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सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

तस्वीर


लघुकथा

तस्वीर

मनोज कुमार
उसने अपने मृत पिता की तस्वीर बेड रूम में लगा ली।
रोज़ सुबह अपने जन्म-दाता को देखकर दिन की शुरुआत करता। तस्वीर के इर्द-गिर्द उसने अपनी, बीवी और बच्चों की तस्वीरें भी रख दीं, जैसे पिता का परिवार पूरा हो गया हो। आशीष-वर्षा की कल्पना में मन सन्तोष से भर उठा।
एक दिन दूर का रिश्तेदार घर आया। उसकी पत्नी ने इसकी पत्नी के कान में कहा, मरे हुए लोगों के साथ अपनी तस्वीरें नहीं रखनी चाहिए। और वह भी बेड रूम में ! ........ अशुभ होता है।
पत्नी के मन में शंका के बीज पलने लगे।
पिता की तस्वीर अब स्टोर रूम की शोभा बढ़ा रही थी।
***

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

लघुकथा

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सत्येन्द्र झा

व्यख्याता पद केलिये साक्षात्कार चल रहा था।

“सबसे छोटी लघुकथा क्या हो सकती है ?” एक साक्षात्कार में विशेषज्ञ ने आवेदक से पूछा।

“सब कुछ मर गया।” आवेदक ने कुछ सोचते हुए उत्तर दिया।

“कैसे...? यह कैसे हुई लघुकथा?”

“श्रीमान इसमें आपको लघुकथा के सभी आवश्यक अवयव मिल जायेंगे। यह अपने आप में सम्पूर्ण है।”

“ट्रीन-ट्रीन......” तभी टेबल पर रखा सरकारी फोन खनखना उठा। फोन पर हुए वार्तालाप का मतलब आवेदक अच्छी तरह समझ चुका था।

“मैं समझा नहीं... जरा आप इसे विस्तार से समझायेंगे?”

विशेषज्ञ की बदली हुई मुख-मुद्रा को आवेदक ने परिलच्छित कर लिया था। “छोड़िये न सर.... ! विस्तार से कहने लगे तो वो लघुकथा ही क्या? तब तो यह दीर्घकथा हो जायेगी।”

इतना कहते हुए वह आवेदक गेट खोल बाहर निकल गया। वहां अभी भी प्रत्याशियों की भीड़ उमर रही थी।

(मूलकथा मैथिली में “अहींकेँ कहै छी” में संकलित ’लघुकथा’ से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

लघुकथा : खाली ग्लास

लघुकथा : खाली ग्लास

सत्येन्द्र झा

“सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचय हमेशा देना चाहिये।” प्रोफेसर साहब कक्षा में कह रहे थे, “एक ग्लास में आधा पानी भरा है... सकारात्मक दृष्टिकोण वाले इस ग्लास को आधा भरा कहेंगे और जिनकी सोच नकारात्मक है वे कहेंगे कि ग्लास आधी खाली है।”

एक क्षात्र उठकर जोर से बोला, “लेकिन सर ! यह आदर्श और एक हद तक असंभव दृष्टि है। अब तो गरीबों को ऐसा चश्मा पहना दिया गया है कि उनके सामने पूरी भरी गलास भी हो तो भी उन्हे खाली ही लगती है। क्योंकि उन्हे पता है कि उस भरे ग्लास से एक बूंद पानी भी उन्हे मिलने वाला नहीं है।”

(मूलकथा मैथिली में “अहींकें कहै छी” में संकलित “खाली गिलास” से हिन्दी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 1 मार्च 2011

मजनूँ कहीं का

लघुकथा

मजनूँ कहीं का

मेरा फोटोमनोज कुमार

बहुत दिनों से मास्टर मुचकुन्द नाथ की नज़रें उसे ही खोज रही थीं। कहीं से उन्हें उड़ती ख़बर मिली थी कि क्लास का एक लड़का माला से इश्क फरमा रहा है। माला क्लास की सबसे ख़ूबसूरत लड़की जो थी। पर, उन्हें अभी तक इसका कोई सुबूत नहीं मिला था ताकि वह उसको मज़ा चखा सकें। उनकी मंशा उसे रंगे हाथ पकड़ने की थी। वो घात लगाए ही थे कि यह मौक़ा उन्हें जल्द मिल गया।

उस दिन जब वो क्लास लेने आ रहे थे तो खिड़की से उन्हें दिखाई पड़ा कि शंकर एक चिट माला की ओर बढ़ा रहा है। इससे पहले कि माला उस चिट को ले पाती, मास्टर साहब धप्प से कमरे में घुसे और चिट को झपट कर अपने क़ब्ज़े में किया। उन्होंने मुड़े हुए कागज के टुकड़े को खोलकर भरी क्लास में ऊँचे स्वर में बाँचना शुरू किया। उस पर एक शे’र लिखा था .........

नज़र में ढल के उभरते हैं दिल के अफ़साने,

यह और बात है कि दुनियाँ नज़र न पहचाने।

उनकी आँखों से आग बरसने लगी। गुस्से से तमतमाए मास्टर साहब ने नैतिकता, विद्यालय की मर्यादा और छात्रों के धर्म की दुहाई देते हुए शंकर पर लात-घूंसे और चप्पल की बौछार कर दी। जब जी ठंडा हुआ तो हाँफते हुए बोले, “साला ... मजनूँ की औलाद ... पढ़ने आता है या इश्कबाज़ी करने! आइन्दा ऐसी हरकत की तो खैर नहीं .........।”

क्लास खत्म होने के बाद माला ने शंकर से पूछा, “तुझे क्या हो गया शंकर ? ऐसा क्यों किया?”

शंकर ने बताया, “वो रतन ने लिखा था, और तुझे देने को बोला था।”

इधर, स्टाफ रूम में मास्टर मुचकुन्द नाथ अपने दोस्त अध्यापकों को गर्व से वृत्तान्त सुना रहे थे, “आज मज़ा चखा दिया। कमीना कहीं का, मेरी माला पर नज़र रखता था।”

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मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

लघुकथा :: कथनी और करनी

कथनी और करनी

IMG_0545_thumb[1]मनोज कुमार

totaआज राधाबाबू के जन्म दिन के अवसर पर एक भव्य समारोह आयोजित किया गया है।

भले ही उनके घुँघराले बाल युवावस्था में ही काल-कवलित हो गए हों या चालीसा पार करते-करते गठिया ने घुटनों को जाम कर दिया हो। लेकिन इन सबसे उनके सौन्दर्यबोध में कोई अन्तर नहीं आया था। उनका आदर्श है – ‘यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः, स एव वक्ता स च दर्शनीयः’।

....... यह प्रोजेक्ट तो मुझे ही मिलना चाहिए, जैसे भी हो। मैं औरों की तरह नहीं जो बरदाश्त कर लूँ। ........... कोई तो कमजोर नब्ज होगी। काम के लिए तो बीस परसेन्ट काफी हैं। चालीस में नहीं मानता है तो उठवा लो घर में से किसी को। अपने काम के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ हूँ मैं, जो चाह लेता हूँ, करता हूँ” वे अपने पेशे के प्रति खुद को समर्पित मानते ही नही, शब्दों में सदा बोल भी उठते हैं।

सिपहसलारों ने उनकी इस बात पर तालियों के साथ सहमति प्रकट की - पुल वाले इंजीनियर को ही लो। भला आदमी था। ईमानदार था। बेचारा गया काम से। काम आपका बना और मुआवजा भरा सरकार ने। श्च ... श्च ... श्च। अबला को क्लर्की मिल गई। अब उसका घर चल रहा है। उसकी नौकरी के लिए कितना प्रयास किया था आपने। आज तक आपका अहसान नहीं भूली है, नाम लेती है

इतने में किसी ने आकर सूचना दी, ‘मीडिया वाले और बाकी लोग भी पधार चुके हैं।’

वे गण्य-मान्य लोगों के साथ बाहर आए। लान में मंचनुमा स्टेज पर आकर माइक के पीछे स्थान ग्रहण किया। उनका वक्तव्य शुरू हुआ, में अपनी परम्परा, नैतिकता और संस्कारों को संकल्प के साथ जीना चाहिएसद्भाव, शान्ति और सौहार्द का वातावरण निर्मित हो इसके लिए हमें एक-दूसरे से मेल-मिलाप बढ़ाकर दिल में प्यार और भाईचारा का दीपक जलाना चाहिए, प्रकाश फैलाना चाहिए। हमें वह हर प्रयास करना चाहिए जिससे समाज में एक दूसरे के प्रति प्रेम, स्नेह, आदर और सम्मान का भाव बढ़े .....।”

वक्तव्य समाप्त होते ही पार्श्व में उनका पसंदीदा गीत ‘जोत से जोत जलाते लो, प्रेम की गंगा बहाते चलो ......!” बज उठा। उपस्थिति लोगों की जोरदार तालियाँ देर तक गूँजी। एक बंकिम स्मिति उनके अधरों को स्पर्श करती हुई तेजी से गुजर गई।

राधाबाhin_bday_ca-2बू किसी भी अवसर पर अंदरखाने में शहर के धनाड्य और संभ्रांत मित्रों के साथ जाम टकराने से नहीं चूकते। आज भी शहर के गण्य-मान्य लोगों के साथ ड्राइंग रूम की मद्धिम रोशनी में जाम का दौर चल रहा है। जन्मदिन के उपलक्ष्य में शहर की सबसे मंहगी बेकरी से एक बृहद् आकार का हृदयनुमा केक मंगाया गया है। उन्होंने पहले फूंक मारकर प्रकाश बिखेर रही मोमबत्तियों को बुझाया। फिर चाकू से दिल के आकार के केक के टुकड़े कर डाले ...... पहला टुकड़ा अपने मुँह में रखा।

बाहर लोग अभी भी उनके अभिनन्दन में जयकार कर रहे थे ।

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मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

लघुकथा :: चित भी मेरी पट भी मेरी

लघुकथा

चित भी मेरी पट भी मेरी

सत्येन्द्र झा

उसका बैल बीमार था। पशु चिकित्सक को बुलाया गया। मोटे-मोटे इंजेक्शन और ढेर सारी दबाइयां चली.... मगर बैल बच नहीं पाया।लोग कह रहे थे कि डॉक्टर बीमारी नहीं पहचान सका। डॉक्टर साहब झुंझला गए, "दवा तो मैंने सही ही दिया था मगर... पशु की जातकुछ बोलता तो है नहीं.... अब ऐसे बीमारी कभी-कभार पहचान में ना आये तो क्या कर सकते हैं....?"

उफ़... इस बार उसका सबसे छोटा बेटा बीमार पड़ गया। शहर के सबसे बड़े डॉक्टर से इलाज करवाया मगर.... वह बच नहीं पाया।लोगों की जुबाँ पर फिर से एक ही शिकायत थी, "उफ़... डॉक्टर बीमारी नहीं पहचान पाया।" यह डॉक्टर साहब कुछ ज्यादा ही झुंझलागए, "तुम्हारा बेटा इतना बोलता था कि ठीक से इलाज करना मुश्किल। तुरत ये हो रहा है... तुरत वो हो रहा है.... तुरत ये होगया....... ! अगर कुछ नहीं बोलता तो मैं अपने ढंग से इलाज करता... ! वो तो मैं ही था जो इतने दिनों तक भी खीच पाया.... ।

बैल...?  बेटा.... ?? वह अबाक था.... ! उसे यह भी समझ में नहीं आ रही थी कि मन में चीत्कार करे या कलेजा फार के चिल्लाए.... !

(मूल कथा मैथिली में 'अहीं के कहै छी' में संकलित 'मूक वाचाल' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

लघुकथा :: स्वागत‌!!

लघुकथा

स्वागत!!

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उस दिन प्याज पहलवान और टमाटर ठाकुर आमने-सामने भिड़ गए। रास्ता तंग था। कोई किसी को आगे बढने की जगह नहीं दे रहा था।

प्याज पहलवान दहाड़ा, “हट जा मेरे रास्ते से! जानता नहीं तू मैं कौन हूँ?”

टमाटर ठाकुर ने व्यंग्य कसा, “कौन हो तुम?”

प्याज पहलवान की दहाड़ और भी तेज़ हो गई, “आज मैं देश की सबसे चर्चित और महत्त्वपूर्ण शख़्सियत हूँ। अब वो दिन लद गए जब मुझे हिकारत की नज़र से देखा जाता था और लोग मुझसे दूरियाँ बनाते थे। मेरी देह की दुर्गंध उन्हें परेशान करती थी। मेरी उपस्थिति से उनकी आँख में किरकिरी होती थी। आज तो मुझे पाकर, मेरे समीप आकर लोगों की आँखों में ख़ुशी के आँसू होते हैं!”

टमाटर ठाकुर के चेहरे पर कुटिल मुस्कान तैर गई, “हुँह! आज मैं भी वो नहीं रहा, जब लोग मुझे सड़े-गले और भौंडे प्रदर्शनों वाले कार्यक्रमों में प्रयोग किया करते थे। आज मैं भी तुमसे किसी मायने में कम नहीं हूं। लोग अब मुझे भी पाकर खुशी के आँसू बहाते हैं …!”

यह सुन प्याज पहलवान ने टमाटर ठाकुर को गले लगाया। ‘अरे! हम दोनों इतने बेशकीमती हो गए हैं … आओ गले मिलें!’

अगले दिन दोनों ने खुदरा-बाज़ार संघ के कार्यक्रम के मंच पर मुस्कुराते हुए मुख्य अतिथि का आसन ग्रहण किया। सामने जमीन पर बैठी आम जनता आँखें फाड़े उन्हें देखे जा रही थी, जबकि कुछ खास लोग मंचासीन अतिथियों का खुले दिल से स्वागत कर रहे थे।

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

भगवान कभी नहीं मरते हैं..!

भगवान कभी नहीं मरते हैं..!

-- सत्येन्द्र झा

बारह वर्षीय लड़की अचानक अपनी माँ से पूछ बैठी, "माँ... माँ.... ! भगवान कैसे होते हैं ?"

नख-शिख स्वर्णाभूषण से लदी माँ बोली, "भगवान.... उम्म्म्म.... अब मैं तुझे कैसे समझाऊं.... ? बेटी, भगवान वैसे ही होते हैं जैसे तुम्हारे पापा।" 

लड़की चुप हो गयी। उसके बाल मस्तिष्क में कोलाहल चल रहा था कि उसके पापा को तो सभी बेईमान कहते हैं... फिर वो भगवान कैसे ? उसी दिन तो वह पंडित काका के घर गयी थी सत्यनारायण कथा में। वहाँ भी तो दो महिलायें उसके पापा की बेईमानी का नया किस्सा बतिया रही थीं। उस ने अनदेखे में सब सुन लिया था।

कुछ देर चुप रहने के बाद वह फिर बोली, "माँ ! मगर पापा तो एक दिन मर जायेंगे.... मगर भगवान तो.... । "

माँ का शरीर किसी अप्रत्याशित भय से सिहर उठा था। बेटी को डांटते हुए बोली, "शुभ-शुभ बोलो.... भगवान कभी नहीं मरते हैं।"

लड़की फिर चुप हो गयी। उसके अंतर में भारी द्वन्द चल रहा था। सहसा आँखों के आगे दो तस्वीरें झिलमिला उठीं। एक दिव्य तस्वीर सस्त्राभूषनधारी भगवान की है और एक में उसके पापा हैं।  फिर दोनों तस्वीर मिल कर एक हो गए। लड़की की आँखें चौंधिया गयीं। वह उठकर चुप चाप अपनी कोठरी में चली गयी।  फिर कलम निकाल कर एक बड़े से पन्ने  पर लिखा, "बेईमान कभी नहीं मरते हैं।"

(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहै छी" में संकलित 'निर्णय' से हिंदी में केशव कर्णद्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 4 जनवरी 2011

लघुकथा:: वास्तव में…..!

लघुकथा:: वास्तव में…..!

सत्येन्द्र झा

नाटक चल रहा था। नायक नायिका से कहता है, "मेरा और तुम्हारा साथ तो जन्म-जन्मों का है। तुम्हारे प्यार के बिना तो अब एक पल भी जीना मुमकिन नहीं.... !"

नाटक समाप्त हुआ।

एक घर में उसी दृश्य की पुनरावृति चल रही है। युवक युवती से वैसा ही प्रणय-निवेदन कर रहा है। किन्तु नाटक में नायक सदा के लिए युवती का हाथ पकड़ता है जबकि घर वाला युवक विवाह के प्रसंग में। वह युवती से कहता है, "मुझे कुछ याद नहीं आ रहा कि मैं ने तुम से कभी ऐसा कुछ कहा था.... !"

अभिनय और वास्तविकता एक दूसरे में उलझ गए थे। वास्तव में अभिनय का चरित्र उलट गया था।

(मूल कथा मैथिली में 'अहीं कें कहै छी' में संकलित 'जाति-अजाति' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 14 दिसंबर 2010

लघुकथा :: बड़ा अपराधी

लघुकथा

बड़ा अपराधी

सत्येन्द्र झा

                                दो व्यक्ति कारागार के एक ही कोठरी में बंद थे। साथ रहते-रहते परिचय बढ़ा। फिर शुरू हुई आपस की राम कहानी। एक ने कहा, "भाई! क्या कहूं ? लोभ जो न करा दे। पता नहीं.... वो कैसा अशुभ मुहूर्त था जब लोभ के वशीभूत हमने अपनी ही पुत्रवधू की हत्या कर दी। जहर दे कर मार डाला हम ने उस अबला को..... । शायद यही मेरा प्रायश्चित हो।" फिर डबडबा आयी आँखों को पोछ कर बोला, "लेकिन आप यहाँ कैसे.... ?

"मैं बाप होने का प्रायश्चित कर रहा हूँ।" दूसरे ने कहा, "मेरी बड़ी इच्छा थी कि बुढापे में एकलौते बेटे के साथ रहूँ। शहर आ गया। मगर बहू को अपने सजे घर में गंवार बूढा गंवारा नहीं था। बेटे-बहू में ठन गयी। मेरे रहने से झगड़ा बढ़ता ही गया। एक रात बहू ने जहर खा कर अपने प्राण दे दिये। बहू के पिता ने दहेज़ हत्या के आरोप में मुझे अपने बेटे के घर के बदले आजीवन इस काल-कोठरी में पहुंचा दिया।" दूसरे व्यक्ति की आँखें शून्य में गडी़ थी।

पहले व्यक्ति ने कहा, "भाई ! बुरा मत मानना... ! मगर आप तो मुझ से भी बड़े अपराधी निकले.... !"

(मूल कथा मैथिली पुस्तक 'अहीं कें कहै छी' में संकलित 'अपराधी' से केशव कर्ण द्वारा हिंदी में अनुदित।)

मंगलवार, 7 दिसंबर 2010

लघुकथा :: अपराध

-- सत्येन्द्र झा

"सर ! आप जो कहेंगे मैं वह सब करूंगी।" मेरे सामने बैठी स्टेनो मुझ से कह रही थी।

वह कृषकाया रूपसी युवती मेरे ही अधीन कार्यरत थी। उसके द्वारा कहे गए "वह सब" शब्द मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। जिस्म में एक गर्म लहर सी दौड़ गयी। लेकिन अगले ही पल  किसी संस्कार ने संभाल लिया। मैं ने गंभीर स्वर में कहा, "आज तुमने जो गलती की है वह काबिलेमाफी नहीं है, लेकिन तुम भविष्य में इसे ना दुहराने की कसम खाओ तो मैं तुम्हे माफ़ करसकता हूँ।

उसके होठों पर हृदयभेदी मुस्कराहट तैर गए थे। उसकी अदाओं में अभी भी शोखी थी। मुस्कराकर ही कहा था, "सर आप के पूर्ववर्ती अधिकारी तो ऐसी राहत नहीं देते थे। उन्हें 'मैं' चाहिए थीऔर मुझे 'पैसे' जो कंपनी के टेंडर दूसरे के हाथों बेचने से मुझे मिल जाते थे।" हाथों को जोड़ करउसने कहना जारी रखा, "सर ! आप से निवेदन है कि आप यह परम्परा पूर्ववत चलने दीजिये।इस से मेरा भी उपकार होगा और आपको भी कुछ 'सुख' मिल जाएगा।"

उसकी झुकी हुई निगाहें उसके खुद के देह पर अटक गयी थी।  होंठ यंत्रवत हिल रहे थे, "सर ! मैंविवाहित हूँ। घर में तीन बच्चे और एक विकलांग पति.... ! इतने बड़े परिवार का निर्वाह तीनहज़ार की मासिक तनख्वाह में नहीं हो पता है सर.... ! वैसे भी मैं उतनी बदसूरत भी तो नहीं हूँ।"

बहुत हिम्मत कर के मैं नजरें उठा पाया था। उसकी आँखों से आंसुओं की क्षीण सी धाराएंप्रवाहित हो रही थी। मुझे लगा जैसे मैं ने उसे राहत देकर कोई गंभीर अपराध कर दिया हो..... ।

(मूल कथा मैथिली में "अहीं कें कहै छी" में संकलित 'मोहलति' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 30 नवंबर 2010

लघुकथा :: ईष्ट देव

लघुकथा :: ईष्ट देव

 

-- --- मनोज कुमार

भोलू प्रतिदिन की भांति उस दिन भी अपने ईष्ट देव पर चढ़ाने के लिए फूल लेने घर से निकला था। आहाता पार कर सड़क के पास पहुंचा ही था कि उसे सड़क के इस पार काफी भीड़ दिखाई दी। उस पार फुटपाथ पर मालन बैठती है, जिससे वह फूल लेता है। उसका यह प्रतिदिन का नियम है। पर आज वह जाए तो कैसे जाए ? सड़क के किनारे की भीड़ तो रास्ता रोके खड़ी है ही ऊपर से पुलिस भी डंडा लिए लोगों को सड़क पार जाने नहीं दे रही है। भोलू ने वहां खड़े एक व्यक्ति से पूछा, “माज़रा क्या है...।” वह व्यक्ति भी थोड़ी ठिठोली करने के मूड में था, .... बोला “हमारे माई-बाप, मतलब...मेरे कहने का मंतरी जी आ रहें हैं। उहे से रास्ता रोक दिया गया है।” भोलू को लगा अब तो जब रास्ता साफ होगा तभी वह सड़क पार कर सकेगा। वह पास के चबूतरे पर बैठ गया। इंतज़ार करने लगा। थोड़ी देर बाद उसे सायरन की आवाज़ सुनाई देने लगी, फिर गाड़ियों का काफिला दिखा। सबसे आगे पुलिस की गाड़ी, बंदुकों से लैस जवान। फिर सफेद लाल बत्ती वाली गाड़ी। उसके पीछे फिर से पुलिस और बंदूक वाले जवानों की गाड़ियां। तेज़ी से चिल्ल-पों करते हुए काफिला गुज़र गया।

भोलू सड़क की ओर बढ़ा। पर भीड़ अभी-भी टस-से-मस नहीं हुई थी। पुलिस वाले अब भी लोगों को जाने नहीं दे रहे थे। भोलू ने फिर उसी, भीड़ और सारे माज़रे का मज़ा ले रहे व्यक्ति से पूछा, “अब क्या है...जाने क्यों नही दे रहे?” इस बार बग़ैर किसी ठिठोली के वह बोला, “एक दुर्दांत अपराधी पकड़ा गया है। उसने पूरे राज्य में तबाही मचा रखी थी। उसे ही अपराध शाखा के मुख्यालय ले जाया जा रहा है...।” भोलू चबूतरे पर आकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद फिर सायरन, फिर पुलिस और बंदुकों से लैस जवान की गाड़ियां, फिर बरबख़्तबंद गाड़ी, उसके पीछे फिर से पुलिस और बंदूक वाले जवानों की गाड़ियां। भोलू को लगा फ़र्क सिर्फ लाल बत्ती के होने-न-होने का था। बांक़ी सब तो समान ही था।

.... काफिला गुज़र गया था। भीड़ छंट चुकी थी। रोड पर सन्नाटा पसरा था। सड़क के उस पार फुटपाथ पर मालन फूल की दुकान सजा चुकी थी। पर पता नहीं क्यों भोलू के मन पर एक अवसाद सा छाया था। वह अपने घर की तरफ लौट चला। सोच रहा था आज ईष्ट देव को बिना फूल-माला के ही पुजूंगा। ... ...

*** *** ***

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

लघुकथा :: मित्र

मित्र

बीना अवस्थी

बस स्टाप के समीप स्थित पार्क में तुषार और उसके मित्र बैठे थे। अचानक बड़ी तेज आवाज हुई। वातावरण को दहलाने वाली। ....धड़ाम। उसके साथ ही कुछ चीखें और भगदड़।

‘क्या हुआ’ अचानक ताश खेलते हाथ रुक गए। स्कूटर और ट्रक का एक्सीडेन्ट हो गया है। दोनो लड़के पता नहीं जिन्दा हैं भी या नहीं। बताने वाला भागता चला गया । ताश फेंककर सब उठ खड़े हुए ‘चलो देखते हैं।’

‘छोड़ो यार, यह सब तो चलता रहता है। कहाँ तक देखा जाएगा। चलो अगली बाजी चलते हैं। हम अपनी इतनी सुन्दर शाम क्यों बरबाद करें।’

शायद जाने की हड़बड़ी में किसी ने तुषार की बात सुनी नहीं क्योंकि सभी भागते चले गए लेकिन उसके घनिष्ट मित्र नयन के कदम एकदम रुक गए। जमाने भर की घृणा एवं हिकारत उसके नेत्रों में समाती चली गई।

‘आश्चर्य है तुषार, यह तुम कह रहे हो। मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकता था कि तुम जो अभी पूरी तरह अपने पैरों पर खड़े भी नहीं हो पाए हो, ऐसा बोल सकते हो। सामने देखकर भी तुम्हारे इस रूप को अजनबी पा रहा हूँ मैं।’

अभी तीन महीने पहले ही तो आफिस जाते समय तुषार का एक्सीडेन्ट हो गया था। अचेत एवं घायल तुषार को समीप स्थित डिग्री कालेज के छात्र अस्पताल ले गए थे। अपना रक्त देकर जान बचाई थी। तुषार की मूर्च्छा टूटने पर पता लेकर न केवल उसके घरवालों को सूचना दी बल्कि उसकी व्याकुल मम्मी के पास रात भर बैठकर सान्त्वना देते रहे – ‘घबराइए नहीं आन्टी, भइया जल्दी अच्छे हो जाएंगे। आप कोई भी परेशानी हम लोगों से बिना संकोच बताइएगा।’

तुषार का पर्स, चेन, घड़ी, अँगूठी एवं स्कूटर सब सुरक्षित रहा। वे सब अपनी पढ़ाई का नुकसान करके बराबर तुषार से मिलने अस्पताल आते थे। तत्काल चिकित्सा से ही तुषार के जीवन की रक्षा हुई थी। कई बार वे सब घर भी आए। तुषार एवं उसके परिवार वालों के पास कृतज्ञता के शब्द न थे। यदि वे लड़के इतने तत्पर न होते तो....।

नित्य शाम को उनकी मित्र मण्डली उसके घर पर जमा होती ताकि तुषार अकेलापन न अनुभव करे क्योंकि उसके कमर से नीचे का शरीर प्लास्टर से ढक गया था। प्लास्टर कटने के बाद खुली हवा में चलने का अभ्यास करवाने के लिए वे सब तुषार को घर के बाहर ले जाने लगे ताकि इतने दिन घर में बंद रहे तुषार का मन बहल सके। सहारा देकर चलने का अभ्यास करवाकर वे देर तक पार्क में बैठे रहते फिर तुषार को घर छोड़ जाते। अब तुषार छड़ी के सहारे चलने लगा था।

स्वार्थ का श्याम आवरण हटते ही तुषार के नेत्रों के समक्ष प्रकाश फैल गया। वह स्वयं के समक्ष अपराधी बन गया। ‘सचमुच अपने आनन्द में रंचमात्र व्यवधान आ जाने से मैं मानवता से गिर गया था। कुछ देर के लिए मैं भूल गया था कि मेरे लिए भी सबने यही सोचा होता तो क्या मैं जीवित होता। तुमने दर्पण दिखाकर मुझ पर उपकार किया है। मुझे क्षमा कर दो।’

‘मित्रता में क्षमा और उपकार जैसे शब्द होते ही नहीं मित्र। मेरा उद्देश्य तुम्हें अपमानित या लज्जित करना नहीं था। लेकिन तुम्हारे मुँह से ऐसी बात सुनकर मैं तिलमिला गया था। भूल जाओ कि किसने क्या कहा। चलो देखते हैं हम किसी के लिए क्या कर सकते हैं।’

नयन का सहारा लेकर तुषार उठ खड़ा हुआ और छड़ी के सहारे डगमगाते हुए घटनास्थल की ओर नयन के साथ बढ़ने लगा।

मंगलवार, 2 नवंबर 2010

लघुकथा :: उत्साह

लघुकथा

उत्साह

हरीश प्रकाश गुप्त

बगल में पड़ी टेबुल पर सजी गृहस्थी उनके आज भी आत्मनिर्भर होने का बयान करती है। मसलन, खाने-पीने से लेकर दवाइयों तक, जरूरत की सभी चीजें ढकी, खुली टेबुल पर बिखरी पड़ी हैं।
आवाज सुनकर आने में थोड़ी देरी क्या हुई आनन्द बिहारी का मल-मूत्र बिस्तर पर ही छूट गया। छोटी बहू, बड़ी बहू कमरे के दरवाजे तक आगे-पीछे आईं और नाक, मुँह सिकोड़ते पड़े काम का हवाला देते बारी-बारी से चलती बनीं। गंदगी न होती तो एक बार इधर मुँह कर भी लेतीं। पत्नी, जो बन पड़ रहा था, किए जा रही थीं। निष्ठा मजबूरी में इस कदर घुल मिल चुकी थी कि उसमें अंतर कर पाना मुश्किल हो गया था।
old woman1 उन्हें बिस्तर पर आए यही कोई छह महीने होने को आए थे। महीनों डॉक्टर नर्सिंग होम करने के बाद घर पर वापस आना हुआ था। अब, कोई बीमारी हो तो डॉक्टर इलाज करे। बढ़ती उम्र ही शरीर की डोर छोड़ने लगे तो डॉक्टर क्या करे। कहा, इन्हें घर ले जाओ, खिलाओ, पिलाओ, सेवा करो और भगवान से प्रार्थना करो। तब से घर पर ही हैं। पड़े-पड़े शरीर अकड़ गया है। बमुश्किल आधी करवट घूम पाते हैं। बेड शोर उग आए हैं, सो अलग।
बगल में पड़ी टेबुल पर सजी गृहस्थी उनके आज भी आत्मनिर्भर होने का बयान करती है। मसलन, खाने-पीने से लेकर दवाइयों तक, जरूरत की सभी चीजें ढकी, खुली टेबुल पर बिखरी पड़ी हैं। और हाँ, वो टोटीनुमा वीकर भी रखा है जिससे वो लेटे-लेटे ही एक हाथ से उठाकर दूध, पानी या फिर अधठण्डी चाय सुड़क लेते हैं। हर आने-जाने वाले को देखकर आँखे चमक उठती हैं उनकी। साफ आवाज तो नहीं निकलती लेकिन हों-हों-आँ-आँ की मिश्रित ध्वनि के साथ इशारों में कहते हैं, देखो, कितना भला चंगा हूँ। अपने सभी काम खुद ही कर लेता हूँ। मना करता हूँ, लेकिन क्या बहुएँ, क्या बेटे, मानते ही नहीं, लगे रहते हैं सेवा में। बहुत खयाल रखते हैं।
बढ़ती उम्र के साथ बहुगुणित होती जाती ब्याधियाँ उन्हें जीने नहीं दे रहीं और जीने का असीम उत्साह, रिश्ते- नातों के प्रति लुटता निर्दोष स्नेह तथा जिन्दगी के प्रति नजरिया उन्हें मरने नहीं दे रहा। आनन्दबिहारी हैं कि इन ब्याधियों को जीवन का अभिन्न हिस्सा मान प्रसन्नता से जिए जा रहे हैं।
पीठ में छाले, शरीर लाचार, अशक्त, अभिव्यक्ति के लिए शब्द स्पष्ट निकलते नहीं। शरीर की वेदना, उफ्फ !
बढ़ती उम्र के साथ बहुगुणित होती जाती ब्याधियाँ उन्हें जीने नहीं दे रहीं और जीने का असीम उत्साह, रिश्ते- नातों के प्रति लुटता निर्दोष स्नेह तथा जिन्दगी के प्रति नजरिया उन्हें मरने नहीं दे रहा। आनन्दबिहारी हैं कि इन ब्याधियों को जीवन का अभिन्न हिस्सा मान प्रसन्नता से जिए जा रहे हैं।

मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010

लघुकथा :: वसुधैव कुटुम्बकम्

लघुकथा

वसुधैव कुटुम्बकम्

सत्येन्द्र झा

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एक पत्रिका के प्रकाशन की योजना बन रही थी। प्रकाशक और सम्पादक विचार-विमर्श कर रहे थे।

"राजनितिक चर्चा कौन लिखेगा?"

"मेरा छोटा पुत्र। उसे राजनीति में गहरी दिलचस्पी है।"

"और महिला कॉलम?"

"मेरी पत्नी। दिन भर मोहल्ले की औरतों को ज्ञान बांटती रहती है।"

"सिनेमा का पन्ना?"

"मेरा मंझला पुत्र। इस पद के लिए उस से अच्छा उम्मीदवार कौन हो सकता है? वह तो एक दिन में तीन-तीन सिनेमा देखता है।"

"खेल-जगत?"

"अरे.... मेरा बड़ा बेटा। खेलों से उसे इतनी अभिरूचि है कि वह इसके चक्कर में अपनी पढाई-लिखाई भी चौपट कर चुका है।"

"बहुत बढ़िया। किन्तु आवरण चित्र?"

"मेरी बेटी है न।  वह तो बात-बात में आपका चित्र खींच दे।”

पत्रिका प्रकाशित हुई। शीर्षक के नीचे मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था, "आपके लिए, आपके द्वारा, आपकी पत्रिका!”

(मूलकथा मैथिली में 'अहीं के कहै छी' में संकलित "बन्न कोठली" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

लघुकथा :: अपेक्षा

लघुकथा

अपेक्षा

IMG_0545_thumb[1] मनोज कुमार

“आपकी तारीफ़?”

“जी मैं पत्रकार! आप इन दिनों चर्चित और उभरते हुए कथाकार हैं, आपका इंटरव्यू लेने आया था।”

“जी बैठिए।”

“थैन्क्स!”

“कहिए क्या लेंगे, मेरे वक़्त, और विचार के अलावा। वैसे मैं ये बता दूं कि आप जो लेना चाहेंगे मैं दे न पाऊंगा, और जो मैं दे पाऊंगा आप लेना नहीं चाहेंगे।”

“जी मैं समझा नहीं...”

“आपका न समझना ही इस साक्षात्कार की भूमिका है! आगे बढिए।”

“आप तो आज कल चर्चाओं के हीरो हैं, कहानियों के बादशाह!”

“दो मिनट ठहरिए। पानी तो है घर में। यह तो एक बैचलर का मकान है। नींबू-पानी का गिलास रखकर हम बातें करेंगे, तो हमारी नीरस बातें भी सरस लगेंगी.... ”

“आपके कमरे में हर चीज़ें कुछ न कुछ कहती प्रतीत हो रही हैं। सरसरी तौर पर देखने से पूरे कमरे में अस्त-व्यस्तता का-सा महौल नज़र आता है, टेबुल, कुर्सियाँ, पुस्तकें, कपड़े ... सब अस्त-व्यस्त।”

“अगर मुझमें सुरुचि-सम्पन्नता, क्रियाशीलता के साथ मौन और उर्ध्वगामी चिंतन, ‘हाई थिंकिंग’, की झलक होती, तो क्या आप यहां होते?”

“तो क्या मैं ये मान कर चलूं कि आपकी कहानियां आपके व्यक्तित्व का संप्रेषण हैं?”

“देखिये भाई साहब! कहानियों की चर्चा से मुझे अलग रखिये। मौसम की बातें कीजिये, कॉमन वेल्थ खेल-कूद की चर्चा कीजिये। ....और नहीं तो क्रिकेट या फ़िल्म जगत ही सही…!”

“... ... लेकिन मैं तो कहानियों की चर्चा करने के ख़्याल से आया हूँ।”

“... हम्म! शानदार ख़्याल है साब! लेकिन देर से आये। कुछ दिनों पहले तक मैं कहानियां रचता था, आज गढता भर हूँ।”

“मैं समझा नहीं...”

“मतलब, आप जैसे आलोचकों और अख़बारनबीसों ने हम जैसे कहानीकारों को डीप फ़्रीज़ करने का व्रत-सा ले लिया है। कोई भी चर्चा उठा लीजिये, दो-चार पंक्तियाँ तो मिल ही जायेंगी कि अब कहानी कोई पढ़ने की चीज रह गई है? किस्सागोई बीते दिनों की बात हो गई है। कहानियां तो फ़लां लिखते थे ….!”

“लेकिन आपकी कहानियों की चर्चा तो हर जगह हो रही है।”

“हमें भी तो सर्वाइव करना है ...! हम भी अब बार्टर सिस्टम में विश्‍वास रखते हैं।”

“मतलब?”

“तुम मुझे आलू दो, मैं दाल दूंगा।”

“इससे तो न सिर्फ़ आपकी कहानियों का बल्कि साहित्यजगत का स्तर नीचे गिर जाएगा!”

“देखो भाई यह है यथार्थवादी दृष्टिकोण! और इसके चलते साहित्यजगत को और साहित्यकारों को जो बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ हासिल हुई है, वह तो अंधे तक जान सकते हैं।... तुम्हें नहीं पता क्या? देखते नहीं कितने सम्मान मिल रहे हैं, बांटे जा रहे हैं।”

“हां-हां, पता है! पर इस यथार्थवादी दृष्टि से तो आप और आपकी कहानियाँ कोई बहुत ऊँचे स्तर को तो ..... ”

“मेरी कहानियों को अब गोली मारो। लो, निंबू-पानी पियो ..... !”

“अगर आप बुरा न मानें तो एक बात पूछूं?”

“यह तो पूछने के बाद कह सकता हूँ। लेकिन आप पूछिये जरूर, क्योंकि बग़ैर पूछे आप रह सकते नहीं ...”

“आपकी कहानियों मे “वो” विषय बहुत होता है, आप समझ रहे हैं न मैं क्या कह रहा हूं?”

“खूब समझ रहा हूं, “उस” विषय को...”

“आप इस विषय पर क्यों लिखने लगे? कहीं प्रसिद्धि का कारण...”

“देखो भाई! यह सही है या गलत, कहा नहीं जा सकता। पर अगर रचनाओं से रचनाकार और पाठकों के बीच समान संवेदना उभरती है तो उस रचना को महत्त्व का माना जाना चाहिये।”

“मेरा मतलब कुछ और था। कई बार ऐसा भी होता है कि लोग-बाग तुरत ख्याति प्राप्त करने के लिए..... ”

“असली मतलब यह है कि यह सत्य नहीं है। मेरे भाई, मैं तुम्हें ग़लत साबित करने के लिये कोई तर्क या वक्तव्य नहीं दूंगा। तुम्हें ग़लत साबित करके तो मेरा घाटा ही होना है। तुम मेरे बारे में लिखोगे तो मेरे शुभचिंतकों में वृद्धि हो या न हो मेरे पाठकों में वृद्धि तो अवश्य ही होगी।”

“लेकिन .....”

“... लेकिन, मेरे दोस्त, मेरी कहानियों में कहानी खोजो ना, अपनी महबूबाओं की तस्वीरें, उसका फ़िगर और उसका पता-ठिकाना क्यों तलाशते रहते हो...!”

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

लघुकथा-पहरा

लघुकथा

पहरा

श्याम सुन्दर चौधरी़

सिपाही ने मेज पर चाय से भरे दोनों कप को रखा तो उन दोनों की बातों का तारतम्य एकाएक टूट गया। वे दोनों किसी मृतक के सम्बन्ध में बातें कर रहे थे। सिपाही के जाते ही इन्सपेक्टर वीरेन्द्र ने इन्सपेक्टर ज्ञानेश्वर सिंह की ओर एक कप बढ़ा दिया और दूसरे कप को अपने हाथ में लेकर सिप करते हुए पूछा, ‘हाँ भई, ...तुम कह रहे थे कि वह वेश्या मरते वख्त कोई चिट्ठी छोड़ गई है, क्या लिखा है उसमें?’

इन्सपेक्टर ज्ञानेश्वर ने सामने रखी फाइल में से एक कागज निकाला, एक बार इन्सपेक्टर वीरेन्द्र की ओर देखा और फिर पढ़ने लगा,

‘ – मैं खुदकुशी कर रही हूँ। दुनियाँ में इस वख्त मुझसे ज्यादा खुश और कौन होगा? लेकिन मेरे मरने के बाद मेरी लाश पर पहरा लगा दिया जाए। जीते जी कितने रंगे पुते बनावटी चेहरों ने मेरे जिस्म को खरोंचा है, उनकी गरम और कड़वी सांसों को मैं समेटती रही, कितने टेढ़े- मेढ़े, गन्दे- साफ लोगों की साँसें, उनमें से कोई अगर मेरी लाश पर भी..... ओह ! नहीं..... मुझ पर रहम करो, पहरा बढ़ा दो, मैं थक चुकी हूँ.......’

पत्र पढ़ कर इन्सपेक्टर ज्ञानेश्वर थोड़ी देर चुप रहा, और फिर एक तेज साँस छोड़ते हुए कहा, ‘स्साली.... नाटक करती है....;’

कुटिल मुस्कान के साथ इन्सपेक्टर वीरेन्द्र ने पूछा, ‘तो क्या पहरा लगाने का इरादा है....?’

ज्ञानेश्वर ने जवाब दिया, ‘अरे नहीं यार, ....... जो मर गया उसके लिए पहरा क्या ....लेकिन हाँ...’ रहस्यमय मुसकान के साथ वीरेन्द्र की ओर देखते हुए बोला ‘चीज थी जोरदार, जिस्म का एक-एक इंच किस कदर तराशा हुआ था.....’

‘क्या मतलब.....यानी तुम भी........।’ वीरेन्द्र को आश्चर्य हो रहा था।

‘यार आदमी तुम समझदार हो...’ इन्सपेक्टर ने कहा। और फिर दोनों जोरों से हँसते हुए अपने-अपने जबड़े फैलाते चले गए।

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

शौक


शौक



सत्येन्द्र झा

tension[7] वो नियमित समय से कार्यालय पहुँचते थे। सभी कार्य नियमानुकूल करते थे। हाकिम को उन्होंने कभी भी शिकायत का मौका नहीं दिया। लेकिन वही रमण बाबू जब घर पहुँचते थे तो पता नहीं उन्हें क्या हो जाता था...? पत्नी पर कड़क के बोलना... बच्चों से ऐसा व्यवहार मानो वे इनके आदेशपाल हों। उस पर से पचासों प्रश्न.... ! हमेशा तमतमाए हुए।
उस दिन रमण बाबू संयमित थे। अवसर जान पत्नी ने मधुर स्वर में पूछा, "आपको घर आते ही क्या हो जाता है? ऐसे खिसियाये हुए और खिन्न क्यूँ रहते हैं?”
रमण बाबू उस दिन सच में प्रसन्न थे। बोले, "असल में साहेब के साथ रहते-रहते मुझे भी कभी-कभी साहेब बनने का शौख चढ़ जाता है।" बोलते हुए रमण बाबू की मुख-मुद्रा फिर से तनावग्रस्त हो गयी थी।
(मूल कथा मैथिली में 'अहीं के कहै छी' में संकलित 'शौख' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित)

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

लघुकथा - प्रतिबिम्ब

लघुकथा

प्रतिबिम्ब

हरीश प्रकाश गुप्त

सहसा उसके कपोलों पर रंगत उभर आई। सन्तोष की सिहरन तन-बदन में भीतर तक उतरती चली गई। कल्पनाओं में खोई स्मृति की आँखें शब्द-सी व्यक्त करती चमक उठीं।

हाँ, अब कल्पना ही एकमात्र सहेली तो है जो हमेशा सुखद अनुभूति देने चली आती है। वर्ना, माँ तो बस हरदम शून्य में ही आँखें गड़ाए रहती है। उसकी हँसी को देखे हुए एक अर्सा होने को आ गया। बोलती है, पर शब्द उसके होठों से ही निकलते हैं। माँ को अपनी कोई चिन्ता नहीं है। चिन्ता खाए जा रही है तो बस स्मृति की। पिता की स्थिति थोड़ी भिन्न है। हर स्थिति-परिस्थिति का असंपृक्त भाव से संज्ञा शून्य समन्वय।

निलय की रौनक भाभी और बच्चे तक ही सीमित है। वह स्मृति से कभी बड़ा नहीं बन पाया। उम्र में डेढ़-एक साल उससे बड़ा जरूर है किन्तु स्मृति से अच्छा सेटिल न हो पाने की कुण्ठा उसे हमेशा स्मृति के पीछे ही खड़ा करती आई है। ऊपर से भाभी की सोच– तुम ही क्यों? अभी तो माँ-बाप जिन्दा हैं।“

पर, स्मृति ने भाई-बहनों के लिए कभी ऐसा नहीं सोचा। पहले निलय, अलीना फिर अलीशा की जिम्मेदारियाँ। अभी पिछले ही वर्ष उसने अलीशा का विवाह इन्दौर में किया है। अलीना तो और भी आगे मुम्बई में है। बहुत इच्छा थी कि अलीना हमेशा उसके नजदीक रहे। छोटी बहन हम उम्र सहेली की तरह भीतर जगह बनाए हुए थी। अब दूरी का खयाल आते ही काँच में रेख की तरह वेदना भर जाती है।

मिठाई भी खाएगी या......” कल्पना ने उसे अतीत से झकझोरकर वर्तमान में ला खड़ा किया। ........हमेशा बातें करते-करते यूँ ही जाने कहाँ खो जाती है ?”

हाँ-हाँ क्यों नहीं।“ फिर उसने प्रश्न के अधूरे उत्तर को पूरा किया। बस, यों ही कल्पना। बहुत हो गया। अब मैं अतीत की उलझी हुई रेखाओं के जाल से निकलना चाहती हूँ। अब मेरे आसपास बिखरे प्रतिबिम्ब ही मेरे अवलम्ब हैं और मैं अपने अन्दर पसरे खाली स्थान को उनसे भरना चाहती हूँ। इन प्रतिबिम्बों में ही मेरे सपने पूरे होते दिखाई देते हैं.........”

...........अरे हाँ, तुम्हारा बेटा अविरल मेरिट में आया है। सच, मुझे कितनी खुशी है, मैं कह नहीं सकती। उसे पार्टी तो मैं दूँगी। सुनो, जब वह आए तो तुम उससे ही पूछकर बताना कि आंटी उसे पार्टी देगी, कहाँ चलेगा ? ..........” कहते-कहते स्मृति अब अविरल में प्रतिबिम्ब खोज रही थी।

कल्पना के सामने कभी अपना, कभी अविरल का तो कभी स्मृति का, सबके चेहरे तेजी से घूम रहे थे।

 

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चित्र गूगल सर्च

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

लघुकथा -- दोष किसका..... ?

दोष किसका..... ?


लघुकथा -- सत्येन्द्र झा

युवावस्था में प्रेम-विवाह के आन्दोलनकारी समर्थक। प्रेम-विवाह किये। माँ-बाप से अनबन और घोर निराशा।

वक़्त-बेवक्त सास-ससुर से भी तल्खी। "प्रेम-विवाह का मतलब यह तो नहीं कि दामाद के हर अरमान में आग ही लगा दें।" तिलक-दहेज़ नहीं देना पड़ा... कम से कम 'अन्य आवश्यक सामग्री' के साथ ससम्मान विदाई तो करते।

वृद्धावस्था में प्रेम-विवाह के कट्टर विरोधी।

इच्छा के प्रतिकूल सामाजिक क्रांतिकारी पुत्र ने एक युवती का हाथ थाम लिया।  न पंडित न बारात, ना ही दहेज़। कोर्ट-मैरिज।

अब पुत्र से भी अनबन।

पहले से भी अधिक निराशा। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि दोष किसका था और गलती कहाँ हो गयी ?

(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहैं छी" में संकलित "तीन चित्र" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)चित्र : आभार गूगल सर्च