रविवार, 2 जनवरी 2011

भारतीय काव्यशास्त्र-49 :: रस सिद्धांत

भारतीय काव्यशास्त्र-49 :: रस सिद्धांत

आचार्य परशुराम राय

पिछले दो अंकों में विभिन्न आचार्यों द्वारा प्रतिपादित रस-निष्पत्ति से सम्बन्धित चार सिद्धांतों- उत्पत्तिवाद, अनुमितिवाद, भुक्तिवाद और अभिव्यक्तिवाद पर चर्चा की जा चुकी है। कुछ नाट्यशास्त्र के आचार्यों ने रस सिद्धांत पर अपने बड़े ही मौलिक और सूक्ष्म विचार प्रतिपादित किया है। इनमें प्रमुख हैं आचार्य धनंजय और उनके अनुयायी। इनके मत में रसानुभूति के समय चित्त की चार अवस्थाएँ पायी जाती हैं- विकास, विस्तार, विक्षोभ और विक्षेप। चित्त की ये चार अवस्थाएँ क्रमशः शृंगार, वीर, बीभत्स और रौद्र में पायी जाती हैं। ये ही अवस्थाएँ शेष चार रसों में भी होती हैं-

विकासविस्तरक्षोभविक्षेपैः स चतुर्विधः।।

शृंगारवीरबीभत्सरौद्रेषु मनसः क्रमात्।

हास्याद्भुतभयोत्कर्षणकरुणानां त एव हि।।

(आचार्य धनंजय कृत दशरूपक से)

आचार्य धनंजय के अनुसार शृंगार रस से हास्य, रौद्र से करुण, वीर रस से अद्भुत रस और बीभत्स से भयानक रस की उत्पत्ति होती है। अतएव वे चार मुख्य रसों की ही अवधारणा मानते हैं-

अतस्तज्जन्यता तेषामत एवावधारणम्।।

शृङ्गाराद्धि भवेद्धास्यो रौद्राच्च करुणो रसः।

वीराच्चैवाद्भुतोत्पत्तिर्बीभत्साच्च भयानकः।।

काव्यशास्त्र में जिन्हें हम स्थायिभाव के नाम से जानते हैँ, उन्हें आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में मन की मूल प्रवृत्तियों से सम्बद्ध मनःसंवेग कहा जाता है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैगडूगल मन की 14 मूल प्रवृत्तियाँ मानते हैं और उनसे जुड़े 14 मनःसंवेग। इनके अनुसार मन की मूल प्रवृत्तियाँ निम्नलिखित हैं-

पलायन और आत्मरक्षा, युयुत्सा, निवृत्ति अथवा वैराग्य, शरणागति, कामवृत्ति, कौतूहल या जिज्ञासा, आमोद, आत्मदीनता, स्वाभिमान, पुत्रैषणा, भोजनान्वेषण की प्रवृत्ति, संग्रह की प्रवृत्ति, सामूहिकता की प्रवृत्ति और रचनात्मक प्रवृत्ति।

इसी प्रकार इनसे जुड़े भय, क्रोध, घृणा, करुणा या, काम, आश्चर्य, हास, दैन्य, आत्मगौरव, उत्साह, वात्सल्य आदि मनःसंवेग हैं।

भारतीय आचार्यों ने प्राचीन भारतीय मनोविज्ञान के सिद्धांत के अनुसार नौ मनःसंवेगों को मौलिक मनःसंवेग माना और उसी के आधार पर काव्यशास्त्र में नौ स्थायिभावों के सिद्धांत को लेकर नौ रसों की स्थापना किया, जिनकी चर्चा हम पहले कर चुके हैं।

रसों का अलौकिकत्व

अभिनवगुप्त आदि आचार्यों ने रस को अलौकिक कहा है। इसका अर्थ है कि रस लौकिक वस्तुओं से भिन्न है। संसार में पायी जानेवाली अनित्य वस्तुओं को दो रूप माने गए हैं- कार्य और ज्ञाप्य। किसी कारण से बने पदार्थ कार्य कहलाते हैं और किसी साधन से जब इन कार्य-रूप पदार्थों का ज्ञान होता है तो वे ही ज्ञाप्य कहलाते हैं। उदाहरण के लिए यदि हम घड़ा को कार्य कहें, तो दीपक के द्वारा उसका ज्ञान होने से घड़ा ज्ञाप्य कहलायेगा। अर्थात हर अनित्य पदार्थ के कार्य और ज्ञाप्य  दो रूप होते हैं और अपने निमित्त के नाश होने के बाद भी उनका अस्तित्व बना रह सकता है। जैसे घड़े का निमित्त अर्थात घड़े को बनानेवाले कुम्हार की मृत्यु के बाद भी घड़े का अस्तित्व हो सकता है। इसी प्रकार यदि हम रस को कार्य मान लें तो उसके निमित्त-कारण विभावादि होंगे। पर विभावादि के नाश अर्थात समाप्त हो जाने पर रस की प्रतीति नहीं होती है। अतएव रस न तो कार्य कहा जा सकता है और न ही ज्ञाप्य। इस लिए यह लौकिक नहीं हो सकता। इस आधार पर रस को अलौकिक कहा गया है।

रस की अलौकिकता के लिए दूसरा तर्क यह दिया गया है कि रस का हेतु न कारक हेतु है और न ही ज्ञापक। क्योंकि इस विश्व में दो प्रकार के कारण होते हैं- कारक और ज्ञापक। जबकि रस न तो कार्य है और न तो ज्ञाप्य है, जैसा कि हम ऊपर चर्चा कर चुके हैं। इस परिस्थिति में रस के कारक और ज्ञापक हेतु भी नहीं हो सकते। अतएव रस अलौकिक है।

तीसरा तर्क यह दिया गया है कि सांसारिक पदार्थों के ज्ञान के दो रूप बताए गए हैं- सविकल्पक ज्ञान और निर्विकल्पक ज्ञान। सविकल्प ज्ञान में पदार्थ के स्वरूप के अतिरिक्त उसके नाम, जाति आदि का भी ज्ञान होता है, जैसे- घड़ा, कपड़ा, जल आदि। ये शब्द-व्यवहार के विषय हैं। लेकिन रसानुभूति स्वसंवेदन-रूप होती है, शब्द-व्यवहार का विषय नहीं। निर्विकल्पक ज्ञान में वस्तु के केवल स्वरूप का ज्ञान होता है, उसके नाम, जाति आदि का नहीं। इसके लिए बालक, गूँगे आदि का उदाहरण दिया गया है- बालमूकादिविज्ञानसदृशं निर्वकल्पकम्, अर्थात जो बच्चा या गूँगा है तथा उन्हें या जिन लोगों को यदि किसी वस्तु का ज्ञान नहीं है, तो उन्हें केवल उसके स्वरूप का ज्ञान होता है पर उसके नाम, जाति आदि का नहीं। अतएव उनका यह ज्ञान निर्विकल्पक ज्ञान कहलाता है। लेकिन जैसे ही उसके स्वरूप के साथ नाम, जाति आदि का ज्ञान हो जाता है, वह सविकल्पक ज्ञान हो जाता है और तब निर्विकल्पक ज्ञान का स्वरूप अनुभव-जन्य नहीं रह जाता। जबकि रसानुभूति में विभादि की प्रतीति भी होती है। इसलिए समूहालम्बनात्मक- ज्ञान न तो निर्विकल्पक ज्ञान हो सकता है और न ही सविकल्पक। इसलिए रस अलौकिक होता है।

अगल अंक में रसों के क्रम, लक्षण आदि पर चर्चा की जाएगी।

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपका यह पोस्ट एक विद्यार्थी के रूप में पढ़ता हूं। य़ह मेरे लिए पुनरावृति का कार्य कर रहा है। आशा है -आप इसकी निरंतरता बनाए रखेगे। ज्ञानपरक पोस्ट।
    नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाए।

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  2. काव्यशास्त्र की बेहतरीन जानकारी अक्सर आपके ब्लॉग पर मिल जाती है.आपका श्रम प्रशंसनीय है

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  3. काश हम इस अद्‌भुत ज्ञान को धारण करने की योग्यता रखते...!

    अबसे प्रारंभ करें तो कितना जान पाएंगे?

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  4. ग्यानवर्द्धक पोस्ट। धन्यवाद। आपको सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें।

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  5. आचार्य जी जितना आपकी शृंखला को पढ‌ता हूँ उतना ही अपनी अज्ञानता का बोध होता है... और तब ऐसा प्रतीत होता है मानो आपकी कक्षा में बैठकर कृष्णपट निहार रहा हूँ और आप पढा रहे हैं.
    नववर्ष आपसे और भी बहुत कुछ सीखने का अवसर प्रदान करेगा!

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  6. आपकी अति उत्तम रचना कल के साप्ताहिक चर्चा मंच पर सुशोभित हो रही है । कल (3-1-20211) के चर्चा मंच पर आकर अपने विचारों से अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.uchcharan.com

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  7. नए वर्ष की आपको भी बधाई।
    गरम जेब हो और मुंह में मिठाई॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  8. काव्यशास्त्र की बेहतरीन जानकारी.

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  9. वन्दना जी, इस अंक को चर्चामंच पर लेने के लिए आपको हार्दिक धन्यवाद।

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  10. उत्साह-वर्द्धन के लिए पाठकों को हार्दिक धन्यवाद। नव-वर्ष 2011 पर आप सभी लोगों को हृदय से बधाई।

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  11. आप को ओर आप के परिवार को इस नये वर्ष की शुभकामनाऎं
    बहुत गहरी बाते लिखी आप ने अपने लेख मे, गराहण करने योग्या धन्यवाद

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  12. आचार्य जी,
    नमस्कार !

    कल की कक्षा मैं आज कर रहा हूँ. देर हो गयी. माफ़ कर दीजियेगा. वैसे उठक-बैठक कर ली है मैंने.

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  13. महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के ब्लॉग हिन्दी विश्‍व पर राजकिशोर के ३१ डिसेंबर के 'एक सार्थक दिन' शीर्षक के एक पोस्ट से ऐसा लगता है कि प्रीति सागर की छीनाल सस्कृति के तहत दलाली का ठेका राजकिशोर ने ही ले लिया है !बहुत ही स्तरहीन , घटिया और बाजारू स्तर की पोस्ट की भाषा देखिए ..."पुरुष और स्त्रियाँ खूब सज-धज कर आए थे- मानो यहां स्वयंवर प्रतियोगिता होने वाली ..."यह किसी अंतरराष्ट्रीय स्तर के विश्‍वविद्यालय के औपचारिक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग ना होकर किसी छीनाल संस्कृति के तहत चलाए जाने वाले कोठे की भाषा लगती है ! क्या राजकिशोर की माँ भी जब सज कर किसी कार्यक्रम में जाती हैं तो किसी स्वयंवर के लिए राजकिशोर का कोई नया बाप खोजने के लिए जाती हैं !

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