बुधवार, 12 जनवरी 2011

देसिल बयना-63 :: रहली तs मन न भयली, गईली तs मन पछतईली

देसिल बयना-63

रहली तs मन न भयली, गईली तs मन पछतईली

salilसलिल वर्मा

इस देसिल बयना के रचयिता का नाम देखकर आप चौंके तो होंगे ही। मज़ेदार वाकया हुआ। सलिल जी के साथ फोन पर बात हो रही थी और उनके मुंह से अचानक यह बयना निकला। तो मैंने स्लिप में खड़े फ़िल्डर की तरह झट से इसे लपका और कहा आपने तो बड़ा अच्छा देसिल बयना कह डाला। क्यों नहीं हमारे ब्लॉग के लिए इसपर एक पोस्ट लिख डालते हैं। … और यह सलिल जी का बड़प्पन कि बिना देरी किए उन्होंने आधे घंटें में मेल से यह पोस्ट भेज दिया। उनके प्रति आभार सहित हम उसे हम पेश कर रहे हैं। --- मनोज कुमार

इंदु के बिआह एतना नीमन घर में अऊर एतना बड़का इंजीनियर से हुआ कि पूरा टोला में लोग दाँत तर उँगरी दबा लिया. कोनो कोनो बूढ पुरनियाँ के मुँह का त ई हाल था कि काला जामुन मुँह में डाल के निकाल लीजिये, तईयो उसके ऊपर खरोंच का निसान नहीं पड़ेगा. कहे का माने कि एकदम पोपला मुँह, दुनो गाल आपस में गला मिलने के लिये तत्पर, तईयो इंदु के बिआह में मसूढ़ा तर ऊँगरी दबाये, दुल्हा को देखकर गीत गाने से नहीं बाज आ रही थीं कि पुरबs पच्छिमवा से अईलन सुंदर दुल्हा, जुड़ावे लगिलन हेs सासू अपने नयनवा. जेतने लोग दुल्हा का तारीफ करता, ओतने लोग इंदु के भौजाई का तारीफ करने से नहीं चूकता.

“भला कोई कहियो सकता है कि बिना बाप के बेटी का बिआह एतना धूम धाम से अऊर एतना बढिया लड़िका से हो सकता है.”

“हमको त लगता है कि बिस्नाथ चचा जिंदा होते, तैयो एतना नीमन बर नहीं खोज सकते थे.”

“ई त भौजाई होकर भी महतारी से बढ़कर काम की हैं सकुंतला भौजी.”

“अऊर का! नहीं तs के एतना खर्चा करता है कोई अप्पन ननद के ऊपर, ऊ भी टूँअर (अनाथ)बिना बाप के बेटी पर.”

“सच्चो, भगवान रामरती चाची जईसा पुतोह सबको दे. घर सम्भारने से लेकर, ननद के बिआह तक एक गोड़ पर सब काम की है सकुंतला भौजी.”

सकुंतला भौजी अऊर इंदु, कहे को तो ननद भौजाई थीं, मगर दुनो का सम्बंध देखकर लगता था कि दुनो एक्के पेट के बहिन है, चाहे सखि सहेली. बिस्नाथ चचा मरते बखत एही एगो जिम्मेदारी छोड़ गए थे अपना बेटा राज किसोर अऊर पुतोह सकुंतला के ऊपर. सकुंतला कोनो कसर नहीं छोड़ी अपना ससुर का अंतिम इच्छा पूरा करने में. टोला मोहल्ला में जब इंदु का बात चलता था तब सकुंतला भौजी एही बात कहती थीं सब से कि तनिको बिआह सादी में उँच नीच हो जाएगा तs सब बदनामी हमरे माथा पर आएगा. लोग कहेगा कि बिना बाप के बेटी को भौजी बिलटा दिहिस. आखिर हमको भी तो बाबूजी को मुँह देखाना है. अऊर बाबूजी कहते हुये माथा पर अँचरा ओढ़ लेती थी. एतना आदर्स अऊर व्यौहार कुसल थी सकुंतला भौजी कि लोग उनका उपमा देता था. दादी नानी लोग तs गोड़ लागने पर आसीर्बाद देती थीं कि राजकिसोर बहु जईसन पुतोह मिले.

पुराना कहनाम है कि दुस्मनी एकतरफा हो सकता है, प्रेम दुनो तरफ से होता है. इंदु भी अपनी भौजाई को बहिन, दोस्त अऊर माई से कम नहीं समझती थी. अगर सकुंतला भौजी कोनो बात के लिये मना कर दी त का मजाल कि इंदू ऊ काम कर दे. भौजी का एक्के बात उसको ध्यान में रहता था कि अगर तुमरा एक्को गो कदम, एन्ने ओन्ने पड़ गया तो हम किसी को मुँह देखाने के लायक नहीं रहेंगे. हमको तो बस गंगा जी के गोदी में सरन लेना पड़ेगा.

मगर बाप रे बाप. दुन्नो ननद भौजाई में जुद्ध भी बहुत भयंकर होता था. अऊर तब ओलाहना सुनने लायक होता था. चुपचाप रामरती चाची सुनते रहती थी. बीच बचाव करने का तो उनको कोनो मौके नहीं मिलता था. कुछ कहीं नहीं कि दुनो ननद भौजाई उनके ऊपर लुझ जाती थी, “ए माय! आप चुपचाप कोना में बईठकर हवा महल सुनिये ट्रांजिस्टर पर. ई हमलोग का मामला है, हम लोग फरिया लेंगे.”

इसके बाद फिर लड़ाई चालू.

“देख लेना इंदु! हमरे मना करने के बावजूद भी तुम सरसती चाची के घर गई थी, ई ठीक बात नहीं है.”

“हम का उनके घर हलुआ खाने गये थे. रजनी से किताब लेने गये थे.”

“कॉलेजे में काहे नहीं ली किताब! देखी थी, ऊ दिन केतना लड़ाई की थीं माय से. इसके बाद भी तुमको मन कैसे किया ओहाँ जाने का!”

“हमको लड़ाई से का मतलब. जब देखिये त हमको लोग डाँटते रहता है.”

“डाँटे नहीं हैं, समझा रहे हैं.”

“हमको नहीं समझना है ई सब.”

“समझोगी कईसे नहीं. कल को अपना घर चल जाओगी तs ई लच्छन से लोग हमको दूसेगा.”

“तs बिआह दीजिये कोनो राह चलता से. आज बाबूजी जिंदा रहते तs दोसरा घर का औरत हमको एतना बात बोल जाती.”

“जब तुमरे भईया बिआह के लाए थे तब से एही घर हमरा हो गया है. खबरदार कभी दोसरा घर का औरत बोली हमको.”

अऊर ई बात पर रोते हुये सकुंतला भौजी रामरती चाची के पास जाकर रोने लगी, जो चुपचाप कोना में ट्रांजिस्टर पर हवा महल सुनने में मगन थीं. ई महाजुद्ध का उनपर कोनो असर नहीं हो रहा था. सकुंतला भौजी गोहार लगाने लगीं.

“देख लीजिये माय! केतना बढिया बात बोल रही हैं आपकी बेटी. अब एही सुनना बाकी रह गया था ई घर में हमको... हम दोसर घर की औरत अऊर राह चलता से बिआह दें आपकी बेटी को.”

“ए दुलहिन! तुम लोग का तो रोजे का लड़ाई है ई सब. कोनो दिन नहीं बीतता है कि तुम दुनो के बीच में झगड़ा नहीं हो. कभी इंदु रोते हुये फरियाद लेकर आएगी अऊर कभी तुम गोहार लगाओगी. जल्दी से अच्छा लड़िका खोजकर इसका बिआह कर दो. एक्के बार में सब झंझट खतम हो जाएगा. मगर तुमरा मन तइयो नहीं लगेगा. रहली s मन भयली, गईली s मन पछतईली.”

रामरती चाची का ई परबचन सुनकर रोते रोते भी सकुंतला भौजीके मुँह से हँसी छूट गया. अऊर ऊ जाकर इंदु को अँचरा में समेट ली.

आज इंदु का बिदाई करके सकुंतला भौजाई जब सूना अँगना देखीं त मारे रोलाई के पूरा अँचरा भीज गया. पीछे से रामरती चाची आ गईं अऊर बोलीं, “देखी दुलहिन! हम कहते थे न रहली s मन भयली, गईली s मन पछतईली. जब थी तs रोज लड़ाई झगड़ा होता था अऊर आज जब ऊ चल गई अपना घर त तुमरा मन पछता रहा है.”

सकुंतला भौजी का रोलाई नहीं थम रहा था. भागकर इंदु के कमरा में, उसके बिछावन में, उसके तकिया में मुँह गाड़कर रोए जा रही थीं.

(आज के देसिल बयना का अर्थ यह है कि हम जिसके साथ प्यार करते हैं झगड़ा भी उन्हीं के साथ होता है. वे प्रियजन जब साथ होते हैं तो मन को नहीं सुहाते जिस कारण झगड़ा होता है, लेकिन जब वे चले जाते हैं तो मन पछताता है उनके न होने से पैदा हुये सूनेपन के कारण)

19 टिप्‍पणियां:

  1. वाह........... ! आज हिरदय गदगद हो गया. ई बयना पढ़ कर बहुत बल मिल रहा है..... एक से भले दो. बांकी फकरा तो सुने तो मगर उ पर किस्सा कमाल गढ़े हैं चचाजी. सबसे बड़ी बात जो ई खांटी देसी लेखन में भी उ का कहते हैं........... हाँ आदर्श.... तो इहाँ भी आप कुछ आदर्शों का निर्माण और निर्वाह करते नजर आ रहे हैं, जो समाज के लिए निश्चित ही अनुकरणीय है. अब और का कहें..... धनवाद तो नहिये देंगे.

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  2. एक सन्देश देता हुआ देशी वयना अच्छा लगा ,बधाई

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  3. जिदगी के छोटे-छोटे अहम हमें अपनों से तो दूर कर देते हैं किंतु वियोग के समय वही रिश्ते न चाहते हुए भी आत्मीयता के स्नेहिल सूत्र में अचानक बध जाते हैं।
    कहावत है- लडकी पराई होती है,फिर भी संस्कारों के वशीभूत होकर हम उसे अच्छी शिक्षा और संस्कार देते है। उसके कुछ कह सुन देने से माता, पिता भाई,भाभी, चाचा, चाची एवं अन्य पर कोई असर नही पड़ता है।लड़की की विदाई के समय पाषाण हृदय भी पिघल जाता है।हम विगत सारी वातों को भूलकर वियोग की अंतिम बेला में मन ही मन आंखों में आंसूओं का सैलाब लिए आशीर्वाद देते हैं- भगवान तुझे सुखी संसार दें।
    मन को आंदलित करती यह पोस्ट देसिल बयना के रूप में मन को छू गयी।सादर।

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  4. लोक-जीवन के सहज व्यवहार और पारिवारिक स्नेह की सुन्दर प्रस्तुति - कहावत का कथ्य भलीभाँति संप्रेषित.

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  5. सुन्दर सन्देश देती हुयी देसिल बयना। सलिल जी की कलम को सलाम।

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  6. मनोज जी /सलिल जी / करन जी आज का अंक देसिल बयना की यात्रा का एक मुकाम अंक है... २१ वी सदी के हिंदी में आंचलिक लेखन में देसिल बयना से क्रांति आएगी.. भले ही करन से इतर यह पहला अंक है लेकिन इस मानिए कि कोसी नदी में करेह नहीं या गंडक या बागमती या बालन मिलकर इसकी धारा को समृद्ध कर रही है.. बाकी सलिल जी के लेखन से हम सभी परिचित हैं और उनका देसिल बयना का अंदाज़ भी अच्छा लगा.. रोचकता उनके लेखन की प्राण है और यह इस अंक में है.. आप तीनो को बहुत बहुत शुभकामना.. देसिल बयना परिवार और भी विस्तृत हो, इस शुभकामना के साथ..

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  7. ननद-भौजाई के इस खेल में हमको सबसे अच्छी लगी रामरती चाची। रेडियो प्रोग्राम की ही तरह उसका दिमाग भी हवामहल था। बेटी शिकायत करे कि पोतहु- एकदम क्रॉस वेंटिलेशन।

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  8. ये मेरा दुर्भाग्य ही है कि इतना अच्छा लिखा हुआ मेरे सर के ऊपर से चला जाता है :( फिर भी सलिल जी का नाम देख कर आज हिम्मत की पढ़ने की ..और जितना समझ आया उससे ये तो कह सकती हूँ कि भाषा शैली बहुत रोचक है

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  9. भाषा,शिल्प और कथ्य के परिपेक्ष्य में देसिल बयना की मिठास कायम रखने में सलिल जी सफल हुए हैं और बधाई के पात्र हैं !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  10. .बिलकुल सही है साहेब कि,दूर होकर ही किसी का महत्त्व समझ आता है क्योंकि चिराग टेल तो अँधेरा होता है.

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  11. मनोज जी! कुछ सामाजिक दायित्व के कारण बहुत देर हो गई आने में... भाषा की अनभिज्ञता के कारण हो सकता है कई लोगों ने न समझ पाने की बात लिखी है.. लेकिन इस भाषा की और इस तरह हर आंचलिक भाषा की अपनी मिठास होती है... और यही मिठास आत्मा है!
    आपने मुझे जो सम्मान दिया उसके लिए आपका आभारी हूँ और करण जी का भी, जो इस पोस्ट की प्रेरणा हैं... अंत में धन्यवाद सभी पाठकों का!

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  12. बहुत सुंदर संदेश देती आप की यह पोस्ट जी, धन्यवाद

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  13. देसिल बयना में सलिल जी का लिखने का मनमोहक अंदाज़ देखकर मन खुश हो गया जी ...भावनाओं को शुद्ध देशी भाषा में उँडेल कर रख दिया है और कहावत को जीवंत करने में कोई कमी नहीं छोड़ी है ।

    देसिल बयना का यह प्रयोग आगे भी जारी रहे तो आनंद आ जाए ।

    मनोज जी, सलिल जी व करण जी को हार्दिक धन्यवाद !

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  14. सलिल भाई द्वारा रचित देसिल बयना का यह
    अंक करण द्वारा इस ब्लाग पर बहाई गई लोक-रस की गंगा को और पावन कर रहा है। कथानक, पात्र भाषा शैली - सभी यथानुकूल और रोचक हैं।

    बधाई सलिल जी। आप इसी तरह इस व्लाग पर भी आते रहें। आप का स्वागत है।

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  15. करण से अलग देसिल बयना का यह अंक रोचक है।

    आभार

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  16. मनोज जी , यह पोस्ट पढ कर मन गद्गगद् होगया । सलिल जी पाठक को किस तरह घर -आँगन के कोने-कोने में अपनेपन के साथ खींच ले जाते हैं । आप ऐसी रचना अपने ब्लाग में देने के लिये अनेकानेक साधुवाद के अधिकारी हैं ।

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