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शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (पांचवां भाग) उद्दाम जिजीविषा

पांचवां भाग

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ

193मनोज कुमार, करण समस्तीपुरी

चौथा भाग :: निराला निकेतन : निराला जीवन : निराला परिचय

तीसरा भाग :: निराला निकेतन और निराला ही जीवन

दूसरा भाग : कुत्तों के साथ रहते हैं जानकीवल्लभ शास्त्री!

पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!

उद्दाम जिजीविषा069 

079शास्त्री जी का व्यक्तित्व भी उनके कृतित्व की तरह विराट है । उम्र का असर उनकी स्मृति पर है किन्तु वाणी पर विल्कुल नहीं। स्मृति और विस्मृति के बीच उनकी खनकती आवाज़ असीम आत्मीयता का अनुभव दे

ता है। हमने उनके घर को देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो बोले, “इस घर में प्रायवेसी नाम की चीज़ है ही नहीं। जहां तक आपकी दृष्टि जाए, सब आपका है। घूमिए-फिरिए। यह तो बाहर का लौंडा है ... बाहर से यहां आया था, यहीं का होकर रह गया। इतनी बड़ी जगह, एक एकड़, में एक आदमी रहता है। यह देखने वाली चीज़ है।”
 

शास्त्री जी की छाया

071

सबसे पहले हम पहुंचे सामने के कमरे में जिसमें शास्त्री जी की पत्नी, श्रीमती छाया देवी थीं। हमारी श्रीमती जी पहले से ही उनके साथ घुल-मिल गईं थीं। उन्होंने पूछा, “आपके बाल बच्‍चे …?”

छाया देवी ने  कुछ जवाब नहीं दिया, सिर्फ ना में सिर हिलाए।

आगे उन्होंने जानना चाहा, “घर का काम-धाम ..?”

छाया देवी बताती हैं, “बाई हैं। आती है सुबह नाश्‍ता बना देती है। दोपहर में आकर खाना बना देती है। मुझे नहला भी देती है। मुझसे कुछ नहीं होता। हाथ काम नहीं करता। लाचार हूँ।”
श्रीमती जी ने पूछा, “किसी से दिखाई नहीं?”
तो बताने लगीं, “दिखाई थी। दिल्‍ली में। सर गंगा राम हॉस्‍पीटल में। यहां पर इनके भाई की बहू को छोड़कर गई थी शास्‍त्री जी की देखभाल के लिए। वहां डाक्‍टर बोला रहकर ईलाज करवाना होगा। पर कैसे रहते? यहां जिसे छोड़ा था वह घबरा गई, उसने फोन कर दिया। चली आई। शास्‍त्री जी को किसके ऊपर छोड़ूं। उन्‍हें भी तो देखना पड़ता है।” वो वस्तुतः शास्त्री जी की छाया हैं। इतने स्‍नेह से पूरित दम्‍पत्ति जो एक दूसरे की चिंता में घुला जा रहा है।
छठ पर्व है। .. और बाई के द्वारा घर का कई काम होता है। पर बाई को भी छठ पर्व करना है। बताती हैं, आज तो खरना है। वह तो आकर दिन में ही रात के लिए सब्‍जी बना गई है। रात में प्रसाद भेज देगी तो खा लेंगे। पर कल वह छठ करेगी। कल कैसे काम चलेगा इसकी परेशानी है।”
उनकी पत्नी से भी आशीष लेने का मन हुआ। तब तक तो मेरी श्रीमती जी उनसे बातें कर ही रहीं थी। हम जब गए तो उनके चरण छूए। आशीष देते बोलीं, “आप भी लिखते हैं?”

072मैंने कहा, “बस ऐसे ही, थोड़ा बहुत। शौकिया।” बोलीं, “आप अपनी रचना दीजिए। हम बेला में छापेंगे। बेला शास्त्री जी की पत्रिका रही है। खुद संपादन करते थे। अब नहीं कर पाते। मैंने भी बहुत दिनों तक किया। अब अस्वस्थ रहती हूं। तो अब इसका काम किसी और को दे दिया है। शास्त्री जी के जन्म दिन पर इसका वार्षिकांक आएगा। उसी में आपकी रचना छापूंगी। दे दीजिएगा।”

हमने पूछा कि कब है शास्त्री जी का जन्म दिन तो उन्होंने बताया, “माघ शुक्ल द्वितिया को। इसबार ४ फ़रवरी को पड़ेगा। उस दिन बहुत सारे कार्यक्रम होते हैं। प्रतिवर्ष। पूजा, हवन, सांस्कृतिक कार्यक्रम दिन में .. फिर रात में कवि सम्मेलन। दूसरे दिन सुबह तक चलता है, यानी सूर्योदय से सूर्योदय तक।” फोन नम्बर भी दिया उन्होंने, 0621-2286466, बोलीं, “इस पर कार्यक्रम की जानकारी ले लीजिएगा, और ज़रूर आइएगा।”
हमारी श्रीमती जी को शास्त्री जी की पत्नी बताती हैं, “इनकी साहित्य साधना ग़ज़ब की है। एक दिन कुछ लिख रहे थे। शाम तक पूरा नहीं हो पाया। तो बाहर चबूतरे पर चले गए। उसी चबूतरे पर बैठकर रात भर लिखते रहे। शास्त्री जी कहते हैं, सृजन सुनसान में ही संभव है।”

रैक पर सैंकड़ों पुस्तकें

एक रैक पर सैंकड़ों पुस्तकें पड़ी हुई थी। गड्ड-मड्ड। एक के ऊपर एक। बेतरतीब, धूल-गर्द जमी हुई। उनकी पत्नी से पूछा, “क्या ये सारी शास्त्री जी की रचनाएं हैं?” उन्होंने बताया, “नहीं, इनके ऊपर लोगों ने लिखा है। ये वो पुस्तकें हैं। सब भेज देते हैं।”

किताब, पत्र-पत्रिकाओं का अनगढ़ अम्बार। राधा पढते वक़्त शास्त्री जी के शब्दों में इसका अर्थ जाना,
“सौष्ठव सम्भाल में ही नहीं, बेसम्भाल में भी है। रचाव के मुक़ाबले अनगढ़ में कहीं अधिक तेजस्विता देखी जाती है।”
इसको और स्पष्ट करते हुए उसी पुस्तक में शास्त्री जी कहते हैं, “भक्ति और प्रेम  मूलतः एक ही तत्व हैं। अन्तर है एक के हर घड़ी सम्भाले रहने में और दूसरे के अल्हड़पन में। भक्ति को सम्भाले रखना पड़ता है। ‘मैं इन पुस्तकें, जो मुझ पर लिखी गई हैं, से प्रेम करता हूं।’
यह व्यक्ति जो लिखता है, वही जीता है। अल्हड़पना है इनके जीवन में। वही अल्हड़पना हमें इस पूरे निराला निकेतन में विखरा पड़ा मिला। यहां-वहां, सब जगह। हम पूरे निकेतन में घूम-घूम कर फोटो खीचते रहे, खिचवाते रहे। गाय के लिए नादों के बीच, चबूतरे के पास, पशुओं की समाधियों के पास, उनके बीच के संकट मोचन मंदिर के पास।

कुछ दिन और चलूंगा मैं?089

जब हमने चलने कि इच्छा ज़ाहिर की तो पूछे, “देखने से लगता है कि कुछ दिन चलूंगा मैं?”
हम इस अकस्मात्‌ आए वाक्य को ठीक से समझ नहीं पाए तो पूछ बैठे, “जी?” तो फिर समझाते हुए बोले, “आपको देख कर कैसा लगता है – डेढ दो साल और खींच दूंगा। पच्‍चानवे साल का हो गया हूँ मैं। पता नहीं और कितने दिन और खीचूँगा।”
“नहीं नहीं आप अभी बहुत दिन हमारे साथ रहेंगे।”
वापस आने का मन तो नहीं था, पर मां का आदेश था भागवान को भोग लगने के पहले वापस जाना है। अतः चल पड़े। विदा लेने के लिए जब शास्‍त्री जी से कहा तो कहने लगे, “कुछ देर और बैठते। कुछ खाया पीया नहीं। कहोगे जाकर कि शास्‍त्री जी ने बिना खिलाए पिलाए विदा कर दिया।”

हमने कहा, ‘‘अब चलते हैं। फिर आएंगे।”

कहने लगे, “बिना कुछ खाए जा रहे हो तुम्‍हारे लिए ही इंतजाम करवा रहा हूँ।”
आने का मन तो नहीं था। पर .....!
 
094रास्ते में लौटते वक़्त मन में यह ख़्याल आ रहा था .. जिसने सारा जीवन साहित्य साधना में लगा दिया हो … जिसके मुंह से एक एक वाक्‍य सुक्ति के रूप में निकलता है … ऐसी साहित्यिक धरोहर को हम Preserve करके नहीं रख सकते? आज वह एकाकीपन और त्रासदी को जी रहा है। क्‍या सरकारी तंत्र इतना लाचार है कि इस धरोहर को Nursing की सुविधा भी मुहैया नहीं करा सकता?
शहर से दूर अपनी नौकरी की मजबूरी न होती तो उनके सानिध्‍य में कुछ सेवा का पुण्‍य कमाने का अवसर नहीं खोता … पर ये विचार मेरे मन में बार-बार कौंध रहा था कि वह कौन सा आक्रोश था इनके मन में कि 95 साल का यह साहित्‍य का सेवक राग केदार में, किसने बांसूरी बजाई गा तो लेता है – पर सरकारी सम्‍मान पद्म श्री लेने से इंकार करने का मन बनाता है।
साहित्यिक गुटबंदियों से दूर मुजफ्फरपुर जैसे शहर में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिताया। बेला जैसी साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते रहे। तथाकथित महान आलोचकों की दृष्टि में वे सदा अलक्षित ही रहे। जानकीवल्लभ शास्त्री जी का साहित्यिक योगदान भारतीय काव्य परंपरा के विकास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए।

055आज माघ शुक्ल पक्ष की द्वितीया है, शास्त्री जी का जन्म दिन!

 

 

 

 

ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उन्हें दीर्घायु करे।

शनिवार, 29 जनवरी 2011

फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (चौथा भाग)

फ़ुरसत में …

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ

193मनोज कुमार, करण समस्तीपुरी

तीसरा भाग :: निराला निकेतन और निराला ही जीवन

दूसरा भाग : कुत्तों के साथ रहते हैं जानकीवल्लभ शास्त्री!

पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!

चौथा भाग ::

निराला निकेतन : निराला जीवन : निराला परिचय

हमने कहा, “अगर आपको अपना परिचय देना हो तो क्या कहेंगे?”

069शास्त्री जी बोले, “क्या कहूं, क्या परिचय दूं? एक पागल आदमी है, अकेले रहता है। ... यही मेरा परिचय है। विचित्र जीवन है मेरा। Different! Different होने में समय लगता है। आज के आदमी को मेरे बारे में, मेरी जीवन शैली के बारे में कहिएगा तो क्या कहेगा? .... कहेगा पागल है! मैं भाग्यशाली हूं ... इस अर्थ में कि मुझे कोई जानता ही नहीं। .... मैं आनंद से रहता हूं। जिन्हें दुनिया जानती है, उसे दुनिया नचाती रहती है, और वह नाचता रहता है।”

आगे बोले, “मेरी लिखी हुई किताबें अकेले उठा नहीं सकते आप। आप हमारे बारे में जानने की कोशिश ही मत कीजिए! जो यहां के आदमी हैं वो अपने को सबसे बड़ा कवि, लेखक, सब मानते हैं। उनको मानने दीजिए। और हमारे बारे में कहते हैं, … हां एक आदमी है, … कोई पागल लेखक, … अकेले रहते हैं। उनका कोई नहीं है। यही मेरा परिचय है। उसमें आप पड़िएगा तो बहुत मुश्किल है।’’

उत्तर छायावादी कवि हैं। उन्हें छायावाद का पांचवा स्‍तम्‍भ भी कहा जाता है। उनकी कविताएं अनुभूति प्रधान हैं। अद्भुत छंदबद्ध रचनाएं करते हैं वो। काव्‍य में पीड़ा मूलधारा है। मां पांच साल में गुजर गई उसमें जो वेदना स्‍वरूपित हुई वह गीतों में व्‍यक्त हुई। कालीदास पर उपन्‍यास लिखा उन्होंने। दार्शनिक कवि हैं। कविता सांस्‍कृतिक उन्‍नयन की है। जीवन मूल्‍य, अनेकांतवादी, मानवदर्शन पर लिखी रचनाओं में गहराई भी है, ऊंचाई भी।

imageप्रगतिशील दृष्टि- से लिखी गई है “राधा” ! राधा सात खण्डों में विभक्त उनका महाकाव्य है। राधा में राधा के संदर्भ में भाव और कृष्‍ण के संदर्भ में युग बोध प्रबल है। राधा की एक प्रति लेने की हमने इच्छा ज़ाहिर की तो सेवक से मंगवाकर सौंपते हैं। उस पर उनके हस्ताक्षर लेने की इच्छा ज़ाहिर की। बिना चश्‍में के सब चीज़ें देख लेते हैं। राधा महाकाव्य की पुस्तक हाथ में लेकर उसके पन्‍ने पलटते रहे। “राधा ” में उनकी “छाया” नहीं मिल रही थी। बोले, “सब सौंप दिया है उन्‍हें। यह पुस्‍तक भी। इनके मूल्‍य उन्‍हें ही दे दो। मैं क्‍या करूंगा, सब उनका है।” जब “छाया” की छाया नहीं मिली तो बोले, ‘‘लगता है प्रकाशक ने उनका फोटो हटा दिया इसमें से।’’ मैंने पुस्‍तक से उसे खोज निकाला और उनके सामने कर दिया ... “ये है तो।”

बहुत देर तक निहारते रहे। बोले, “अब सब इन्‍हीं का है।” पुस्तक पर उनके हस्‍ताक्षर लिए। एक छोटा हस्ताक्षर करके बोले ‘‘छोटा हो गया। बड़ा एक और ले लो!’’

सम्मान-पुरस्कार

ये 'साहित्य वाचस्पति, 'विद्यासागर, 'काव्य-धुरीण तथा 'साहित्य मनीषी आदि अनेक उपाधियों से सम्मानित हुए तथा पद्मश्री जैसे राजकीय पुरस्कार को ठुकरा चुके हैं। पुरस्‍कार कई मिले – राजेन्‍द्र शिखर सम्‍मान (बिहार का )। उत्तर प्रदेश सरकार ने भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया। एक पुरस्कार इंदिरा जी के हाथों नहीं लिया। और हाल ही में २०१० में जब पद्म श्री के पुरस्कार की घोषणा की गई तो उन्होंने इसे लेने से मना कर दिया। इसे 'मजाक' कहकर शास्त्रीजी ने अस्वीकार कर दिया। उनके शब्दों में दर्द साफ झलक रहा है। महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री हिंदी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं। साहित्यकारों की कई पीढ़ियां उनके आंगन की छांव में बड़ी हुई हैं....महाकवि से कनिष्ठ कई लोगों को पद्मश्री से बड़ा पुरस्कार मिल चुका है। ऐसे में शास्त्रीजी का दर्द जायज है। दुखी शास्त्री जी बोल पड़ते हैं, “सालों से मेरी सुध लेने कोई नहीं आया।” सच्चे साहित्यकार को सम्मान की भूख भले ही न हो लेकिन उपेक्षा का दंश जरूर उसे सालता है...महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री का जो हिंदी साहित्य में योगदान है उसको सिर्फ पद्मश्री से नहीं तौला जा सकता है!

वर्षों पहले उन्होंने लिखा था

कुपथ कुपथ रथ दौड़ाता जो
पथ निर्देशक वह है,
लाज लजाती जिसकी कृति से
धृति उपदेश वह है,

परिवार

071परिवार के बारे में बताते हुए कहते हैं, “पहली पत्नी का नाम चन्द्रकला था। मैगरा में ही १९४७ में उनकी मृत्यु हो गई। पुत्री शैलबाला को छोड़कर चली गई वो। उनसे एक लड़की है। उसकी दो लड़किया हैं। सब प्रोफ़ेसर हैं। गोरखपुर में।” परिसर में प्रवेश करने के ठीक पहले शास्‍त्री जी की एकमात्र संतान पुत्री शैलबाला जी का अपेक्षाकृत छोटा मकान है। उसमें वह और उनके पति प्रतापचंद्र मिश्र रहते हैं। वे भी अस्‍सी वर्षीय हैं। शैलबाला हिंदी की अवकाशप्राप्‍त प्राघ्‍यापिका हैं। उनकी भी उम्र सत्तर से ऊपर की ही होगी। शास्‍त्री जी के परिसर में आना जाना कम ही होगा। मिश्र जी राजस्‍व विभाग में काम करते थे। सेवा निवृत्त हैं । आकाशवाणी पटना से 70 के दशक में रामेश्‍वर सिंह कश्‍यप के बहुप्रसारित नाटक “लोहा सिंह” में फाटक बाबू की भूमिका निभाते रहे हैं ।

प्रसिद्ध कविता ‘किसने बासुरी बजाई’ गा कर सुनाया … !

करण का उनसे निवेदन होता है कि आपके गीत किसने बांसुरी बजाई हमारे कोर्स में था। हमें बहुत अच्छा लगता है। उसे सुनाइए न।

वो कहते हैं, ‘‘हां, उसे मुज़फ़्फ़र आने के बाद ही लिखा था। इसे बहुत गाया। मंचों पर। अब इस उम्र में गा सकता हूं क्या?” फिर कुछ देर ठहर कर बोलते हैं, “राग केदार में इसे गाता था।” फिर राग केदार की सरगम सुनाते हैं064

यह राग कल्याण थाट से निकलता है। समय रात का पहला प्रहर है।

आरोह - स म म प ध प नी ध स।

अवरोह--स नी ध प स प ध प म ग म रे स।

पकड़--स म म प ध प म रे स।

ये है राग केदार ... फिर गाने लगते हैं,

किसने बांसुरी

बांसुरी बजाई

बांसुरी बजाई!

बांसुरी...

किसने बांसुरी बजाई ?

जनम-जनम की पहचानी-

वह तान कहां से आई?

अंग-अंग फूले कदम्ब-सम,

सांस-झकोरे झूले;

सूखी आंखों में यमुना की –

लोल लहर लहराई!

किसने बांसुरी बजाई?

जटिल कर्म-पथ पर थर-थर-थर

कांप लगे रुकने पग,

कूक सुना सोए-सोए-से

हिय में हूक जगाई!

किसने बांसुरी बजाई?

मसक-मसक रहता मर्म-स्थल,

मर्मर करते प्राण,

कैसे इतनी कठिन रागिनी

कोमल सुर में गाई!

किसने बांसुरी बजाई?

उतर गगन से एक बार-

फिर पीकर विष का प्याला,

निर्मोही मोहन से रूठी

मीरा मृदु मुसकाई!

किसने बांसुरी बजाई?

ओह! क्या अद्भुत नज़ारा था हमारे लिए! एक ९५ साल का शख्स हमारे लिए, हमारे अनुरोध पर फिर से अपना यौवन जी रहा था। न सिर्फ़ उनकी बल्कि हमारी आंखों से भी अविरल अश्रु की धार बह चली!!!

उनके मुंह से निकला ‘‘आजकल लोग न जाने क्‍या लिखते हैं?’’

शनिवार, 22 जनवरी 2011

फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (तीसरा भाग)

फ़ुरसत में …

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ

193मनोज कुमार, करण समस्तीपुरी

दूसरा भाग : कुत्तों के साथ रहते हैं जानकीवल्लभ शास्त्री!

पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!

तीसरा भाग :: निराला निकेतन और निराला ही जीवन 

055आचार्य शास्त्री कहते हैं, "विचित्र जीवन मैंने जिया। कोई समझ नहीं सकता। भाग गया था, गया से। मां नहीं थी। कुछ पढ़ा लिखा नहीं। बी.एच.यू गया पढ़ने! .. बिहार में रहने का सौभाग्य नहीं मिला। भागा तो बनारस चला गया। फिर वहां से रायगढ। किसी ने ललकार दिया। पहुंच गया रायगढ। १९-२० साल की उम्र में। सारे हमसे बड़ी उम्र के थे। वहां मैं ही चुन लिया गया। रायगढ़ के राजा प्रभावित थे। उन्होंने राजकवि का सम्मान दिया। राजकवि बन गया। पर वहां के लोगों में सबसे बड़ा अवगुण था कि वे सब मांसाहारी थे। मैं गंध भी नहीं सह सकता। वहां के वातावरण में मांस की गंध। गंध भी नहीं सह सकता। खाने की बात कहां से! कमरा जो मुझे मिला था उसमें चारो ओर से गंध ही गंध। मैंने बहुत हिम्मत करके वहां की, राजकवि की, नौकरी छोड़ दी। नहीं तो उस तरह की नौकरी कोई छोड़ नहीं न सकता था। राजकवि के पद पर था। छोड़कर बनारस आ गया। ईश्वर की कृपा हुई। दो मिनट के अंदर हमको दूसरी नौकरी मिल गई। Never stood second, even in the first class! ये है न बात! फ़र्स्ट क्लास में भी फ़र्स्ट। कभी सेकेंड हुआ ही नहीं। ये कोई साधारण कैरियर नहीं है। इसीलिए नौकरी मिलने में मुझे एक मिनट का समय लगा ही नहीं। मैंने चाहा और हो गया। ये ही ईश्वरीय कृपा थी। कोई अपना नहीं था। मां नहीं थी। कोई नहीं था। तो भगवान खड़े हो गए।’’

महामना : महामानव के निर्माता

061कुछ देर बाद बोले, “मेरी सारी पढाई काशी में हुई। लोग नौकरी के लिए कोशिश करते हैं। मालवीय महाराज ने हमारे लिए रिकोमेंड किया। कहा कि ऐसा लड़का तुमको मिलेगा कहां। ले जाओ। ये बहुत बड़ी बात है। इसको आज के आदमी को कहिएगा तो हंसेगा। कहेगा सब पागल है। आपने मालवीय जी का नाम भी नहीं सुना होगा। मालवीय जी के कृपापात्र बनकर वहां, ८ साल उनके साथ रहा हूं। बहुत मानते थे मुझे। जब तक वो जीवित रहे, उनके साथ ही रहा। मालवीय जी के साथ गुज़ारे समय, मेरा सौभाग्‍य, 8 वर्ष रहा उनके साथ। जब उनकी मृत्‍यु हुई उनके पास बैठा था। उनकी बगल में बैठकर पाठ कर रहा था, जब वो दिवंगत हुए! उसके बाद छोड़ दिया मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश सब।। वहां से छूटा तो मुज़फ़्फ़रपुर आ गया। उसके बाद यहीं का होकर रह गया! बनारस में मुझे प्रसाद, निराला, प्रेमचंद, नंददुलारे वाजपेयी का स्‍नेह मिला। बनारस में काकली की रचना की। “बंदी मंदिरम” की भी।’’

कुछ याद करते हुए कुछ देर चुप रहे, फिर बोले ... “I never stod second in my life, even in the first class! इस कारण से नौकरी मिलने में कोई कठिनाई, कभी नहीं हुई। जो चाहा वही मिल गया। सब ईश्वरीय कृपा है। जहां भी परीक्षा दी हमेशा फर्स्‍ट आया। नौकरी के लिए हाथ पांव नहीं मारना पड़ा। ईश्‍वर की कृपा रही मुझ पर।”

ऐसे आये मुज़फ़्फ़रपुर

“सन 1939 में मुजफ्फरपुर पहली बार आया। गंगा कभी देखा नहीं था! गलती से नदी पार कर गया फिर यहीं का होकर रह गया। तब यहां रमना में उमाशंकर प्रसाद सिंह हुआ करते थे। 1939 से 48 तक उन्‍हीं के यहां रहा। “राधा” की पांडुलिपि उनकी बेटी और मेरी शिष्‍या चंदा ने तैयार की। घूमता हुआ आ गया मुज़फ़्फ़रपुर। इंटर्व्यू चल रही थी यहां। ठहरने की व्यवस्था नहीं थी। मुझे ठहराने की जगह नहीं मिली, तो संस्कृत कॉलेज में ठहराया गया मैं। वह, अनुग्रह नारायण सिंह का जमाना था। परीक्षा होने लगी। लोगों ने कहा आप भी जाइए ना। दूर-दूर से लोग आए थे। उन सब के बीच .. जहां ठहरने की जगह नहीं थी, वहां प्रोफ़ेसर हो गया। बच्चा बाबू ने अपने यहां रखा। छह वर्ष तक रहा उनके साथ। फिर जब पटना में सर्विस हो गई तो वहां गया। वहां कई वर्षों तक प्रोफ़ेसर रहा।”

गउएं भी निराली हैं067 

093उनके यहां इतनी गउएं हैं। और घर में प्राणी मात्र दो। इसका भी अलग किस्सा है। बताने लगे, “गाए पहले एक खरीदी थी। पिताजी के लिए। जब मुज़फ़्फ़रपुर आया तो पिता को अपने साथ ले आया। पिताजी को रात में दूध दिया गया खाने को। पूछा कैसा दूध है? खरीदकर मंगाया गया है, यह बताने पर उन्होंने कहा कि मैं तो खरीदकर दूध खाने का पक्षधर नहीं हूं। अगले रोज मैंने दरवाजे पर गाय बांध दी। उससे ही इतनी हुईं। पहली गाय का नाम कृष्णा रखा। वो काली थी, इसलिए। ये देख रहे हैं न सामने ... कृष्‍णायतन है, उसके नाम पर। यह घर कृष्‍णा के रहने के लिए बनवाया था। कृष्णा तो रही नहीं पर उसकी संतानें पीढियों से यहां रह रही हैं।

068जो गाय पहली बार पिताजी के लिए मैंने ली उसी की संतानें चल रही हैं। कितनी पीढियां आ गईं। कितने बच्चे पैदा हुए।” सामने नाद के दोनों और कड़ी से बंधे -बछड़ों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, '' ये सब तीसरी-चौथी पीढ़ी वाले हैं!”

“सबने कहा कि किसी को बेच दें। किसी को दे दें। दे देना भी तो बचाव है। न हमको गाय बेचना है, न दूध बेचना है। न तो एक बूंद दूध बाहर गया और न कृष्‍णा की कोई संतान कभी बिकी। यहां के कुत्ते बिल्लियों से लेकर इंसानों तक, सब दूध खाते हैं, दूध पीते हैं, और सब यहीं आनंद से रहते हैं। खाते हैं-पीते हैं। सारे पशु-पक्षी, कुत्ते-बिल्ली।”

करण ने पूछा, ‘गाएं जो दूध देती है उसका क्या करते है?’

तो हंसते हुए बोले, “आइए, बैठिए, खिलाएंगे। बेचना छोड़कर और जो काम हो सकता है वो सब होता है। बेच नहीं सकते हैं।” अहहहा.... कितना प्रगाढ़ दर्शन है... ? कवि कभी व्यापारी नहीं हो सकता । वह (भावनाएं) बांटना जानता है, बेचना नहीं।

092सूर्या-क्षश्थी व्रत के प्रथम नैवेद्य की संध्या दस्तक दे रही है किन्तु हमें आचार्यजी की वात्सल्यमयी वाणी से तृप्ति नहीं मिली है। नाद की दोनों तरफ बंधी गायों को स्नेहपूर्वक निहारते हैं। फिर हाथ से इशारा कर बोलते हैं, “... और कृष्‍णा और उसके मरी हुई संतानों की समाधियां भी इसी हाते के अंदर है। सबकी पक्‍की समाधियां बनी हुई हैं। निराला निकेतन में जो गायें मरतीं हैं, उन्हें यहीं समाधिस्थ कर दिया जाता है। चाहते हैं तो घूम आइए। देख आइए आंखों से! सामने ही तो है। जाकर देखो उनकी समाधि बनी हुईं हैं। हम उनको मां मानते हैं .... तो .... मानते हैं। गायों की कितनी पीढियां यहां आ गई हैं। लोग कहते हैं ... अब ... कि किसी को बेच दें ... या दे-दें .... नहीं! न इनका दूध बेचना है ... न किसी को देना है। दूध भी नहीं बेचता। बेचना छोड़कर सब करता हूं। इतनी कुत्ते-बिल्लियां हैं यहां ... सब पीते हैं। और मैं गाता हूं किसने बांसूरी बजाई। सब अकेले कर रहा हूं। ईश्वर की मर्जी।”082

 

लेखनी-लेखन

अपनी लेखनी के बारे में भी कुछ बताइए। जब हमने यह पूछा, तो बोले, “जितनी पुस्तकें मैंने लिखी है, .. आप उठा भी नहीं सकते।” फिर हाथ फैला कर बताते हैं, “इतनी किताबें लिखी है! बहुत किताबें लिखी। इतना काम किया। पढता था। ... लिखता था। मैंने जीवन भर सरस्वती की साधना की है। इसके अलावा दूसरा कोई काम ही नहीं किया।...

089“अभी एक पुस्तक आई है – राधा। सात खंडों के इस एकाकार महाकाव्य का मूल्य एक हजार रुपये है। मेरी इस किताब का दाम है एक हज़ार! लोग सुन कर घबरा जाते हैं। क्या नहीं लिखा, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक ... सब। इतनी छोटी उम्र में इतनी किताबें लिख गए ... आज सोचता हूं तो विश्वास ही नहीं होता। मैंने अपना प्रचार नहीं किया कभी। दिनकर जी ने अपना प्रचार किया। राजनीति के लोग थे वो। मैं तो कविता करने वाला आदमी था। रजनीतिज्ञ नहीं। कविता और इन चीज़ों में अंतर हो जाता है। किसी को प्यार करना अलग चीज़ है, उस पर भाषण करना अलग हो जाता है। मैं कविता से प्यार करता हूं। विचित्र जीवन है मेरा। समझा नहीं सकता।”087

शनिवार, 15 जनवरी 2011

फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (दूसरा भाग)

फ़ुरसत में …
आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ
193मनोज कुमार, करण समस्तीपुरी

दूसरा भाग : कुत्तों के साथ रहते हैं जानकीवल्लभ शास्त्री!

पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!

नहीं भूले कर्पूरी को  064

आचार्य जी बहुत कुछ भूलने लगे हैं। अचानक उन्हें ख़्याल आया कि जिससे बात कर रहा हूं उसके बारे में तो पूछा ही नहीं, तो बोले, “कहां से आए हो तुम लोग?”

करण ने बताया ‘बंगलुरु से।’

मैंने कहा, ‘कोलकाता से।’

फिर मेरी पत्नी की ओर देखते हुए पूछे, ‘ये कौन है?’ मैंने बताया, ‘मेरी पत्नी है, और ये मेरे बच्चे।’

पता नहीं आचार्य जी ने हमारा उत्तर सुना-समझा या नहीं लेकिन एक संक्षिप्त मौन के बाद फिर पूछ बैठे,"आपलोग रहने वाले कहाँ के हैं... ?” जब हमने बताया कि समस्तीपुर से आए हैं तो एकदम से उनकी स्मृति ताजा हो गयी। बोलने लगे, ‘‘हां, गया हूं वहां। बहुत पहले। कवि सम्मेलन में हमें दो-चार बार जाना पड़ा है। वो एक नेता थे, बाद में चीफ़ मिनिस्टर भी हुए ..।’’

उनका नाम भूलने लगे तो हमने बताया कि ‘वो कर्पूरी ठाकुर थे।’ तो उन्हें याद आया और बोले, ‘‘हां, कर्पूरी ठाकुर। जैसे आप बैठे हैं वैसे हमारे घर में बैठते थे। बहुत अच्छे इंसान थे। मुझे बहुत मानते थे। मुझे सबसे ज़्यादा मानने वालों में से एक थे। ये मेरा सौभाग्य है। उन्हीं के समय में मैं प्रोफ़ेसर भी पटना यूनिवर्सिटी का बना था। उनका बेटा भी उन्हीं की तरह मानता है। आते हैं तो बैठना, उठना, खाना, पीना चलता है। कर्पूरी ठाकुर के समय में कई बार गया समस्तीपुर। दो मंजिले पर रहते थे वो। वहीं मुझे ठहराया जाता था। काव्यपाठ किया है मैंने वहां।”

किसने बांसूरी बजाई करके उस जमाने में एक गीत गाता था मैं। इस गीत को जब उन्होंने मेरे गले से सुना तो गला पसंद आ गया उनको। गला ही काट लिया मेरा। ज़िन्दगी भर के लिए उन्हीं का हो के रह गया मैं।

आचार्यजी बहुत कुछ भूल रहे थे किन्तु बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री का सखावत स्नेह उन्हें सहज ही स्मरण आ रहा था। आगे कहते हैं, "उन्होंने केवल एक, मेरी एक कविता सुनी, enchanted (मोहित) हो गए, भक्त हो गए वो। किसने बांसूरी बजाई करके उस जमाने में एक गीत गाता था मैं। इस गीत को जब उन्होंने मेरे गले से सुना तो गला पसंद आ गया उनको। गला ही काट लिया मेरा। ज़िन्दगी भर के लिए उन्हीं का हो के रह गया मैं। उन्होंने ही मुझको प्रोफ़ेसर बनाया पटना में। जो कुछ काम किया वहीं किया। बताइए कहां मैं ब्राह्मण और कहां वो ठाकुर। किसी के यहां खा-पी नहीं सकता था मैं। उसको निभाते हुए इतना माना। मैं कोई महापुरुष नहीं था। पर उनके साथ रहकर इतना जाना कि कवि की भी इज़्ज़त होती है। कर्पूरी जी सारी ज़िन्दगी मुझे काफ़ी मान-सम्मान देते रहे।’’

अचानक उन्हें याद आता है कि अभी तक बहू नहीं आई है। पूछते हैं, ‘‘वाइफ़ नहीं जगी?’’ फिर से आवाज़ देते हैं, ‘‘अरे बहू को बुलाओ। सोयी हैं क्या।’’ उनके दो सेवकों में से एक ने कहा ‘हां,’ तो बोले, ‘‘जगाओ उन्हें, कितनी दूर से आए हैं ये लोग। बुलाओ।’’ फिर हमसे मुखातिब होकर बोले, “वैसे आनंद तो सोए रहने में ही है।”

फिर बताने लगे, ‘‘बहू, मेरी पत्नी। पिताजी उन्हें बहू कहते थे। सब कहने लगे। मैं भी कहने लगा। अच्छा है ना बहू संबोधन!’’ फिर बताने लगे, ‘‘१२ मास बीमार रहने वाली पत्नी हैं। बारह मास बीमार! इसीलिए पड़ी रहती हैं। इलाज होता है, पर बीमार रह रही हैं। मैं अकेला शख्स हूं। सब ईश्वर की मर्ज़ी, जो वह चाहता है अच्छा ही चाहता है.., भला या बुरा कुछ भी आपके साथ हो रहा है, उस पर आपकी क्या मर्जी.. कुछ है मर्जी..?’’

तभी किसी ने बताया कि जग गई हैं। हमारी श्रीमती जी सामने वाले कमरे में उनकी पत्नी के पास चलीं गई।

पैतृक निवास स्थल और पिता

अपने पैतृक निवास स्थल के बारे में बताते हुए कहते हैं, “गया से भी ४० मील आगे एक गांव है मैगरा, फिर उसे समझाते हुए उसका अंगरेज़ी में स्पेलिंग भी बताते हैं, एम ए आई जी आर ए, Maigra, शायद पुरातन काल में यह मायाग्राम रहा हो, और समय के साथ मैगरा बन गया हो। गौतम बुद्ध वाली जगह से हूं।”

‘‘मां को मैंने कभी नहीं जाना’’ थोड़े दुखी और द्रवित स्वर में बोले, ‘‘मेरी मां बचपन में ही मुझे छोड़ कर चली गई।’’ ... थोड़ी देर चुप रहकर शायद उन दिनों को याद करने लगे। फिर बोले, ‘‘घर में लकड़ी नहीं थी, उन दिनों लकड़ी पर भोजन पकता था। पिताजी कहीं जा रहे थे, मां ने उनसे कहा, किसी को बोल दो लकड़ी दे जाएगा। नहीं तो भोजन नहीं बन पाएगा। क्रोध से पिताजी ने कहा कि सामने जो लकड़ी है उसी को जला लो। वह लकड़ी पूजा में प्रयोग के लिए किसी चीज़ की थी। काफ़ी क़ीमती। .... दूसरे दिन मां को सांप ने काटा। मां चली गई। ५ वर्ष का रहा होऊंगा मैं।’’

1916 में गया के मैगरा ग्राम में माघ द्वितीया को शास्त्री जी का जन्म हुआ था।

कई मिनट ख़ामोशी में बीता। लगा अंदर के दर्द उभर आए थे। जब सामान्य हुए तो कहने लगे, ‘‘मेरे पिताजी महापुरुष थे। मेरे पिता इतने बहादुर निकले कि लोगों के लाख कहने और समझाने पर भी उन्होंने दूसरी शादी नहीं की। किसके लिए? मेरे लिए। लड़के के लिए। अखंड मंडलाकार रह गए। पूजनीय थे। चले गए पिताजी, मैंने पिता का मंदिर बनवा लिया। वो देखो सामने। ये मंदिर मैंने अपने पिता की याद में बनवाया है। मैं कभी मंदिर में नहीं गया और न ही किसी देवता को पूजा। मेरे भगवान मेरे पिता हैं। उन्‍होंने कभी मेरा नाम नहीं लिया। बस एक ही बार बोले, तब चलें जानकी वल्लभ? और चल पड़े!’'059

073065हमने देखा। ठीक उसी बरामदे के सामने, एक मंदिर, उसमें पिता की मूर्ति और उस मंदिर की बाहरी दीवार पर लिखा था, ‘पितृ देव स्मृतिस्तम्भ’। शास्त्री जी कह रहे थे, ‘‘दुनिया में ऐसा पिता कहां मिलता है! सबसे बड़ी बात है कि यूं कहने के लिए पिता होते हैं, वो नहीं थे, बक़ायदा पिता थे! बहुत बड़े विद्वान थे। छोटी उम्र में मां चली गई। मेरा जीवन चौपट हो गया था। मातृविहीन बालक था मैं। किसी के कहने पर शादी के लिए तैयार नहीं थे। किसी काम के लिए तैयार नहीं थे। सब काम मेरा गड़बड़ा गया। उन्होंने मां की भूमिका भी निभाई। मेरे लिए मेरे पिता ही मां थे और बाप भी। जब मैं मुज़फ़्फ़रपुर आ गया तो उनको भी अपने पास ले आया। ये घर देख रहे हैं न आप, कोई पागल ही इतना बड़ा घर बनाएगा। मैं पाग़ल था और मैंने इतना बड़ा घर बनाया।’’

पहली बार मुज़फ़्फ़रपुर

हमने पूछा, ’पहली बार मुज़फ़्फ़रपुर आपको कौन सा आकर्षण ले आया?’

हमारे इस प्रश्न पर शास्त्री जी का कहना था – ‘‘कोई आकर्षण नहीं । केवल दुर्भाग्य । दुर्भाग्य के अलावा कुछ भी नहीं! मेरा किसी जन्म का दुर्भाग्य था !’’

हम समझे नहीं तो हमारे चेहरे पर अपनी नज़र गड़ाकर बोले, ‘‘गंगा के इधर कभी नहीं आया था मैं। पटना नहीं देखा था। गया ज़िला के बाहर ही बहुत कम निकला था। देखने के लिए कि गंगा के यहां क्या होगा चलना चाहिए। उस वक़्त परीक्षा दे चुका था। रिज़ल्ट निकलने वाला था। तो मैंने सोचा कि घूम-फिर कर देख आऊं क्या है? पटना आया .. तो वह जो एक घाट है ....’’ फिर भूलने लगे। तो उन्हें बताया .. ‘महेन्द्रू घाट।’

‘‘हां, और उसके उस पार ... पहलेजाघाट था। गंगा के इस पार। कभी आया नहीं था। गंगा के किनारे आया तो कुछ लड़के थे। नदी में खेल कर रहे थे। बोले उस पार जाना है। मैंने कहा नहीं, भय लगता है। बोले कुछ नहीं होगा। पार करा दूंगा। उन्होंने पार करा दिया। चला आया उनके साथ।’’

 

कैसे बना ‘निराला निकेतन’089

करण ने उनसे पूछा, ‘कवि बच्चन यहां आए थे? सुना है कि बच्चन की एक रचना का सृजन  यहीं से शुरू हुआ था।’

बताया उन्हों ने ‘‘बच्चन भी कई बार यहां आए। दो-तीन बार आए बच्चन। शादी ब्याह सब में आए वे। न जाने क्यों इतना मानते थे?’’ फिर खुद ही बताने लगे, ‘‘जितने अच्छे-अच्छे कवि थे उस जमाने में, सब गिन लीजिए। बुरा न मानिए ... पढने में मैं अच्छा माना जाता था, गाता था। लिखता था। उस जमाने में जितने कवि सम्मेलन होते थे, जिसमें बड़े-बड़े सारे कवि आते थे, सब में मुझे बुलाया जाता था कविता पाठ करने के लिए। बच्चन जी के साथ भी.. कविता पढी।’’

हमने बात को आगे बढाने के उद्देश्य से पूछा, ‘इस घर का नाम ‘निराला निकेतन’ क्यों रखा?’

हम आज तक यही सोचते रहे कि यह घर शायद कवि निराला से प्रभावित होकर यह नाम रखा है। जब उनसे पूछा ‘आपने इसका नाम निराला निकेतन कैसे रखा?’

तो उन्होंने बताया, ‘‘Its different!’’

हम ठीक से समझे नहीं तो उन्होंने स्पष्ट किया, ‘‘Dfferent के अर्थ में है। ... मेरी तरह का लोग सबसे अलग। अब देखिए न एक दर्जन भर तो गउएं हैं यहां। इसके अलावा अन्य पशु-पक्षी सब! जितने में आपलोग पूरा परिवार खाइएगा-पिइएगा, उतने में हमारे यहां कुत्ते-बिल्ले सब खाते हैं। ये सब हैं हमारे परिवार के सदस्य। मैं सब से अलग हूं। निराला। ये जो कोई सुनेगा तो गाली देगा हमको। बदमाश कहेगा। कोई अच्छा थोड़े न कहेगा! इसीलिए ऐसा नाम रख लिया हमने। निराला! Different के अर्थ में।’’

आगे बताते हुए कहते हैं, ‘‘मेरा किसी के यहां न आना, न जाना, न खाना होता है। कोई अगर यह कहता है कि शास्त्री हमारे यहां आया, तो समझ लेना कि वह झूठा है, और अगर यह कहे कि मेरे यहां खाया, तब तो महा झूठा। इस तरह का जीवन रहा मेरा। Different होने के कारण निराला निकेतन हो गया। निराला जो कवि थे, उन्हींने बचपन में मेरा साथ दिया। और मेरे यहां आना-जाना सब किया था। लेकिन उस निराला के अर्थ में मैंने नहीं नाम रखा था। नाम मैंने Different के अर्थ में रखा था। उनका नाम भी हो गया, यह संयोग है।’’

069... आवेश था उनके चेहरे पर। थोड़ी देर रुके और संयमित स्वर में बोले ... “कवि जो निराला थे – उन्होंने यहां आना-जाना किया है। पर यह घर उस निराला के अर्थ में नहीं है। मेरी कविता पढ़कर निराला मुझसे मिलने आए। निराला का स्‍नेह मिलता रहा मुझे। निराला बड़े कवि थे। मैं उनका प्रिय पात्र था। मोहल्ले भर के आवारा कुत्ते यहां आते हैं। उन्हें दूध रोटी देता हूं। मैं तो कुत्ते बिल्लियों के साथ रहने वाला आदमी हूँ … कह दीजिएगा लोगों से खाली कुत्तों के साथ रहता है जानकीवल्लभ शास्त्री!”

हम ने सोचा हम से अधिक सौभाग्यशाली तो सच में निराला निकेतन के कुत्ते ही हैं जिन्हें इस महामानव का सानिध्य तो मिल रहा है।

शनिवार, 8 जनवरी 2011

फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ - पहला भाग

फ़ुरसत में … 

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ

193मनोज कुमार, करण समस्तीपुरी

पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!

ऊपर ऊपर पी जाते हैं, जो पीने वाले है

कहते ऐसे ही जीते हैं, जो जीने वाले हैं।

ऐसे ही जीने वाले, एक शख्सियत से मिलना हमारे लिए आज तक की जिंदगी का सबसे बड़ा और सुखद पल था। जो अपनी साधना में लीन एकांत और शांति का जीवन जी रहा है। जो पी रहा है, ऊपर ऊपर ही, वह तो अपने उन हिस्‍सों को जिन्‍हें नहीं पचा पा रहा, स्विस बैंक में जमा कर रहा है। ... और वह जो अपने पेट को काट कर, अपनी पेंशन का अधिकांश भाग और अगर वह कम पड़ जाय तो अपनी जमीन बेच कर अपने गली-मुहल्‍ले के पशु-पक्षियों को अपनी गोद में रखकर अपने हिस्‍से की बिस्कुट खिलाता है, दूध पिलाता है, दूध की कमी न हो उनके लिए गायें पालता है, ..ये कुत्ते, बिल्‍ली, गायें जब मरते हैं तो अपने आंगन में उनकी समाधि बना देता, पूजा करता है उनकी, ऐसा शख्‍स अपने आवास का नाम निराला निकेतन रखता है क्‍योंकि वह Different है। Different इसलिए भी कि ‘ऊपर-ऊपर’ पी जाने वाले यदि उसके जीवन के 95वें वर्ष में उसे पदम श्री देने की सोचता है तो यह शख्‍स आदर पूर्वक उसे लौटा भी देता है।

11 नवम्‍बर 2010, महापर्व छठ के खरना का दिन। हमने जब अपने गांव रेवाड़ी, ज़िला समस्तीपुर से मुज़फ्फ़रपुर जाकर आचार्य जानकीवल्लभ शास्‍त्री जी से मिलने का मन बनाया और मां को इसकी सूचना दी तो मां का कहना था, ‘आज खरना है। जाओ पर शाम में भगवान को भोग लगाने के पहले आ जाना।’

गांव से हम चले तो इसी तरह कि शाम ढलते गांव वापस आ जाएंगे पर मुज़फ्फ़रपुर की सड़कों की यातायात और कुछ अन्‍य कठिनाइयों से निराला निकेतन पहुँचते पहुँचते शाम के 3.30 बज गए। पर आगे के जो दो घंटे बीते वह अंग्रेजी की उक्ति Life time experience के समान था।

लगभग २५ साल बाद गुज़र रहा था उधर से। काफ़ी कुछ बदला-बदला लग रहा था। कम-से-कम वो गलियां ग़ायब मिली जहां ज़िला स्‍कूल के दिनों में गुज़रते वक़्त कभी-कभार देखा था जिन गलियों में मुज़फ़्फ़रपुर की मशहूर तवायफ़ें रहा करती थीं। सड़क किनारे घरों के दरवाज़ों पर पहले की तरह 'ममता रानी, सपना रानी, गायिका और नृत्‍यांगना' जैसी तख्‍़ती नहीं दिखी। आज सब बदला-बदला था। उसी रेडलाइट एरिया के “चतुर्भुज स्‍थान” के एक छोर पर है उनका “निराला निकेतन”

‘निराला निकेतन’095

मुजफ्फरपुर को उत्तर बिहार की राजनीतिक, साहित्यिक राजधानी के रूप में भी माना जाता है। इसी शहर में है चतुर्भुज स्थान। साधारणतया हर चौराहे पर चार रास्ते होते हैं। पर यहां पांच सड़के मिलती है और पहली सड़क मुड़ती है चतुर्भुज स्थान मंदिर पर। उसके ठीक बगल में करीब एक एकड़ के प्‍लॉट पर बना निराला निकेतन विरान खंडहर सा एहसास कराता है। परिसर के चारो ओर चहारदीवारी है। मुख्‍य द्वार पर पुराना दरवाजा। एक सत्रह-अठारह साल का नौजवान (उनका सेवक) उसे आकर खोलता है, … हम प्रवेश करते हैं। पूछने पर उसने बताया कि हां, शास्‍त्रीजी हैं, सामने ही बैठे हैं। दो-चार क़दम आगे बढ़ा। लगा तीर्थ यात्रा के बाद मंदिर में प्रवेश कर रहे हों। परिसर अपनी गौरव गाथा का बयान करती प्रतीत हो रहा था। गेट के ऊपर लंबा बोर्ड लगा है। नीली पृष्‍ठभूमि पर सफ़ेद रंग से उकेरे गए ‘निराला निकेतन’। 'निराला निकेतन' वाले बोर्ड का नीलापन थोड़ा हल्‍का हो गया है। बोर्ड की जर्जर अवस्‍था शास्त्री जी की तरह लगी और उसकी विशलता भी!067

परिसर में दोनों ओर गायों को खिलाने की नादों की लंबी कतार। नादों की कतार के पीछे टीन की छत वाला एक घर गायों को बांधने के लिए। हम आगे बढते हैं। बरामदे के ठीक सामने मंदिर है। शास्‍त्री जी के पिता का।065

ग्रिल से घिरा बरामदा, बरामदे में प्रवेश करते ही बांई तरफ पंलग पर शास्‍त्री जी गंजी और कमर के नीचे धोती डाले तकिए के सहारे बैठे मिले, गोद में कुत्ते के तीन-चार बच्चे। शास्त्री जी की काफी उम्र हो चुकी है! वे काफी अस्वस्थ दिखे। उनकी चारों तरफ ढेर सारे कुत्ते थे। वो भी सड़क के कुत्ते, जिनकी बदबू से पूरा घर भरा पड़ा था। लेकिन शास्त्री जी के चेहरे पर उनके प्रति अगाध स्नेह दिखा। गोद में चार-पांच कुत्तों के बच्‍चों के साथ बैठे थे। नीचे एक कुतिया थी। हमें देखते ही बोलते हैं, ‘बैठने की जगह ढूंढ लो। जहां मिले बैठ जाओ। यहां सब जगह ऐसा ही है।’

064हम बैठते हैं तो नीचे वाली कुतिया कूं-कूं करती है। हमारी तरफ़ मुखातिब होकर कहते हैं, ‘मां आई है। ले जाने।’ हम हतप्रभ थे गन्दी सी कुतिया के लिए इतनी सम्मानित संज्ञा। शास्त्री जी फिर उसे कहते हैं, ‘आ गई लेने? जा। जा। तुझे भी अपने बच्चों के बिना मन नहीं लगता। ले जा!’

हम उनके पैर छूते हैं। नज़रें इधर-उधर दौड़ाते हैं। दीवार पर छायावाद के स्‍तम्‍भ प्रसाद, निराला, पंत, महोदवी की तस्‍वीर है। दाई तरफ शास्‍त्री जी की वो तस्‍वीर जब वे मुज़फ्फ़रपुर आए थे। बांई तरफ वो तस्‍वीर जब वे सेवानिवृत्त हुए, तब वे पटने में थे। हम उन सारी तस्‍वीरों को अपने कैमरे में उतारने लगे। तस्‍वीरों में भरपूर, लंबे बाल, शास्‍त्री जी की पहचान। शास्त्री जी के सामने एक औसत कद का दर्पण और एक छोटी कंघी आज भी पड़ीं है। शायद उनकी कुंतल-प्रियता की गवाह।057

071लोगों से सुन रखा था शास्‍त्री जी की याददाश्‍त बहुत कमजोर हो चुकी है। हां, बात-चीत के दौरान हमें भी लगा। अतः इस आलेख में कुछ तथ्‍यगत भूल हो सकते हैं। पर जो भी उन्‍होंने बताया हम उसे ही पेश कर रहे हैं। कुछ पूछने से पहले खुद ही बताना शुरु कर देते हैं। घटनाओं को बेतरतीब बताते हैं। कई बार भूल जाते हैं। फिर पूछते हैं क्‍या कह रहा था? कई बार एक ही वाकया बार-बार सुनाते हैं। कहीं का कहीं जोड़ देते हैं, तो कभी बोलते-बोलते चुप हो जाते हैं। काफी देर बाद फिर बोलते हैं। जबकि उनकी पत्‍नी छाया देवी से बात हुई तो पाया कि वे बोलने का क्रम बनाए रखती है। सिलसिलेवार बताती हैं बात को। बड़े ही मृदुल और शांत स्वभाव की महिला हैं वो। शास्त्री जी को अगर बीच में बात काटो तो झल्‍ला भी जाते हैं। सुन भी नहीं पाते कई बार।

हमसे पूछते हैं, ‘क्‍यों आए? कुछ भी नहीं कहूँगा। छापोगे? .. नहीं बताऊँगां कुछ भी। ... जाओ औरों से पूछो। यहां क्‍यों आए? ऐसा क्‍या है शास्‍त्री के पास कि मिलने चले आए!’

हमने कहा –‘आपका आशीर्वाद लेने आए हैं। यही पढ़ता था। एल.एस. कॉलेज, बिहार यूनिवर्सिटी में। छुट्टियों में छठ मनाने घर आया था। बस आपके चरण छूने चला आया।’

थोड़ा शांत दिखे तो हम भी सोचने लगे बात कहां से शुरु करें। हमने कहा, ‘एक फोटो चाहिए। आपके साथ।’

हंसते हैं। ‘मेरे साथ बैठे पाओगे। बैठो।’ पलंग पर सलगी (पुराने कपड़े से बनी तोशक) बिछी थी उसे मोड़ देते हैं। करण खींचता है फोटो।055

हमने उनके पैर के पास उसी पलंग पर जगह ली। करण उनके बगल में बैठ गया। बच्चे तो फोटो लेने में मस्त थे। एक कुर्सी थी। श्रीमती जी उस पर बैठ गईं।

पूछा, ‘कैसे हैं, तबीयत कैसी है?’

बोलते हैं, ‘देख ही रहे हैं, ठीक हूं।’

ऊपर टंगे एक चित्र को दिखाते हुए कहते हैं, ‘यह लड़का आया था मुज़फ़्फ़रपुर।’

060063सामने दूसरी दीवार पर टंगे दूसरे चित्र को दिखाते कहते हैं, ‘यह .. पटना से सेवानिवृत हुआ था। नौकरी खोजने से लेकर सेवानिवृत होने तक का फोटो लगा रखा है। इन दोनों के बीच आपके सामने बैठा हूं, ९५ साल का जानकी वल्लभ शास्त्री! .. अकेला!! … एक एकड़ जमीन के प्लाट में बने आवास में अकेला!!!’

उनकी उम्र का कहीं कोई प्रभाव न आवाज़ पर था न ही नजरों पर।

056शास्त्री जी ज़ोर से आवाज़ लगाते हैं, ‘अरे कोई है। ज़रा बहू के जगाओ। बुलाओ बाहर। लोग आए हैं मिलने। दूर से।‘ फिर हमें बताया, “बीमार रहती हैं। बारहों मास बीमार रहने वाली बहू हैं। अच्छी हैं .... अच्छा ही है, अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं।’’ पता नहीं उनका व्यंग्यार्थ क्या था... शायद विधाता के असंतुलित अनुकम्पा पर ही व्यंग्य हो किन्तु हमें नेपोलियन बोनापार्ट की उक्ति याद आयी, "द वर्ल्ड सफ्फर्स अ लोट नोट बिकॉज ऑफ़ द वायलेंस ऑफ़ द बैड पीपल बट बिकॉज द सायलेंस ऑफ़ द गुड़ पीपल।" अच्छे लोग अच्छे बने रहने के लिए कुछ भी झेल लेते हैं। यह भी तो मानसिक बीमारी ही है।

शास्त्री जी फिर   कहते हैं  ... “बीमार तो .. रहना ही चाहिए। ... इंसान अगर बीमार ज़्यादा नहीं रहेगा तो पियक्कड़ हो जाएगा!”

हमने सोचा सच ही तो कह रहे हैं, जो स्वस्थ है, समृद्ध है, सबल है,  उसे किसी न किसी चीज़ का नशा तो रहता है, अपने स्वस्थ, सबल होने का ही सही।

हम जितनी देर रहे, उनकी इस तरह की कई उक्तियां सुनने को मिलती रही।

… ज़ारी ….

** अगले महीने आचार्य जानकीबल्लभ शास्स्त्री जी का जन्मदिवस है। तब तक उनके आशीष स्वरुप यह श्रृंखला आप तक पहुंचती रहेगी … फ़ुरसत में…  हमारे ब्लॉग से शास्त्री जी को जन्मदिवस की हार्दिक शुभ-कामना देने में हमारे साथ आयें। 

धन्यवाद !