-- सत्येन्द्र झा
"तमाम सबूत ओ गबाहों के बयानात के मद्देनजर.... अदालत उम्रकैद की सजा मुक़र्रर करती है।" न्यायाधीश महोदय ने फैसला सुनाया। वह मुस्कुरा उठा। उस पर हत्या का अभियोग लगा था। लेकिन फिर से अदालत में दूसरा व्यक्ति उसी अपराध की स्वीकारोक्ति दे रहा है। न्यायधीश महोदय भी सन्न। एक हत्या और कुल मिलाकर पांच अभियुक्त और हरेक का दावा कि हत्या उसी ने किया है। पहला व्यक्ति रिहा हो गया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
"लेकिन वकील साहब, बाहर जाकर मैं खाऊंगा क्या... ? रहूँगा कहाँ... ? जेल में तो कम से एक छत और और दोनों टाइम भोजन तो मिलता.... ! अरे माना कि वह हत्या मैं ने नहीं की थी मगर सजा पाकर मैं खुश था। आपने यह क्या कर दिया.... पांच-पांच लोगों को..... !", वह अधिवक्ता से गुहार कर रहा था। वकील साहब ने हिकारत भरे लहजे में कहा, "अबे चुप कर.... ! ज्यादा सयाना बनने की कोशिश मर करो। सजा उतनी ही मिलती है जितना वो खर्च-वर्च करता है। आखिर मुफ्त में चौदह साल रोटी तोड़ने को नहीं मिलती।"
वकील साहब के पान चबाने से काले दांत चमक उठे थे जबकि उसकी आँखों के आगे अँधेरा छ गया था।
मूल कथा मैथिली में "अहीं कें कहै छी" में संकलित "सजायक मूल्य" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।