बुधवार, 4 अगस्त 2010

देसिल बयना - 41 : धन धराबे तीन नाम....

-- करण समस्तीपुरी


"बाग़ लगवले.... बगिचबा लगवले..... बेकल जिया रहलो न जाई.... पिरितिया काहे ना लगवले... !!" जैसे-जैसे बड़की पोखर तक लाउडिस्पीकर का गीत पहुँच रहा था, झुरुखन सिंघ का गाय-गोरु चारा रहा धनुआ का जिया सच्चे में बेकल होने लगा... एतना बेकल की बेचारा से रहा नहीं गया। माल हका दिया बथान दिश।


झुरुखन सिंघ के बेटी का ब्याह हुआ था राते। आरा जिला छपरा से बरात आया था मजफ्फरपुर वाला नाच-पाटी के साथ। राते तो धनुआ भी देखा पूरा नाच। दोपहर में सिंघ बाबू के ड्योढ़ी पर महफ़िल जमा था। धनुआ का रत्ती भर मन नहीं था महफ़िल छोड़ के जाने का मगर का करे... मालिक का माल-जाल है। अपना होता तो छोड़ियो देता।


चरबाही में हमलोगों को किस्सा सुना रहा था। एंह.... हरमुनिया मास्टर का हाथ तो बिजली जैसे चलता है। एक्कहि बेर ई कोना से ले के उ कोना तक गरगरा देता है। उसके धुन पर कव्वाली गाने में मजा आ जाएगा। सच्चे में धनुआ को गीत गाने का बड़ा शौक था। कव्वाली तो और सुर में गता था। बेचारा से रहा नहीं गया। झटपट माल मवेशी को बाँध कर हाथ पैर धोया और माथा में गमछी बाँध के हरमुनिया मास्टर के बगल में बैठ गया।


इधर नचनिया गा रही थी, "सलामे इश्क मेरी जाँ जरा कबूल कर ले..... मेरा दिल बेचैन है हमसफर के लिए" और उधर धनुआ बेचैन हो रहा था गीत पकड़ने के लिए। एक जगह पर जैसे ही गीत मद्धिम कर के नचनिया छमछमा के नाचने लगी कि फट से ई पकड़ लिया अगिला लाइन, "इस से आगे की तू दास्ताँ मुझ से सुन.... !"



गीत खतमो नहीं हुआ था कि जैसे तबला पर चाटी पर रहा था धनुआ के कान के नीचे पड़ा चटाक। ठाकुर टोला के हकरू सिंघ दहार रहे थे, "ससुर के नाती ! सरकारी राज बुझ लिया है का रे.... परजा-कुटुंब सब के सामने ठाकुरटोला के महफ़िल में बैठ गया और बाई जी से सुर मिला रहा है... !" झनाक.... ! दोसरो कान में घंटी बजा था।

उ दिन के बाद से धनुआ नजर नहीं आया छठ में उ की महतारी को मनीआटर (मनी-आर्डर) आया। पाछे पता लिखा था, धन्नुसेठ मानिकचंद ट्रेडर्स। किरिस्तोफर रोड, कलकत्ता। तब पता चला कि धनुआ अब धन्नु हो गया और शहर कलकत्ता में है। साल लगे पर होली में आया था। महतारी के लिए छाप वाली साड़ी और झुरुखन सिंघ के लिए गमकौआ जर्दा लाया था। रंग और इतर वाला गुलाल भी लाया था। एंह... अ एगो झुनकी वाला डफली भी लाया था। होरी दिन उसी के दुआरी पर आधा गाँव मेबा वाला ठंडाई छांका। फेर जो जलूस निकाला कि पंडित टोल से ठाकुर टोल तक बस एक्के नाम का चर्चा था कि ओह.... कलकतिया धन्नु तो थई-थई कर दिया।

कुछ दिन गए हकरू सिंघ भी दुआ मलामत कर रहे थे, "हे बेटा धन्नु ! पुराना बात को हिरदय में नहीं रखना चाहिए। हम तो तोहरे बाप-पितिया दाखिल हैं। बड़े-बुजरुग भले के लिए न डांट-डपट करते हैं। अबकी जाना तो हमरे भगलुआ को भी साथे लेते जाना। इहाँ दिन भर बहेलाबा जैसे मटरगश्ती करते रहता है।" धन्नु बोला, "ना हकरू काका ! अब तो कलकत्ता नहीं जायेंगे। सोचा है इहें भट्टी चौक पर पाँव-रोटी का फैक्टरी चालू करेंगे। हम काम सीख गए हैं। अपना बिजनिस रहेगा तो गाँव-घर सब का तरक्की होगा।


जल्दिये आस-पास के गाँव शहर में धन्नु के पाँव-रोटी चलने लगा। हकरू सिंघ के बेटा भी वही में काम करता था। बिजिनिस ऐसा बढ़ा कि दर्जनों इस्टाफ रखना पड़ा। भगलू सिंघ इनका दाहिना हाथ था। फैक्टरी के काम से लेकर हाट-बाजार में सप्लाई तक वही देखता था। धन्नु अब धनेसर राम हो गए थे। बस तिजौरी पर बैठ के औडर देना है। धन्नु था तो लिख-लोहा पढ़ पत्थर मगर हिसाब


किताब में रत्ती भर भूल नहीं हो सकता है। बनिया-साहूकार को भले ना छोड़े मगर गाँव-जवार में कौनो जरूरतमंद के सहायता करने में कभी पीछे नही रहता था। धीरे-धीरे धनेसर राम बेकरी वाला इलाका-टॉप हो गया।

गए बैसाख में हकरू सिंघ के फरीक दहारण सिंघ का परिवार भटिंडा से आया रहा बेटी का लगन करे। अच्छा घर-वर मिला था। मगर दहेज़ का मांग भी तगड़ा था। अमरसिंहपुर वाला पलौट बेचने का पिलान था। मगर एक मुश्त उ चौरस प्लौट ले कौन ? भगलुआ को पता चला तो कहिस, "चाचा ! सेठ धनेसर राम से बात करिए न ! उ ले सकते हैं।" दहारण सिंघ को तनिक अचरज हुआ, "एँ... ई सेठ धनेसर राम कौन है ?" भगलू कुछ बोले उ से पहिले हकरुये सिंघ बोल पड़े, "अरे उ उ मोसमात कहारिन का बेटा धनुआ.... !" अब तो दहारण सिंघ की आँखें और फटी रह गयी, "तोरी जात के ..... गाय-गोरु चराए वाला धनुआ सेठ धनेसर राम हो गया....?" फेर शाट-काट में उ का कहानी चला। आखिर में निश्चित हुआ कि बिहान भोरे-भोर सेठ धनेसर राम से मिला जाए।
हकरू सिंघ, भगलू, दहारण सिंघ और उ का बेटा सब पहुचे धनेसर राम के घरे पर। हम भी तभी वहीं थे। ठाकुर लोगों को देखते ही धन्नु सेठ चौकी पर से उठा कर हाथ जोड़ कर बोला, "पायं लागू दाहरण काका ! पायं लागू हकरू काका !! फिर आगे बढ़ कर दाहरण सिंघ का हाथ पकड़ कुर्सी पर बैठाया। हकरू सिंघ मश्का लगाए, "देखा दाहरण ! यही है अपना धनेसर.... हें... हें... हें.... !" फिर दाहरण सिंघ भी वैसने ठाकुर सुहाती किये, "हें... हें... हें... ! हम तो पहिचानबे नहीं किये.... ! अपना धन्नु इत्ता बड़ा सेठ हो गया। हम तो समस्तीपुर टीसने से इसका परसिद्धी सुनते आ रहे हैं। हें... हें... हें.... ! जब सुने कि अरे ई तो अपना धन्नु है तो हिरदय परसन्न हो गया। हें... हें... हें... !! एकदम खांटी सेठ लगता है। मारवारी पंजाबी भी फेल हो जाए। हें...हें...हें...हें.... ।"

इधर ठाकुर लोग धनेसर-पुराण पढ़ रहे थे मगर हमरे कान में तो हकरू सिंघ का वही तमाचा बज रहा था, जौन उ धनुआ को झुरुखन सिंघ के महफ़िल में दिए रहे। फिर पता नहीं धनेसर को का हुआ बेचारा अचानके कान के नीचा सहलाने लगा। सिंघ जी लोग अपना-अपना बकतब (वक्तव्य) पूरा कर के धनेसर का मुँह देख रहे थे। बेचारा धन्नु बोला, "अरे नहीं काका ! ई सब आप लोगों का असीरबाद है। आप लोग श्रेठ हैं। हम तो आजो वही लिख लोहा पढ़ पत्थर हैं। हमरा अन्दर में हिरदय तो आजो वही धनुए का है। और नाम का का है ? बुझ लीजिये कि "धन धराबे तीन नाम ! धनुआ - धन्नु - धनेसर राम !" खें... खें... खें.... खें.... !!! बाते-बाते में धनुआ सिंघ जी का चमेटा वापिस कर दिया था मगर मतलब के मारे उ लोग उस पर भी खिखिया रहे थे।
खैर सेठ धनेसर राम का यही तो विशेषता है। कौनो जरूरतमंद को मना नहीं करता है। बात हो गया। सिंघ जी को प्लौट का मुंहमांगा दाम मिल गया। सब धनेसर राम का जयकारा लगाते हुए ठाकुर टोल का रास्ता नापे। फिर धन्नुआ के करेजा फट पड़ा। बोला, "दोस्त ! देखो आज ई धने का परभाब है न.... । हम तो आजो वही हैं... का बदला है.... ? काल्हो निरच्छर थे, आजो अंगूठाछाप। कल फूटी-कौरी नहीं थी तो धनुआ.... ससुर ठाकुर का चाटा भी खाया। कलकत्ता में दू पैसा कमाया तो धन्नु हो गया। और आज भगवान बरकत दिए तो धनेसर राम हो गया... ! वाह रे दुनिया... वाह रे समाज !! आज के दुनिया में आदमी का कोई प्यार और प्रतिष्ठा नहीं है.... सब धन का मोल है। "धन धराबे तीन नाम ! धनुआ - धन्नु - धनेसर राम !" हम देखे थे धनुआ के गाल पर मोटा-मोटा आंसू लुढ़क आया था।

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर एकदम पूरनिया कट.....लगता है कि कहीं पू्णिया जिला की ओर निकल गया हूँ....चला जा रहा हूँ....। शानदार ।

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  2. ए करण जी,
    एतना बढिया देसिल बयना, पढ के पहले त हस्सी आ रहा था, कहानी खत्त्म करते-करते रुलाइओ दिए।

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  3. bahut sundar.

    karanji, aapka desil bayana keval lokoktiyo ka katha roop me varnan bhar nahi hai.yah vibhinn patro ke madhyam se nirbal varg ke charitro ke maan, sammaan aur swabhimaan ko pratishthit bhi karata hai aur unki vani ko swar bhi pradan karata hai.

    aabhar.

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  4. धन धराबे तीन नाम .. धनुआ - धन्नु - धनेसर राम !!
    वाह वाह .. क्‍या खूब लिखा !!

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  5. करन बाबू … अभी त ओफिस जाने का तइयारी में लगल थे तब आप पर नजर पड़ गया... देसिल बयनवा छोड़ के जाने का मनो नहीं करता है...मगर आज का बयना त लोर दे गया आँख में...कुच्छो कहने के लायक नहीं रखे आप... जमीनी अदमी अईसने होता है...अब का बोलें..कम लिखला को ढेर बुझिए..

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  6. करण जी के शब्द सामथ्र्य से काफी दिनों से परिचित हूं। एक के बाद एक इनकी बेहतरीन 'देसिल बयनाÓ पढ़ी। उसी कड़ी में आज एक और बेहतरीन रचना, जो कि लोगों के आंख खोलने में सक्षम हैं।

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  7. आज का देसिल बयना जितना सटीक है उतना करुण भी ......सच है लोग पैसे से ही लोगों की औकात नापते हैं ....बहुत अच्छी तरह से ये बात समझा दी है.....

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  8. धन धराबे तीन नाम...इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    कभी 'डाकिया डाक लाया' पर भी आयें...

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  9. आपकी लेखनी का तो दिन ब दिन मैं कायल होते जा रहा हूं। कितनी सूक्ष्मता से आप पकड़ते हैं इसका एक विवरण यह है
    हरमुनिया मास्टर का हाथ तो बिजली जैसे चलता है। एक्कहि बेर ई कोना से ले के उ कोना तक गरगरा देता है।
    ये जुमले तो कितनी बार सुना होगा जब वहां रहते थे, आज बरसों बाद आपकी जुबानी चित्र साकार हो गए।
    आपके देसिल बयना के माध्यम से सब भूले बिसरे रस्ते गलियां एक एक कर तैर रहे हैं आंखों के सामने। जैसे ये वाला ...
    मजफ्फरपुर वाला नाच-पाटी के साथ।
    अब ये मत कहिएगा कि उस गली में भी आते जाते थे का?
    अब आज का बयना तो सरसता से गंभीरता का अद्भुत संगम है। और जो क्लाइमेक्स कूटे हैं उस पत तो आपसे ही आशीष लेने का मन करता है आपको गुरु मान कर
    "कल फूटी-कौरी नहीं थी तो धनुआ.... ससुर ठाकुर का चाटा भी खाया। कलकत्ता में दू पैसा कमाया तो धन्नु हो गया। और आज भगवान बरकत दिए तो धनेसर राम हो गया... ! वाह रे दुनिया... वाह रे समाज !! आज के दुनिया में आदमी का कोई प्यार और प्रतिष्ठा नहीं है.... सब धन का मोल है। "
    जीवन में आने वाले इस विसंगति को आपसे अधिक कौन झेला होगा!

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  10. sabse bada rupaiya.........aaj ka kaduva saty yahee hai......
    sneh pyar kee bhasha samajh me kum hee aatee hai logo ko .......

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  11. "धन धराबे तीन नाम ! धनुआ - धन्नु - धनेसर राम !" .........काहे कहा जाता है...आज किलियर हुआ...

    कथा ने रोमांचित और भावुक दोनों कर दिया...
    अकथ आनंद मिला...बहुत बहुत आभार आपका...

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  12. Adabhut desil Bayana,
    jitana romanchit utna hi bhavuk. Manav jivan se bilkul parichay kara diye.........!

    @ Karan Bhaiya,
    are ka likhe, ....................

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  13. "हें... हें... हें...
    Ram Ram karan Babu...ap to is bar pichla bar ka pura kasar nikal diye..manoranjan ke sath sath kathor sachai ko b bata gaye...bahute khub likha hai apne is bar ka desil bayna humesa ki tarah ekdume desil estyle me...

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  14. Achchhi prastuti. Deshaj shabd samajhane walon ko anand to dete hain, kintu jo nahin samajh pate unhe thoda kasht hota hai. Vaise gramin parivesh me desil bayana ko vyanjit karati yah rachana pathaniy hai.

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  15. गंभीर हास्य के द्वारा प्रस्तुत देसिल बयना का यह अंक बहुत अच्छा लगा।

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  16. वाह वाह .. क्‍या खूब लिखा !! बेहतरीन रचना, जो कि लोगों की आंख खोलने में सक्षम हैं।

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  17. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  18. बहुत ही बेहतरीन रचना
    बहुत बहुत बधाई।

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  19. बेहतरीन मर्मस्पर्शी कथा ... सच ही है कि ये दुनिया सिर्फ पैसा देखे है ...

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  20. सभी पाठकों को कोटिशः धन्यवाद ! आपका प्रोत्साहन और प्यार ही देसिल बयना का आधार है !!

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