शनिवार, 28 अगस्त 2010

फ़ुरसत में… साहब आप भी न........!

फ़ुरसत में…

  साहब आप भी न........!

[IMG_0155[9].jpg]मनोज कुमार

सुबह सुबह मॉर्निंग वाक पर जाता हूँ। सवा से डेढ़ घंटे की हमारी सैर होती है। जिस दिन जैसा स्‍पीड रहा। कभी ब्रिस्‍क वॉक, तो कभी फ़्रिस्क (frisk – to move sportively), कभी कभी तो रिस्‍क वॉक भी हो जाता है। अब उसी दिन एक टैक्सी वाला छूकर कर निकल गया, बाल-बाल बचा। कान में नोकिया के सेट का इयरफोन घुसेड़ कर 94.3 रेडियो वन पर आ रहे “भोरेर प्रतीक” सुनते-सुनते मेरी चहलकदमी गति पकड़ती है।

सुबह-सुबह, इक्‍के-दुक्‍के लोग ही होते हैं सड़क पर। हमारी तरह सिरफिरे! नई पौध (नई जेनरेशन) तो देर तक टीवी देख कर ज्ञान अर्जन के बाद देर से उठने के आदी हैं। सड़क पर हमारी तरह दो तिहाई जिंदगी पार कर चुके सिरफिरे, गठिया से लेकर हृदय रोग तक के मरीज स्वास्थ्य लाभ कर रहे होते हैं। किसी-किसी दिन कोई भूला भटका यात्री किसी ठिकाने का पता पूछने के लिए हम जैसों सिरफ़िरों को देख हर्षित हो उठता है। जब वो पूछते हैं कोई ठिकाना तो कान से मोबाइल फोन का ईयर प्‍लग हटा कर, उन्‍हें रास्ता, या सही मंजिल का पता बता कर जो सुकून मिलता है, वह वर्णनातीत है। लगता है चलो एक भूले भटके को रास्ता दिखाया, वरना आजकल तो सही राह दिखाने वाले मिलते ही कितने हैं!

images_edited आज मैं एक खास परिवार से आपको मिलवाना चाहता हूं। रोज सुबह उन्‍हें इसी फुटपाथ पर सोए देखता हूँ। कोलकाता की सुबह जल्‍दी हो जाती है। चार बजे से ही सड़कों पर वाहनों की चिल्ल पों शुरू हो जाती है। ... और छह बजते-बजते तो धूप इतनी तीखी होती है कि सारा शरीर पसीने से तर-ब-तर हो जाता है!

सुबह टहलते लोगों के चेहरे देखता हूँ! “रिच” से लेकर “वेरी रिच” या “सेमी रिच”! जिस फ़ुटपाथ से मैं गुज़र रहा होता हूं, इसी फुटपाथ के किनारे प्रसिद्ध नेश्‍नल लाइब्रेरी है। उसके लान में टहलने आने वालों की गाडि़यों की कतार फुटपाथ के किनारे सड़क पर लगी रहती है। हम तब तक नहीं निकलते जब कोई चिकित्‍सक या स्‍वास्‍थ्‍य सलाहकार सलाह नहीं देता कि अ‍ब तो कोलेस्‍ट्रोल घटाइए। ... या जीवन के तीसरे पड़ाव पर आकर भी अपने से बाद की पीढी से कदम ताल मिलाने के लिए लगता है अब स्लिम या ट्रिम होना है। ... या फिर हृदयाघात या गठिया से ग्रसित जीवन में थोड़ा संतुलन लाने की चेष्‍टा में।

इस फुटपाथ की बाई ओर है कोलकाता का प्रसिद्ध चिडि़या खाना और दाहिनी तरफ सामने ताज बंगाल होटल। अभी तक इन्‍हें ताज बंगाल की शान को बट्टा लगाते हुए कहकर किसी ने नहीं भगाया है, वरना आज कल तो शहर के सौंदर्यीकरण के फैशन के नाम पर रैम्‍प (फुटपाथ) पर से सबसे पहले इन्‍हें ही भगाया जाता है। इनके आश्रयस्थल (फ़ुटपाथ) और चिड़ियाखाना की दीवार के बीच एक गंदी सी, सड़ी सी, नाली है। उसकी सड़ांध मारती बदबू, बसों कारों की चिल्‍ल-पों और कोलकाता के मच्‍छरों का दंश भी इनकी निश्‍चिंत निद्रा में विघ्‍न नहीं डाल पाते।

प्रायः रोज ही वहां से मैं गुजरता हूँ। किसी रोज़ वो करवट लेकर मुझे जगह दे देते हैं, और जगह देकर उनकी नींद और गहरी और मीठी हो जाती है। कभी मैं फुटपाथ छोड़कर नीचे उतर जाता हूँ। फुटपाथ छोडकर नीचे उतरने में मुझे काफी कष्‍ट होता है।

ये फर्क है! फ़र्क़ तो यह भी है कि कई तो सुबह की सैर करने नेश्‍नल लाइब्रेरी के लॉन तक शीत ताप नियंत्रित गाडि़यों से आते हैं, और ये, उष्‍ण ताप आच्‍छादित जीवन में फ़ुटपाथ पर चैन की नींद सोते हैं।

हम पैसा, ऐश्‍वर्य, वैभव की भाग-दौड़ से भरी बेचैन ज़िन्दगी से थोड़ा सा वक्‍त इन सैर सपाटा के लिए निकालते हैं, और ये अपनी भागती-दौड़ती जिंदगी से फुटपाथ पर थोड़ा चैन आराम के पल निकाल कर मस्त हैं।

ऐसे में मुझे यह ख्‍याल आता है कि हम टहल-टहल कर पसीना बहाते हैं, ... और ये जो फुटपाथ पर सोए हैं, दिन भर पसीना बहाते हैं तब जाकर कहीं जिंदगी की फुटपाथ पर थोड़ा सा टहल पाते हैं।

आज मन किया फ़ुरसत में… आपको उससे परिचय कराएं। मोबाइल को कान के कनेक्‍शन से हटा कर तस्‍वीर लेने लगा तो वह अंगड़ाई लेते हुए बोला ...

“साहब आप भी न ....... !” और करवट बदल कर सो गया।

24 टिप्‍पणियां:

  1. मनोज जी!
    कोलकता शहर के जीवन-दर्शन को आपने बड़े सुन्दर ढ़ंग से सहेजा है और विचार-मंथन का रास्ता खोला है।
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  2. आज की सच्चाई को दर्शाती एक सुंदर रचना , बधाई

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  3. हम टहल-टहल कर पसीना बहाते हैं, ... और ये जो फुटपाथ पर सोए हैं, दिन भर पसीना बहाते हैं तब जाकर कहीं जिंदगी की फुटपाथ पर थोड़ा सा टहल पाते हैं।...

    लोग मखमली बिछावन पर भी करवटें बदलते हैं ...ये पत्थर पर भी बेफिक्र सोते हैं ...
    श्रम की यही तो महत्ता है ...!

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  4. "किसी रोज़ वो करवट लेकर मुझे जगह दे देते हैं, और जगह देकर उनकी नींद और गहरी और मीठी हो जाती है।"

    यह है आम आदमी का सच। इन्हें हमारे लिए कष्ट सहने में भी अपनी नींद टूटने पर कष्ट नहीं होता बल्कि तसल्ली होती और नींद अधिक आनन्दपूर्ण हो जाती है। यही फर्क है कि हम किसी चीज को किस दृष्टि से देखते हैं और नजरिया ही हमें सन्तोष देता है।

    "हम टहल-टहल कर पसीना बहाते हैं, ... और ये जो फुटपाथ पर सोए हैं, दिन भर पसीना बहाते हैं तब जाकर कहीं जिंदगी की फुटपाथ पर थोड़ा सा टहल पाते हैं।"

    "जिंदगी का फुटपाथ"। वाह! बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं। आम आदमी की जिन्दगी को इतने करीब से देखने के लिए आप बधाई के पात्र हैं।

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  5. बहुत ही सुंदर और सटीक लिखा आपने, हमको भी कलकता में गुजारा समय याद आगया. शुभकामनाएं.

    रामराम

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  6. आज तो फुर्सत में आपने आम आदमी की ज़िंदगी के करीब से दर्शन कराये ...हम भी इनमें ही शामिल हैं ..बस फुटपाथ के साथ एक छत और है ..

    ज़िंदगी का फुटपाथ ...बहुत सुन्दर ...

    अच्छी अभिव्यक्ति

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  7. हम टहल-टहल कर पसीना बहाते हैं, ... और ये जो फुटपाथ पर सोए हैं, दिन भर पसीना बहाते हैं तब जाकर कहीं जिंदगी की फुटपाथ पर थोड़ा सा टहल पाते हैं।

    गहरी और अर्थपूर्ण बात ।

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  8. जिस दिन इन लोगो के सर पर छत होगी, भर पेट खा सके गे उस दिन भारत विकास शील बने गा. बहुत सुंदर ढंग से आप्ने आम आदमी का दर्द व्याण किया, आप ने जो फ़लोवर का इतना बडा बोर्ड अपने ब्लांग पर लगा रखा है कई बात इस से तंग हो कर हमे बिना पढे ओर बिना टिपण्णी किये ही भागना पडता है, जब आप का ब्लांग खुलने मै बहुत समय लेता है, कृप्या इसे बहुत छोटा कर ले तो सब को बहुत आरम मिलेगा, वेसे यह एक राय है, माने या ना माने आप की मर्जी, हम तो फ़िर भी आयेगे, खुला तो पढेगे नही तो भाग जायेगे..:)

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  9. As-pas ki ghatanaon ke prati Manoj Kumar ji kaphi sajag rahate hain aur unhen jivan darshan ke sath jodane ke achchhe KALAKAR hain.

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  10. रिच,सेमी रिच और वैरी रिच लोगो द्वारा आम फुटपाथी जिंदगी को इतने नज़दीक से देखना और उसका वर्णन करना भी एक सुकून पाने वाली बात है.

    बहुत से एहसास जो इस दौरान अनुभव किये आपने सुंदर शब्दों से सजाया है और 'जिंदगी का फुटपाथ'शब्द ने कुछ नया सोचने को दे दिया.

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  11. @ राज भाटिय़ा जी
    बदल दिया।
    आपने अच्छी सलाह दी।

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  12. कलकत्ता के दिनों की याद दिला दी । मेहनत करने वालों को पत्थर पर भी नींद आजाती है आप का रिस्कवॉक पसंद आया ।

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  13. देरी की माफी के बाद टिप्पणीः
    मनोज जी, कलकत्ता ऊप्प्स कोलकाता का नाम आते ही मेरे दिल में कुछ कुछ होने लगता है... लेकिन यह शहर ऐसा है जहाँ किसी को पनाह न भी मिले पर मोहब्बत बेपनाह मिलती है.. जहाँ खेल के नाम पर फुटपाथ पर सोने वाले सैकड़ों बेसहारा लोगोंको ट्रेन में भरकर कानपुर भेज दिया गया, वहीं इस शहर से मेरा पहला परिचय भी बड़ा दिल को छूने वाला था.. एक होटेल के बावर्चीख़ाने के बाहर सड़क की तरफ खुलने वाली तंदूर की राख निकलने वाली कंदरा (Ash Pit) में जाड़े की सर्द में आठ लोगों को घुसकर सोते हुए और जाड़े से लड़ते हुए देखा था मैंने, और तभी फैसला किया कि यह शहर बस मेरा है...
    मुझसे मिला दिया मनोज भाई आपने मुझे. और हाँ शीत ताप नियंत्रित के विलोम के रूप में ऊष्ण ताप आच्छादित शब्द मन में नस गया..कभी प्रयोग करने की अनुमति प्रदान करें!! बहुत सुंदर!!

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  14. @ सलिल जी
    बड़े भाई को अनुमति की आवश्यकता नहीं है, अधिकार है।

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  15. आपकी पोस्ट रविवार २९ -०८ -२०१० को चर्चा मंच पर है ....वहाँ आपका स्वागत है ..

    http://charchamanch.blogspot.com/
    .

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  16. जो किसी प्रतिस्पर्धा में नहीं हैं,बस,अपनी मेहनत को ही भगवान का प्रसाद मानते हैं,वे ही छककर सो सकते हैं।

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  17. Such scenes are very common in metropolitan and in other cities. In the winter season, many sleep on the pavements not to wake up ever. Many are crushed by reckless drunken drivers. The question is why is it so? Six decades of democracy, welfare measures, and to be specific, more than three decades of Communist rule in West Bengal, why are people without shelter? You are welcome to put the plight of the people on blogger, but I think you must also reflect on the factors which makes destitution so commonplace and what we can do on our part for improving things.

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  18. पत्थर पर भी जिनको नींद आ जाती है .. वो जीवन के महत्व को जानते हैं ... ये परिचय परिश्र्म का है ... बेफिक्री हा है ... कोलकाता का जीवन चरित्र जुदा है सब जगहों से ...

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  19. lekhan me ek naveen darshan chhupa hai ! dhanyawaad !! vartaalap jaisa shilp drut prabhaav chhodta hai !! dhanyawaad !!!

    *kuchh takniki kathinaaee ke kaaran roman me likhna pad raha hai !

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  20. हम पैसा, ऐश्‍वर्य, वैभव की भाग-दौड़ से भरी बेचैन ज़िन्दगी से थोड़ा सा वक्‍त इन सैर सपाटा के लिए निकालते हैं, और ये अपनी भागती-दौड़ती जिंदगी से फुटपाथ पर थोड़ा चैन आराम के पल निकाल कर मस्त हैं।

    सौ बात की एक बात कह दी आपने....

    हावड़ा ब्रिज पर चढ़ने से पहले उस भीड़ भरे तंग रस्ते के किनारे बेफिक्री से सोये लोग नीद और श्रम का अर्थ मुझे भी कई बार समझा चुके हैं ....

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