शनिवार, 15 जनवरी 2011

फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (दूसरा भाग)

फ़ुरसत में …
आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ
193मनोज कुमार, करण समस्तीपुरी

दूसरा भाग : कुत्तों के साथ रहते हैं जानकीवल्लभ शास्त्री!

पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!

नहीं भूले कर्पूरी को  064

आचार्य जी बहुत कुछ भूलने लगे हैं। अचानक उन्हें ख़्याल आया कि जिससे बात कर रहा हूं उसके बारे में तो पूछा ही नहीं, तो बोले, “कहां से आए हो तुम लोग?”

करण ने बताया ‘बंगलुरु से।’

मैंने कहा, ‘कोलकाता से।’

फिर मेरी पत्नी की ओर देखते हुए पूछे, ‘ये कौन है?’ मैंने बताया, ‘मेरी पत्नी है, और ये मेरे बच्चे।’

पता नहीं आचार्य जी ने हमारा उत्तर सुना-समझा या नहीं लेकिन एक संक्षिप्त मौन के बाद फिर पूछ बैठे,"आपलोग रहने वाले कहाँ के हैं... ?” जब हमने बताया कि समस्तीपुर से आए हैं तो एकदम से उनकी स्मृति ताजा हो गयी। बोलने लगे, ‘‘हां, गया हूं वहां। बहुत पहले। कवि सम्मेलन में हमें दो-चार बार जाना पड़ा है। वो एक नेता थे, बाद में चीफ़ मिनिस्टर भी हुए ..।’’

उनका नाम भूलने लगे तो हमने बताया कि ‘वो कर्पूरी ठाकुर थे।’ तो उन्हें याद आया और बोले, ‘‘हां, कर्पूरी ठाकुर। जैसे आप बैठे हैं वैसे हमारे घर में बैठते थे। बहुत अच्छे इंसान थे। मुझे बहुत मानते थे। मुझे सबसे ज़्यादा मानने वालों में से एक थे। ये मेरा सौभाग्य है। उन्हीं के समय में मैं प्रोफ़ेसर भी पटना यूनिवर्सिटी का बना था। उनका बेटा भी उन्हीं की तरह मानता है। आते हैं तो बैठना, उठना, खाना, पीना चलता है। कर्पूरी ठाकुर के समय में कई बार गया समस्तीपुर। दो मंजिले पर रहते थे वो। वहीं मुझे ठहराया जाता था। काव्यपाठ किया है मैंने वहां।”

किसने बांसूरी बजाई करके उस जमाने में एक गीत गाता था मैं। इस गीत को जब उन्होंने मेरे गले से सुना तो गला पसंद आ गया उनको। गला ही काट लिया मेरा। ज़िन्दगी भर के लिए उन्हीं का हो के रह गया मैं।

आचार्यजी बहुत कुछ भूल रहे थे किन्तु बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री का सखावत स्नेह उन्हें सहज ही स्मरण आ रहा था। आगे कहते हैं, "उन्होंने केवल एक, मेरी एक कविता सुनी, enchanted (मोहित) हो गए, भक्त हो गए वो। किसने बांसूरी बजाई करके उस जमाने में एक गीत गाता था मैं। इस गीत को जब उन्होंने मेरे गले से सुना तो गला पसंद आ गया उनको। गला ही काट लिया मेरा। ज़िन्दगी भर के लिए उन्हीं का हो के रह गया मैं। उन्होंने ही मुझको प्रोफ़ेसर बनाया पटना में। जो कुछ काम किया वहीं किया। बताइए कहां मैं ब्राह्मण और कहां वो ठाकुर। किसी के यहां खा-पी नहीं सकता था मैं। उसको निभाते हुए इतना माना। मैं कोई महापुरुष नहीं था। पर उनके साथ रहकर इतना जाना कि कवि की भी इज़्ज़त होती है। कर्पूरी जी सारी ज़िन्दगी मुझे काफ़ी मान-सम्मान देते रहे।’’

अचानक उन्हें याद आता है कि अभी तक बहू नहीं आई है। पूछते हैं, ‘‘वाइफ़ नहीं जगी?’’ फिर से आवाज़ देते हैं, ‘‘अरे बहू को बुलाओ। सोयी हैं क्या।’’ उनके दो सेवकों में से एक ने कहा ‘हां,’ तो बोले, ‘‘जगाओ उन्हें, कितनी दूर से आए हैं ये लोग। बुलाओ।’’ फिर हमसे मुखातिब होकर बोले, “वैसे आनंद तो सोए रहने में ही है।”

फिर बताने लगे, ‘‘बहू, मेरी पत्नी। पिताजी उन्हें बहू कहते थे। सब कहने लगे। मैं भी कहने लगा। अच्छा है ना बहू संबोधन!’’ फिर बताने लगे, ‘‘१२ मास बीमार रहने वाली पत्नी हैं। बारह मास बीमार! इसीलिए पड़ी रहती हैं। इलाज होता है, पर बीमार रह रही हैं। मैं अकेला शख्स हूं। सब ईश्वर की मर्ज़ी, जो वह चाहता है अच्छा ही चाहता है.., भला या बुरा कुछ भी आपके साथ हो रहा है, उस पर आपकी क्या मर्जी.. कुछ है मर्जी..?’’

तभी किसी ने बताया कि जग गई हैं। हमारी श्रीमती जी सामने वाले कमरे में उनकी पत्नी के पास चलीं गई।

पैतृक निवास स्थल और पिता

अपने पैतृक निवास स्थल के बारे में बताते हुए कहते हैं, “गया से भी ४० मील आगे एक गांव है मैगरा, फिर उसे समझाते हुए उसका अंगरेज़ी में स्पेलिंग भी बताते हैं, एम ए आई जी आर ए, Maigra, शायद पुरातन काल में यह मायाग्राम रहा हो, और समय के साथ मैगरा बन गया हो। गौतम बुद्ध वाली जगह से हूं।”

‘‘मां को मैंने कभी नहीं जाना’’ थोड़े दुखी और द्रवित स्वर में बोले, ‘‘मेरी मां बचपन में ही मुझे छोड़ कर चली गई।’’ ... थोड़ी देर चुप रहकर शायद उन दिनों को याद करने लगे। फिर बोले, ‘‘घर में लकड़ी नहीं थी, उन दिनों लकड़ी पर भोजन पकता था। पिताजी कहीं जा रहे थे, मां ने उनसे कहा, किसी को बोल दो लकड़ी दे जाएगा। नहीं तो भोजन नहीं बन पाएगा। क्रोध से पिताजी ने कहा कि सामने जो लकड़ी है उसी को जला लो। वह लकड़ी पूजा में प्रयोग के लिए किसी चीज़ की थी। काफ़ी क़ीमती। .... दूसरे दिन मां को सांप ने काटा। मां चली गई। ५ वर्ष का रहा होऊंगा मैं।’’

1916 में गया के मैगरा ग्राम में माघ द्वितीया को शास्त्री जी का जन्म हुआ था।

कई मिनट ख़ामोशी में बीता। लगा अंदर के दर्द उभर आए थे। जब सामान्य हुए तो कहने लगे, ‘‘मेरे पिताजी महापुरुष थे। मेरे पिता इतने बहादुर निकले कि लोगों के लाख कहने और समझाने पर भी उन्होंने दूसरी शादी नहीं की। किसके लिए? मेरे लिए। लड़के के लिए। अखंड मंडलाकार रह गए। पूजनीय थे। चले गए पिताजी, मैंने पिता का मंदिर बनवा लिया। वो देखो सामने। ये मंदिर मैंने अपने पिता की याद में बनवाया है। मैं कभी मंदिर में नहीं गया और न ही किसी देवता को पूजा। मेरे भगवान मेरे पिता हैं। उन्‍होंने कभी मेरा नाम नहीं लिया। बस एक ही बार बोले, तब चलें जानकी वल्लभ? और चल पड़े!’'059

073065हमने देखा। ठीक उसी बरामदे के सामने, एक मंदिर, उसमें पिता की मूर्ति और उस मंदिर की बाहरी दीवार पर लिखा था, ‘पितृ देव स्मृतिस्तम्भ’। शास्त्री जी कह रहे थे, ‘‘दुनिया में ऐसा पिता कहां मिलता है! सबसे बड़ी बात है कि यूं कहने के लिए पिता होते हैं, वो नहीं थे, बक़ायदा पिता थे! बहुत बड़े विद्वान थे। छोटी उम्र में मां चली गई। मेरा जीवन चौपट हो गया था। मातृविहीन बालक था मैं। किसी के कहने पर शादी के लिए तैयार नहीं थे। किसी काम के लिए तैयार नहीं थे। सब काम मेरा गड़बड़ा गया। उन्होंने मां की भूमिका भी निभाई। मेरे लिए मेरे पिता ही मां थे और बाप भी। जब मैं मुज़फ़्फ़रपुर आ गया तो उनको भी अपने पास ले आया। ये घर देख रहे हैं न आप, कोई पागल ही इतना बड़ा घर बनाएगा। मैं पाग़ल था और मैंने इतना बड़ा घर बनाया।’’

पहली बार मुज़फ़्फ़रपुर

हमने पूछा, ’पहली बार मुज़फ़्फ़रपुर आपको कौन सा आकर्षण ले आया?’

हमारे इस प्रश्न पर शास्त्री जी का कहना था – ‘‘कोई आकर्षण नहीं । केवल दुर्भाग्य । दुर्भाग्य के अलावा कुछ भी नहीं! मेरा किसी जन्म का दुर्भाग्य था !’’

हम समझे नहीं तो हमारे चेहरे पर अपनी नज़र गड़ाकर बोले, ‘‘गंगा के इधर कभी नहीं आया था मैं। पटना नहीं देखा था। गया ज़िला के बाहर ही बहुत कम निकला था। देखने के लिए कि गंगा के यहां क्या होगा चलना चाहिए। उस वक़्त परीक्षा दे चुका था। रिज़ल्ट निकलने वाला था। तो मैंने सोचा कि घूम-फिर कर देख आऊं क्या है? पटना आया .. तो वह जो एक घाट है ....’’ फिर भूलने लगे। तो उन्हें बताया .. ‘महेन्द्रू घाट।’

‘‘हां, और उसके उस पार ... पहलेजाघाट था। गंगा के इस पार। कभी आया नहीं था। गंगा के किनारे आया तो कुछ लड़के थे। नदी में खेल कर रहे थे। बोले उस पार जाना है। मैंने कहा नहीं, भय लगता है। बोले कुछ नहीं होगा। पार करा दूंगा। उन्होंने पार करा दिया। चला आया उनके साथ।’’

 

कैसे बना ‘निराला निकेतन’089

करण ने उनसे पूछा, ‘कवि बच्चन यहां आए थे? सुना है कि बच्चन की एक रचना का सृजन  यहीं से शुरू हुआ था।’

बताया उन्हों ने ‘‘बच्चन भी कई बार यहां आए। दो-तीन बार आए बच्चन। शादी ब्याह सब में आए वे। न जाने क्यों इतना मानते थे?’’ फिर खुद ही बताने लगे, ‘‘जितने अच्छे-अच्छे कवि थे उस जमाने में, सब गिन लीजिए। बुरा न मानिए ... पढने में मैं अच्छा माना जाता था, गाता था। लिखता था। उस जमाने में जितने कवि सम्मेलन होते थे, जिसमें बड़े-बड़े सारे कवि आते थे, सब में मुझे बुलाया जाता था कविता पाठ करने के लिए। बच्चन जी के साथ भी.. कविता पढी।’’

हमने बात को आगे बढाने के उद्देश्य से पूछा, ‘इस घर का नाम ‘निराला निकेतन’ क्यों रखा?’

हम आज तक यही सोचते रहे कि यह घर शायद कवि निराला से प्रभावित होकर यह नाम रखा है। जब उनसे पूछा ‘आपने इसका नाम निराला निकेतन कैसे रखा?’

तो उन्होंने बताया, ‘‘Its different!’’

हम ठीक से समझे नहीं तो उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘Dfferent के अर्थ में है। ... मेरी तरह का लोग सबसे अलग। अब देखिए न एक दर्जन भर तो गउएं हैं यहां। इसके अलावा अन्य पशु-पक्षी सब! जितने में आपलोग पूरा परिवार खाइएगा-पिइएगा, उतने में हमारे यहां कुत्ते-बिल्ले सब खाते हैं। ये सब हैं हमारे परिवार के सदस्य। मैं सब से अलग हूं। निराला। ये जो कोई सुनेगा तो गाली देगा हमको। बदमाश कहेगा। कोई अच्छा थोड़े न कहेगा! इसीलिए ऐसा नाम रख लिया हमने। निराला! Different के अर्थ में।’’

आगे बताते हुए कहते हैं, ‘‘मेरा किसी के यहां न आना, न जाना, न खाना होता है। कोई अगर यह कहता है कि शास्त्री हमारे यहां आया, तो समझ लेना कि वह झूठा है, और अगर यह कहे कि मेरे यहां खाया, तब तो महा झूठा। इस तरह का जीवन रहा मेरा। Different होने के कारण निराला निकेतन हो गया। निराला जो कवि थे, उन्हींने बचपन में मेरा साथ दिया। और मेरे यहां आना-जाना सब किया था। लेकिन उस निराला के अर्थ में मैंने नहीं नाम रखा था। नाम मैंने Different के अर्थ में रखा था। उनका नाम भी हो गया, यह संयोग है।’’

069... आवेश था उनके चेहरे पर। थोड़ी देर रुके और संयमित स्वर में बोले ... “कवि जो निराला थे – उन्होंने यहां आना-जाना किया है। पर यह घर उस निराला के अर्थ में नहीं है। मेरी कविता पढ़कर निराला मुझसे मिलने आए। निराला का स्‍नेह मिलता रहा मुझे। निराला बड़े कवि थे। मैं उनका प्रिय पात्र था। मोहल्ले भर के आवारा कुत्ते यहां आते हैं। उन्हें दूध रोटी देता हूं। मैं तो कुत्ते बिल्लियों के साथ रहने वाला आदमी हूँ … कह दीजिएगा लोगों से खाली कुत्तों के साथ रहता है जानकीवल्लभ शास्त्री!”

हम ने सोचा हम से अधिक सौभाग्यशाली तो सच में निराला निकेतन के कुत्ते ही हैं जिन्हें इस महामानव का सानिध्य तो मिल रहा है।

64 टिप्‍पणियां:

  1. आचार्य जानकीवल्ल्भ शास्त्री जी के साथ आपका बिताया हुआ समय हम सब के लिए एक अमूल्य निधि के रूप में चिर-संचित रहेगा।जितना भी जान पाया,शायद इन सबका पुस्तकों में मिलना संभव नही है।यह जानकारी उनके बारे में कुछ विशेष ज्ञान से परिचित करा गयी।आपका श्रम सार्थक सिद्ध हुआ।
    बहुत ही रोचक पोस्ट।सादर।।

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  2. बहुत अच्छा लेख - हार्दिक शुभकामनायें !

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  3. @ प्रेम सरोवर जी,
    सही कह रहे हैं आप, इनका पुस्तकों में मिलना संभव नहीं। जो व्यक्ति बहुत कम लोगों से बात करता हो वह हमारे साथ इतना खुल कर इतनी देर तक बात करता रहा यह भी हमारे लिए कम आश्चर्य की बात नहीं थी। और उससे भी बड़ी बात यह थी कि जब हम चलने के लिए उठे तो हमसे ज़्यादा वो दुखी दिख रहे थी, कि कुछ देर और बैठते।

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  4. मेरा बचपन गया जिले के शेरघाटी में बिता है ...मैं शास्त्री के पैत्रिक गाँव मैगरा गया हूँ ..
    "उपर -उपर पि जाते है ..जो पिने वाले है "..उनकी रचना मैंने पढ़ी थी //
    आज उनका गाँव ..नाक्साली का गड़ माना जाता है /
    शास्त्री जी चरण स्पर्श .

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  5. ओह! बब्बन जी, बहुत-बहुत धन्यवाद!

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  6. परम श्रद्धेय आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी से आपकी बातचीत का दूसरा भाग पढ़ा. उनके पिता जी का उनके प्रति और उनका उनके पिताजी के प्रति समर्पण भाव अपने आप में एक मिसाल है.पिता जी की मूर्ती भगवान स्वरुप एक मंदिर बनवाकर उसमें रखना, संस्कारों के मामले में बिगडती हुई नई पीढ़ी को, सोचने पर विवश करेगा ऐसा मैं समझता हूँ. मैं ऐसे महापुरुष के दर्शन तो नहीं कर पा रहा हूँ,पर उनके बारे में ,उनकी जीवनशैली तथा सादगी के बारे में पढ़ना भी बड़ा ही सुखद है.उनके श्रेष्ठ कवि कर्म से तो हम सब वाकिफ़ हैं ही. आपका आभार.

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  7. @ कुंवर जी, बहुत सही कहा आपने कि उनकी जीवन शैली अनुकरणीय और प्रेरक है।

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  8. बहुत अच्छा लगा पढ़कर..आचार्य जानकीवल्ल्भ शास्त्री जी के बारे मे जानकर.

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  9. आचार्य जानकीवल्ल्भ शास्त्री जी के जीवन से बहुत कुछ सीखने को मिला है. इतनी सादगी देख मन आभारित हो गया. पिता को इतना सम्मान आज के पीढ़ी के लिये एक आदर्श है. सुंदर प्रस्तुति................

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  10. आपका परिश्रम प्रशंसा योग्य है , आभारी आपका प्रेरणा स्त्रोत से रुबरु करवानें के लिए ।

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  11. ... behad khoobsoorat lekhan ... prabhaavashaalee va prasanshaneey post !!

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  12. निराला निराला थे, और जानकीवल्लभ जी भी निराला ही हैं! भगवान उन्हें और आयु दें और आप एक बार उनसे और मिल कर उनका हाल चाल दे सकें।
    बहुत सुन्दर।

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  13. महामानव ही कहा जायेगा। अभी तक उदारता समेटे जीवन के अध्यायों की, यादों में विचरण, सौम्यता असीम। पढ़कर हृदय पढ़ लिया।

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  14. ऐसा विशाल-हृदय व्यक्ति ही क्षेष्ठ साहित्य रच सकता है क्योंकि जिन जीवन-मूल्यों के लिए उसने कभी समझौता नहीं किया उन्हीं ने उसे श्रेष्ठ मानव बनाया है !

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  15. वल्लभ शास्त्री जी से आपकी बातचीत का दूसरा भाग पढ़ा. उनके पिता जी का उनके प्रति और उनका उनके पिताजी के प्रति समर्पण भाव अपने आप में एक मिसाल है आपका परिश्रम प्रशंसा योग्य है

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  16. आचार्य जानकीवल्ल्भ शास्त्री जी के जीवन के बारे मे जानकर बहुत अच्छा लगा………………आभार्।

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  17. jameen se jude logo ki pyari pahchaan....hai na its different..!!

    dhanyawad aapka...Shashtri jee se ru-ba-ru karane ke liye...:)

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  18. उनसे भेंट की यह दूसरी किस्‍त पढ़ी। बहुत मार्मिक है। पोस्‍ट की आखिरी फोटो भी उतनी ही मार्मिक है। आप सही कह रहे हैं,पता नहीं आपने ध्‍यान दिया है या नहीं, आखिरी फोटो में शास्‍त्री जी के पीछे बिस्‍तर पर उनका एक कुत्‍ता भी नजर आ रहा है। उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है।
    *

    उन जैसे बिरले ही होंगे जिन्‍होंने अपने पिता का ही मंदिर बनवाकर उसी को अपना आराध्‍य मान लिया। सच ही तो है जिन्‍होंने जन्‍म दिया और मां-पिता की तरह पाला उनसे बड़ा पालनहार कौन होगा।
    *

    आपसे अनुरोध है कि शास्‍त्री जी के साहित्यिक अवदान के बारे में भी यहां विस्‍तार से बताएं। उनकी कविताएं तथा गीत भी हमें पढ़वाएं।

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  19. @ रजेश जी
    आपने सही पकड़ा। बहुत सूक्ष्म दृष्टि रखते हैं आप। वह कुत्ता ही है। हमारे पास उस समय का विडिओ भी है। किसी अंक में हम विडिओ भी लगाएंगे।

    एक अंक साहित्यिक योगदान पर भी रहेगा।

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  20. प्रिय मनोज जी
    आपने जो प्रस्तुत क्या है वह एक धरोहर है. बहुत पहले जब मैं दसवीं मे था तो शाश्तरी जी की कविता पढ़ी थी. " कुपथ कुपथ जो रथ दौड़ाता, पथ निर्देशक वह है. लाज लाजती जिसे देख धृति उपदेशक वह है" इसी कविता का अंश है " ऊपर ऊपर पी जाते हैं जो पीने वाले हैं" मैं मुजफ्फरपुर मे ३ साल तक रहा हूँ .बचपन में. वहीं से फिर पढ़ने नेटरहात चला गया था. हम लोग का सरकारी घर चक्कर मैदान के पास था. तब बहुत गर्व होता था की जानकी वल्लभ जी बिहार के कवि हैं. हिन्दी की किताब साहित्या सरिता मे उनकी रचना पढ़ाई जाती थी. तब ऐसा लगता था की वा हर कवि जिनकी रचना हम पढ़ते हैं वो काल कलवित हू चुके होंगे. निश्चय ही यह ग़लत था. खेद है की वहाँ रह कर भी उनसे मिल नहीं पाया.
    आपके लेख ने इतना कुच्छ उनके बारे मे बताया जो न्यत्रा कहीं भी उपलब्ध नही हो गी.
    उत्साही जी की पारखी नज़रों का कायल हो गया. हैरान हून की कैसे उन्होने देख लिया.
    आपके वीडियो का इंतेज़ार रहेगा
    राकेश

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  21. आदरणीय मनोज कुमार जी आपका आभारी हूँ । आपके इस प्रयास से आचार्य जानकी वल्लभ जी के बारे मेँ और गहराई से जानने के लिए मिला । सचमुच महामानव ही है आचार्य जी । प्रेरणदायी महामानव ।

    "आईँ थी जब सामने मेरे तुम.............गजल"

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  22. कविता से इतर,जिस व्यक्ति के जीवन में भी काव्य-धारा प्रवाहित होने लगे,उस की सन्निधि सौभाग्य से ही प्राप्त होती है।

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  23. वरिष्ठ रचनाकार से परिचित करने के लिए धन्यवाद.उनके दीर्घायुष्य की कामना करते हैं.

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  24. आपके माध्यम से आचार्य जानकीवल्लभजी शास्त्रीजी को समझने का सुअवसर मिला । वाकई में निराले हैं वे.

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  25. मनोज जी, आपके बहाने आज जानकीवल्‍लभ जी के बारे में काफी अंतरंग बातें पता चलीं। आभार ही व्‍यक्‍त कर सकता हूँ।

    ---------
    डा0 अरविंद मिश्र: एक व्‍यक्ति, एक आंदोलन।
    एक फोन और सारी समस्‍याओं से मुक्ति।

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  26. इतने वरिष्ठ साहित्यकार से मिलना ...सचमुच जीवन भर याद रखने वाला अनुभव है.
    बहुत ही आत्मीय बातचीत लगी. जानकीवल्लभ जी का इस उम्र में भी अपनी माँ को याद करके विगलित हो जाना बहुत मार्मिक लगा. और पिता कि याद में सचमुच एक मंदिर बनवा देना...अद्भुत है सचमुच.
    शुक्रिया इतनी बढ़िया मुलाकात का विवरण पढवाने का.
    BTW फोटो में आपके साथ कौन हैं???...भाभी जी?..परिचय तो लिखना था

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  27. जानकीवल्लभ शास्त्री जी के बारे में ये दुर्लभ जानकारी, सहित्य की धरोहर है, इसमें कोई शक नहीं। आभार आपका इस प्रस्तुति के लिए।

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  28. आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ आपका सक्षात्कार एक कालजयी पोस्ट है!
    --
    आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के जीवन के वारे में दुर्लभ जानकारी दी है आपने!
    चित्रों ने तो प्रामाणिकता सिद्ध कर दी है!

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  29. मर्केटिंग के ज़माने में जिन कवि, लेखकों को राजनैतिक प्रश्रय मिला वे प्रसिद्धि के शिखर पर पहुँचे और श्रेष्ठ मान लिये गये.. जो निराला थे वे उपेक्षित रहे... किंतु शास्त्री जी जैसे लोग और उनका साहित्य ऐसे प्रश्रय का मोहताज नहीं..
    आपने इनके जीवन के जिनजिन पहलुओं को छुआ है वे सदा ही सर्वथा अनछुए रहे...
    मन भर आया पढकर!!

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  30. कला साधना कुंद छुरी से दिल को रेते जाना
    अतल आंसुओं के सागर में सपने खेते जाना
    ये इसी महाकवि की ही लाईने हैं -पद्म श्री को लात मारने वाले इस अजीम शख्सियत को नमन
    आपने यह बहुत अच्छा किया -बहुत बहुत आभार !

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  31. असली साहित्य वह नहीं है जो व्यक्ति रचता है। असली साहित्य है वह जीवन जो व्यक्ति जीता है।

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  32. मनोज जी,
    यद्यपि बहुत व्यस्त था मैं, तथापि आपके ब्लॉग पर आ गया हूँ!

    सार्थक हो गया आना...यह साक्षात्कार एक दुर्लभ दस्तावेज बन जाएगा! सहेजे रखिएगा!

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  33. मनोज जी इस कालजयी पोस्ट के लिए आभार ..... आचार्यजी के बारे में यह जानकारी सहेजने के योग्य है...... बहुत बहुत धन्यवाद .....

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  34. मनोज जी आपके ये संस्मरण साहित्य की अनमोल निधि हैं.पढते पढते सांस लेने का भी मन नहीं करता.निराला निकेतन के शास्त्री जी सचमुच निराला हैं.
    बहुत शुक्रिया इस निराले व्यक्तित्व और महान कवि से मिलाने का.

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  35. आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी से मिलना तो आपका हुआ लेकिन आपने संस्मरण को इतने सहज रूप में प्रस्तुत किया है कि हम सबके सामने सजीव हो उठा है। आपका आभार

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  36. बहुत ही प्रेरक संस्मरण है। आपका श्रम हम सबके लिए सुफल हुआ। आपको साधुवाद,

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  37. in mahaan vibhuti se milwane ke liye bahut bahut aabhaar ..lekh itani rochakta se likha gaya hai ki pura padhte huye laga jaise ham bhi aapke saath hi shastri ji se mil rahe hain ...

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  38. मनोज जी यह आलेख उन लोगों को पढना अधिक जरुरी है जो हिंदी ब्लॉग में सार्थक साहित्य कर्म हो रहा है को मानने से इनकार कर रहे हैं... यह आलेख उन तथाकथित साहित्य के ठेकेदारों और राज्य के राजभाषा और साहित्य विभाग के पड़ पर बैठे अफसरों को पढना अधिक जरुरी है... यह आलेख उन सभी लघु-पत्रिकाओं के स्वयंभू समप्दकों के लिए भी उतना ही जरुरी है.. जहाँ तक मैं ने पढ़ा या सुना है.. शास्त्री जी के जीवन पर इस से उत्तम वृत्त नहीं पढ़ा.. शायद वे इतना बात भी नहीं करते.. सुना है कि निराला निकेतन चतुर्भुज स्थान (रेड लाईट एरिया) के बीच या निकट है.. और ना जाने इस विषय पर भी कितनी रिपोर्टें छापी थे उन दिनों जब शास्त्री जी यहाँ अंतिम तौर पर रहने आये थे... आपका यह आलेख एक दस्तावेज है कि हिंदी के कवि की सामाजिक, साहित्यिक और सरकारी तौर पर कितनी उपेक्षा हो सकती है... आपको और करन को बहुत बहुत शुभकामना...

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  39. आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्रीजी का निराला नित्केतन और वे स्वयं वाकई निराले हैं ...उनका पशु पक्षी प्रेम भी निराला ही है ..
    एक अविस्मर्णीय मुलाकात के साक्षी रहे हम लोग आपके शब्दों के माध्यम से ...!
    ईश्वर उन्हें स्वस्थ रखे !

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  40. They are from different world and are made of different stuff.

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  41. सभी प्रकार के प्रलोभनों से दूर मुजफ्फरपुर के रामबाग के एकांत में आकर बसनेवाले महाकवि परम आदरणीय जानकी बल्लभ शास्त्री जी को पाकर न केवल यह शहर,यह प्रदेश बल्कि समूचा देश गौरवान्वित हुआ है.उनका जीवों से प्रेम ,उनकी पितृ-भक्ति आज एक मार्गदर्शी प्रकाशपुंज है, एक आधुनिक मानदंड है न केवल साहित्य के लिए बल्कि आज के सिमटते संबंधों के लिए भी.उनका व्यक्तित्व अद्भुत तो है ही,अविस्मरणीय भी है.आपके आलेख ने हमें उनके इतने करीब ला दिया है जितना हम उनके घर के पास रहकर भी नहीं जा पाए. यह आलेख मेरी नजर में शास्त्री जी के बारे में एक अनोखा दस्तावेज है.

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  42. अच्छा संस्मरण। वाकई निराले हैं जानकी वल्लभ शास्त्री जी जैसे लोग। उनके स्वास्थ्य के लिये मंगलकामनायें।

    उनकी कविता किसने बांसूरी बजाई पोस्ट करिये अगर संभव हो!

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  43. दूसरी बार पढ़ा हूँ . औत्सुक्य और बार भी पढ़ायेगा !
    क्या खूब बोले होंगे आचार्य जी , मैं तो इन चित्रों को बोलते हुए अनुभव कर रहा हूँ !
    आप से ईर्ष्या हो रही है , ईर्ष्या जिसमें प्रेरणा ही प्रेरणा है , क्यों न करूँ ईर्ष्या आपसे !
    जहां मनुष्येतर जीव भी समादृत हैं , निश्चय ही वह सदन निराला है , कितनी अखंड कवि दृष्टि है यह , जीती भी तदनुसार !
    पितृ से सम्बंधित अनुच्छेद जाने किस लोक में लिए गए , सोच रहा हूँ कि वह समय विशिष्ट था या संयोग , कितनी चारूत्व पूर्ण थी दुनिया , सोच सोचकर संवेदनाएं द्रवीभूत होने लगती हैं !
    .
    ब्लागरी जो कभी कर न सका , निजी अक्षमता ही कहूँ , क्यों किसी को दोष दूँ - पर काम्य सदैव रही , उसे आपके सौजन्य से पाते हुए अपार हर्ष होता है ! आपकी जीवटता बनी रहे , ऐसी अत्यल्प और सार्थक पोस्टें ऐसा वातावरण बना दें जहां श्रेष्ठता संस्कार का हिस्सा बनने लगे ! भूरि भूरि बधाई इन प्रविष्टियों के लिए ! आचार्य जी के स्वास्थ्य के लिए अनेकानेक मंगलकामनाएं !

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  44. जानकीवल्लभ जी से परिचय नहीं था ,आपने इतने निराले ढंग से कराया,इतनी सुंदर पोस्ट के लिये बहुत बहुत धन्यवाद !

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  45. कही बार इस पोस्ट को पढ़ते पढ़ते मन किसी दूसरी दिशा में सोचने लगता है ... इतने बड़े साहित्यकार की सहजता देख कर मन भर आता है ... आपने सही कहा है की .......... हम से अधिक सौभाग्यशाली तो सच में निराला निकेतन के कुत्ते ही हैं...

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  46. आभार...ह्रदय से आभार आपका इस महान विभूति से साक्षात्कार करवाने के लिए...

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  47. ब्लॉग पर इस तरह की प्रस्तुति देखकर आत्मिक संतोष होता है, कि गुरुवर के बारे में इतनी सारी बातें, इतने सारे अनुभव, सचमुच कालजयी है आपके दोनों पोस्ट !
    इसके लिए आप प्रशंसनीय ही नहीं श्रद्धेय भी हैं, आपका आभार !

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  48. परम आदरणीय जानकी बल्लभ शास्त्री जी का परिचय पा कर बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद।

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  49. सादर प्रणाम !
    आचार्य जानकीवल्ल्भ शास्त्री जी के साथ आपका बिताया हुआ समय हम सब के लिए एक अमूल्य निधि के रूप में चिर-संचित रहेगा।जितना भी जान पाया,शायद इन सबका पुस्तकों में मिलना संभव नही है।यह जानकारी उनके बारे में कुछ विशेष ज्ञान से परिचित करा गयी।आपका श्रम सार्थक सिद्ध हुआ। सादर

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  50. वाह, वाह, वाह !!! मन गद-गद हो गया आपके इस तलाश-ओ-तलब से। सच कहूं, तो आज तक कोई भी शास्त्री जी के इतने नजदीक तक नहीं ले जा सका था। आपने एक जरूरी यात्रा की, शास्त्री-सागर में मोती खोजा और हमें उपलब्ध कराया। यह साहित्य का अन्वेषण है। साहित्य का शोध और संधान है। भाव-भावना और मर्म के आसपास जीने वाले लोगों को और चाहिए भी क्या ?
    "... कह दीजियेगा लोगों से खाली कुत्तों के साथ रहता है जानकीवल्लभ शास्त्री ।'
    अभार
    रंजीत

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  51. श्रद्धेय आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी से आपकी बातचीत का दूसरा भाग पढ़ा. मैं ऐसे महापुरुष के दर्शन तो नहीं कर पा रहा हूँ,पर उनके बारे में पढ़ना भी बड़ा ही सुखद है. आपका आभार.

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  52. परम आदरणीय शास्त्रीजी के साथ आपकी यह भेंट वार्ता सचमुच अनूठी रही ! पढ़ कर आनंद आ गया ! मेरी बधाई एवं शुभकामनाएं स्वीकार करें !

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  53. आचार्य जानकीवल्ल्भ शास्त्री जी के बारे मे अच्छी जानकारी.आभार

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  54. ऐसे रत्न कहाँ कहाँ बिखरे पड़े हैं और सच्चे अर्थों में जो मानव हैं. स्वार्थ वश तो सभी मानव सम्मान कर लेते हैं लेकिन गाय, कुत्ते , बिल्ली जैसे मूक प्राणियों के साथ सहकार आज जैसे युग में तो बिरले ही मिलेंगे. एक प्रेरणादायक जीवन. ऐसे मानुष तो वन्दनीय हैं और उससे अधिक आप जो आपने कम से कम एक महाकवि और महामानव के विषय में इतना कुछ लाकर हमें थमा दिया.

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  55. Janki vallabh shastri ji par saaree
    samagree bade manoyog se padh gayaa
    hoon main . Door videsh mein rahtaa
    hoon jab mahakaviyon par kuchh
    aatmik padhne ko miltaa hai to mun
    khil - khil jaataa hai . Aapka
    sansmaran sahejne waalaa hai .
    Aapkee lekhni mein dam hai . Ab to
    net par aapkee saree likhee
    saamagree padhnee padegee . Shubh
    kamnaayen.

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  56. जानकी बल्लभ शास्त्री जी से मिल कर और उनके बारे में जान कर बहुत अच्छा लगा ...

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  57. श्रद्धेय आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी से आपके ब्लॉग पर फिर से मिला.
    पढ़कर आँखे नाम है, और बहुत कुछ सोचने को मजबूर हो गया. अगर जिंदगी की सचाई को समझना हो तो बुजुर्गों के पास बैठना चाहिए.
    मैंने स्कूल के दिनों में उनकी सिर्फ कविताएं पढ़ी थी.
    यह पोस्ट आपके मेहनत से संग्रहणीय बन पड़ा है. ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ.

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  58. बहुत सुन्दर मनोज भाई.. मै जब डी आई जी के रूप में २००८ में मुजफ्फरपुर में था तब अक्सर शास्त्री जी से मिलता था...हिंदी साहित्य के व्यवसाइयों ने हिंदी की जो दशा की है कि शास्त्री जी जैसे विराट काव्य पुरुष तथाकथित साहित्य समाज में अप्रासंगिक जैसे हो गए हैं .. मगर आज हिन्दी साहित्यकार होने का दावा करनेवाला कोई भी व्यक्ति उनकी लेखनी की उदात्तता का स्पर्श भी नहीं कर सकता ..

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  59. आप सौभाग्यशाली हैं और मैं अपने को दुर्भाग्यशाली मानता हूँ इस बिनाह पर कि आप समस्तीपुर से आचार्य जी से मिलने आगये और मैं मुजफ्फरपुर का होकर भी कभी उनसे नहीं मिल पाया ! वाकई आपकी किस्मत पर रश्क कर रहा हूँ ! मगर आपकी पोस्ट को पढ़ कर सुखद अनुभूति हो रही है ! इस बार अगर घर गया तो ज़रूर मिलूँगा उनसे !

    अर्श

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  60. पूरी सीरीज बहुत अच्छी है आपने शास्त्री जी से परिचय कराया उनके जीवन से बहुत से लोगो को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।

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  61. “कवि जो निराला थे – उन्होंने यहां आना-जाना किया है। पर यह घर उस निराला के अर्थ में नहीं है। मेरी कविता पढ़कर निराला मुझसे मिलने आए। निराला का स्‍नेह मिलता रहा मुझे। निराला बड़े कवि थे। मैं उनका प्रिय पात्र था। मोहल्ले भर के आवारा कुत्ते यहां आते हैं। उन्हें दूध रोटी देता हूं। मैं तो कुत्ते बिल्लियों के साथ रहने वाला आदमी हूँ … कह दीजिएगा लोगों से खाली कुत्तों के साथ रहता है जानकीवल्लभ शास्त्री!” ... ..सच में सच्चे ह्रदय वाला इंसान ही बेबाक होता है ......
    ...शास्त्री जी के बारे में जानकार दुःख होता है कि समय के साथ एक नेक इंसान किस तरह गुमनाम जिंदगी जीने को विवस हो जाता है... न जाने ऐसे कितने सचे साहित्यकार समय के साथ भुला दिया जाते है ...
    सार्थक और चिंतनशील प्रस्तुति के लिए आपका बहुत बहुत आभार ..

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  62. दिव्य-व्यक्तित्व से मिलना, और उस मुलाक़ात को इतनी खूबसूरती के साथ सब के साथ बांटना, आभारी हूं. सजीव चित्रों के माध्यम से आपकी मुलाकात
    महसूस भी कर पा रही हूं. अभी पहला भाग पढना शेष हैं. आज ही पढती हूं.

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