मंगलवार, 3 अगस्त 2010

तेरा जूता तेरे सर (लघुकथा)

तेरा जूता तेरे सर      (लघुकथा)

-- सत्येन्द्र झा

उस गाँव में सभी लोग धोती कुरता पहनते थे। एक दिन एक पैंट-शर्ट वाला आदमी आया। वो उसी गाँव में सभ्य की तरह रहने लगा। अब सभी लोग पैंट शर्ट पहने लगे।

नए आदमी ने कुछ दिनों बाद धोती-कुरता पहनना आरम्भ कर दिया। ग्रामीणों ने पुनः धोती-कुरता धारण करने का निश्चय किया।

लेकिन ये क्या? ये सभी तो धोती पहनना ही भूल चुके थे।

नए आदमी ने एक साइनबोर्ड लगा दिया,

image…. और दूकान चलने लगी!!

 (मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहै छी" में संकलित 'त्वदीयं वस्तु' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित। )

31 टिप्‍पणियां:

  1. vaah!
    jab hum doosaro ka andha anukaran karate hai to aisa hi hota.
    "तेरा जूता तेरे सर"

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह करारा सटीक व्यंग्य है हम पर।

    एक व्यक्ति को भी यदि धोतीधारी रहने देते तो आज उसकी दुकान न चलती।
    संसकृति को सिरे से खारिज़ करने तो तत्पर, उस गौरव का स्मरण करने पर बिदक उठने वाले स्वयं अपनी दुकान लगाना चाहते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  4. Cheen ne hamare saath yahi hathkanda to apnaya! Sasta kapda bazaar me bhar diya...ab jab bunkar aatmhatya kar mar jayenge to Cheen apna kapda mahanga kar dega!

    उत्तर देंहटाएं
  5. यह लघुकथा तो बड़ी गहरी बात कह गयी ....
    कौवा चला हँस की चाल और अपनी चाल भी भूल गया .....

    विचारणीय ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. मैं श्री सत्येन्द्र जी की श्लिष्ट शैली का इसीलिये कायल हूँ.... लघुकथा की शर्तों को पूरा करते हुए महज एक घटनाक्रम को उठाते हैं और ऐसा मार्मिक व्यंग्य छोड़ जाते हैं जो सुनने में सहज चुटीला परन्तु सोचने पर मजबूर कर देता है. अच्छी प्रस्तुति. धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  7. bahut hi sarthak sandesh deti hui ye post wakai bahut kuchh kah gai.
    poonam

    उत्तर देंहटाएं
  8. अंधनुकरण पर करारा और तीखा व्यंग्य। कम शब्दों मे सिढी, शटीक और खड़ी बात कहने का यह अंदाज़-ए-बयां चलती रहे!

    उत्तर देंहटाएं
  9. jab har saakh par ullu baitha ho to anjam a gulista kiya hooga never be follow blindly.

    उत्तर देंहटाएं
  10. सांस्कृतिक अधिग्रहण की चेष्टा ने हमें कहाँ पहुँचा दिया है, इस तथ्य को प्रस्तुत कथा में बड़े अच्छे ढंग से चित्रित किया गया है।

    उत्तर देंहटाएं
  11. हम सिर्फ गुण अपनाएं ...वे चाहे अपनी संस्कृति के हों या दूसरी ...
    अच्छा व्यंग्य ....!

    उत्तर देंहटाएं
  12. छोटी सी लघुकथा में बहुत बड़ा सन्देश छुपा नहीं खुला हुआ है.. आभार सर..

    उत्तर देंहटाएं
  13. बाजारीकरण के तरीकों पर शानदार लघुकथा..बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत अच्छा संदेश दे दिया आप ने अपनी इस कहानी मै. धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  15. भूलों को याद दिलाने की ही दुकान चल रही है आजकल।

    उत्तर देंहटाएं
  16. manoj ji ye to bilkul vahi baat hai
    kiahan (london ) men hindi ki classes jordar tarike se chalti hai :) aur bharat men ham angreji ke gulam hain :)
    behtareen laghukatha....
    (maaf kijiyega net ki kharabi ki vajah se roman men likhna padh raha hai).

    उत्तर देंहटाएं
  17. प्रवीण जी,

    भूलों को याद दिलाने की दुकानें नहिं,विद्याशालाएं हुआ करती है।

    उत्तर देंहटाएं
  18. गंभीर कटाक्ष...आज की वास्तविकता कहें या बाजारवाद...सत्य तथ्य यही है...
    योग को योगा बना ,देखिये सब कैसी दूकान चला रहे हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  19. बेहतरीन धोबीपछाड लगाया आपने. बिल्कुल सटीक.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  20. सत्येंद्र जी ने व्यंग्य का ऐसा जूता मारा है कि धोती के साथ साथ भूला बिसरा नीम और बासमती भी याद आ गया... सादर नमन!!

    उत्तर देंहटाएं
  21. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

    उत्तर देंहटाएं
  22. जूते का तो पाँव में, होता है सम्मान।
    जूता जब सिर पर चढ़े, कर देता अपमान।।

    उत्तर देंहटाएं
  23. सटीक और करारा व्यंग ... लकीर के फकीरों का हाल ऐसा ही होता है ...

    उत्तर देंहटाएं

आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।