मंगलवार, 18 जनवरी 2011

देसिल बयना - 64 : सांच को आंच क्या

देसिल बयना - 64 : सांच को आंच क्या


-- करण समस्तीपुरी

अरे बाप रे बाप........ ई शीतलहरी तो जान मुआ देगा रे दद्दा... ! पंद्रह दिन होय गया गोसाईं को उगे। गुरूजी पढाए रहे अनेक शबद एक शबद.... 'जौन जनानी सुरुज को नहीं देखी हो -- असूर्यपश्या'। ई तो पूरा परदेसे पन्द्रहिया से 'असूरुजपश्य' है।

हाथ-पैर ठण्ड से ठुआ के लोह हो गया है। बतीसो दांत चौबीसों घंटे खंजरी के तरह बजते रहता है.... हाड़-पांजर तक हिल गया है। ससुर हुक्का पानी पर भी आफत है। कोई निकले भी तो कहाँ... मियाँ के दौर मस्जिद तक... रजाई से निकलो तो घूड़ा तर.... !

उ तो कहिये कि घूड़े-धुंआ के बल पर जान बचा हुआ है। खैर हमरे रेवाखंड का विशेषता भी है घूड़ा। ख़ास कर अखारा पर वाला घूड़ा तो इलाका-फेमस है। माझकोठी का बच्चा से लेके बूढा तक वहीं डेरा दिए रहता है। अखारा पर के सुखाई भगत खूब हैं भी। इएह अजोध लकड़ी का धुनी जोर देते हैं। धुइयाँ और कुहासा दुन्नु मिल कर एक हो जाता है। बीच में धधरा को घेरे चारु तरफ से टोलबैय्या (टोला का आदमी) सब।

अखारा पर के घूड़ा का महात्तम्मे अलग है। अजोध्याजी और जनकपुर के महात्मा लोग भर माघ अखारे पर सत्संग करते थे। उ के घूड़ा का परभावो बहुत था। कौनो रोगी दुखी हो अखारा पर के घूड़ा का भषम लगा दीजिये मिनिट में टनटना जाएगा। उ घूड़ा का एगो और खासियत था अगर आपके मन में कौनो मिथ्या-इर्ष्य, छल-कपट है तो आ उ का आंच बर्दाश्त नहीं कर सकते थे।
सुखाई भगत किस्सा सुना रहे थे कि पेठिया गाछी वाला बटुकलाल खानदानी चोर था। ससुर उ चोरी को कहता था हाथ का सफाई। आपके आँख से डिम्मा गायब कर दे और आपको पता न चले और अगर पता चलियो गया तो का मजाल कि आप उसे ढूंढ़ निकालें.... ! हरि बोल।

माघे महिना में ससुरा का मति मारा गया। का किहिस कि बौधू महंथ का सबा सेर घी पता नहीं कहाँ घुसा लिया। रसोई के टाइम पर बेचारा भंडारी जब घी खोजे तो ले बलैय्या के.... आँख बंद डिम्मा गायब। नजर के मटक में घी का कनस्तर खाली।

पूरा अखारा पर गुल-गुल-गुल-गुल होने लगा। घी कौन लिया.... ई लिया कि उ लिया.... मगर पता कैसे चले... ? सुखाई भगत के गुरु थे मोदकानंद महाराज। उ कहिन अरे घबराओ मत तुरत पता चल जाएगा कि घी किसने लिया है... ? उ जगह भंडारी, सेबक, सुखाई और बटुकलाल.... यही चार लोग थे। आखिर घी तो यही में से कौनो लिया होगा। हम किसी पर दोष नहीं लगाते हैं। मगर परीक्षा होगा सबका तो अपने पता चल जाएगा।
"बाप रे बाप..... ई ठंडी में सब का देह चेक करियेगा का.... ? इससे अच्छा भंडारी से काहे नहीं पूछ लेते हैं...... उ तो रसोई द्वार पर किसी को ठेकने भी नहीं देता है।" बटुकलाल सिकपिका कर बोला था। महाराजजी घूड़े तर से बोले, "नहीं हो ! परीक्षा की विधि है न.... ! चलिए आप सब एक एक कर इहाँ आईये।"
महाराजजी आगे कहे थे, "चारो आदमी सच बोल रहे हैं न। अगर झूठ बोलते हैं तो बता दीजिये नहीं तो हम देह-वस्त्र क्या चेक करेंगे.....ई ब्रहम घूड़ा का आंच सब कुछ बता देगा।" और लोग तो बस सुन रहे थे मगर बटुकलाल उछाल कर बोला, "हाँ भाई ! सांच को आंच का.... ? कौनो हम झूठ थोड़े बोल रहे हैं। जैसे चाहिए वैसे चेक कर लीजिये।"

मोदकानंदजी दो-चार तेलगर लक्कर डाल दीये घूड़ा पर। तुरत आंच उठने लगा। चारो जने एक-एक कर आये। दुइये मिनिट में सबका मिजाज खनखना जाता था। सेबकराम तो पूछा भी था, "परीक्षा हो गयी गुरूजी.... ? आंच बहुत तेज है बर्दाश्त नहीं हो रहा।"
मोदकानान्दजी बोले, "अरे भाई सांच को आंच क्या.... ? दुई मिनिट खड़े रहो। चोर का पता तुरुत चल जाएगा।" इस तरह से सेवकराम के बाद नंबर आ गया बटुक लाल का। बेचारा आना-कानी करने लगा तो महाराजजी बोले, "अरे आप घबरा काहे रहे हैं... देखा नहीं.... उ दोनों सच बोल रहा था तो घूड़ा का आंच का बिगाड़ लिया उसका.... आ जाइए आपकी भी परीक्षा हो जाए।"

बटुकलाल तमक कर बोला, "हाँ-हाँ, पता कीजिये न..... ! हमहू इन्तिजारे कर रहे हैं.... आग बताता है चोर का पता.... उन दोनों के बारे में बताया नहीं... ? दो मिनट भी नहीं गया कि आंच में कुछ छन-छन का आवाज उठा। गुरूजी ध्यान से देखे.... फिर हंस कर बोले, "बटुकजी.... जरा नीचे देखिये.... आपकी सच्चाई बह रही है।"

हा.... हा..... हा.... हा..... हा....हा..... ! आहि रे तोरी के.... ई तो सच में बटुक लाल की सच्चाई बही जा रही थी। बेचारा गुरूजी को कर जोर लिया, "छमा करिए प्रभु ! बहुत गलती हो गयी। जाड़ा महिना का जमा हुआ कठगर घी देख कर लोभ हो गया था। गमछी में बांध कर मिर्जई के नीचे छुपा लिए और ऊपर से चादर ओढ़ लिए। ऊपर-झापर से देखते भी तो पता नहीं चलता।"

मोदकनान्दजी बोले, "हाँ ! इहे लिए तो हम आंच जला दिए। जौन सांच होगा उको आंच का बिगार लेगा .... ? और जौन घी हुआ तो अपने पिघल के निकल जाएगा। तो समझे न.... सांच के लिए आंच नहीं होता है मगर झूठ को तुरत बाहर कर देता है।"

"हाँ गुरुजी ! सब बूझ गए। सत्य को कोई भी आलोचना या परीक्षा दबा नहीं सकती और असत्य को बचा नहीं सकती। मतलब कि गड़बड़ करेंगे तब आलोचना या विरोध का डर होगा। सही हैं तो डर काहे का.... !
कहते हैं कि उसी दिन से दू गो बात हुआ, एक तो अखारा पर का घूड़ा देवगुनिया हो गया। जौन कोई चोरी-चालाकी करे तो उका इन्साफ वही होने लगा.... ससुरा डर के मारे कोई अखारा पर के घूड़ा तर झूठ बोलता ही नहीं था। और दूसरा ई कहावत परचलित हो गया, "सांच को आंच क्या ?"

16 टिप्‍पणियां:

  1. सत्य को कोई भी आलोचना या परीक्षा दबा नहीं सकती और असत्य को बचा नहीं सकती। मतलब कि गड़बड़ करेंगे तब आलोचना या विरोध का डर होगा। सही हैं तो डर काहे का....
    --
    बहुत ही प्रेरक पोस्ट रही आज की!

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  2. देसिल बयना का यह अंक बहुत अच्छा लगा।

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  3. करन जी,
    आपकी लेखनी का जवाब नहीं !
    शब्द विन्यास भावों को पूरी प्रखरता से मुखरित करते हैं !
    सचमुच, सांच को आंच क्या !
    मेरी बधाई स्वीकार करें !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  4. Ram Ram Karan Ji...Waise to apka desil bayna ka jawab ni hota..lakn e bar ka desil bayna mai thoda kami lag raha hai..
    ek bar pahile bhi kahe the ajo kah dete hai ki ab Saching Tedulkar kabi kabi acha na khele to b wo Sachin Tendulkar he rahega na....
    Waise Kahwat ko khub samjhaya hai apne...SAANCH KO AANCH KYA...

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  5. ई हुआ न बात...

    आंच सच झूठ को एक मिनट में बहा के बाहर कर दिया...

    कहावत चरितार्थ करती खूब सुन्नर मनभावन कथा...
    WAAAHHH

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  6. इसको कहते हैं देसिल बयना.. कमाल करते हैं आप करन बाबू... ईगो सिकायत लगले करिये देते हैं.. अगिला बार से जब बुध केरोज लिखियेगा तउसके साथे ईहो लिख दीजियेगा कि इसमें साँस लेने का जगह कहाँ कहाँ पर है..
    अब एतना उमर में कबड्डी कबड्डी करके साँस रोककर हमसे पढ़ल नहीं जाता है! समझे ना!!

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  7. क्या बात है करण जी। कहाँ कहाँ से खोज के लाते हो यह सब। बहुत सुन्दर।

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  8. देसिल बयना नित नए सोपानों को स्पर्श कर रहा है।

    बधाई

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  9. करण जी जो अपने होते हैं, वो झूठी तारीफ़ नहीं करते। ज़रा रचना जी की बात पर ध्यान दीजिएगा। बाक़ी मिथिलांचल की जो तस्वीर आपने खींची है, वह तो दृश्य साक्षात्‌ कर ही रहे हैं।

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  10. करन जी आप किसी दिन दिल्ली छोड़वा दीजियेगा... दिल्ली के इस सर्दी में घूड की याद दिला दिया.. मन कर रहा है कि यही घूड जोड़ लें.. नबका आलू पका लें... और बिना मूह हाथ धोये शुरू हो जाएँ.. मिथिलांचल का जो दिरिश्य आप उपस्थित कर रहे हैं.. वो मैथिलि में भी नहीं हो रहा है इन्दिओं.. 'हरिमोहन झा की याद दिला रही है आपकी देसिल बयाना... कभी खट्टर काका पर लिखिए.. उनका अनुवाद कीजिये... नोत दे रहे हैं लिखने के लिए... पूरे हिंदी जगत में वैसा व्यंग्यकार कम ही मिलेगा... जरा बता दीजिये हिंदी साहित्य को..

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  11. @ अरुणजी,
    बहुत-बहुत धन्यवाद. आपने मेरी सोयी अभिलाषा को जगा दिया है. सच में हरिमोहन झा से बड़ा हुमरिस्ट को आज तक मैं ने नहीं पढ़ा और मैं भाग्यशाली हूँ इस अर्थ में कि मैं ने उनकी तमाम रचनाएँ पढी हुई है. वे उद्भट विद्वान् थे. दर्शनशास्त्र के अद्वितीय ज्ञाता. हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू, बंगला और ओडिया भाषाओं पर उनका समान अधिकार था. दर्शन के अतिरिक्त आध्यात्म, नीति-शास्त्र, इतिहास, साहित्य, ज्योतिष आदि क्षेत्रों में भी उनका लोहा मन जाता था. बस आपने इच्छा प्रकट कर हम पर बड़ा उपकार किया है. बस अब इस ब्लॉग व्यवस्थापक से आज्ञा लेकर मैं इस दिशा में कार्य शुरू कर दूंगा. धन्यवाद.

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  12. @ करण जी
    आज्ञा!!!
    कमाल करते हो!!
    शुभस्य शीघ्रम्‌।

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