मंगलवार, 17 अगस्त 2010

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सत्येन्द्र झा

नए हाकिम के पदभार ग्रहण करते ही विभाग में हडकंप मच गया था। फ़ाइल पर आपत्तियां दर्ज होने लगी,बिल-भुगतान का प्रवाह रुक गया। क्रय-दर कम करने की प्रक्रिया शुरू हो गयी। अखबारों ने नए पदाधिकारी कीकार्य-कुशलता और इमानदारी का खूब प्रशस्ति-गायन किया।

विभाग के अधीनस्थ अधिकारी और कर्मचारी दुखी थे। हाकिम के आने से उनकी उपरी आय पर पॉवर-ब्रेक लगगया था। खैर समय अपनी गति से बीतता रहा।

एक दिन, "सर, वैसे तो आप जो कहेंगे वही होगा... मगर पुराने साहब तो दस परसेंट..... ।"

"पहले साहब की बात मैं नहीं सुनना चाहता हूँ। वो तो कार्यालयी मर्यादा को मिट्टी में मिला कर चले गए।", नएसाहब धाराप्रवाह बोलते चले जा रहे थे, "मेरी कलम बीस परसेंट से कम पर नहीं चलेगी।"

पूरे कार्यालय में खुशी की लहर दौड़ गयी। मीडिया में नए हाकिम का पुराना इमेज बरकरार रहा।

(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहै छी"  से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित। )

27 टिप्‍पणियां:

  1. आज्कल के सत्य को उजागर करती कहानी , अच्छी लगी.आभार...

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  2. एक उम्मीद ही तो है जो साथ नही छोडती. सुंदर कथा.

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  3. "मेरी कलम बीस परसेंट से कम पर नहीं चलेगी।"
    --
    क्या थे कल और क्या आज हम हो गये,
    देश के लाल गुदड़ी में फिर खो गये,
    दिन दहाड़े सजग सन्तरी सो गये,

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  4. सुंदर प्रस्तुति!


    “कोई देश विदेशी भाषा के द्वारा न तो उन्नति कर सकता है और ना ही राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति।”

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  5. नौकरशाहों का सच ! बहुत सही !! सुन्दर कथा !!!

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  6. कितना सरल है भ्रष्टाचार बढ़ाना ...और सब कर्मचारियों को खुश रखना ...

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  7. अंत के बारे मे यही सोच रही थी और वो ही निकला……………कितना भ्रष्टाचार फ़ैल गया है।

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  8. भृष्टाचार ऐसे भी आता है शिष्टाचार का रूप धरकर।
    सुन्दर लघुकथा!!

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  9. भ्रष्ट नौकरशाही का सटीक चित्रण.....
    हम भी पढते हुए सोच रहे थे कि ये लघुकथा तो बहुत पहले कहीं पढी हुई है...यहाँ कैसे? वो तो अन्त में जाकर स्पष्ट हुआ.....

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  10. ए भाई जरा देखके चलो! नया साहब आया, तरक्की भी लाया... दस का बीस… गोल गोल रोटी का पहिया चला, पीछे पीछे चाँदी का रुपईया चला!! मनोज बाबू, छा गए!

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  11. लक्ष्य हमेशा ऊँचा रखना चाहिए। प्रयास से कुछ भी असम्भव नहीं!

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  12. सब तरफ बिखरा हुआ आज का सच, लेकिन तिक्त।

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  13. लोकसेवा के विद्रूप चेहरे को दर्शाती उत्तम रचना।

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  14. गाड़ी तो रुकी ही नहीं, अब दुगुनी गति से।

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  15. और उनकी इमेज बनी रही ..... आज इसी बात का तो चलन है ... सब को खुश रक्खो और जम कर खाओ खिलाओ .... तीखा व्यंग ....

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