शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

शिव-स्वरोदय-27

शिव-स्वरोदय-27

आचार्य परशुराम राय

विषमस्योदयो यत्र मनसाऽपि चिन्तयेत्।

यात्रा हानिकरो तस्य मृत्युः क्लेशो न संशयः।।133।।

अन्वय - श्लोक अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय नहीं दिया जा रहा है।

भावार्थ - विषम स्वर के प्रवाह काल में यात्रा प्रारम्भ करने का विचार मन में उठने नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे यात्रा में कठिनाई तो आती ही है, हानि भी होती है। यहाँ तक कि मृत्यु भी हो सकती है।

English Translation- Here Visham Swar is nothing but Sushumna Nadi and therefore during the flow of breath through both the nostrils at a time, we should not think of starting any journey. Because it causes appearance great difficulties or losses or even death.

पुरो वामोर्ध्वतश्चन्द्रो दक्षाधः पृष्ठतो रविः।

पूर्णा रिक्ताविवेकोSयं ज्ञातव्यो देशिकैः सदा।।134।।

अन्वय- यह श्लोक भी लगभग अन्वित क्रम में है।

भावार्थ- यदि चन्द्र स्वर प्रवाहित हो रहा हो और कोई सामने से आए, बायें से आए अथवा ऊपर से या सामने, बायें या ऊपर की ओर विराजमान हो, तो समझना चाहिए कि उससे आपका काम पूरा होगा। इसी प्रकार जब सूर्य नाड़ी प्रवाहित हो रहा हो, तो नीचे, पीछे अथवा दाहिने से आनेवाला या उक्त दिशाओं में विराजमान व्यक्ति आपको शुभ संदेश देगा या आपका काम पूरा करेगा। किन्तु यदि स्थितियाँ इनके विपरीत हों, तो देशिकों (आध्यात्मिक गुरुजनों) को समझना चाहिए कि वह काल बिलकुल रिक्त और अविवेकपूर्ण है, अर्थात कार्य में सफलता के लिए उचित समय नहीं है।

English Translation- During the flow of breath through left nostril if a person is coming from the left side, front or upside or he is sitting on the left, in the front or upside of you, communication with him will be always beneficial. In case of flow of breath through right nostril, the above directions should be considered as right, back and below side in place of left, front and upside. But in opposite conditions wises are suggested to consider the time not suitable for success.

ऊर्ध्ववामाग्रतो दूतो ज्ञेयो वामपथि स्थितः।

पृष्ठे दक्षे तथाSधस्तात्सूर्यवाहागतः शुभः।।135।।

अन्वय- (चन्द्रस्वरप्रवाहे) वामपथि ऊर्ध्ववामाग्रतः तथा (एव) सूर्यवाहे दक्षे पृष्ठे अधस्तात् स्थितः आगतः (वा) दूतः शुभः ज्ञेयः।

भावार्थ- पिछले श्लोक की ही भाँति इस श्लोक में भी वे ही बातें दूत के बारे में कही गयी हैं, अर्थात चन्द्र स्वर के प्रवाह काल में यदि कोई दूत बायें, ऊपर या सामने से आए अथवा सूर्य-स्वर के प्रवाह-काल में यदि वह दाहिने, नीचे या पीछे से आए तो समझना चाहिए कि वह कोई शुभ समाचार लाया है। ऐसा न हो तो विपरीत परिणाम समझना चाहिए।

English Translation- Like previous verse, a messenger coming from left side, front or upside during the flow of breath throw left nostril gives good news. Similarly, during the flow of right nostril breath messenger coming from right side, back or below gives good message. If it is opposite, the result will be bad.

अनादिर्विषमः सन्धिर्निराहारो निराकुलः।

परे सूक्ष्मे विलीयते सा संध्या सद्भिरुच्यते।।136।।

अन्वय- श्लोक अन्वित क्रम में है।

भावार्थ- जब इडा और पिंगला स्वर एक-दूसरे में लय हो जाते हैं, तो वह समय बड़ा ही भीषण होता है। अर्थात् सुषुम्ना स्वर का प्रवाह-काल बड़ा ही विषम होता है। क्योंकि सुषुम्ना को निराहार और स्थिर माना गया है। वह सूक्ष्म तत्त्व में लय हो जाती है जिसे सज्जन लोग संध्या कहते हैं।

English Translation- When breath alternates from left to right and vice-versa that period is most inauspicious for any work (other than spiritual practices) because it is Sushumna and it is unmovable and it accepts nothing. It is absorbed by subtle Tattva and wises call it Sandhya, the transition period.

न वेदं वेद इत्याहुर्वेदो वेदो न विद्यते।

परमात्मा वेद्यते येन स वेदो वेद उच्यते।।137।।

अन्वय- वेदं न वेद इति आहुः वेदो न वेदः विद्यते, (अपितु) परमात्मा येन विद्यते स वेदो वेद उच्यते।

भावार्थ- ज्ञानी लोग कहते हैं कि वेद स्वयं वेद नहीं होते, बल्कि ईश्वर का ज्ञान जिससे होता है उसे वेद कहते हैं, अर्थात जब साधक समाधि में प्रवेश कर परम चेतना से युक्त होता है उस अवस्था को वेद कहते हैं।

English Translation- Wise men tell that Veda itself is not Veda (Knowledge), but it is that by which enlightenment is achieved, i.e. union of individual consciousness and Cosmic consciousness.

न संध्या संधिरित्याहुः संध्या संधिर्निगद्यते।

विषमः संधिगः प्राण स संधिजः संधिरुच्यते।।138।।

अन्वय- (रात्रिदिवसयोः) संधिः इति न संध्या आहुः, (इयं) संन्धिः (सामान्यरूपेण)

सन्ध्या निगद्यते, (अपितु) सः विषमः सन्धिगः सन्धिजः प्राणः सन्धिः

उच्यते।

भावार्थ – दिन और रात का मिलन संध्या नहीं है, यह तो मात्र एक बाह्य प्रक्रिया है। वास्तविक संध्या तो सुषुम्ना नाड़ी में स्वर के प्रवाह को कहते हैं।

English Translation- Union of day and night is not the real evening, it is a mere phenomenon of nature. The real evening is flow of Sushumna, i.e. flow of breath through both the nostrils simultaneously.

8 टिप्‍पणियां:

  1. स्वरोदय विज्ञान बहुत लाभकारी है। यह शास्त्र जन जन-जन तक पहुँचाकर आप जन हित के लिए उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। आपको आभार।

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  2. आद. आचार्य जी,

    शिव स्वरोदय का यह अंक भी विशेष जानकारियों का खज़ाना है !

    ऐसे दुर्लभ ज्ञान से ब्लॉग जगत को समृद्ध करने के लिए आपका किन शब्दों में धन्यवाद करूँ ,समझ में नहीं आता !

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. लुप्त हो रही इस अमूल्य विद्या से परिचित करवा कर आप ब्लॉग जगत का निश्चय ही बड़ा उपकार कर रहे हैं. धन्यवाद !

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  5. अत्यंत लाभदायक एवं जानकारीयुक्त पोस्ट ।

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  6. आचार्य जी! यह उपकारी विद्या आपके लेखों के माध्यम सए पुनर्जीवित हो रही है!!

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