मंगलवार, 11 जनवरी 2011

भगवान कभी नहीं मरते हैं..!

भगवान कभी नहीं मरते हैं..!

-- सत्येन्द्र झा

बारह वर्षीय लड़की अचानक अपनी माँ से पूछ बैठी, "माँ... माँ.... ! भगवान कैसे होते हैं ?"

नख-शिख स्वर्णाभूषण से लदी माँ बोली, "भगवान.... उम्म्म्म.... अब मैं तुझे कैसे समझाऊं.... ? बेटी, भगवान वैसे ही होते हैं जैसे तुम्हारे पापा।" 

लड़की चुप हो गयी। उसके बाल मस्तिष्क में कोलाहल चल रहा था कि उसके पापा को तो सभी बेईमान कहते हैं... फिर वो भगवान कैसे ? उसी दिन तो वह पंडित काका के घर गयी थी सत्यनारायण कथा में। वहाँ भी तो दो महिलायें उसके पापा की बेईमानी का नया किस्सा बतिया रही थीं। उस ने अनदेखे में सब सुन लिया था।

कुछ देर चुप रहने के बाद वह फिर बोली, "माँ ! मगर पापा तो एक दिन मर जायेंगे.... मगर भगवान तो.... । "

माँ का शरीर किसी अप्रत्याशित भय से सिहर उठा था। बेटी को डांटते हुए बोली, "शुभ-शुभ बोलो.... भगवान कभी नहीं मरते हैं।"

लड़की फिर चुप हो गयी। उसके अंतर में भारी द्वन्द चल रहा था। सहसा आँखों के आगे दो तस्वीरें झिलमिला उठीं। एक दिव्य तस्वीर सस्त्राभूषनधारी भगवान की है और एक में उसके पापा हैं।  फिर दोनों तस्वीर मिल कर एक हो गए। लड़की की आँखें चौंधिया गयीं। वह उठकर चुप चाप अपनी कोठरी में चली गयी।  फिर कलम निकाल कर एक बड़े से पन्ने  पर लिखा, "बेईमान कभी नहीं मरते हैं।"

(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहै छी" में संकलित 'निर्णय' से हिंदी में केशव कर्णद्वारा अनुदित।)

33 टिप्‍पणियां:

  1. लड़की के बाल सुलभ मन में दो तरह के विचार स्थायी भाव के रूप में कार्य कर रहे थे।पापा के प्रति उसके मन के भाव मूर्त रूप ले चुके थे। शायद इस लिए लडकी ने लिखा था- बेईमान कभी नही मरते।

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  2. बेईमानी से ही अमरत्व भी हड़प लिया होगा बेईमानों ने।

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  3. मनुष्य मर जाता है लेकिन उसके सारभूत तत्व अक्षुण्ण रहते हैं। आत्मा अजर-अमर है। बेइमानी भी अब आधुनिक मनुष्य का सार-भूत हो गयी है। आत्मा में प्रवेश कर गयी है।

    बच्ची का लिखा आप्त-वचन हो गया।

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  4. सार भूत है कि बच्चों से वर्तालाप में अत्यन्त सावधानी रखनी चाहिये...उनके बालमन पर माता-पिता की बातों/कथनों/कलापों का गहरा असर होता है....गलत भी सही भी....आप क्या देना चाहते हैं.....

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  5. अच्छी कहानी | जब बेईमानी को ही हम भगवान मान लेंगे तो बेईमानी अमर तो हो ही जाएगी |

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  6. अच्छा कथ्य.... बाल मन का बहुत ही इमानदार चित्रण ! धन्यवाद !!

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  7. सत्यन्द्र झा जी की लघु कथाएं आज के समाज को प्रतिविम्बित करती हैं.. गूढ़ अर्थ लिए यह कथा बदलते मूल्यों की कथा है..

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  8. इस लघुकथा का end दिल को छूने वाला है.लेखक को बधाई और मनोज जी आपको इसे पढ़वाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.अगर वैसी कोई बच्ची हो तो आगे चल के बड़ी लेखिका बन सकती है.

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  9. ufff..........aise kisi ke dil pe koi baat ankit ki jati hai...:)

    kitni sahi baat aapne baal sulabh tarike se kah di..!

    aapko naman

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  10. बच्चे मन के सच्चे.निष्कपट.

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  11. बहुत सुन्दर कथा। बाल मन ऐसे ही सहज ढंग से ग्रहण करता है और प्रश्न करता है।

    आभार,

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  12. यथार्थ को यथावत चित्रित करती बहुत सुन्दर कथा।
    आभार

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  13. मर्मस्पर्शी लघुकथा। बाल मनोविज्ञान का सटीक चित्रण। यह कथा लघुकथा के मानकों पर उत्कृष्ट कथा कही जा सकती है।

    आभार

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  14. बाल मनोविज्ञान पर आधारित सदेशप्रद लघुकथा के लिए सत्येन्द्र जी को आभार,

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  15. बहुत सुंदर, इस बच्ची की तरह से भारत के सारे बच्चे बन जाये तो बेईमान जल्द ही मर जाये...
    लेकिन आज तो हम इस बेईमानी को भगवान से भी ज्यादा मानते हे तो मरे केसे?

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  16. सोचने पर मजबूर करती अच्छी लघुकथा ...बिमान कभी नहीं मरते ...रक्तबीज की तरह पैदा होते रहते हैं

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  17. एक उत्कृट कोटि की लघुकथा जो मन को हिला कर रख देती है।

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  18. छोटी सी बच्ची ने अपने छोटे से दिमाग का इस्तेमाल बिल्कुल सही और सच्ची बात लिख दी । एक अच्छी लघु कथा से परिचय कराने के लिए धन्यवाद ।

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  19. बहुत ही सुंदर कथा है। आप को इस के लिए बधाई!

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  20. ek balpan ke sachche man sahaj aawaj deti hui sunder laghu katha.........sunder prastuti.

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  21. Es laghu katha men aaj ke daur ki sachchaai chupi hai !
    Aaj ki sthiti dekh kar to yahi lagata hai jaise es dharati se beimaan kabhi khatm nahin honge !
    Es laghukatha ke liye lekhak aur prakashak dono dhanyawaad ke paatr hain !
    -Gyanchand Marmagya

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  22. sach mai bhagwan kabhi nhi marte

    achhi post
    ...
    kabhi yaha bhi aaye
    www.deepti09sharma.blogspot.com

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  23. bahut hi badiya katha. ladki ne ant me jo likha wo aaj ke yug me bahut hi sarthak hai.

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  24. कृत्रिमताओं के कारण कथा का मूल कथ्य कहीं दब गया है।

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  25. जेब्बाssssत!! इसको कहते हैं लघु कथा. ग़ज़ल के शेर का मज़ा देती है यह लघु कथा.. कृपया सत्येंद्र झा जी के विषय में कुछ लिखें!!

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  26. Satya hai saralta, sahjatta aur baalman kitna sukomal hota hai. vishv me kaii samsyaaye isi baal man ne suljhaya hai.

    .मुझे याद आ रहा है , गुरु Teg बहादुर चिंतामग्न थे . .पुत्र पास आया कोई प्रतिक्रिया नहीं ..पिता को पाता भी नहीं चला . पुत्र ने पूछा आप चिंतित क्यों है - 'मानवता और धर्म रक्षा के लिए किसी आत्मज्ञानी संत को बलिदान देना होगा उसी को तलाश रहा हूँ'.. पुत्र बोल उठा - 'आप से बढकर आत्मज्ञानी संत कौन है? फैसला हो गया. और तेगबहादुर ने स्वयं का चुनाव किया इस कार्य के लिए. वह १०-११ वर्ष का बालक कोई और नहीं गुरु गोबिंद सिंह जी थे. दोनों गुरुओं को नमन.

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