मंगलवार, 24 अगस्त 2010

लघुकथा -- दोष किसका..... ?

दोष किसका..... ?


लघुकथा -- सत्येन्द्र झा

युवावस्था में प्रेम-विवाह के आन्दोलनकारी समर्थक। प्रेम-विवाह किये। माँ-बाप से अनबन और घोर निराशा।

वक़्त-बेवक्त सास-ससुर से भी तल्खी। "प्रेम-विवाह का मतलब यह तो नहीं कि दामाद के हर अरमान में आग ही लगा दें।" तिलक-दहेज़ नहीं देना पड़ा... कम से कम 'अन्य आवश्यक सामग्री' के साथ ससम्मान विदाई तो करते।

वृद्धावस्था में प्रेम-विवाह के कट्टर विरोधी।

इच्छा के प्रतिकूल सामाजिक क्रांतिकारी पुत्र ने एक युवती का हाथ थाम लिया।  न पंडित न बारात, ना ही दहेज़। कोर्ट-मैरिज।

अब पुत्र से भी अनबन।

पहले से भी अधिक निराशा। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि दोष किसका था और गलती कहाँ हो गयी ?

(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहैं छी" में संकलित "तीन चित्र" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)चित्र : आभार गूगल सर्च

28 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    हिन्दी ही ऐसी भाषा है जिसमें हमारे देश की सभी भाषाओं का समन्वय है।

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  2. बहुत सटीक!

    रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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  4. भाई-बहिन के पावन पर्व रक्षा बन्धन की हार्दिक शुभकामनाएँ!
    --
    आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है!
    http://charchamanch.blogspot.com/2010/08/255.html

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  5. हूँ.... ! बहुत गंभीर बात है. आखिर दोष किसका है और गलती कहाँ हुई ? जवाब तो खोजना पड़ेगा.... वरना यह दोष कई पीढ़ियों तक तबाह करेगी !!! अच्छी समस्या प्रधान कथा !!! समाधान अब पाठक समाज पर !!!! लेखक को धन्यवाद !!!!!

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  6. समाज में ऐसा ही होता है .. रक्षाबंधन की बधाई और शुभकामनाएं !!

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  7. रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
    बहुत खूब लिखा है आपने! बिल्कुल सही बात कहा है !

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  8. जीवन के यथार्थ का एक पहलू...
    रक्षाबंधन पर्व की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं.

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  9. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाए

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  10. बहुत शानदार लघुकथा. रक्षाबन्धन पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं.

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  11. सच है कभी कभी जो इंसान खुद करता है वो ही अगर उसली औलाद करे तो अच्छा नही मानता ... ये दोहरा मानदंड समझ से परे है ....

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  12. जीवन के यथार्थ का एक पहलू को दर्शाती समस्या प्रधान रचना।

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  13. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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  14. झा जी की पिछली लघुकथा पढी थी मैंने और कथा का जो इम्पैक्ट था वो महसूस करने की बात है. लघुकथा की यह विशेषता यहाँ भी देखने को मिलती है.एक जर्जर परम्परा और उसके मानने वाले, दोष किसका,यह तो पता लगाना ही होगा...सचमुच एक वैचारिक मंथन का विषय सुझाती लघु कथा...सत्येंद्र जी और केशव जी दोनों ही धन्यवाद के पात्र हैं.

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  15. बहुत सटीक रचना, रक्शःआबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  16. कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता।

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  17. गलती कहीं नहीं हुई। दोष उस व्यवस्था का है,जो परिवर्तन का धुर-विरोधी है। ऐसे विवाहों से ही,जातिविहीन और प्रेमोन्मुख समाज का जन्म होगा जहां सिर्फ मनुष्यवाद की अहमियत होगी।

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  18. ऐसी दुनिया है तो आखिर ऐसी दुनिया क्यों है...

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  19. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    समस्या गंभीर है।

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  20. आप को राखी की बधाई और शुभ कामनाएं

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  21. समाज का तीखा सच। व्यवस्था परिवर्तन को आगे बढ़े पग कभी-कभी व्यवस्था की जकड़ से बाहर नहीं निकल पाते। हम दोष यदि व्यवस्था में देखते हैं तो दृढ़ संकल्प में कमी भी एक पहलू है। कमजोरी के चलते व्यवस्थाएं नहीं बदला करतीं।
    समस्या प्रधान सुन्दर कथा के लिए सतेयेन्द्र को बधाई।

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  22. समाज का यथार्थ। समस्या प्रधान कथा की प्रस्तुति के लिए सत्येन्द्र जी को धन्यवाद।

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  23. बेहद सटीक ..मुझे भी यही सवाल कचोटते हैं आखिर इतनी सीधी सी बात क्यों नहीं समझ में आती लोगों को .

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  24. बेहद सटीक ..मुझे भी यही सवाल कचोटते हैं आखिर इतनी सीधी सी बात क्यों नहीं समझ में आती लोगों को .

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