पांचवां भाग
आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ
मनोज कुमार, करण समस्तीपुरी
चौथा भाग :: निराला निकेतन : निराला जीवन : निराला परिचय
तीसरा भाग :: निराला निकेतन और निराला ही जीवन
दूसरा भाग : कुत्तों के साथ रहते हैं जानकीवल्लभ शास्त्री!
पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!
शास्त्री जी का व्यक्तित्व भी उनके कृतित्व की तरह विराट है । उम्र का असर उनकी स्मृति पर है किन्तु वाणी पर विल्कुल नहीं। स्मृति और विस्मृति के बीच उनकी खनकती आवाज़ असीम आत्मीयता का अनुभव दे
ता है। हमने उनके घर को देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो बोले, “इस घर में प्रायवेसी नाम की चीज़ है ही नहीं। जहां तक आपकी दृष्टि जाए, सब आपका है। घूमिए-फिरिए। यह तो बाहर का लौंडा है ... बाहर से यहां आया था, यहीं का होकर रह गया। इतनी बड़ी जगह, एक एकड़, में एक आदमी रहता है। यह देखने वाली चीज़ है।”
सबसे पहले हम पहुंचे सामने के कमरे में जिसमें शास्त्री जी की पत्नी, श्रीमती छाया देवी थीं। हमारी श्रीमती जी पहले से ही उनके साथ घुल-मिल गईं थीं। उन्होंने पूछा, “आपके बाल बच्चे …?”
छाया देवी ने कुछ जवाब नहीं दिया, सिर्फ ना में सिर हिलाए।
आगे उन्होंने जानना चाहा, “घर का काम-धाम ..?”
छाया देवी बताती हैं, “बाई हैं। आती है सुबह नाश्ता बना देती है। दोपहर में आकर खाना बना देती है। मुझे नहला भी देती है। मुझसे कुछ नहीं होता। हाथ काम नहीं करता। लाचार हूँ।”
श्रीमती जी ने पूछा, “किसी से दिखाई नहीं?”
तो बताने लगीं, “दिखाई थी। दिल्ली में। सर गंगा राम हॉस्पीटल में। यहां पर इनके भाई की बहू को छोड़कर गई थी शास्त्री जी की देखभाल के लिए। वहां डाक्टर बोला रहकर ईलाज करवाना होगा। पर कैसे रहते? यहां जिसे छोड़ा था वह घबरा गई, उसने फोन कर दिया। चली आई। शास्त्री जी को किसके ऊपर छोड़ूं। उन्हें भी तो देखना पड़ता है।” वो वस्तुतः शास्त्री जी की छाया हैं। इतने स्नेह से पूरित दम्पत्ति जो एक दूसरे की चिंता में घुला जा रहा है।
छठ पर्व है। .. और बाई के द्वारा घर का कई काम होता है। पर बाई को भी छठ पर्व करना है। बताती हैं, “आज तो खरना है। वह तो आकर दिन में ही रात के लिए सब्जी बना गई है। रात में प्रसाद भेज देगी तो खा लेंगे। पर कल वह छठ करेगी। कल कैसे काम चलेगा इसकी परेशानी है।”
उनकी पत्नी से भी आशीष लेने का मन हुआ। तब तक तो मेरी श्रीमती जी उनसे बातें कर ही रहीं थी। हम जब गए तो उनके चरण छूए। आशीष देते बोलीं, “आप भी लिखते हैं?”
मैंने कहा, “बस ऐसे ही, थोड़ा बहुत। शौकिया।” बोलीं, “आप अपनी रचना दीजिए। हम बेला में छापेंगे। बेला शास्त्री जी की पत्रिका रही है। खुद संपादन करते थे। अब नहीं कर पाते। मैंने भी बहुत दिनों तक किया। अब अस्वस्थ रहती हूं। तो अब इसका काम किसी और को दे दिया है। शास्त्री जी के जन्म दिन पर इसका वार्षिकांक आएगा। उसी में आपकी रचना छापूंगी। दे दीजिएगा।”
हमने पूछा कि कब है शास्त्री जी का जन्म दिन तो उन्होंने बताया, “माघ शुक्ल द्वितिया को। इसबार ४ फ़रवरी को पड़ेगा। उस दिन बहुत सारे कार्यक्रम होते हैं। प्रतिवर्ष। पूजा, हवन, सांस्कृतिक कार्यक्रम दिन में .. फिर रात में कवि सम्मेलन। दूसरे दिन सुबह तक चलता है, यानी सूर्योदय से सूर्योदय तक।” फोन नम्बर भी दिया उन्होंने, 0621-2286466, बोलीं, “इस पर कार्यक्रम की जानकारी ले लीजिएगा, और ज़रूर आइएगा।”
हमारी श्रीमती जी को शास्त्री जी की पत्नी बताती हैं, “इनकी साहित्य साधना ग़ज़ब की है। एक दिन कुछ लिख रहे थे। शाम तक पूरा नहीं हो पाया। तो बाहर चबूतरे पर चले गए। उसी चबूतरे पर बैठकर रात भर लिखते रहे। शास्त्री जी कहते हैं, सृजन सुनसान में ही संभव है।”
रैक पर सैंकड़ों पुस्तकें
एक रैक पर सैंकड़ों पुस्तकें पड़ी हुई थी। गड्ड-मड्ड। एक के ऊपर एक। बेतरतीब, धूल-गर्द जमी हुई। उनकी पत्नी से पूछा, “क्या ये सारी शास्त्री जी की रचनाएं हैं?” उन्होंने बताया, “नहीं, इनके ऊपर लोगों ने लिखा है। ये वो पुस्तकें हैं। सब भेज देते हैं।”
किताब, पत्र-पत्रिकाओं का अनगढ़ अम्बार। राधा पढते वक़्त शास्त्री जी के शब्दों में इसका अर्थ जाना,
“सौष्ठव सम्भाल में ही नहीं, बेसम्भाल में भी है। रचाव के मुक़ाबले अनगढ़ में कहीं अधिक तेजस्विता देखी जाती है।”
इसको और स्पष्ट करते हुए उसी पुस्तक में शास्त्री जी कहते हैं, “भक्ति और प्रेम मूलतः एक ही तत्व हैं। अन्तर है एक के हर घड़ी सम्भाले रहने में और दूसरे के अल्हड़पन में। भक्ति को सम्भाले रखना पड़ता है। ‘मैं इन पुस्तकें, जो मुझ पर लिखी गई हैं, से प्रेम करता हूं।’
यह व्यक्ति जो लिखता है, वही जीता है। अल्हड़पना है इनके जीवन में। वही अल्हड़पना हमें इस पूरे निराला निकेतन में विखरा पड़ा मिला। यहां-वहां, सब जगह। हम पूरे निकेतन में घूम-घूम कर फोटो खीचते रहे, खिचवाते रहे। गाय के लिए नादों के बीच, चबूतरे के पास, पशुओं की समाधियों के पास, उनके बीच के संकट मोचन मंदिर के पास।
जब हमने चलने कि इच्छा ज़ाहिर की तो पूछे, “देखने से लगता है कि कुछ दिन चलूंगा मैं?”
हम इस अकस्मात् आए वाक्य को ठीक से समझ नहीं पाए तो पूछ बैठे, “जी?” तो फिर समझाते हुए बोले, “आपको देख कर कैसा लगता है – डेढ दो साल और खींच दूंगा। पच्चानवे साल का हो गया हूँ मैं। पता नहीं और कितने दिन और खीचूँगा।”
“नहीं नहीं आप अभी बहुत दिन हमारे साथ रहेंगे।”
वापस आने का मन तो नहीं था, पर मां का आदेश था भागवान को भोग लगने के पहले वापस जाना है। अतः चल पड़े। विदा लेने के लिए जब शास्त्री जी से कहा तो कहने लगे, “कुछ देर और बैठते। कुछ खाया पीया नहीं। कहोगे जाकर कि शास्त्री जी ने बिना खिलाए पिलाए विदा कर दिया।”
हमने कहा, ‘‘अब चलते हैं। फिर आएंगे।”
कहने लगे, “बिना कुछ खाए जा रहे हो तुम्हारे लिए ही इंतजाम करवा रहा हूँ।”
आने का मन तो नहीं था। पर .....!
रास्ते में लौटते वक़्त मन में यह ख़्याल आ रहा था .. जिसने सारा जीवन साहित्य साधना में लगा दिया हो … जिसके मुंह से एक एक वाक्य सुक्ति के रूप में निकलता है … ऐसी साहित्यिक धरोहर को हम Preserve करके नहीं रख सकते? आज वह एकाकीपन और त्रासदी को जी रहा है। क्या सरकारी तंत्र इतना लाचार है कि इस धरोहर को Nursing की सुविधा भी मुहैया नहीं करा सकता?
शहर से दूर अपनी नौकरी की मजबूरी न होती तो उनके सानिध्य में कुछ सेवा का पुण्य कमाने का अवसर नहीं खोता … पर ये विचार मेरे मन में बार-बार कौंध रहा था कि वह कौन सा आक्रोश था इनके मन में कि 95 साल का यह साहित्य का सेवक राग केदार में, किसने बांसूरी बजाई गा तो लेता है – पर सरकारी सम्मान पद्म श्री लेने से इंकार करने का मन बनाता है।
साहित्यिक गुटबंदियों से दूर मुजफ्फरपुर जैसे शहर में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिताया। बेला जैसी साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते रहे। तथाकथित महान आलोचकों की दृष्टि में वे सदा अलक्षित ही रहे। जानकीवल्लभ शास्त्री जी का साहित्यिक योगदान भारतीय काव्य परंपरा के विकास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए।
आज माघ शुक्ल पक्ष की द्वितीया है, शास्त्री जी का जन्म दिन!
ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उन्हें दीर्घायु करे।