गुरुवार, 27 जनवरी 2011

आँच-53 :: आंच ने पूरा किया एक साल :: समीक्षा की पद्धतियाँ।

आँच-53

नमस्कार मित्रों!

एक साल तक किसी एक स्तंभ को चलाए रखना आसान नहीं होता। खास कर पाठकों की रुचि बनी रहे। पर हमने तय किया यह सफ़र। सोचा कि इस बीते साल के सफ़र को कैसे याद किया जाए! निःसंदेह इसके लिए हमारे प्रेरणा के स्रोत आचार्य परशुराम राय से उपयुक्त कोई हो नहीं सकता था। यह स्तंभ उनका ही ब्रेनचाइल्ड था। तो सुनिए आंच की कहानी आचार्य की जुबानी।

मनोज कुमार 

आचार्य परशुराम राय

आँच शृंखला आज अपना एक वर्ष पूरा कर ली है। मनोज ब्लाग पर प्रकाशित रचनाओं पर आनेवाली टिप्पणियों से प्रेरित होकर समीक्षा के लिए इस शृंखला के श्रीगणेश का विचार मन में उद्भूत हुआ था। धीरे-धीरे यह शृंखला इतनी लोकप्रिय हुई कि कई रचनाकार अपनी रचनाओं को आँच की कसौटी पर कसने के लिए आगे आए और इसके परिणाम स्वरूप यह शृंखला आज अपना एक वर्ष पूरा कर रही है। इस स्तम्भ के नामकरण को लेकर ब्लाग के सहयोगियों ने कई नाम सुझाए थे, पर आँच पर सबकी सहमति बनी और फिर इसके उद्देश्य के अनुरूप समीक्षा के अर्थ में इस शृंखला के नाम को परिभाषित किया गया, जिसे प्रायः हर अंक के ऊपर अलग से आज भी दिया जाता है। वैसे इस शृंखला के प्रारम्भ होने के पूर्व ही इस ब्लाग पर समीक्षा के बीज का वपन डॉ.रमेश मोहन झा की लेखनी से हो चुका था। पहले छिटपुट समीक्षाएँ चौपाल पर प्रकाशित की जाती थीं। पर एक शृंखला के रूप में इसका पहला अंक 28-01-2010 को प्रकाशित हुआ था।

आँच का उद्देश्य कवि की भावभूमि की गरमाहट को पाठकों तक पहुँचाना और पाठक (समीक्षक) की अनुभूति की गरमाहट को कवि तक पहुँचाना है।

इस शृंखला का पहला अंक श्री मनोज कुमार जी की कविता अमरलता पर लिखा गया था। इसका श्रीगणेश करने का सौभाग्य अवश्य मुझे मिला था, लेकिन इसमें कड़ियों को लगातार जोड़ने में सबसे बड़ा योगदान मेरे प्रिय मित्र एवं ब्लाग के सहयोगी श्री हरीश प्रकाश गुप्त का रहा, जो एक बड़े ही सहृदय व्यक्ति और साहित्यकार हैं, भले ही उनकी कोई पुस्तक न छपी हो। इसके अतिरिक्त आदरणीय श्री मनोज कुमार और प्रिय श्री करण समस्तीपुरी का योगदान भी स्मरणीय है। इस शृंखला के अतिथि लेखकों में सर्वप्रथम नाम आता है डॉ.रमेश मोहन झा का और फिर श्री होमनिधि शर्मा का और अंत में श्रीमती मल्लिका द्विवेदी का। इसमें कुल 33 कविताएओं और 8 कहानियों की समीक्षा की गयी। इसके अतिरिक्त 9 अंक पाठकों की टिप्पणियों में उठाए गए प्रश्नों के समाधान के रूप में लिखे गए और 2 अंक हिन्दी मुहावरों पर अर्थवैज्ञानिक-दृष्टि को आधार बनाकर लिखे गए। इन सबका विवरण नीचे की सारिणी में देखा जा सकता है-

कुल समीक्षा

समीक्षक

कविता

कहानी

उपांक

52

श्री मनोज कुमार

श्री हरीश प्रकाश गुप्त

श्री परशुराम राय

श्री केशव कर्ण

(करण समस्तीपुरी)

डॉ.रमेश मोहन झा

श्री होमनिधि शर्मा

श्रीमती मल्लिका द्विवेदी

04

16

08

04

01

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04

04

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01

07

01

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यह तो रहा आँच के एक वर्ष का लेखा-जोखा। पर आँच के इस अंक का विवेच्य विषय है समीक्षा की पद्धतियाँ। आँच के एक अंक पर हमारे एक सहृदय पाठक ने प्रश्न किया था कि वह समीक्षा व्यवहारिक समीक्षा थी अथवा सैद्धांतिक। उस समय मन में विचार आया था कि क्यों न वार्षिक अंक के लिए इसे विवेच्य विषय बनाया जाय। अतएव आज इसी को विचार के लिए लेते हैं।

भारत में सामान्यतया पाश्चात्य और भारतीय समीक्षा-पद्धतियों का संगम आधुनिक समीक्षा में देखा जाता है, लेकिन पाश्चात्य समीक्षा पद्धति का अनुकरण अधिक हुआ है। हिन्दी समीक्षा में तो प्रायः यही आजकल देखने को मिलता है। अतएव यहाँ दोनों पद्धतियों की एक झाँकी प्रस्तुत है।

भारतीय काव्यशास्त्र परम्परा काव्य को अभिव्यक्ति की उत्कृष्टता और सौष्ठव के रूपवादी परिप्रेक्ष्य में देखने का आदी रहा है। इसके अन्तर्गत काव्य के शुद्ध चैतन्य से लेकर उसके सभी अंगों का सैद्धांतिक विवेचन किया गया है। काव्य के भारतीय मानदण्ड इसकी संस्कृति के अनुरूप व्यक्तिनिष्ठ न होकर वस्तुनिष्ठ हैं, विषय-प्रधान हैं, दर्शन पर आधारित हैं। भारतीय आलोचना में सामाजिक, श्रोता या रसभोक्ता को अधिक महत्व दिया गया है।

भारतीय समीक्षा के मानदण्ड हैं- रस, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य आदि हैं। कोई आवश्यक नहीं कि सभी पाठक इन सभी काव्यांगों से परिचित ही हों। पर, यहाँ इस छोटे से विवेचन में इन सबका परिचय देना संभव नहीं है। इस अंक का उद्देश्य मात्र समीक्षा की एक रूपरेखा प्रस्तुत करना है। वैसे इन काव्यांगों पर विस्तृत चर्चा इसी ब्लाग पर नियमित रूप से हर रविवार को भारतीय काव्यशास्त्र के शीर्षक से आ रही है। पाठक इन्हें वहाँ देख सकते हैं।

भारतीय आलोचना के कई रूप देखने को मिलते हैं, जैसे- वृत्ति, भाष्य, वार्त्तिक, टीका, वचनिका, वार्ता, चर्चा आदि।

वृत्ति किसी सूत्र, कारिका आदि की संक्षिप्त व्याख्या है। यह मूल रचनाकार अथवा किसी अन्य विद्वान द्वारा की जाती है। आचार्य आनन्दवर्धन, मम्मट, विश्वनाथ कविराज आदि ने अपने ग्रंथों में कारिकाओं पर स्वयं वृत्ति लिखी है। कई ग्रंथों पर अन्य आचार्यों ने भी वृत्ति लिखी है, यथा- न्यायसूत्रों पर आचार्य विश्वनाथ की, काव्यकल्पलतावृत्ति आचार्य अमरचन्द्र यति आदि की।

भाष्य में ग्रंथों में प्रयुक्त सूत्रों, कारिकाओं, श्लोकों आदि की सांगोपांग व्याख्या की जाती है। इसमें भाष्यकार द्वारा प्रयुक्त पदों का भी संगत स्पष्टीकरण रहता है। महर्षि पतंजलि का अष्टाध्यायी (महर्षि पाणिनिकृत व्याकरण ग्रंथ) पर महाभाष्य, आदि शंकराचार्य द्वारा अनेक ग्रंथों पर किए गए भाष्य, ऋग्वेद संहिता पर आचार्य सायण का भाष्य, न्यायसूत्र पर महर्षि वात्स्यायन आदि का भाष्य उल्लेखनीय हैं।

सूत्रों, सिद्धांतों आदि की व्याख्यात्मक आलोचनाओं में वार्त्तिक पद्धति सर्वाधिक पूर्ण है। इसे परिभाषित करते हुए कहा गया है - जो कहा गया, जो नहीं कहा गया और यदि कहने में दोष हो, उन सबको जिसमें स्पष्ट किया जाय, उसे वार्त्तिक कहते हैं- उक्तानुक्तदुरुक्तार्थव्यक्तिकारितुं वार्त्तिकम्। इस प्रकार वार्त्तिक व्याख्यात्मक आलोचना की सबसे अच्छी पद्धति है। इसके उदाहरण के लिए आचार्य कात्यायन का अष्टाध्यायी पर वार्त्तिक, कुमारिलभट्ट का मीमांसा पर वार्त्तिक आदि।

टीका भी आलोचना की एक व्याख्यात्मक पद्धति है। टीका प्रायः सभी प्रकार के ग्रंथों पर की गयी है, विशेषकर काव्यशास्त्रों, काव्यों आदि पर, जैसे- महाकवि कालिदास, भारवि आदि के विभिन्न काव्य-ग्रंथों पर आचार्य मल्लिनाथ की टीकाएँ विश्वप्रसिद्ध हैं। इसी प्रकार ध्वन्यालोक, काव्यप्रकाश आदि पर अभिनवगुप्त आदि आचार्यों की टीकाएँ। वैसे, इसके लिए अंग्रेजी में Commentary शब्द का प्रयोग किया गया है।

वचनिका, चर्चा और वार्ता शब्द हिन्दी में प्रणीत काव्यशास्त्रों पर लिखे वार्त्तिक के लिए प्रयुक्त हुए हैं।

पाश्चात्य समीक्षा में रचनाकार की व्यक्तिगत और परिस्थितिगत भावनाओं का अधिक ध्यान रखा जाता है। इसमें ऐतिहासिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक आधारों को अधिक महत्व दिया जाता है, जबकि भारतीय आलोचना में काव्य में व्याप्त तथ्यों और सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य की व्याख्या को। ऐसा नहीं है कि भारतीय आलोचना पद्धति में मनोविज्ञान को स्थान नहीं दिया गया है। पूरा रस-सिद्धांत मानसिक संवेगों पर ही आधारित है। पाश्चात्य आलोचना में कलापक्ष के अन्तर्गत बिम्ब, प्रतीक, अभिव्यंजना और व्यावहारिक सिद्धांत आते हैं। इसके अतिरिक्त वस्तुवादी और भाववादी सिद्धांत भी सम्मिलित हैं। संक्षेप में कहा जाय तो निम्नलिखित पद्धतियाँ पाश्चात्य आलोचना के अन्तर्गत व्यवहृत हैं-

आत्मप्रधान या प्रभावात्मक आलोचना

सैद्धांतिक आलोचना

शास्त्रीय या निर्णयात्मक आलोचना

व्याख्यात्मक आलोचना

तुलनात्मक आलोचना

मनोवैज्ञानिक आलोचना

ऐतिहासिक आलोचना

व्यावहारिक आलोचना

किसी रचनाकार की कृति का अध्ययन करने के बाद आलोचक के ऊपर उसका जो प्रभाव पड़ता है, कृति के प्रति उस दृष्टि से अवधारणा के आधार पर लिखी गयी आलोचना आत्मप्रधान आलोचना होती है। इसमें आलोचना के विभिन्न मानदण्डों का अनुपालन प्राय: नहीं होता है। इस पद्धति में शब्दाडम्बर अधिक देखने को मिलता है। इसमें आलोचक की स्वच्छन्द प्रवृत्ति देखने को मिलती है। बिहारी की रचनाओं पर पद्मसिंह शर्मा द्वारा की गयी आलोचना इस श्रेणी में रखी जा सकती है।

सैद्धांतिक आलोचना के अन्तर्गत आलोच्य रचना में दृष्टिगत काव्यशास्त्रीय सैद्धांतिक पक्षों को प्रकाशित करना आलोचक का अभीष्ट होता है। इस प्रकार की आलोचना में व्यापक सैद्धांतिक विकास की सम्भावना परिलक्षित होती है। हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा लिखे गए आलोचनात्मक निबन्ध इसी कोटि के हैं।

शास्त्रीय या निर्णयात्मक आलोचना में आलोच्य कृति का भावपक्ष, कलापक्ष एवं अन्य शास्त्रीय सिद्धांतों को आधार बनाकर लिखी गयी समीक्षाएँ आती हैं। इनमें आलोचक सैद्धांतिक आलोचक की भाँति सिद्धांन्तों के प्रति अधिक हठी नहीं होता है।

व्याख्यात्मक आलोचना में व्यापक सिद्धांतों और युगीन चेतना को अधिक महत्व न देकर रचनाकार के दृष्टिकोण की व्याख्या देखने को मिलती है। इस प्रकार का आलोचक यह मानकर चलता है कि सभी रचनाकारों की प्रकृति एक जैसी नहीं पायी जाती, अतएव आलोच्य रचना को सिद्धांतों की कसौटी पर कसना उचित नहीं है। वह रचना को साहित्य का विकास मानकर देखता है, लेकिन इसमें आत्मप्रधान आलोचना जैसी प्रवृत्ति नहीं पायी जाती, बल्कि एक तटस्थ भाव देखने को मिलता है। आँच पर की गई अधिकाँश आलोचनाएँ इसी प्रकृति की हैं।

तुलनात्मक आलोचना दो या अधिक रचनाकारों की समान विषयों पर लिखी रचनाओं के विभिन्न अंगों का तुलनात्मक प्रतिपादन है। इसके अन्तर्गत मूल्य-निर्धारण पर अधिक जोर रहता है। इस तरह की आलोचना करते समय इस बात पर ध्यान देना अधिक आवश्यक होता है कि तुलनात्मक अध्ययन के लिए चुने गए रचनाकारों को बड़ा-छोटा करके न देखा जाये। अन्यथा की गई समीक्षा समस्याओं और विवादों की जननी बन जाएगी। अतएव इस प्रकार की समीक्षा के लिए आवश्यक है कि तुलनात्मक अध्ययन के लिए निर्धारित मानदण्डों के परिप्रेक्ष्य में तटस्थ होकर रचनाओं पर विचार किया जाए।

मनौवैज्ञानिक आलोचना भी व्याख्यापरक होती है। किन्तु इसके अन्तर्गत रचना में वर्णित मूल भावों और प्रेरक तत्वों का विवेचन अभीष्ट होता है। इस प्रकार की आलोचना के उद्देश्य हैं:- रचनाओं को रचनाकारों के निजी स्वभाव, उनके आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक परिवेश से उत्पन्न मानसिक स्थिति के परिप्रेक्ष्य में देखना, निष्कर्ष निकालना, बाह्य परिस्थितियों का अन्तस् में होने वाली प्रतिक्रिया का अध्ययन आदि प्रकाशित करना। व्याख्यात्मक आलोचना में जहाँ कृतित्व का विश्लेषण अभीष्ट होता है, वहीं मनोवैज्ञानिक आलोचना में कवि की रुचि, परिस्थिति और आन्तरिक वृत्तियों का।

ऐतिहासिक आलोचना का उद्देश्य रचनाकार और रचना की सामयिक परिस्थितयों के आधार पर उसका मूल्यांकन करना है। अर्थात् तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक परिवेश का सामूहिक रूप से रचना और रचनाकार पर पड़े प्रभावों का विश्लेषण ऐतिहासिक आलोचना के अन्तर्गत किया जाता है। किसी रचनाकार या रचना के मूल्यांकन में ऐतिहासिक आलोचना की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

अलोचना का उद्देश्य किसी रचना में निहित समस्त सौन्दर्य और विशेषताओं का विश्लेषण कर उनका आस्वादन कराना है। पर आलोचना की जितनी पद्धतियां विकसित हुईं, इस उद्देश्य की पूर्णरूपेण पूर्ति न कर पायीं। इसी कारण से व्यावहारिक आलोचना का सूत्रपात अंग्रेजी के प्रसिद्ध आलोचक आई.ए.रिचर्ड्स ने किया। उन्होंने अपनी पुस्तक प्रैक्टिकल क्रटिसिज्म में इस पद्धति का विश्लेषण किया है। इसके लिए उन्होंने एक प्रयोग किया, उन्होंने कई अंग्रेजी कविताओं को उनके शीर्षक और कवियों के नाम हटाकर उन्हें अनेक शिक्षित व्यक्तियों के पास स्वतंत्र आलोचना के लिए भेजा। प्राप्त आलोचनाओं में से तेरह आलोचनाओं का विश्लेषण कर उन्होंने समीक्षा के कुछ विशिष्ट सिद्धांतों का प्रतिपादन अपने उक्त ग्रंथ में किया है। जो व्यावहारिक आलोचना के आधार हैं। लेकिन इस आलोचना सिद्धांत को कई कठिनाइयों के कारण आदर नहीं मिल पाया।

आँच के इस अंक का उद्देश्य भारतीय और पाश्चात्य आलोचना पद्धतियों का संक्षिप्त परिचय मात्र देना था । इस छोटे से निबन्ध में इनका विशद विवेचन सम्भव नहीं और यदि किया भी जाए तो पाठको में अरुचि पैदा करेगा। अतएव इतना ही।

अंत में 'आँच' शृंखला के लिए अपनी रचनाएं समीक्षा हेतु देने के लिए रचनाकारों का मैं इस शृंखला के वार्षिक अंक के अवसर पर हृदय से धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने अपनी रचनाओं पर की गई समीक्षा को एक सकारात्मक दृष्टि प्रदान की। 'आँच' के सभी पाठकों को, जिन्होंने इस शृंखला को लोकप्रियता प्रदान की, समीक्षक दल की ओर से हार्दिक धन्यवाद देता हूँ। साथ ही सभी समीक्षक बन्धुओं को भी अपना हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ,  जो 'आँच' को लगातार प्रज्वलित रखने के लिए नियमित रूप से ईँधन देते रहे।

20 टिप्‍पणियां:

  1. प्रसंशनीय प्रस्तुति है ।
    धन्यवाद ।

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  2. किसी परंपरा की बुनियाद डालना आसान है किन्तु उसका निर्वहन एक कठिन कार्य है।मैंने देखा है कि अनेक प्रकार की टिप्पणियों एवं आलोचनाओं के बीच भी आँच का वर्चस्व पूरे एक वर्ष तक बना रहा। इससे यह स्पष्ट होता है कि हम सबको यह पसंद है।इसकी निरंतरता को बनाए रखने वाले प्रबुद्ध लोगों को मै तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होने अपने अनवरत परिश्रम से इसे मूर्त रूप दिया है। आज मै पुन: सुझाव दे रहा हूं कि समीक्षा करते समय इसका उल्लेख अवश्य किया जाए कि जो समीक्षा हो रही है वह प्रयोजनमूलक,सैद्धांतिक या व्यवहारिक है। इसका निर्णय मैं समीक्षक के उपर छोड़ रहा हूं।अंत में,मैं उन समस्त लोगों को धन्यवाद देता हू जिन्होने इसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एक अलग अंदाज एवं शैली मे प्रस्तुत करने का कार्य करते रहे हैं। आशा ही नही अपितु पूर्ण विश्वास है कि आने वाले दिनों में आँच व्लागजगत में केंद्रविन्दु के रूप में अपने अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रखने में अपनी पूरी समग्रता में सफल होगा। सादर।

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  3. आँच में समीक्षा का स्तर बहुत ही ऊँचा रहता है।

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  4. आँच की प्रथम वर्षगांठ पर बधाई एवं शुभकामनायें ! एक बेहद उम्दा आलेख प्रस्तुत किया ……………काफ़ी ज्ञानवर्धन हुआ ……………आँच पर समीक्षा के बाद रचना सोने सी खरी हो जाती है……………आभार्।

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  5. .आंच की वर्षगांठ पर हार्दिक बधाई तथा उज्जवल भविष्य की कामनाएं.

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  6. नत मस्तक हूँ आचार्य जी के ग्यान के आगे। मैने कई पोस्ट बुकमार्क कर रखी हैं समय समय पर पढती भी हूँ मेरे जैसे साधारण लोगों के लिये ये ग्यान बहुत बडी उपल्ब्धि है। धन्यवाद वर्षगाँठ पर बहुत बहुत बधाई, शुभकामनाये।

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  7. मनोज जी
    सबसे पहले तो 'आंच' के प्रथम वर्षगाँठ पर आपको और आपकी टीम को हार्दिक शुभकामना.. जब पहली बार आपने मुझसे कहा था कि मेरी कविता को आंच पर ले रहे हैं आप, तब तक आंच के महत्व से मैं परिचित नहीं था.. लेकिन अपनी आदरणीय हरीश गुप्त जी की समीक्षा के बाद जो सकारात्मक सोच मुझमे कविता के प्रति आई, उस से मुझे आंच के महत्व का पता चला.. जो कि मेरी उस कविता की समीक्षा की टिप्पणी से जाहिर है...
    "आंच. जब मनोज जी ने आंच के बारे में बताया और सूचना दी कि मेरी कविता आंच पर रखी जा रही है.. सहसा मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. मन घबराया हुआ था कि मेरी कोई कविता पहली बार समीक्षक के सामने से गुजरेगी ... लेकिन आंच शब्द आने से सबसे पहले माँ की याद आ गई जो गाँव में आज भी धीमी आंच पर चावल के आते की मोती रोटी पकाती है... बहुत सुस्वादु होती है वे रोटिया... मैं भी चूल्हे के पास बैठ जाया करता था और कभी कभी आंच लगा दिया करता था.. यानि लकड़ी चूल्हे में आगे बढ़ा दिया करता था... आंच मुझे तभी से बहुत रचनात्मक और सृजनात्मक लगती थी... आज फिर वैसा ही आभास हुआ और आज सामने हैं हरि प्रकाश गुप्त जी .
    बहुत सोच समझ कर मैं कविता नहीं लिखता और मेरी कविताओं में मेरे आसपास की चीज़ें ही होती है. इस से यदि कोई विम्ब निकल आता है तो स्वयं भी अच्छा लगता है.. लेकिन वर्तमान कविता "कील पर टंगी बाबूजी की कमीज " प्रभावशाली बन जायेगी इसकी उम्मीद नहीं थी. हाँ मैं चाहता था कि हमारे आसपास की चीज़ें किसप्रकार हमें देखती हैं वह बताना चाहता था और शायद कुछ हद तक सफल भी हुआ... लेकिन जितनी शिद्दत से हरीश प्रकाश गुप्त जी ने कविता की समालोचना की है.. मैं स्वयं ही अपनी कविता को कई बार पढ़ गया और इस बार पढ़ कर कविता अधिक अच्छी लगी.. कुछ नए आयाम मेरी कविताओं में गुप्त जी ने देखे हैं जो स्वयं मुझे नहीं लगी थी.. यह देख काफी अच्छा लगा और आगे लिखने और सोचने में मदद मिलेगी..
    सर्जना की प्रक्रिया में इन् आयामों को अगर ध्यान में रखा जाय तो कविता वास्तव में पूर्ण बनेगी.. लिंग निर्णय कमजोरी है और अध्ययन कर रहा हूँ.. आगामी कविताओं में यह कम मिलेंगी.. 'बाबूजी' का अधिक प्रयोग हो गया था... शायद नाटकीय प्रभाव लाना चाहता था... शब्द संयम के महत्त्व को समझ रहा हूँ... मेरे ए़क इ-मेल मित्र है.. निर्मल गुप्त जी (http://n-kumarsambhav.blogspot.com/) जिन्होंने इस कविता में कुछ अर्थपूर्ण सुझाव दिए थे और पहले मैंने 'शर्ट' लिखी थी लेकिन उनके सुझाव पर इससे 'कमीज' किया . आज मैं मनोज जी, हरि प्रकाश गुप्त जी और साथ ही निर्मल गुप्त जी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ.. फिर से आंच पर आने के इन्तजार में अरुण".....

    ... फिर एक दो और मौके पर मेरी कवितायेँ आंच पर सेंकी गई और सोंधी हुई.... अधिक सक्रिय तो नहीं हूँ ब्लॉग पर लेकिन जो कोई २०० ब्लॉग पर नियमित-अनियमित आना जाना है, आंच उनमे सर्वश्रेष्ठ, सार्थक श्रृंखला है... आने वाले अंको में आंच के लौ प्रखर हो, सकारात्मक हो इन्ही कामनाओं के साथ आपकी टीम को एक बार फिर हार्दिक बधाई...

    अरुण

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  8. आंच' के एक वर्ष पूरा करने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं!
    समीक्षा के विभिन्न आयामों के बारे में विस्तृत जानकारी से भरा आज का अंक बहुत उपयोगी लगा!
    'आंच' में तपना किसी भी कृतिकार के लिए गौरव की बात होती है !
    आद. आचार्य जी, गुप्त जी,मनोज जी, केशव जी के साथ वो सारे लोग भी बधाई के पात्र हैं जिन्होंने आंच के स्तर को नई ऊँचाई प्रदान करने में अपना सृजनात्मक योगदान दिया !

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  9. मनोज जी आंच के एक वर्ष पूरा करने पर ढेरों बधाई.
    आचार्य जी के ज्ञान को नमन ,बेहद ज्ञानवर्धन हुआ.
    जहाँ तक आंच की बात है ...तो सांच को आंच नहीं :)
    एक उच्चस्तरीय फोरम है आंच.

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  10. आँच का एक वर्ष का सभर पूरा करने के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार कीजिए!
    इस हिमालय से नई
    ज्वाला निकलनी चाहिए।
    आँच में गर आग है तो-
    आग जलनी चाहिए।

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  11. सबसे पहले तो बधाई...

    आलोचना की इतनी सुन्दर सारगर्भित व्याख्या के लिए बहुत बहुत आभार...

    मुझे ज्ञात न था कि आंच पर आलोचना हेतु रचनाएं भेजनी पड़ती हैं....मेरा अनुमान था कि यह चुनाव आप लोग ही करते हैं..

    बड़ी इच्छा थी मेरी कि मेरे समस्त सामग्रियों की भी समीक्षा हो और मैं अपने त्रुटियों को जान पाऊं...

    मैं यह सोचकर चुप हो बैठी रही कि संभवतः आंच पर कसे जाने योग्य मेरा लेखन ही नहीं,नहीं तो आज तक अवश्य चुना जाता....

    भ्रम दूर हुआ...अब शुरुआत कहाँ से करूँ,सोच रही हूँ...निर्णय लेने में मेरी मदद करेंगे????

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  12. आँच के एक वर्ष पूरा होने पर हार्दिक बधाई और यह बेल पुष्पित पल्लवित हो, यह शुभकामना!! आँच को लेकर जो मानदण्ड आपने स्थापित किये हैं वह अविवादित है... जितनी भी समीक्षाएँ पढीं, उससे कविता का नया अर्थ ज्ञात हुआ. कुछ नवोदित कविओं से भी परिचय हुआ जैसे अरुण चंद्र राय एवम् निखिलानंद गिरी जी! यही नहीं, मनोज जी की स्वयम् कीग़ज़ल को भी आँच पर चढ़ाया गया और उसकी भी समीक्षा में कोई कसर नहीं रखी गई!एक तटस्थ समीक्षा का इससे बेहतर कोई उदाहरण नहीं मिलेगा!
    आँच की पूरी टीम को बधाई! मुझे आज अपने कवि न होने पर अफसोस हो रहा है कि काश कवि होता तो इस आँच से निकलकर कुंदन हो पाता!

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  13. आंच के एक वर्ष पूरे होने की हार्दिक बधाई.
    समीक्षा कर्म बाखूबी निभाया आप लोगों ने.

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  14. आंच के इस वार्षिक पराव पर मैं आपसभी पाठकों का हृदय के अंतस्थल से आभार प्रकट करता हूँ. इसके प्रेरणास्रोत आचार्य परशुराम रायजी को नमन करता हूँ. इसे सुचारू रूप से चलाने में अग्रणी योगदान देने वाले अग्रज हरीशजी प्रकाश गुप्तजी का यदि आभार प्रकट करूँ तो यह अशोभनीय होगा... उनकी लेखनी को भी नमन. इस ब्लॉग के माध्यम से पूर्ण साहित्यिक व्यक्तित्व की ओर अग्रसर श्री मनोज कुमार के लिए कहना न होगा कि इनकी ऊर्जा इतनी अजस्र है कि कुछ वर्षों से रुकी हमारी कलम भी चल पड़ीं. इस स्तम्भ के अतिथि समीक्षकों का भी मैं हृदय से आभार प्रकट करता हूँ. आंच को निरंतर इंधन देते रहने वाले रचनाकारों का भी मैं अपनी टीम की ओर से बंदन-अभिनन्दन करता हूँ और अंत में सबसे महत्वपूर्ण हमारे पाठक.... आपको कोटि-कोटि नमस्कार ! आपके प्रोत्साहन के बिना यह संभव न था.

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  15. अगर आप आईपी एड्रेस और उसके प्रयोगकर्ता की सूची बना सकें,तो पाएँगे कि इस स्तम्भ के पाठकों में कई दिग्गज नाम शामिल हैं।

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  16. आंच की वर्षगांठ पर आपको और आपके सहयोगियों को हार्दिक बधाई ...स्वीकार करें

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  17. आंच' के एक वर्ष पूरा करने पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं.........बहुत ही अच्छा प्रयास रहा है आप सभी लोंगों का........ . काबिलेतारीफ .

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  18. आंच पर पलाश भी पके, यह कामना है.. और इसी कामना के साथ आंच की सम्पूर्ण टीम को हार्दिक शुभकामना !

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आपका मूल्यांकन – हमारा पथ-प्रदर्शक होंगा।