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शनिवार, 28 दिसंबर 2013

फुरसत में… 114 नालंदा के खंडहरों की सैर

फुरसत में… 114

नालंदा के खंडहरों की सैर19102011(002)

मनोज कुमार

साल जाते-जाते बड़े  भाई ने दो आदेश किया।  एक कि इस ब्लॉग पर गतिविधि पुनः ज़ारी किया जाए। सो हाज़िर हूं … दूसरे ..

मेरे लिए नालंदा की यात्रा वैसे तो हमेशा विशेष ही होती है, इस बार तो और भी खास हो गई, जब इस बाबत Facebook पर Status Update लगाया तो बड़े भाई (सलिल वर्मा) का आदेश हुआ,

सलिल वर्मा Please take a full snap of ruins of Nalanda University and send me as New Year Greetings!!”

कई बार यात्रा कर चुके नालंदा को इस आदेश के तहत देखने की कोशिश, इस बार हमारी मजबूरी बन गई, नालंदा, जहां प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग  7वीं शताब्दि में आया था। उसके अनुसार उस जमाने में यहां के लोग एक तालाब में “नालंदा” नामक नाग का निवास होना बताते थे। यही कारण है कि इस नगर का नाम नालंदा पड़ा।

19102011(022)भगवान बुद्ध के पुत्र सारिपुत्र का जन्म नालंदा के पास “नालक” गांव में हुआ था। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उन्होंने इसी गांव में आकर अपनी मां को धर्मोपदेश दिया और निर्वाण प्राप्त किया। फलस्वरूप वह बौद्ध श्रद्धालुओं और उपासकों के लिए प्रमुख तीर्थ-स्थल हो गया। भगवान बुद्ध के बाद सबसे अधिक पूजा सारिपुत्र की ही होती है। इस महापुरुष का जन्म और निर्वाण एक ही स्थान पर होना श्रद्धा का विषय बना रहा। उनकी याद में इस जगह पर एक चैत्य का निर्माण हुआ। इस चैत्य के नज़दीक जो भिक्षु विहार बने वे बाद में अध्ययन के केन्द्र हो गए। देश के दूर-दराज के भागों से विद्यार्थी यहां आकर शिक्षा ग्रहण करते थे। पाल राजाओं ने नालंदा के निर्माण में महत्वपूर्ण निभाई।

पालि ग्रंथों में नालंदा शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए कहा गया है, “न अलं ददाती ति नालंदा” अर्थात्‌ वह जो प्रचुर दे सके। विडम्बना यह कि तुर्क आक्रमणकारी बख़्तियार ख़लजी ने अपने लूटपाट के अभियान के तहत सन 1199 में प्रचुर देने वाले नालंदा के इस विश्वविद्यालय में आग लगा दी। शिक्षा का यह महान केन्द्र जलकर खाक हो गया। आज तो सिर्फ़ वहां खंडहर बचे हैं और इन्हीं खंडहरों की तस्वीर अपने कैमरे में क़ैद कर लाने का मुझे आदेश मिला।

12022011(007)कैमरे की आंख से देखिए, इन भग्नावशेषों की दीवालों की 6 से 12 फीट की मोटाई यह साबित करती है कि विहारों की ऊंचाई काफ़ी रही होगी। साथ ही भवन भी विशाल रहे होंगे। ऊंचे भवनों तक पहुंचने के लिए चौड़ी और पक्की सीढियों के अवशेष आज भी विद्यमान है। ह्वेनसांग और बाद के दिनों में आए चीनी यात्री इत्सिंग के अनुसार यहाँ 8 भव्य विहार थे। इन महाविहारों से लगे हुए चैत्य और स्तूपों का निर्माण हुआ था। हीनयान और महायान के लिए 108 मंदिरों का निर्माण हुआ। पूरा विद्यालय एक ऊंचे प्राचीर से घिरा था।

ह्वेनसांग ने ज़िक्र किया है कि इसमें प्रवेश करने के लिए एक विशाल दरवाज़ा था। उसके बाहर खड़े द्वारपाल भी काफ़ी विद्वान होते थे। जो विद्यार्थी यहां प्रवेश पाना चाहते थे, उनकी परीक्षा ये द्वारपाल लिया करते थे, और योग्य उम्मीदवारों को ही चुना जाता था। 10 में से सिर्फ़ एक या दो विद्यार्थी ही विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार के भीतर जा पाते थे!

19102011(012)विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता था। आस-पास के क़रीब 100 गांवों द्वारा इसके खर्च की व्यवस्था की जाती थी। इत्सिंग ने तो 200 गांवों की बात कही है। इस विश्वविद्यालय में उन दिनों 10,000 विद्यार्थी 1500 आचार्यगण से शिक्षा ग्रहण करते थे। अर्थात प्रत्येक सात विद्यार्थी पर औसतन एक शिक्षक!

बौद्ध धर्म, दर्शन, कला, इतिहास, आदि के साथ आयुर्वेद, विज्ञान, कला, वेद, हेतु विद्या (Logic) शब्द विद्या (Philology) चिकित्सा विद्या, ज्योतिष, अथर्ववेद तथा सांख्य, दण्डनीति, पाणीनीय संस्कृत व्याकरण की शिक्षा की व्यवस्था थी।

12022011(003)नालंदा जाएं और राजगीर की चर्चा न हो ऐसा कैसे हो सकता है? प्राचीन समय से बौद्ध, जैन, हिन्दू और मुस्लिम तीर्थ-स्थल राजगीर पांच पहाड़ियों, वैराभगिरी, विपुलाचल, रत्नगिरी, उदयगिरी और स्वर्णगिरी से घिरी एक हरी भरी घाटी में स्थित है। इस नगरी में पत्थरों को काटकर बनाई गई अनेक गुफ़ाएं हैं जो प्राचीन काल के जड़वादी चार्वाक दार्शनिकों से लेकर अनेक दार्शनिकों की आवास स्थली रही हैं। प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य की राजधानी रही है। ऐसा माना जाता है कि पौराणिक राजा वसु, जो ब्रह्मा के पुत्र कहलाये जाते हैं, ही इस नगर के प्रतिष्ठाता थे।

18102011(013)राजगीर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से एक है जरासंध का अखाड़ा है। इसे जरासंध की रणभूमि भी कहा जाता है। यह महाभारत काल में बनाई गई जगह है। यहां पर भीमसेन और जरासंघ के बीच कई दिनों तक मल्ल्युद्ध हुआ था। कभी इस रणभूमि की मिट्टी महीन और सफ़ेद रंग की थी। कुश्ती के शौकीन लोग यहां से भारी मात्रा में मिट्टी ले जाने लगे। अब यहां उस तरह की मिट्टी नहीं दिखती। पत्थरों पर दो समानान्तर रेखाओं के निशान स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसके बारे में लोगों का कहना है कि वे भगवान श्री कृष्ण के रथ के पहियों के निशान हैं।

राजगीर सिर्फ़ बुद्ध एवं उनके जीवन से संबंधित अनेक घटनाओं के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, यह स्थल जैन धर्मावलम्बियों के लिए भी समान रूप से प्रसिद्ध है। अन्तिम जीन महावीर ने अपने 32 वर्ष के सन्यासी जीवन का 14 वर्ष राजगीर और उसके आसपास ही बिताया था। जैनों ने भी बिम्बिसार और अजातशत्रु को अपने धर्म के समर्थक के रूप में दावा किया है। राजगीर में ही 20 वें तीर्थंकर मुनि सुव्रत नाथ का जन्म हुआ था। महावीर के 11 प्रमुख शिष्य/गण्धर की मृत्यु राजगीर के एक पहाड़ के शिखर पर हुई।

रज्जूपथ से राजगीर के विश्वशांति स्तूप की यात्रा भी काफ़ी रोमांचकारी होता है। थोड़ा भय, थोड़ा कुतूहल मिश्रित आनंद देते हैं।

ध्यान में लगे लोगों को तो नालंदा के खंडहरों के प्रांगण में भी देखा था, लेकिन विश्वशांति स्तूप में कुछ अलग ही अनुभूति हुई और हम भी ध्यान में जाने की सोची। … और देखा एक वृक्ष जिसे देख कर लगा कि निर्वण किसे कहते हैं? लेकिन इनको देख कर लगा कि ये किस ओर ध्यानस्थ हैं?12022011(002)

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शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

फ़ुरसत में ... स्मृति से साक्षात्कार

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स्मृति से साक्षात्कार

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मनोज कुमार

ऑन लाइन पुस्तक की बुकिंग की थी। सप्ताह भी नहीं बीता, आ गई है। फ़ुरसत में हूं ही, पढ़ने लगता हूं, … पढ़ ही डालता हूं। पुस्तक अगर रोचक हो तो एक सांस में खतम हो जाती है। संस्मरण एक विशिष्ट विधा है। इस विधा को साधना एक कठिन कार्य है। जिस पुस्तक को मैं पढ़ रहा था, वह अलग और मौलिक इस रूप में है कि इसमें रचनाकार के सधे हुए शिल्प की निजी विशेषताएं समाहित हैं।

संस्मरण को हम सम्पूर्ण स्मृति कह सकते हैं। इस तरह की स्मृति जो हमारे आज को अधिक सार्थक, समृद्ध और संवेदनशील बना दे। हमारी स्मृति का एक सिरा हमारे वर्तमान से बंधा होता है, तो दूसरा अतीत से। संस्मरण अतीत और वर्तमान के समय-सरिता के बीच एक पुल है, जो दोनों किनारों के बीच संवाद का माध्यम बनता है।

मेरा फोटोपोस्टग्रेजुएशन करने के लिए वहां बिताए 1990-1996 के उन अनमोल पलों को स्मृतियों में रूस” पुस्तक के ज़रिए शिखा वार्ष्णेय अपने पांच वर्षीय रूस के प्रवास को याद करती हैं। बीते कल के कुछ पात्र, कुछ स्थान, कुछ दृश्य, कुछ घटनाओं के साथ हमारी एक आत्मीयता हो जाती है। एक संबंध बन जाता है। हम उन स्मृतियों को संजोए रहते हैं। रूस में बिताए शुरु के दिनों में चाय पीने की मुहिम में परिचारक को समझाने के लिए जिस नाटकीयता से सारे दृश्य को इस पुस्तक में उन्होंने साकार किया है उसे पढ़कर तब बरबस हंसी आ जाती है जब यह रहस्योद्घाटन होता है कि रूसी में भी चाय को चाय ही कहते हैं।

शिखा की इस किताब में भावुकता के साथ-साथ हास्य-विनोद भी है। जब रूस जाने का प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तब घर का माहौल आम मध्यमवर्गीय परिवार की तरह संशय और उत्सुकता वाला था। मम्मी को जहां संशय है, “एक बार लड़की को विदेश भेजा, फिर तो वहीं की होकर रह जाएगी” वहीं पापा कहते हैं, “क्या हुआ, समझदार है, हम भी तो उसकी ख़ुशी चाहते हैं न!” और बहन के मनोभाव का वर्णन करते हुए लेखिका कहती हैं, “बहन ख़ुश थी, अब ये कमरा उसका और सिर्फ़ उसका होगा। बिस्तर और तकिए उसे नहीं बांटना होगा।”

IMG_3588संस्मरण में महज सूचना नहीं होता, बल्कि एक जीवंत अस्तित्व होता है जो हमारी बीती ज़िन्दगी के अनेक आवर्तों में लिपटा होता है। जो संस्मरण लिख रहा होता है, वह उन आवर्तों की पहचान करता है। “टॉल्सटॉय, गोर्की और यह नन्हा दिमाग” शीर्षक अध्याय पढ़ते वक़्त ऐसा लगता है कि जब वहां के संस्मरण की रचना की जा रही होगी, तो संस्मरणकार के समक्ष स्मृति के साथ-साथ एक आत्मीय संबंध भाव भी रहा होगा। इसमें न सिर्फ़ उनका अपना आत्मानुभव है बल्कि स्वयं को खोजने-पहचानने की ईमानदार कोशिश भी नज़र आती है। लिखती हैं, “वहां जाने के बाद गोर्की के उपन्यास मुझे कुछ-कुछ पसंद आने लगे थे। अब चाय का क़र्ज़ भी तो निभाना होता है ना।”

शिखा जी के संस्मरण पढते वक़्त लगता है कि जीवन के लौकिक अनुभवों को संबंधों के प्रकाश में सहेजने की इनकी आकांक्षा ने इस रचना को जन्म दिया है। विदेश की धरती पर बिताए क्षणों के बीच इस संस्मरण में अपनी माटी से जुड़े होने का जहां एक ओर अहसास कराती हैं, वहीं दूसरी ओर इसकी जीवंतता और सरसता आकर्षित करती है। “छुट्टी पर भारत से आने वाले के हाथ मूली-गोभी के पराठे ज़रूर मंगाए जाते … और यह कहने की ज़रूरत नहीं कि उन पर लाने वाले का कोई हक़ नहीं होता था।”

कहानी और संस्मरण का ढांचा मिलता-जुलता है। कई बार अच्छे ढंग से लिखे गए संस्मरण और कहानी में अंतर नहीं दिखता। वो कौन थी” शीर्षक अध्याय शिखा जी

का संस्मरण होते हुए कहानी का-सा प्रभाव पैदा करता है। जब वो रुसी भाषा सीखने के लिए “वेरोनिश” की यात्रा पर होती हैं, तो उन्हें ज़िन्दगी का पहला और सबसे खतरनाक वाकये का समना करना पड़ता है और उस परिस्थिति से वह किस प्रकार निकल पाती हैं वह एक सस्पेंस थ्रिलर की गति से लिखा रोचक प्रकरण है। हां भारत की सहमी, सकुचाई सी लड़की इस घटना के बाद “बोल्ड गर्ल” के ख़िताब से नवाज़ी गई।

संस्मरण में रचनाकार शुरु से लेकर अंत तक एक आलंबन (सहारा) के साथ गहरी आत्मीयता से जुड़ा होता है। यह आत्मीयता शिखा की स्मृतियों में इस कदर प्रगाढ़ है कि वो कहती हैं, “मास्को अपनी ही मातृभूमि जैसा लगने लगा।” संस्मरण रचना का मूल लक्ष्य मूल्यवान स्मृति को सुरक्षित रखना होता है। और शिखा जी ने रूस में बिताये अपनी अमूल्य स्मृतियों को इस पुस्तक के माध्यम से न सिर्फ़ सुरक्षित रखा है बल्कि हमसे बांटा भी है। “मास्को हर दिल के क़रीब” शीर्षक अध्याय में उस शहर के हर दर्शनीय स्थलों का विवरण बड़े ही रोचक अंदाज़ में किया गया है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि संस्मरण न तो हम सूचना के आधार पर लिख सकते हैं और न ही साक्षी भाव से। स्मृति तो अतीत की वर्तमानता की बोधक होती है।

संस्मरण में रचनाकार स्वयं का अनुभूत सत्य लिख रहा होता है। जहां कहानियों में सत्य आभासित होता है, वहीं संस्मरण में सृजित होता है। कल्पना का प्रयोग यहां भी होता है, लेकिन इसकी भूमिका संयोजन, अन्वय (सम्बंध स्थापित करना) एवं रचनात्मक प्रभाव पैदा करने की होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है उनके द्वारा रूस के प्राचीनतम नगर कीवस्काया का वर्णन। कहती हैं, “एक सप्ताह में हमने देखा एक प्राचीन कलात्मक, खूबसूरत शहर जो अपार प्रकृति संपदा लिए हुए था। इन सबसे भी बढ़कर पाया वहां के सहृदय लोगों का प्यार और आदर। … कीव शहर को जब हम छोड़ रहे थे तो लगा कि कीव हाथ हिला कर कह रहा हो फिर आइएगा।”

संस्मरण में यात्रा हर स्थल, मानव संपर्क, रास्ते, देश-काल, भिन्नता और विविधता में गहरे प्रवेश करने वाली दृष्टि के साथ होनी चाहिए। शिखा ने जगह-जगह इस पुस्तक में यह अहसास दिलाया है कि अपने समस्त अनुभव-ज्ञान से रचना को संपुष्ट करने की क्षमता भी उनके भीतर के रचनाकार में है। “टर्निंग पॉइंट” शीर्षक अध्याय में एक अद्योगिक नगरी का वर्णन इस सहजता के साथ करती हैं कि लगता है उनके साथ हम भी शहर में हैं। वहां की विशिष्टता का वर्णन करते हुए कहती हैं, “पहली बार अहसास हुआ कि सिविक सेन्स किसे कहते हैं। वहां लोग न ख़ुद नियम तोड़ते थे न किसी को तोड़ने देते हैं।”

इस तरह की रचना में जब तक पाठक को पूरी तरह शामिल करने की क्षमता न हो, तो वह गूंगे का गुड़ ही बनी रहेगी। 1990-91 के “प्रेरोस्त्राइका” के काल का वर्णन जिस ईमानदारी के साथ उन्होंने किया है वह पढ़कर मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं हो रही है कि यह पुस्तक एक बहुत ही उत्कृष्ट कोटि का संस्मरण हैं।

संस्मरण अनुभव, सौन्दर्य बोध और प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति है। शिखा जी ने “टूटते देश में बनता भविष्य” शीर्षक अध्याय में उस देश की आर्थिक तंगी के अपने संस्मरण को इस शैली में लिखा है कि इसे पढ़ते वक़्त कई बार दिल भर आता है। वहां की घटनाओं की पृष्ठ्भूमि में लिखे गए इनके संस्मरण में साधारण के प्रति आकर्षण एवं स्वस्थ एवं नैतिक जीवन पर बल दिया गया है।

शिखा जी का संस्मरण स्मृति से साक्षात्कार है। वह समय में लौटना नहीं है, बल्कि गुज़रे समय को जीवन की वर्तमानता से जोड़ने का माध्यम है। इस रूप में वह इकहरे वर्तमान की रिक्तता को भरने वाला सशक्त रचना माध्यम है। जब लेखिका यह कहती हैं, “आदमी जो सोचता है, वैसा हो जाए तो फिर भगवान को कौन पूछेगा?” तो वह यही साबित कर रही होती हैं कि ज़िन्दगी में तूफान का आना-जाना लगा रहता है, ज़रूरत है इन संकट के समय में अपने हौसले, आदर्श और संवेदना को सही ढंग से इस्तेमाल करने का। रूस की बदलती अर्थव्यवस्था के कारण बहुत से आकस्मिक संकटो का पहाड़ टूट पड़ता है, यहां तक कि मुफ़्त शिक्षण बंद कर दिया जाता है। खाने-पीने और ज़रूरत की हर चीज़ों के दाम आसमान छूने लगते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि “स्टेशन की बेंच” पर डेरा डंडा जमाना पड़ता है। किंतु वह विकट परिस्थितियों का डटकर मुक़ाबला कर संकट से पार होती हैं, उनका सपना पूरा होता। कहती हैं, “इंसान को सपने ज़रूर देखने चाहिए, तभी उसके पूरे होने की उम्मीद की जा सकती है।”

IMG_3586संस्मरण में रचनाकार ख़ुद को भी प्रकाशित करता चलता है। इसे कल्पना करके नहीं लिखा जा सकता। क्योंकि आत्मीयता, अनुभव की प्रत्यक्षता और घटना एवं परिवेश की सत्यता इसका आधार तैयार करते हैं। इसमें व्यक्ति का संबंध होता है। ऐसा संबंध, किसी भी स्तर पर रचनाकार की ज़िन्दगी को अर्थ देता है, उसमें भराव या खालीपन पैदा करता है, जिस कारण वह संस्मरणीय हो जाता है। अपनी डिग्री लेकर भारत लौटकर आने वाली शिखा अब बदली हुई इंसान हैं और लिखती हैं, “नहीं खतम हुई वो सुनहरी यादें, वो मस्ती के दिनों की कसक, वो थोड़े में ही ख़ुश रहने का जज़्बा और अपनों से दूर ग़ैरों को अपनाने की ख़्वाहिश।” संस्मरण रचना वर्तमान को एक दिशा, पहचान और संस्कार देती है। हमारा वर्तमान तात्कालिकता वाला होता है, एक आयामी होता है, इसमें सूचनाओं की प्रधानता होती है! हम यदि अतीत की प्रतिमा पर पड़ी धूल को झाड़कर उन्हें बार-बार पहचानने योग्य बना दें – तो “स्मृतियों में रूस” जैसा एक सार्थक संस्मरण तैयार हो सकता है।

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शनिवार, 28 जनवरी 2012

फ़ुरसत में ... दिल की खेती .. “प्यार” बोऊं या “नफ़रत” ?

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दिल की खेती .. “प्यार” बोऊं या “नफ़रत” ?

IMG_3308मनोज कुमार

कहीं पढ़ा था, “किसी की मदद करते वक़्त उसके चेहरे की तरफ़ मत देखो, ... क्योंकि उसकी झुकी हुई आंखें आपके दिल में गुरूर न भर दे ...।” इस सूक्ति को मैंने दिल में गांठ की तरह बांध ली थी। मुझे नहीं पता था कि यह गांठ दिल को सुकून पहुंचाएगी या किसी दिन गले की फांस बन जाएगी।

बात उन दिनों की है जब सौ, दो सौ, चार सौ, पांच सौ रुपए भी काफ़ी बड़े होते थे, आज भी हैं, तब कुछ ज़्यादा थे। क्योंकि तब यह राशि हमारी कुल मासिक तनख़्वाह की दस परसेंट हुआ करती थी ! तकरीबन पंद्रह-सोलह साल पहले की बात है। पंद्रह या सोलह? छोड़िए न, एक साल इधर-उधर होने से पांच सौ रुपए की सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

उन दिनों अपनी पोस्टिंग हैदराबाद के निकट मेदक ज़िले के एद्दुमैलारम नामक जगह में थी। दिल्ली किसी काम से आना हुआ था। काम ख़तम कर वापसी के लिए ट्रेन पकड़ने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पहाड़गंज वाली साइड के प्लेटफ़ॉर्म पर पहुंचा, तो मालूम हुआ कि ट्रेन परली साइड के प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ी है। गरमियों के दिन थे। दोपहर के ठीक बाद का समय था, जो काफ़ी गरम होता है। तपती धूप की वजह से पसीने से लथपथ ए.सी-II टियर की कोच में पिछले सोलह प्लेटफ़ॉर्म की थकान बढ़ाने वाले कारक, मेरे एक मात्र बक्से, को अपनी सीट, संख्या चार के ऊपर फेंका एवं दिल्ली की गरमी और उस ऑटो वाले को (जिसे बोला था कि हैदराबाद जाने वाली ट्रेन जिस साइड होगी उसी साइड उतारना ) भला बुरा कहते हुए अपनी सीट पर पसर गया।

बॉगी में ए.सी. ऑन थी या नहीं, उसकी परवाह किए बग़ैर मैंने पंखे को अभी ऑन किया ही था कि पीछे की किसी सीट से एक सज्जन मेरे पास आए। उन्होंने अंगरेज़ी में वार्तालाप करना शुरू किया। यह कोई नई या अचरज की बात नहीं थी मेरे लिए। अन्य भाषाओं के जानते हुए भी अंगरेज़ी इसीलिए तो बोली जाती है कि सामने वाले पर आपके सभ्य, बुद्धिजीवी, और पढ़ेलिखे ओहदेदार होने का रौब जमे। उन दिनों इस तरह की अंगरेज़ी बोलने वाले अधिकांश यात्री, यानी हमारे देश के शासन तंत्र (ब्यूरोक्रेसी) को चलाने वाले रहनुमा, ए.सी-II में ही सफ़र करते थे (आपका यह खादिम भी उसी तंत्र का एक मुलाजिम था), क्योंकि तब सिक्स्थ क्या फ़िफ़्थ पे कमीशन भी नहीं आया था। आज तो सिक्स्थ पे कमीशन का ज़माना है, ए.सी-II वाले मुसाफ़िर टर्मिनल थ्री की ओर शिफ़्ट कर गए हैं और ए.सी-II में स्थानीय भाषाओं ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है। ऐसा नहीं था कि तब ए.सी-II में स्थानीय भाषाएं अपनी जगह नहीं बनाती थीं, बनाती थीं, बस उत्तर और मध्य भारत के हिंदी बोले जाने वाले आंचलिक भाषा-भाषी को छोड़कर। शायद शर्मिंदगी ... या कुछ और कारण था।

बहरहाल, अंगरेज़ी में उस सज्जन से जो वार्तालाप हुआ उसका लब्बो-लुआब यह था कि उनकी सीट मेरी सीट से दो-तीन खिड़की छोड़कर है, कि अपना सामान उन्होंने अपनी सीट पर छोड़ रखा है, कि वे हैदराबाद जा रहे हैं, कि उन्होंने चार्ट (जो बॉगी के बाहर चिपकी है) पर मेरा नाम पढ़ा और उन्हें मालूम था कि मैं भी हैदराबाद जा रहा हूं, कि वे आंध्र प्रदेश राज्य सरकार के सरकारी पदाधिकारी हैं, कि क्लॉक रूम में सामान रख कर वे इंडिया गेट आदि भ्रमण को गए थे, कि वापस क्लॉक रूम में जब वो सामान लेने गए, तो वहां काफ़ी भीड़ और लंबी लाइन थी, कि उस लंबी लाइन में जब वे खड़े अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे, तो किसी ने उनका बटुआ मार लिया था, कि उसी बटुए में उनका सारा पैसा और ट्रेन की टिकट थे, कि उन्होंने पता लगाया है, रेलवे के नियमों के तहत दुबारा टिकट बनवाने के उन्हें ढाई सौ रुपए लगेंगे, कि उन्हें मदद चाहिए

उन्होंने जब मुझे सोचता पाया तो झट से बोले हैदराबाद स्टेशन पर उनका ड्राइवर उनको लेने आएगा। वे स्टेशन पर उतरते ही मुझे मेरा पैसा वापस कर देंगे। उनकी बातें सुनते वक़्त मैंने डिब्बे में इधर-उधर नज़र दौड़ाई, तो लगा कि उन सज्जन का एकमात्र सहयात्री, उस बॉगी में, अभी तक मैं ही था। दिमाग ने अपनी रफ़्तार तेज़ की, और मुझे सूचित किया कि दिल्ली के क्लॉक रूम से सामान निकालते वक़्त अकसर लंबी लाइन लगी ही रहती है। ... और वहां …  आए दिन बटुआ मार ही लिया जाता है। यह सज्जन कोई अपवाद नहीं हैं।

फिर मेरी आंखों ने उन सज्जन की स्कैनिंग की। भाषा तो वे साहबों वाली बोल ही रहे थे, पोशाक भी (सफ़ारी सूट) साहबों वाली पहन रखी थी, मतलब सिर्फ़ चेहरे से ही नहीं उनके पूरे बदन से सहबियत टपक रही थी। इस मामले में, मेरी नज़रों ने मुझे ही धिक्कारते हुए कहा कि तुम ही तृतीय श्रेणी के यात्री लग रहे हो

फिर मेरे कानों ने कहा कि सुन ही चुके हो ये सज्जन कितनी मोहक अंगरेज़ी बोल रहे हैं। साहबों वाले स्टाइल का जादू, साहबों वाली भाषा का ज़ोर और उस सूक्ति के प्रति मेरे कमिटमेंट ने मुझमें ऐसी हलचल पैदा की कि मैं बिना उनकी ओर देखे अपने बटुए से पांच सौ का नोट निकाल कर उनकी तरफ़ बढ़ा दिए।

उन सज्जन की सज्जनता बोल पड़ी, “इतना नहीं! बस ढाई सौ दीजिए। उसी में टिकट बन जाएगा।” कहते हैं संगत का असर होता है। उनकी सज्जनता संक्रामक थी। मुझसे चिपक कर मुझसे कहवा गई, “रखिए। हैदराबद स्टेशन पर वापस ले लूंगा। रास्ते में खाने-पीने के लिए भी तो आपको कुछ चाहिए।” उस सज्जन ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए अंगरेज़ी जैसी शिष्ट भाषा के शालीन नमूने और कई सुने-अनसुने जुमले मेरी शान में पेश कर दिए। मैं उनके द्वारा प्रकट किए गए आभार के भार तले दबा जा रहा था, मानों खुद को उस से बचाने के लिए मुझे कहना पड़ा, “बिना समय गंवाए आप अपनी डुप्लिकेट टिकट बनवा लाइए। बातें और आभार प्रदर्शन हम आगे भी कह-सुन लेंगे। अगले चौबीस घंटे की यात्रा तो हम साथ ही कर रहे हैं।” सज्जन बाहर की ओर लपके, मैं एक लंबी सांस छोड़ता हुआ अपने प्रिय लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक की करिश्माई लेखनी के मायाजाल “पैंसठ लाख की डकैती” के थ्रिल में डूबने-उतराने लगा।

गाड़ी चल पड़ी थी। मैं अपनी हिचक के साथ अपनी तरफ़ से कोई पहल नहीं कर रहा था, पर मन में कहीं न कहीं यह इंसानी लालच तो था ही कि सज्जन आएं और  इस ब्रेक के बाद स्टाइल में अपने आभार प्रदर्शन के वाधित सुरों को फिर से आगे बढ़ाएं। वो न तो दिखे, न आए ही। गाड़ी आगरा क्रॉस कर रही थी। अब मैंने आंखों-आंखों में ही अन्य सीटों की टोह लिया। फिर भी न दिखे। शायद बाथ रूम में हों। उनके बताए सीट संख्या बीस पर गया। खबर ली, सीट पर उनके द्वारा बताए नाम के सज्जन ही थे, पर वो नहीं। हैदराबाद भी आ गया। उन सज्जन को न तो आना था, न वो आए ही। उनकी सज्जनता के संक्रमण ने मुझे मुर्गा बना डाला था, और मैं हलाल भी किया जा चुका था।

उस घटना को आज फ़ुरसत में याद करते हुए मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि ऐसे ज़रूरतमंद इंसानों के लिए, ऐसे मदद मांगने वालों के लिए, अपने दिल में “प्यार” बोऊं या “नफ़रत”। इसी सप्ताह बुधवार को करण की “स्मृति-शिखर से” वाली “रहिमन वे नर मर चुके...” पोस्ट ने तो मेरी दुविधा और बढ़ा दी है। उस पर से आप तो जानते ही हैं कि

“दिल से ज़्यादा उपजाऊ जगह और कोई नहीं है – क्योंकि यहां कुछ भी बोया जाए बढ़ता ज़रूर है --- फिर वो “प्यार” हो या “नफ़रत”।”

आज फ़ुरसत में दिल की खेती करने चला हूं। मेरी उलझन अभी तक मिटी नहीं है। आप ही मेरी मदद कीजिए और मुझे बताइए कि मैं ऐसी मदद मांगने वाले ऐसे लोगों के लिए अपने दिल की ज़मीन पर “प्यार” बोऊं या “नफ़रत”??

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

फ़ुरसत में ... एक दोपहरी साहित्य अकादेमी के प्रांगण में ..!

फ़ुरसत में ...

एक दोपहरी साहित्य अकादेमी के प्रांगण में ..!

vcm_s_kf_m160_148x160मनोज कुमार

दिल्ली दौरे पर था। इसी सप्ताह। अपना काम निबट चुका था। जब काम दोपहर के भोजनावकाश के पूर्व निपट जाता है, तो मैं फ़ुरसत में होता हूं। वापसी की फ़्लाइट होती है शाम के पांच बजे। सो अपने पास दो-तीन घंटे फ़ुरसतियाने के होते हैं। अमूमन मैं उसी सड़क पर आगे बढ़ जाता हूं। उस कोपरनिकस मार्ग के अंतिम छोर पर स्थित है साहित्य अकादेमी। पहले तले पर के इसके ‘बुक शॉप’ में पुस्तकें देखते, काम की पुस्तकें चुनते एक-डेढ़ घंटे तो गुज़र ही जाते हैं। यह मेरा नियम-सा बन चुका है।

इसी क्रम में इस बार भी वहीं था कि अचानक ख़्याल आया क्यों न आसपास के ब्लॉगर मित्रों से मिलकर उनका कुछ हाल-चाल जाना जाए। अरुण को फोन किया। वह तो मानों तैयार ही बैठा था, उसने तुरत हामी भर दी। राधारमण जी को जैसे मेरे ही फोन का इंतज़ार हो, बोले आप को ही याद कर रहा था, बोलिए कहां मिलना है? मैंने कहा एक मिनट में कॉल बैक करता हूं। अब बारी थी सलिल भाई की। उनको जब फोन लगाया, तो उन्होंने पूछा, ‘कहां हो?’ मेरे यह बताने पर कि मैं तो साहित्य अकादेमी में हूं, उन्होंने कहा, दो मिनट में पहुंचता हूं। जब तक मैं ‘बुक शॉप’ में अपनी चुनी पुस्तकें उठाता, बिल आदि का भुगतान करता, सलिल भाई अपनी चिर-परिचित मुस्कुराहट के साथ हाज़िर थे। मैं तो चौंक ही गया। मेरे मुंह से अनायास निकला, यहीं थे क्या? वे हंसने लगे।

salilकंधे पर टंगे स्वेटर की बाजुओं को उन्होंने छाती पर बांधा और बोले चलिए नीचे चलते हैं, वहीं लॉन की घास पर बैठकर बातें करेंगे। नीचे उतर कर हम लॉन की तरफ़ बढ़ ही रहे थे कि अरुण भी पहुंच गया। पांच मिनट के भीतर राधारमण जी भी आ गए। हम सब साहित्य अकादमी के गार्डेन की लॉन की घास पर बैठकर दिल्ली की गुनगुनी धूप का डेढ़-दो घंटे तक मज़ा लेते रहे। सच मानिए, इन एक सौ बीस मिनट में न हमने ब्लॉग की चर्चा की, न ब्लॉगिंग की और न किसी ब्लॉगर की ही! यह पहली बार हो रहा था। इसके पहले भी जहां ये चार यार मिले ब्लॉग का बुख़ार सिर चढ़ कर बोला। उन बैठकियों के दौरान शायद ही कोई क्षण ऐसा गुज़रा हो जब हमने ब्लॉग जगत के इतर कोई बात की हो!!

जब हम उस दिन बात कर रहे थे, तो सिर्फ़ बात कर रहे थे। मुझे उस मुलाक़ात में कुछ खास अलग या विशेष हुआ हो, नज़र नहीं आया। पर जब आज फ़ुरसत में ... उस दिन को याद करने बैठा हूं, ... तो लगता है कहीं-न-कहीं हम सब इस आभासी दुनिया की चमक-दमक और उपयोगिता से ऊब-से ही गए हैं। सलिल भाई ने तो यहां तक कहा कि पहले तो सप्ताह में दो पोस्ट लगाने की धुन सवार रहती थी, अब महीने में भी दो हो जाए, तो बहुत है। अरुण का भी यही हाल है – कहता है बहुत सुस्ती-सी छा गई है। पोस्ट लगाने का मन ही नहीं करता। राधारमण जी तो ‘ऐज़ यूज़ुअल’ हाल-चाल और स्वास्थ्य के प्रति ही संवेदनशील दिखे।

ऐसा भी उस दिन नहीं हुआ कि हमने देश-दुनिया के प्रति अपनी-अपनी चिंता जताई हो। या देश की ही किसी समस्या पर विमर्श कर डाला हो। साहित्य अकादेमी के प्रांगण में बैठकर हमने साहित्य के ही गिरते-उठते स्तर पर चर्चा कर डाली हो .. न, ऐसा भी न हुआ। शायद समस्याओं के प्रति हमारी संवेदनशीलता में ही कमी आ गई हो। उनकी तो वो जानें, मुझे तो यही लगता है, जब इतने बड़े और विद्वान लोग हैं ही इस पर सोचने-विचारने के लिए, तो हम सोच कर ही कौन-सा तीर मार लेंगे।

हमने इन लमहों में आपस के दुख-सुख बांटे। हाल-चाल – सुने -- गुने। सलिल भाई का प्रोमोशन आ गया है। हम सब ख़ुश हुए। बधाई दी। मिठाई खाने-खिलाने का अनुरोध रखा। दूसरे ही पल यह जानकर कि इस पदोन्नति से सलिल भाई को कोई अर्थिक लाभ नहीं होने वाला है – तुरत ही हमने मिठाई खाने-खिलाने वाला अनुरोध वापस ले लिया और यह जानकर कि इसके (पदोन्नति के) कारण उनके ऊपर तबादले की तलवार भी लटकी हुई है – हमारा मिठाई खाने-खिलाने वाला अनुरोध सहानुभूति और संवेदना में बदल चुका था। ख़ासकर तब, जब बिटिया दसवीं की परीक्षा की तैयारी कर रही हो, और पिता का तबादला हो जाए, बड़ा ही खतरनाक मामला हो जाता है।

AIbEiAIAAAAjCNut-8ux2cTvmQEQroWd49T5ifTRARjUjdXGmbLy8pwBMAFkA3w0g-7cypY8vgzrpx6GNnUxZQराधारमण जी की पदोन्नति अभी तक नहीं आई है, और सरकारी रफ़्तार तो फाइलों की रफ़्तार पर निर्भर करती है – जो अपनी ही रफ़्तार से चलती है। जो फाइल जितनी वजनी होती है, उसकी गति उतनी ही तेज़ होती है। जो फाइल रूखी-सूखी, दीन-हीन होती है, वह गति से भी सुस्त और धीमी हो जाती है। कभी-कभी तो वह अंधकार के गर्त में पड़ी धूल-मिट्टी फांकती रहती है। हां, उनकी (राधारमण जी की) पदोन्नति तो नहीं हुई, पर तबादला ज़रूर हो गया है। अब वे योजना आयोग की कुर्सी को शोभायमान करते हुए देश की ग़रीबी की रेखा को नए ढंग से परिभाषित करने में लगे हुए हैं।

हमने उनकी योजना आयोग की पदस्थापना पर ख़ुश होकर बधाई देने का अपना दायित्व निर्वाह किया ही था कि हमारे सामने उनकी समस्या सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ी हो गई। अब तक राधारमण जी अपने पहले के विभाग के कोटे के सरकारी मकान में थे। वहां से तबादला हो गया, तो उस विभाग ने मकान ख़ाली करने का नोटिस दे दिया था। ... और इसी सप्ताह यानी आज के दिन वह अवधि पूरी हो रही है। कोई अनुशासनिक/प्रशासनिक कार्रवाई न हो इसलिए वे नए मकान की चिंता में घुले जा रहे थे। मकान उचित दर, उचित स्थल और दूरी पर हो, जहां से बाल-बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो, मिल नहीं रहा था। मिठाई खाने-खिलाने का आग्रह छोड़ अरुण अपना फोन खड़काने लगता है – और अपने इष्ट-मित्रों से बात कर राधारमण जी को समस्या के यथाशीघ्र निदान का आश्वासन देता है।

arunpicअरुण की न तो पदोन्नति हुई है, और न ही तबादला। फिर भी वह किसी न किसी उधेड़-बुन में ही था। पदोन्नति आ जाए, तो वाह-वाह, न आए तो भी – वाली उसकी मुद्रा थी। हरदम कुछ-न-कुछ नया करने की उसकी धुन उस पर सवार रहती ही है। इस बार वह विश्व पुस्तक मेले में स्टॉल बुक करवा चुका है और बड़े उत्साह के साथ पुस्तक प्रकाशन के काम में जुटा हुआ है। अरुण से बहुत देर तक और विस्तार में हम पुस्तक प्रकाशन और छपाई के बारे में ज्ञान प्राप्त करते रहे।

इसी बीच अरुण के चिहुंकने की आवाज़ ने हमारी बातों का सिलसिला तोड़ा। हम कुछ पूछते उसके पहले ही वह खड़ा हो चुका था। जब वस्तुस्थिति का जायज़ा लिया तो मलूम हुआ कि लॉन की घास को पानी पटाने के लिए माली ने कहीं पानी का नल खोल कर रख छोड़ा था। पानी सरकते-सरकते अरुण तक पहुंच चुका था। इस आकस्मिक व्यवधान ने हमें तत्काल वहां से उठने को विवश किया। हमने सभा विसर्जित की और अगली बैठकी का एक-दूसरे को आश्वासन देते हुए अपने-अपने ठिकाने का रुख किया।

एयर पोर्ट के रास्ते में यह सोच रहा था, जाते ही इस बार की मुलाक़ात पर फ़ुरसत में लिखूंगा और यह शे’र मन में चल रहा था,

Imageसमेट   लो   इन   नाजुक   पलों   को

न जाने  ये  लम्हें  कल  हो  ना  हो।

हों  भी  ये  लम्हें,  तो  क्या   मालूम

शामिल उन   पलों में हम हो ना हो।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

फ़ुरसत में … क्यों बनाऊं रिश्ते, क्यों बढ़ाऊं दोस्तों की संख्या

फ़ुरसत में …

क्यों बनाऊं रिश्ते, क्यों बढ़ाऊं दोस्तों की संख्या

19012010015मनोज कुमार

आज की बात शुरु करने के पहले कल की बात शुरु करता हूं। कल एक ब्लॉगर मित्र से चैट करते-करते बात अचानक बन्द हो गई। नहीं-नहीं, आप ग़लत न समझें, उनकी तरफ़ से नहीं, मेरी तरफ़ से। अब, आज जब उन्होंने मेरी बत्ती हरी देखी तो धर लिया। आगे बढ़ने के पहले आज की चैट से आपको रू-ब-रू करता चलूं …

वो : नमस्कार! तबियत ठीक है न ?

मैं : नमस्कार ! क्यूं … तबियत के बारे में प्रश्न ..?

वो : आज कल आप अचानक गायब हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता ..!

मैं : हां, हां ठीक ही है तबियत। पर कुछ आपात स्थिति ही थी कि झट से कम्प्यूटर बन्द करना पड़ा।

वो : आज कल आप गज़ब के साहित्यकार हो गए हैं, अब आपातकालीन स्थिति क्या थी यह नहीं पता न :) ...!

मैं : बीवी की भृकुटी का तनना, तो मेरे ब्रह्मांड को भस्म कर देने की ताक़त रखता है। इससे बड़ा आपात काल क्या हो सकता है?

वो : :):) …  हाँ यह तो है ... यानि आप नेट बंद कर भाग खड़े हुए?!

मैं : अजी उसके लिए हमें अपने हाथ-पैर नहीं चलाने पड़े ...!

वो : मतलब?

मैं : उनको भी आता है कम्प्यूटर खोलना और बंद कर देना। कमाल की बात तो यह है कि हम तो शट डाउन करते हैं, वो ... शट अप !!

वो : हा हा आह, … सही है

उनकी हंसी (हा-हा) के साथ ‘आह’ ... का निकलना ... चुनौती के साथ चिन्ता की बात थी मेरे लिए। ‘हंसी’ एक चुनौती थी और ‘आह’ चिन्ता। छोटी नहीं बहुत बड़ी चुनौती, कि मैं भी ठहाके लगाता जाऊं और आह भी न निकले .. और यह तभी हो सकता था जब मैं इस आभासी दुनिया के लोगों के साथ चैटियाता रहूं। पर, आए दिन मेरे अनायास उठ गये ठहाकों से उनको बैठे-बिठाए कोई क्लु दे-देना कौन सी बुद्धिमानी की बात है? उस दिन छदामी से चैट करते-करते जो ठहाका लगाया, तो उनकी भृकुटि तन गई थी। उनकी तनी हुई भृकुटि यह सूचक होती है कि उनका अगला प्रहार मेरे लैपटॉप पर ही होना है। ... और फिर ये स्थिति मेरे लिए चिन्ता का सबब बन जाती है। तब तो मैं तय कर लेता हूं कि आभासी दुनिया से नाता-रिश्ता ही खतम कर लूं। हो जाऊं एकाकी ... क्यों बनाऊं रिश्ते, क्यों बढ़ाऊं दोस्तों की संख्या, क्यों विस्तृत करूं परिवार? उनके द्वारा और उनके साथ होने वाले और हो चुके किसी लीला प्रसंग का वर्णन करना आज का उद्देश्य नहीं है मेरा। फ़ुरसत में हूं .. तो सोचा यह प्रसंग भी बताता चलूं।

कभी-कभी फ़ुरसत में सोचता हूं तो मुझे यह प्रतीत होता है, इक्कीसवीं शताब्दी में, जहां एक दूसरी तरह की आबोहवा, बड़ी सनकी शैली में क्रियाशील है, उसके पीछे कोई विवेक नज़र नहीं आता। लोग मतलब-बेमतल भृकुटि तान लेते हैं। ऊल-जलूल हरकतें करते हैं। आपसी रिश्तों को तार-तार कर लेते हैं। लगता है हमारे चारो ओर एक तूफ़ानी हवा अंधड़ का रूप धारण कर साएं-साएं बह रही हो। ऐसा अंधड़, जो सारे मानव-मूल्यों को जैसे शेष करने के लिए ही क्रियाशील हुआ हो! अब आप कहेंगे इसमें उनकी भृकुटि कहां से आ गई? या ‘उनके’ उस लीला-प्रसंग की प्रासंगिकता क्या हो सकती है?

इसका जवाब देना मेरे लिए सचमुच विकट है। लेकिन मैंने जब उस दिन के वाकए पर फ़ुरसत में सोचने का काम शुरु किया, तो आपको अत्यंत विनम्रतापूर्वक मैं बताऊं कि वर्षों पहले जब ‘उन्हें’ जीवन संगिनी बनाया था तो अपनी सहज रुचि के मुताबिक, ‘उनको’ एक अंश तक अपनी सीमित मति के मुताबिक, मैंने समझने की कोशिश की थी। जो संबंध ‘उनसे’ सात वचनों और सात जन्मों का हुआ, उस संबंध के प्रति मेरी एक धारणा थी और आस्था भी।

मैं गांव का आदमी हूं। मेरी ये दृष्टि है, या ये मेरी जो संवेदना है, गांव की आबोहवा ने उसे रचा है। और जब उस संस्था, उस बंधन और आज के ‘उनके’ लीला-प्रसंग पर विचार करता हूं तो मुझे लगता है कि कहीं न कहीं इसका संबंध मेरे गांव के होने से जुड़ा है। हम गांव में जन्मे थे। जिस गांव में मेरा जन्म हुआ था, गंडक के समीप था वह गांव। अब जब जाता हूं, तो मेरे मुंह से अनायास निकल जाता है ‘वो कहां गया? वो तो कहीं दिखाई नहीं देता।’ मैं जब गांव जाता हूं तो लगता है जैसे किसी पराये गांव में आ गया हूं। सारा का सारा वातावरण, सारी संवेदना, जीवन शैली सब कुछ बदल गई है। पहचानना मुश्किल हो गया है कि यह मेरा ही गांव है या हम किसी और गांव में आ गये हैं।’

ये, जो मेरी अपनी संवेदना, ग्रामीण संवेदना, थी, उसकी प्रकृति ये है कि वो समूह से जुड़ी हुई संवेदना होती थी। गांव का आदमी अकेले रह नहीं सकता। उसके दुख-सुख की जो परिधि है, जो सीमा है, उसमें क़ैद होकर घुटते रहना गांव का स्वभाव नहीं है। वो बांटना चाहता है, अपना भी दुख, दूसरे का भी सुख। ये प्रकृति थी। इस तरह से मैं सोचता रहा था और आभासी ही सही, इस दुनियां, जिसे मैं ब्लॉगजगत कहता रहा हूं, फ़ुरसत में के माध्यम से अपनी संवेदना बाँटता रहा, बांटते रहना चाहता हूं।

मेरी, जो भी है, वह एक परिस्थिति छोटी-सी है – जब मैं फ़ुरसत में ... रच रहा होता हूं। इसे रचता हूं एक ललित निबंधकार के रूप में। मित्रों आप सब पंडित आदमी हैं, जानते हैं ललित निबंध की प्रकृति ही ये होती है – बात का बतंगड़ करना। कोई एक बात ले करके उस पर स्वकीय शैली में, बिल्कुल मुक्त शैली में आप अपनी बात पेश करें। रम्यता हो, लालित्य हो उसमें। वो आपको अपने साथ बांध करके यात्रा कराए। उसमें इस तरह की बात न हो जो बहुत ही गरिष्ठ ज्ञान, जो प्रायः सहृदय व्यक्तियों को वितृष्ण करता है, या जो रस के भूखे होते हैं, उनको उसमें रुचि नहीं होती। अब ऐसा बतंगड़ करते-करते मेरी मूढ़ मति किसी के लिए दुख, क्रोध, क्षोभ और रंज का कारण भी बन जाती है। मुझे दुख होता है। आज मैं दुखी हूं। और दुखी मन से आज का फ़ुरसत में रच रहा हूं।

मति मूढ़ है मेरी, सो, तर्क की कसौटी पर कस-कस के गरिष्ठ ज्ञान पेश कर नहीं पाता। वह तो एक ऐसी विधा है, जो शोध का विषय हो सकती है। लेकिन मैं जानता हूं कि ज़माने का रुख़ ऐसा होता है कि जो ज्ञान आप पेश कर रहे होते हैं, उसमें रुचि कम है लोगों की। लोग कुछ ऐसा चाहते हैं कि जो एक रसहीनता हमारे जीवन में न चाहते हुए भी प्रवेश कर रही है, बल्कि हमारे ऊपर हावी हो रही है और हमारे रस-लोक को निरन्तर सोख रही है, बंजड़ बना रही है, एक अवसाद हमारे भीतर पैदा हो रहा है, जो जीवन-प्रियता को आहिस्ते-आहिस्ते लील रहा है, उसका कुछ निराकरण करे।

‘किंकरमम्‌किंकरमेति’ - ये एक समस्या आई है हमारे जीवन में। करें क्या? शांति जिसे कहते हैं – समाधान – वो मिल नहीं रहा है। आज की इक्कीसवीं शताब्दी में, आप सब जानते हैं, कई ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं, जिन पर बौद्धिक विमर्श केन्द्रित है। नारी समस्या, अस्पृश्यता की समस्या, धर्म की समस्या, अर्थ की समस्या, इन सब समस्याओं को ले करके अकसर बड़े-बड़े मंचों की ओर से विचार विमर्श आयोजित होते हैं, जिसमें देश के शीर्षस्थ चिंतक शरीक़ होते हैं। लेकिन प्रायः मुझे ऐसा लगता है, मेरी जाति के कुछ और लोगों को भी ऐसा लगता होगा, कि ये विमर्श जो हुआ, उसका निष्कर्ष क्या है? हमारे हाथ क्या लगा? समाधान लगा – या नई-नई समस्याएं और खड़ी हो गईं। अकसर ये प्रतिक्रिया होती है कि ये एक शब्द समारोह है, इससे आम आदमी की समस्याओं का कोई समाधान होने वाला नहीं है।

हमारे गावों में चौपाल होती थी। जानते हैं आप सब। उन चौपालों में हम गंवार लोग,  विभिन्न विषयों पर हम बहस करते थे। विषय का हमें बोध था, नहीं था, पता नहीं, बस, हम बहस करते थे। विषय की सटीक जानकारी नहीं, पर हम बहस करते थे। आज भी है हममें, पर यह हमारी आदत नहीं विरासत है। गांव की विरासत! यह चौपालें, ये गोष्ठियां, जहां हम सब सिर्फ़ गपियाते ही नहीं थे। ये हमारे संवाद का माध्यम थे, संवेदना बांटने का माध्यम थे, ठीक वैसे ही जैसे इस आभासी जगत में चैटिंग। ये चौपालें कितनी समर्थ रही हैं, छोटी-छोटी समस्याओं के प्रति कितनी संवेदनशील रही हैं, और कैसे-कैसे फ़करों (कहावतों) में उनका समाधान लोगों को दे देती रही हैं, इसका एक उदाहरण देते हुए आगे बढ़ता हूं। चौपाल में बोले गए इस फकरे ने एक बेटे की आंखें खोल दीं “.. मइया निहारे जठरी (पेट) मेहरारू (पत्नी) निहारे गठरी (गांठ का पैसा)” – विद्या वो है जो मुक्त करे। सीधी सी परिभाषा उसकी है कि विद्या वह नहीं है जो मुक्त न करे, भार बढ़ाये। उलझने आपके सामने खड़ी कर दे, वह विद्या नहीं है। हम तो उसे अविद्या ही कहेंगे।

ऐसी अविद्या की एक आबोहवा हमारे बीच पसरी है। हम आंख फेरे बैठे हैं। चौपालों की ओर आप देखें और वहां के लोग निपढ़ ही होते हैं, उनको, आज की सभ्यता के जो तेवर हैं, जो शिष्टाचार हैं, उसमें उनकी न कोई रुचि होती है, न उनका उन्हें ज्ञान होता है। पढ़े लिखे नहीं हैं। लेकिन गांव में यदि किसी दूसरे के ही घर में कोई बीमार हो जाए तो काली-थान जाकर उसके आरोग्य के लिए सामर्थ्य से अधिक की मनौती रख लेते है। उनके मन में रहता है, ‘उसे कुछ हो जाएगा तो कल से मैं किससे बात करूंगा प्रभु’। ये संवेदना है, ग्रामीण संवेदना।

फ़ुरसत में कुछ कहना चाहा, अपनी अल्प बुद्धि से, कहीं आपको हममें कमी दिखाई देती है, वो मेरी अपनी है। मेरी अपनी कोई क्षमता नहीं है।

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (पांचवां भाग) उद्दाम जिजीविषा

पांचवां भाग

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ

193मनोज कुमार, करण समस्तीपुरी

चौथा भाग :: निराला निकेतन : निराला जीवन : निराला परिचय

तीसरा भाग :: निराला निकेतन और निराला ही जीवन

दूसरा भाग : कुत्तों के साथ रहते हैं जानकीवल्लभ शास्त्री!

पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!

उद्दाम जिजीविषा069 

079शास्त्री जी का व्यक्तित्व भी उनके कृतित्व की तरह विराट है । उम्र का असर उनकी स्मृति पर है किन्तु वाणी पर विल्कुल नहीं। स्मृति और विस्मृति के बीच उनकी खनकती आवाज़ असीम आत्मीयता का अनुभव दे

ता है। हमने उनके घर को देखने की इच्छा ज़ाहिर की तो बोले, “इस घर में प्रायवेसी नाम की चीज़ है ही नहीं। जहां तक आपकी दृष्टि जाए, सब आपका है। घूमिए-फिरिए। यह तो बाहर का लौंडा है ... बाहर से यहां आया था, यहीं का होकर रह गया। इतनी बड़ी जगह, एक एकड़, में एक आदमी रहता है। यह देखने वाली चीज़ है।”
 

शास्त्री जी की छाया

071

सबसे पहले हम पहुंचे सामने के कमरे में जिसमें शास्त्री जी की पत्नी, श्रीमती छाया देवी थीं। हमारी श्रीमती जी पहले से ही उनके साथ घुल-मिल गईं थीं। उन्होंने पूछा, “आपके बाल बच्‍चे …?”

छाया देवी ने  कुछ जवाब नहीं दिया, सिर्फ ना में सिर हिलाए।

आगे उन्होंने जानना चाहा, “घर का काम-धाम ..?”

छाया देवी बताती हैं, “बाई हैं। आती है सुबह नाश्‍ता बना देती है। दोपहर में आकर खाना बना देती है। मुझे नहला भी देती है। मुझसे कुछ नहीं होता। हाथ काम नहीं करता। लाचार हूँ।”
श्रीमती जी ने पूछा, “किसी से दिखाई नहीं?”
तो बताने लगीं, “दिखाई थी। दिल्‍ली में। सर गंगा राम हॉस्‍पीटल में। यहां पर इनके भाई की बहू को छोड़कर गई थी शास्‍त्री जी की देखभाल के लिए। वहां डाक्‍टर बोला रहकर ईलाज करवाना होगा। पर कैसे रहते? यहां जिसे छोड़ा था वह घबरा गई, उसने फोन कर दिया। चली आई। शास्‍त्री जी को किसके ऊपर छोड़ूं। उन्‍हें भी तो देखना पड़ता है।” वो वस्तुतः शास्त्री जी की छाया हैं। इतने स्‍नेह से पूरित दम्‍पत्ति जो एक दूसरे की चिंता में घुला जा रहा है।
छठ पर्व है। .. और बाई के द्वारा घर का कई काम होता है। पर बाई को भी छठ पर्व करना है। बताती हैं, आज तो खरना है। वह तो आकर दिन में ही रात के लिए सब्‍जी बना गई है। रात में प्रसाद भेज देगी तो खा लेंगे। पर कल वह छठ करेगी। कल कैसे काम चलेगा इसकी परेशानी है।”
उनकी पत्नी से भी आशीष लेने का मन हुआ। तब तक तो मेरी श्रीमती जी उनसे बातें कर ही रहीं थी। हम जब गए तो उनके चरण छूए। आशीष देते बोलीं, “आप भी लिखते हैं?”

072मैंने कहा, “बस ऐसे ही, थोड़ा बहुत। शौकिया।” बोलीं, “आप अपनी रचना दीजिए। हम बेला में छापेंगे। बेला शास्त्री जी की पत्रिका रही है। खुद संपादन करते थे। अब नहीं कर पाते। मैंने भी बहुत दिनों तक किया। अब अस्वस्थ रहती हूं। तो अब इसका काम किसी और को दे दिया है। शास्त्री जी के जन्म दिन पर इसका वार्षिकांक आएगा। उसी में आपकी रचना छापूंगी। दे दीजिएगा।”

हमने पूछा कि कब है शास्त्री जी का जन्म दिन तो उन्होंने बताया, “माघ शुक्ल द्वितिया को। इसबार ४ फ़रवरी को पड़ेगा। उस दिन बहुत सारे कार्यक्रम होते हैं। प्रतिवर्ष। पूजा, हवन, सांस्कृतिक कार्यक्रम दिन में .. फिर रात में कवि सम्मेलन। दूसरे दिन सुबह तक चलता है, यानी सूर्योदय से सूर्योदय तक।” फोन नम्बर भी दिया उन्होंने, 0621-2286466, बोलीं, “इस पर कार्यक्रम की जानकारी ले लीजिएगा, और ज़रूर आइएगा।”
हमारी श्रीमती जी को शास्त्री जी की पत्नी बताती हैं, “इनकी साहित्य साधना ग़ज़ब की है। एक दिन कुछ लिख रहे थे। शाम तक पूरा नहीं हो पाया। तो बाहर चबूतरे पर चले गए। उसी चबूतरे पर बैठकर रात भर लिखते रहे। शास्त्री जी कहते हैं, सृजन सुनसान में ही संभव है।”

रैक पर सैंकड़ों पुस्तकें

एक रैक पर सैंकड़ों पुस्तकें पड़ी हुई थी। गड्ड-मड्ड। एक के ऊपर एक। बेतरतीब, धूल-गर्द जमी हुई। उनकी पत्नी से पूछा, “क्या ये सारी शास्त्री जी की रचनाएं हैं?” उन्होंने बताया, “नहीं, इनके ऊपर लोगों ने लिखा है। ये वो पुस्तकें हैं। सब भेज देते हैं।”

किताब, पत्र-पत्रिकाओं का अनगढ़ अम्बार। राधा पढते वक़्त शास्त्री जी के शब्दों में इसका अर्थ जाना,
“सौष्ठव सम्भाल में ही नहीं, बेसम्भाल में भी है। रचाव के मुक़ाबले अनगढ़ में कहीं अधिक तेजस्विता देखी जाती है।”
इसको और स्पष्ट करते हुए उसी पुस्तक में शास्त्री जी कहते हैं, “भक्ति और प्रेम  मूलतः एक ही तत्व हैं। अन्तर है एक के हर घड़ी सम्भाले रहने में और दूसरे के अल्हड़पन में। भक्ति को सम्भाले रखना पड़ता है। ‘मैं इन पुस्तकें, जो मुझ पर लिखी गई हैं, से प्रेम करता हूं।’
यह व्यक्ति जो लिखता है, वही जीता है। अल्हड़पना है इनके जीवन में। वही अल्हड़पना हमें इस पूरे निराला निकेतन में विखरा पड़ा मिला। यहां-वहां, सब जगह। हम पूरे निकेतन में घूम-घूम कर फोटो खीचते रहे, खिचवाते रहे। गाय के लिए नादों के बीच, चबूतरे के पास, पशुओं की समाधियों के पास, उनके बीच के संकट मोचन मंदिर के पास।

कुछ दिन और चलूंगा मैं?089

जब हमने चलने कि इच्छा ज़ाहिर की तो पूछे, “देखने से लगता है कि कुछ दिन चलूंगा मैं?”
हम इस अकस्मात्‌ आए वाक्य को ठीक से समझ नहीं पाए तो पूछ बैठे, “जी?” तो फिर समझाते हुए बोले, “आपको देख कर कैसा लगता है – डेढ दो साल और खींच दूंगा। पच्‍चानवे साल का हो गया हूँ मैं। पता नहीं और कितने दिन और खीचूँगा।”
“नहीं नहीं आप अभी बहुत दिन हमारे साथ रहेंगे।”
वापस आने का मन तो नहीं था, पर मां का आदेश था भागवान को भोग लगने के पहले वापस जाना है। अतः चल पड़े। विदा लेने के लिए जब शास्‍त्री जी से कहा तो कहने लगे, “कुछ देर और बैठते। कुछ खाया पीया नहीं। कहोगे जाकर कि शास्‍त्री जी ने बिना खिलाए पिलाए विदा कर दिया।”

हमने कहा, ‘‘अब चलते हैं। फिर आएंगे।”

कहने लगे, “बिना कुछ खाए जा रहे हो तुम्‍हारे लिए ही इंतजाम करवा रहा हूँ।”
आने का मन तो नहीं था। पर .....!
 
094रास्ते में लौटते वक़्त मन में यह ख़्याल आ रहा था .. जिसने सारा जीवन साहित्य साधना में लगा दिया हो … जिसके मुंह से एक एक वाक्‍य सुक्ति के रूप में निकलता है … ऐसी साहित्यिक धरोहर को हम Preserve करके नहीं रख सकते? आज वह एकाकीपन और त्रासदी को जी रहा है। क्‍या सरकारी तंत्र इतना लाचार है कि इस धरोहर को Nursing की सुविधा भी मुहैया नहीं करा सकता?
शहर से दूर अपनी नौकरी की मजबूरी न होती तो उनके सानिध्‍य में कुछ सेवा का पुण्‍य कमाने का अवसर नहीं खोता … पर ये विचार मेरे मन में बार-बार कौंध रहा था कि वह कौन सा आक्रोश था इनके मन में कि 95 साल का यह साहित्‍य का सेवक राग केदार में, किसने बांसूरी बजाई गा तो लेता है – पर सरकारी सम्‍मान पद्म श्री लेने से इंकार करने का मन बनाता है।
साहित्यिक गुटबंदियों से दूर मुजफ्फरपुर जैसे शहर में उन्होंने अपना पूरा जीवन बिताया। बेला जैसी साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते रहे। तथाकथित महान आलोचकों की दृष्टि में वे सदा अलक्षित ही रहे। जानकीवल्लभ शास्त्री जी का साहित्यिक योगदान भारतीय काव्य परंपरा के विकास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना चाहिए।

055आज माघ शुक्ल पक्ष की द्वितीया है, शास्त्री जी का जन्म दिन!

 

 

 

 

ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उन्हें दीर्घायु करे।

शनिवार, 29 जनवरी 2011

फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (चौथा भाग)

फ़ुरसत में …

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ

193मनोज कुमार, करण समस्तीपुरी

तीसरा भाग :: निराला निकेतन और निराला ही जीवन

दूसरा भाग : कुत्तों के साथ रहते हैं जानकीवल्लभ शास्त्री!

पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!

चौथा भाग ::

निराला निकेतन : निराला जीवन : निराला परिचय

हमने कहा, “अगर आपको अपना परिचय देना हो तो क्या कहेंगे?”

069शास्त्री जी बोले, “क्या कहूं, क्या परिचय दूं? एक पागल आदमी है, अकेले रहता है। ... यही मेरा परिचय है। विचित्र जीवन है मेरा। Different! Different होने में समय लगता है। आज के आदमी को मेरे बारे में, मेरी जीवन शैली के बारे में कहिएगा तो क्या कहेगा? .... कहेगा पागल है! मैं भाग्यशाली हूं ... इस अर्थ में कि मुझे कोई जानता ही नहीं। .... मैं आनंद से रहता हूं। जिन्हें दुनिया जानती है, उसे दुनिया नचाती रहती है, और वह नाचता रहता है।”

आगे बोले, “मेरी लिखी हुई किताबें अकेले उठा नहीं सकते आप। आप हमारे बारे में जानने की कोशिश ही मत कीजिए! जो यहां के आदमी हैं वो अपने को सबसे बड़ा कवि, लेखक, सब मानते हैं। उनको मानने दीजिए। और हमारे बारे में कहते हैं, … हां एक आदमी है, … कोई पागल लेखक, … अकेले रहते हैं। उनका कोई नहीं है। यही मेरा परिचय है। उसमें आप पड़िएगा तो बहुत मुश्किल है।’’

उत्तर छायावादी कवि हैं। उन्हें छायावाद का पांचवा स्‍तम्‍भ भी कहा जाता है। उनकी कविताएं अनुभूति प्रधान हैं। अद्भुत छंदबद्ध रचनाएं करते हैं वो। काव्‍य में पीड़ा मूलधारा है। मां पांच साल में गुजर गई उसमें जो वेदना स्‍वरूपित हुई वह गीतों में व्‍यक्त हुई। कालीदास पर उपन्‍यास लिखा उन्होंने। दार्शनिक कवि हैं। कविता सांस्‍कृतिक उन्‍नयन की है। जीवन मूल्‍य, अनेकांतवादी, मानवदर्शन पर लिखी रचनाओं में गहराई भी है, ऊंचाई भी।

imageप्रगतिशील दृष्टि- से लिखी गई है “राधा” ! राधा सात खण्डों में विभक्त उनका महाकाव्य है। राधा में राधा के संदर्भ में भाव और कृष्‍ण के संदर्भ में युग बोध प्रबल है। राधा की एक प्रति लेने की हमने इच्छा ज़ाहिर की तो सेवक से मंगवाकर सौंपते हैं। उस पर उनके हस्ताक्षर लेने की इच्छा ज़ाहिर की। बिना चश्‍में के सब चीज़ें देख लेते हैं। राधा महाकाव्य की पुस्तक हाथ में लेकर उसके पन्‍ने पलटते रहे। “राधा ” में उनकी “छाया” नहीं मिल रही थी। बोले, “सब सौंप दिया है उन्‍हें। यह पुस्‍तक भी। इनके मूल्‍य उन्‍हें ही दे दो। मैं क्‍या करूंगा, सब उनका है।” जब “छाया” की छाया नहीं मिली तो बोले, ‘‘लगता है प्रकाशक ने उनका फोटो हटा दिया इसमें से।’’ मैंने पुस्‍तक से उसे खोज निकाला और उनके सामने कर दिया ... “ये है तो।”

बहुत देर तक निहारते रहे। बोले, “अब सब इन्‍हीं का है।” पुस्तक पर उनके हस्‍ताक्षर लिए। एक छोटा हस्ताक्षर करके बोले ‘‘छोटा हो गया। बड़ा एक और ले लो!’’

सम्मान-पुरस्कार

ये 'साहित्य वाचस्पति, 'विद्यासागर, 'काव्य-धुरीण तथा 'साहित्य मनीषी आदि अनेक उपाधियों से सम्मानित हुए तथा पद्मश्री जैसे राजकीय पुरस्कार को ठुकरा चुके हैं। पुरस्‍कार कई मिले – राजेन्‍द्र शिखर सम्‍मान (बिहार का )। उत्तर प्रदेश सरकार ने भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया। एक पुरस्कार इंदिरा जी के हाथों नहीं लिया। और हाल ही में २०१० में जब पद्म श्री के पुरस्कार की घोषणा की गई तो उन्होंने इसे लेने से मना कर दिया। इसे 'मजाक' कहकर शास्त्रीजी ने अस्वीकार कर दिया। उनके शब्दों में दर्द साफ झलक रहा है। महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री हिंदी और संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं। साहित्यकारों की कई पीढ़ियां उनके आंगन की छांव में बड़ी हुई हैं....महाकवि से कनिष्ठ कई लोगों को पद्मश्री से बड़ा पुरस्कार मिल चुका है। ऐसे में शास्त्रीजी का दर्द जायज है। दुखी शास्त्री जी बोल पड़ते हैं, “सालों से मेरी सुध लेने कोई नहीं आया।” सच्चे साहित्यकार को सम्मान की भूख भले ही न हो लेकिन उपेक्षा का दंश जरूर उसे सालता है...महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री का जो हिंदी साहित्य में योगदान है उसको सिर्फ पद्मश्री से नहीं तौला जा सकता है!

वर्षों पहले उन्होंने लिखा था

कुपथ कुपथ रथ दौड़ाता जो
पथ निर्देशक वह है,
लाज लजाती जिसकी कृति से
धृति उपदेश वह है,

परिवार

071परिवार के बारे में बताते हुए कहते हैं, “पहली पत्नी का नाम चन्द्रकला था। मैगरा में ही १९४७ में उनकी मृत्यु हो गई। पुत्री शैलबाला को छोड़कर चली गई वो। उनसे एक लड़की है। उसकी दो लड़किया हैं। सब प्रोफ़ेसर हैं। गोरखपुर में।” परिसर में प्रवेश करने के ठीक पहले शास्‍त्री जी की एकमात्र संतान पुत्री शैलबाला जी का अपेक्षाकृत छोटा मकान है। उसमें वह और उनके पति प्रतापचंद्र मिश्र रहते हैं। वे भी अस्‍सी वर्षीय हैं। शैलबाला हिंदी की अवकाशप्राप्‍त प्राघ्‍यापिका हैं। उनकी भी उम्र सत्तर से ऊपर की ही होगी। शास्‍त्री जी के परिसर में आना जाना कम ही होगा। मिश्र जी राजस्‍व विभाग में काम करते थे। सेवा निवृत्त हैं । आकाशवाणी पटना से 70 के दशक में रामेश्‍वर सिंह कश्‍यप के बहुप्रसारित नाटक “लोहा सिंह” में फाटक बाबू की भूमिका निभाते रहे हैं ।

प्रसिद्ध कविता ‘किसने बासुरी बजाई’ गा कर सुनाया … !

करण का उनसे निवेदन होता है कि आपके गीत किसने बांसुरी बजाई हमारे कोर्स में था। हमें बहुत अच्छा लगता है। उसे सुनाइए न।

वो कहते हैं, ‘‘हां, उसे मुज़फ़्फ़र आने के बाद ही लिखा था। इसे बहुत गाया। मंचों पर। अब इस उम्र में गा सकता हूं क्या?” फिर कुछ देर ठहर कर बोलते हैं, “राग केदार में इसे गाता था।” फिर राग केदार की सरगम सुनाते हैं064

यह राग कल्याण थाट से निकलता है। समय रात का पहला प्रहर है।

आरोह - स म म प ध प नी ध स।

अवरोह--स नी ध प स प ध प म ग म रे स।

पकड़--स म म प ध प म रे स।

ये है राग केदार ... फिर गाने लगते हैं,

किसने बांसुरी

बांसुरी बजाई

बांसुरी बजाई!

बांसुरी...

किसने बांसुरी बजाई ?

जनम-जनम की पहचानी-

वह तान कहां से आई?

अंग-अंग फूले कदम्ब-सम,

सांस-झकोरे झूले;

सूखी आंखों में यमुना की –

लोल लहर लहराई!

किसने बांसुरी बजाई?

जटिल कर्म-पथ पर थर-थर-थर

कांप लगे रुकने पग,

कूक सुना सोए-सोए-से

हिय में हूक जगाई!

किसने बांसुरी बजाई?

मसक-मसक रहता मर्म-स्थल,

मर्मर करते प्राण,

कैसे इतनी कठिन रागिनी

कोमल सुर में गाई!

किसने बांसुरी बजाई?

उतर गगन से एक बार-

फिर पीकर विष का प्याला,

निर्मोही मोहन से रूठी

मीरा मृदु मुसकाई!

किसने बांसुरी बजाई?

ओह! क्या अद्भुत नज़ारा था हमारे लिए! एक ९५ साल का शख्स हमारे लिए, हमारे अनुरोध पर फिर से अपना यौवन जी रहा था। न सिर्फ़ उनकी बल्कि हमारी आंखों से भी अविरल अश्रु की धार बह चली!!!

उनके मुंह से निकला ‘‘आजकल लोग न जाने क्‍या लिखते हैं?’’

शनिवार, 22 जनवरी 2011

फ़ुरसत में … आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ (तीसरा भाग)

फ़ुरसत में …

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के साथ

193मनोज कुमार, करण समस्तीपुरी

दूसरा भाग : कुत्तों के साथ रहते हैं जानकीवल्लभ शास्त्री!

पहला भाग-अच्छे लोग बीमार ही रहते हैं!

तीसरा भाग :: निराला निकेतन और निराला ही जीवन 

055आचार्य शास्त्री कहते हैं, "विचित्र जीवन मैंने जिया। कोई समझ नहीं सकता। भाग गया था, गया से। मां नहीं थी। कुछ पढ़ा लिखा नहीं। बी.एच.यू गया पढ़ने! .. बिहार में रहने का सौभाग्य नहीं मिला। भागा तो बनारस चला गया। फिर वहां से रायगढ। किसी ने ललकार दिया। पहुंच गया रायगढ। १९-२० साल की उम्र में। सारे हमसे बड़ी उम्र के थे। वहां मैं ही चुन लिया गया। रायगढ़ के राजा प्रभावित थे। उन्होंने राजकवि का सम्मान दिया। राजकवि बन गया। पर वहां के लोगों में सबसे बड़ा अवगुण था कि वे सब मांसाहारी थे। मैं गंध भी नहीं सह सकता। वहां के वातावरण में मांस की गंध। गंध भी नहीं सह सकता। खाने की बात कहां से! कमरा जो मुझे मिला था उसमें चारो ओर से गंध ही गंध। मैंने बहुत हिम्मत करके वहां की, राजकवि की, नौकरी छोड़ दी। नहीं तो उस तरह की नौकरी कोई छोड़ नहीं न सकता था। राजकवि के पद पर था। छोड़कर बनारस आ गया। ईश्वर की कृपा हुई। दो मिनट के अंदर हमको दूसरी नौकरी मिल गई। Never stood second, even in the first class! ये है न बात! फ़र्स्ट क्लास में भी फ़र्स्ट। कभी सेकेंड हुआ ही नहीं। ये कोई साधारण कैरियर नहीं है। इसीलिए नौकरी मिलने में मुझे एक मिनट का समय लगा ही नहीं। मैंने चाहा और हो गया। ये ही ईश्वरीय कृपा थी। कोई अपना नहीं था। मां नहीं थी। कोई नहीं था। तो भगवान खड़े हो गए।’’

महामना : महामानव के निर्माता

061कुछ देर बाद बोले, “मेरी सारी पढाई काशी में हुई। लोग नौकरी के लिए कोशिश करते हैं। मालवीय महाराज ने हमारे लिए रिकोमेंड किया। कहा कि ऐसा लड़का तुमको मिलेगा कहां। ले जाओ। ये बहुत बड़ी बात है। इसको आज के आदमी को कहिएगा तो हंसेगा। कहेगा सब पागल है। आपने मालवीय जी का नाम भी नहीं सुना होगा। मालवीय जी के कृपापात्र बनकर वहां, ८ साल उनके साथ रहा हूं। बहुत मानते थे मुझे। जब तक वो जीवित रहे, उनके साथ ही रहा। मालवीय जी के साथ गुज़ारे समय, मेरा सौभाग्‍य, 8 वर्ष रहा उनके साथ। जब उनकी मृत्‍यु हुई उनके पास बैठा था। उनकी बगल में बैठकर पाठ कर रहा था, जब वो दिवंगत हुए! उसके बाद छोड़ दिया मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश सब।। वहां से छूटा तो मुज़फ़्फ़रपुर आ गया। उसके बाद यहीं का होकर रह गया! बनारस में मुझे प्रसाद, निराला, प्रेमचंद, नंददुलारे वाजपेयी का स्‍नेह मिला। बनारस में काकली की रचना की। “बंदी मंदिरम” की भी।’’

कुछ याद करते हुए कुछ देर चुप रहे, फिर बोले ... “I never stod second in my life, even in the first class! इस कारण से नौकरी मिलने में कोई कठिनाई, कभी नहीं हुई। जो चाहा वही मिल गया। सब ईश्वरीय कृपा है। जहां भी परीक्षा दी हमेशा फर्स्‍ट आया। नौकरी के लिए हाथ पांव नहीं मारना पड़ा। ईश्‍वर की कृपा रही मुझ पर।”

ऐसे आये मुज़फ़्फ़रपुर

“सन 1939 में मुजफ्फरपुर पहली बार आया। गंगा कभी देखा नहीं था! गलती से नदी पार कर गया फिर यहीं का होकर रह गया। तब यहां रमना में उमाशंकर प्रसाद सिंह हुआ करते थे। 1939 से 48 तक उन्‍हीं के यहां रहा। “राधा” की पांडुलिपि उनकी बेटी और मेरी शिष्‍या चंदा ने तैयार की। घूमता हुआ आ गया मुज़फ़्फ़रपुर। इंटर्व्यू चल रही थी यहां। ठहरने की व्यवस्था नहीं थी। मुझे ठहराने की जगह नहीं मिली, तो संस्कृत कॉलेज में ठहराया गया मैं। वह, अनुग्रह नारायण सिंह का जमाना था। परीक्षा होने लगी। लोगों ने कहा आप भी जाइए ना। दूर-दूर से लोग आए थे। उन सब के बीच .. जहां ठहरने की जगह नहीं थी, वहां प्रोफ़ेसर हो गया। बच्चा बाबू ने अपने यहां रखा। छह वर्ष तक रहा उनके साथ। फिर जब पटना में सर्विस हो गई तो वहां गया। वहां कई वर्षों तक प्रोफ़ेसर रहा।”

गउएं भी निराली हैं067 

093उनके यहां इतनी गउएं हैं। और घर में प्राणी मात्र दो। इसका भी अलग किस्सा है। बताने लगे, “गाए पहले एक खरीदी थी। पिताजी के लिए। जब मुज़फ़्फ़रपुर आया तो पिता को अपने साथ ले आया। पिताजी को रात में दूध दिया गया खाने को। पूछा कैसा दूध है? खरीदकर मंगाया गया है, यह बताने पर उन्होंने कहा कि मैं तो खरीदकर दूध खाने का पक्षधर नहीं हूं। अगले रोज मैंने दरवाजे पर गाय बांध दी। उससे ही इतनी हुईं। पहली गाय का नाम कृष्णा रखा। वो काली थी, इसलिए। ये देख रहे हैं न सामने ... कृष्‍णायतन है, उसके नाम पर। यह घर कृष्‍णा के रहने के लिए बनवाया था। कृष्णा तो रही नहीं पर उसकी संतानें पीढियों से यहां रह रही हैं।

068जो गाय पहली बार पिताजी के लिए मैंने ली उसी की संतानें चल रही हैं। कितनी पीढियां आ गईं। कितने बच्चे पैदा हुए।” सामने नाद के दोनों और कड़ी से बंधे -बछड़ों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, '' ये सब तीसरी-चौथी पीढ़ी वाले हैं!”

“सबने कहा कि किसी को बेच दें। किसी को दे दें। दे देना भी तो बचाव है। न हमको गाय बेचना है, न दूध बेचना है। न तो एक बूंद दूध बाहर गया और न कृष्‍णा की कोई संतान कभी बिकी। यहां के कुत्ते बिल्लियों से लेकर इंसानों तक, सब दूध खाते हैं, दूध पीते हैं, और सब यहीं आनंद से रहते हैं। खाते हैं-पीते हैं। सारे पशु-पक्षी, कुत्ते-बिल्ली।”

करण ने पूछा, ‘गाएं जो दूध देती है उसका क्या करते है?’

तो हंसते हुए बोले, “आइए, बैठिए, खिलाएंगे। बेचना छोड़कर और जो काम हो सकता है वो सब होता है। बेच नहीं सकते हैं।” अहहहा.... कितना प्रगाढ़ दर्शन है... ? कवि कभी व्यापारी नहीं हो सकता । वह (भावनाएं) बांटना जानता है, बेचना नहीं।

092सूर्या-क्षश्थी व्रत के प्रथम नैवेद्य की संध्या दस्तक दे रही है किन्तु हमें आचार्यजी की वात्सल्यमयी वाणी से तृप्ति नहीं मिली है। नाद की दोनों तरफ बंधी गायों को स्नेहपूर्वक निहारते हैं। फिर हाथ से इशारा कर बोलते हैं, “... और कृष्‍णा और उसके मरी हुई संतानों की समाधियां भी इसी हाते के अंदर है। सबकी पक्‍की समाधियां बनी हुई हैं। निराला निकेतन में जो गायें मरतीं हैं, उन्हें यहीं समाधिस्थ कर दिया जाता है। चाहते हैं तो घूम आइए। देख आइए आंखों से! सामने ही तो है। जाकर देखो उनकी समाधि बनी हुईं हैं। हम उनको मां मानते हैं .... तो .... मानते हैं। गायों की कितनी पीढियां यहां आ गई हैं। लोग कहते हैं ... अब ... कि किसी को बेच दें ... या दे-दें .... नहीं! न इनका दूध बेचना है ... न किसी को देना है। दूध भी नहीं बेचता। बेचना छोड़कर सब करता हूं। इतनी कुत्ते-बिल्लियां हैं यहां ... सब पीते हैं। और मैं गाता हूं किसने बांसूरी बजाई। सब अकेले कर रहा हूं। ईश्वर की मर्जी।”082

 

लेखनी-लेखन

अपनी लेखनी के बारे में भी कुछ बताइए। जब हमने यह पूछा, तो बोले, “जितनी पुस्तकें मैंने लिखी है, .. आप उठा भी नहीं सकते।” फिर हाथ फैला कर बताते हैं, “इतनी किताबें लिखी है! बहुत किताबें लिखी। इतना काम किया। पढता था। ... लिखता था। मैंने जीवन भर सरस्वती की साधना की है। इसके अलावा दूसरा कोई काम ही नहीं किया।...

089“अभी एक पुस्तक आई है – राधा। सात खंडों के इस एकाकार महाकाव्य का मूल्य एक हजार रुपये है। मेरी इस किताब का दाम है एक हज़ार! लोग सुन कर घबरा जाते हैं। क्या नहीं लिखा, कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक ... सब। इतनी छोटी उम्र में इतनी किताबें लिख गए ... आज सोचता हूं तो विश्वास ही नहीं होता। मैंने अपना प्रचार नहीं किया कभी। दिनकर जी ने अपना प्रचार किया। राजनीति के लोग थे वो। मैं तो कविता करने वाला आदमी था। रजनीतिज्ञ नहीं। कविता और इन चीज़ों में अंतर हो जाता है। किसी को प्यार करना अलग चीज़ है, उस पर भाषण करना अलग हो जाता है। मैं कविता से प्यार करता हूं। विचित्र जीवन है मेरा। समझा नहीं सकता।”087