेरी पीड़ा बन चुकी है... क्षमा चाहूँगा इसपर कुछ भी कहना मुझे विचलित करता है..
    सलिल

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  51. kavita aur kavita ka vivran dono hi sundar hai...

    ada ji...jab kavita kisi vishaye ki gahraaye me utarti hai to aise hi vartmaan aur bhavishaya ke sach nikhar ke saamne aate hai...

    kavita padne ke baad bhi agar hum ye samjh paye ki ye duri kab hamare bich paida hone lagi..kab aham hamare andar ghar kar gaya to hi kisi kavi ka parisharm aur manoj ji ka prayash safal hoga...

    Manoj ji badhaye..bahut bahut badhayee...

    anand
    kavyalok.com

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  52. बहुत सही और सुंदर प्रस्तुति |
    आशा

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  53. लगता है जैसे मेरे मनोभावों को ही आपने शब्द दिए हैं...
    एकदम सटीक विश्लेषण किया है आपने...और कविता...
    बहुत बहुत सुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं
  54. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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