सोमवार, 30 अगस्त 2010

साँझ भयी फिर जल गयी बाती !

साँझ भई फिर जल गयी बाती !


करण समस्तीपुरी

बहुराष्ट्रीय कंपनी के वातानुकूलित कार्यालयों में ऋतुओं की आर्द्र-उष्णता की अनुभूति कहाँ ? महानगरीय चकाचौंध में बिजली की रंगोलियाँ सजती हैं.... लेकिन पल भर को बिजली के जाते ही मुँह से निकलता है, "उफ़....सस्सा...... !" अच्छा हुआ उस सांझ बिजली नहीं थी. निकट के बस-स्टॉप से घर तक का छोटा सा रास्ता बिना स्ट्रीट-लाईट के... ! ओह.... शाम ढले कहीं ये गली मेरे गाँव तो नहीं जा रही.... ! आह्हा.... ! नुक्कड़ के बेकरीवाले ने इमरजेंसी लाईट नहीं.... मोमबत्ती जला रक्खी थी ! लुक-झुक-लुक-झुक.... ! मेरे मन में भी जल उठती अतीत की ज्योति.... !!!

साँझ भई फिर जल गयी बाती

साँझ भई फिर जल गयी बाती !

जल-जल मदिर-मदिर, झिल-मिल,

कोई अतीत का गीत सुनाती !

साँझ भई फिर जल गयी बाती !!

अम्बर का आँगन सूना है !

बिन बदरी सावन सूना है !!

तितली बिन उपवन सूना है !

सूना जीवन, मन सूना है !!

शून्य हृदय के अंतस्थल में,

इक आशा की ज्योति गाती !

साँझ भई फिर जल गयी बाती !!

लट लटकाए बूढा बरगद !

गाँव किनारे साझा पनघट !!

पनघट पर पनिहारिन आती !

हिय खोल घट भर ले जाती !!

दीप की लौ बलखाये जैसे,

क्षीण कटि उनकी बलखाती !

साँझ भई फिर जल गयी बाती !!

अरुण क्षितिज में डूबा दिनकर !

बैठक में हुक्के का गर्र-गर्र !!

श्रम से निरत शांत दम भरते !

देश-काल की चर्चा करते !!

दीप के संग बुझने को है अब,

प्यारी सी पुरखों की थाती !

सांझ भई फिर जल गयी बाती !!

48 टिप्‍पणियां:

  1. अम्बर का आँगन सूना है !

    बिन बदरी सावन सूना है !!

    तितली बिन उपवन सूना है !

    सूना जीवन, मन सूना है !!

    शून्य हृदय के अंतस्थल में,

    एक आशा की दीप जलाती !

    साँझ भयी फिर जल गयी बाती !!
    Aah! Na jane kis beete zamane me ye rachana le gayi...jahan se lautne ka man nahi karta...

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  2. बड़े ही सुन्दर प्रयोग और प्रवाह।

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  3. एगो मोमबत्ती से आपको एतना बढिया छंद लिखने का प्रेरना मिल गया, सोचिये कि 70% आबादी आजादी के एतना दिन बाद भी ओही मोमबत्ती अऊर लालटेन में जीता है, जहाँ बिजली का आना खबर बनता है... खैर ई सब बोलकर हम खाली एही साबित कर लेते हैं कि देस के प्रति अपना दायित्व निभा दिए हैं..
    कबिता बहुत सुंदर है... एकदम आपके मूड के हिसाब से, गाँव में घाट किनारे बईठकर, डूबता सूरज को देखकर लिखा हुआ. एक एक बर्नन सजीव. ई पंक्ति में घाट को घट कर लीजिएगा..
    हिय खोल घाट भर ले जाती !

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  4. bahut sundar geet hai.
    dhanyavad.
    kahin kahin pravah me avarodh hai. agar vahan bhi sesh geet ki hi tarah pranjalata hoti to kitana accha hota.

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  5. bahut sundar geet hai, karan ji. kuchh apvado ko chhod de to shabd chayan bahut aakarshak hai. Aise likhate rahe, saath hi punravalokan bhi karate rahe.

    dhanyavad.

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  6. @ क्षमा,
    मेरा अहोभाग्य ! रचना की अनुभूति से आपका साक्षात्कार हो पाया.... !! प्रथम पाठक की दृष्टि में मेरा प्रयास सफल रहा !!! आपका आभारी हूँ !!!!

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  7. @ प्रवीण पाण्डेय,
    प्रवीण जी,
    प्रोत्साहन के लिए कोटिशः धन्यवाद !

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  8. @ राजभाषा हिंदी,
    जय हो महारानी !
    चलिए आपकी सेवा में आज भी हाजरी लग गयी !!

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  9. @ चला बिहारी....
    चचा जी,
    गलती सुधार दिए हैं. और का कहें... आप तो जनबे करते हैं हम जज्बाती जीब हैं. जौन मन में आ गया बक दिए.... ! वैसे अब मन सोच में पड़ जाते हैं कि प्रस्तुति बढ़िया है कि आप वैसहि हमरा हिरदय रखने के लिए वह-वह कर देते हैं... ? आप तो ऐसन न हुकुम दे रखे हैं कि हम धनबादो नहीं दे सकते ! खैर यही आसा करते हैं कि आपका सिनेह बना रहेगा !!

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  10. @ परशुराम राय,
    आचार्यवर,
    "बिनु गुरु भाव-निधि तरई न कोई.... !"
    आशीषाकांक्षी हूँ !!

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  11. @ हरीश प्रकाश गुप्त,
    हरीश जी,
    "बिनु सत्संग विवेक न होई.... !" अब आप लोगों के सानिध्य में आया हूँ !! धन्यवाद !!!

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  12. बहुत सुन्दर प्रवाहमयी कविता ...बाती जल कर आशा का संचार करती है ..वैसे ही यह कविता भी मन को आशान्वित कर रही है ..

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  13. @ संगीता द्वे,
    बहुत-बहुत धन्यवाद !

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  14. बेहद खूबसूरत गीत्……………सुन्दर भाव संयोजन।

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  15. साँझ भयी फिर जल गयी बाती !
    जल-जल मदिर-मदिर, झील-मिल,
    कोई अतीत का गीत सुनाती !
    साँझ भयी फिर जल गयी बाती !!
    क्या बात है, करण जी!
    इस कविता को पढ़ कर मैं वाह-वाह कर उठी। एक-एक शब्द लगता है टप-टप मोती झर रहा हो।

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  16. अम्बर का आँगन सूना है !
    बिन बदरी सावन सूना है !!
    तितली बिन उपवन सूना है !
    सूना जीवन, मन सूना है !!
    शून्य हृदय के अंतस्थल में,
    एक आशा की दीप जलाती !
    साँझ भयी फिर जल गयी बाती !
    --
    बहुत ही अनुपम रचना है!
    --
    बधाई!

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  17. @ रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
    शास्त्रीजी,
    आपका प्रोत्साहन पा कर मैं अपना श्रम सफल मानता हूँ ! धन्यवाद !!

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  18. @ अर्पित श्रीवास्तव,
    अर्पित जी,
    आप हमारे ब्लॉग पर पहली बार आये हैं. आपका अभिनन्दन और प्रोत्साहन के लिए धन्यवाद !!

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  19. तितली बिन उपवन सूना है !

    सूना जीवन, मन सूना है !!

    शून्य हृदय के अंतस्थल में,

    एक आशा की दीप जलाती !

    साँझ भयी फिर जल गयी बाती !!

    बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द, गहरे भावों को लिये अनुपम प्रस्‍तुति ।

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  20. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण गीत! लाजवाब प्रस्तुती!

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  21. ऊपर वाली तस्वीर आध्यात्मिक महत्व की है और स्वयं में एक कविता है।

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  22. शून्य हृदय के अंतस्थल में,
    इक आशा की ज्योति जगाती !
    साँझ भई फिर जल गयी बाती ...

    बहुत ही मधुर ... सुंदर ... छन्द बद्ध गीत .... बहुत ही आनंद आया पढ़ कर ... ...

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  23. बेहद खुबसूरत रचना है आपकी
    ..... आभार

    कुछ लिखा है, शायद आपको पसंद आये --
    (क्या आप को पता है की आपका अगला जन्म कहा होगा ?)
    http://oshotheone.blogspot.com

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  24. Apki kavita ka to jawab ni karan ji..bahooooooot he sundar likha hai apne ...

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  25. @ दिगंबर नासवा,
    धन्य भाग ! आज हमारे पोस्ट पार भी आपकी नजर-ए-इनायत हुई !! धन्यवाद!!!

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  26. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  27. @ रचना,
    बहुत-बहुत आभार रचना जी ! आपकी प्रतिक्रिया हमेशा उत्साहवर्धक होती हैं !

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  28. बहुत समय बाद ऐसे उम्दा कलेवर की रचना पढ़ने मिली. मन प्रसन्न हो गया. सुन्दर प्रस्तुति..बेहतरीन संयोजन..उत्तम प्रवाह!

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  29. @ उडन-तश्तरी,
    आपके दो शब्द ही हमारे उत्साह को आकाश पार पाहुणचा देते है. धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  30. मंगलवार 31 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपका इंतज़ार रहेगा ..आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  31. पठनीय ! बहुत खूब !! ऐसा ही लिखते रहें अच्छा लगता है !


    समय हो तो पढ़ें
    क्या हिंदुत्ववाद की अवधारणा ही आतंकी है !
    http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_30.html

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  32. भाषा की सादगी, सफाई, प्रसंगानुकूल शब्‍दों का खूबसूरत चयन, जिनमें ग्राम व लोक जीवन के व्‍यंजन शब्दो का प्राचुर्य है। ये आपकी भाषिक अभिव्‍यक्ति में गुणात्‍मक वृद्धि करते हैं। कविता में लोकजीवन के खूबसूरत बिंब आपके काव्‍य-शिल्‍प को अधिक भाव व्‍यंजक तो बना ही रहे हैं, दूसरे कवियों से विशिष्‍ट भी बनाते हैं। बिल्‍कुल अपठनीय और गद्यमय होते जा रहे काव्‍य परिदृश्‍य पर आपकी यह कविता इसलिए भी महत्‍वपूर्ण है कि इस कविता की लयात्‍मकता इसे दीर्घ जीवन प्रदान करती है। इस कविता में नागर जीवन की जटिलता, आपाधापी, संग्राम और इन सबसे अलग उम्‍मीद और आंकाक्षाओं की अपरंपार दुनिया है। आपकी भाषिक संवेदना पाठक को आपकी आत्‍मीय दुनिया की सैर कराने में सक्षम है।

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  33. अम्बर का आँगन सूना है !

    बिन बदरी सावन सूना है !!

    तितली बिन उपवन सूना है !

    सूना जीवन, मन सूना है !!

    शून्य हृदय के अंतस्थल में,

    एक आशा की दीप जलाती !

    साँझ भयी फिर जल गयी बाती !
    bahut sundar bhav ,pant ji ki yaad ban aai .

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  34. पहले समीक्षा पढी और फिर यह कविता......
    कविता में जो भाव हैं...समीक्षा में जो कुछ कहा गया.....
    इसके बाद कुछ बचता है यदि कहने को तो संभवतः वह मेरे सामर्थ्य में नहीं(मेरी बुद्धि वहां तक नहीं जाती)...इसलिए बस इतना ही कह सकती हूँ कि इनके पठ्नोपरांत आत्ममुग्धता की जो स्थिति हमने पायी है,उसके लिए आप लोगों का कोटिशः आभार....

    उस माटी जिससे ह्रदय का हर तार बंधा है,को जिस तरह आप अपने रचनाओं में ला कर इस अंतरजाल पर संजोते जा रहे हैं,केवल हम धन्य नहीं हो रहे ,यह साहित्य भी समृद्ध हो रहा है..आपलोगों के इस पावन सद्प्रयास के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि " आपका शुभ हो "...

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  35. Bhai jee chalte phirte apki post per pahunch gaya aur man gad gad ho utha itni sunder kavya rachna ke liye aap ki parshansha bhi chhoti baat hogi aur phir dusre bloggers ne jo kaha main usse alag
    kya kahon sirif dhanyavad for a sunder Kavita

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