अनुवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अनुवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 21 मार्च 2011

लघु कथा : दूसरी गलती

लघुकथा : दूसरी गलती

-- सत्येन्द्र झा


साइकिल कार से सट गयी थी। कार को तो कुछ नहीं हुआ मगर साइकिल के परखच्चे उड़ गए थे। साइकिल की यह पहली गलती थी कि उसे उसकी औकात याद नहीं रही।


टूटी हुई साइकिल जाने लगी न्याय के लिए। यह उसकी दूसरी गलती थी।


(मूल कथा मैथिली में "अहींकें कहै छी" में संकलित 'दोसर गलती' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

मंगलवार, 18 जनवरी 2011

सजा की कीमत

-- सत्येन्द्र झा


"तमाम सबूत गबाहों के बयानात के मद्देनजर.... अदालत उम्रकैद की सजा मुक़र्रर करती है।" ्यायाधीश महोदय ने फैसला सुनाया। वह मुस्कुरा उठा। उस पर हत्या का अभियोग लगा थालेकिन फिर से अदालत में दूसरा व्यक्ति उसी अपराध की स्वीकारोक्ति दे रहा हैन्यायधीश महोदय भी सन्नएक हत्या और कुल मिलाकर पांच अभियुक्त और हरेक का दावा कि हत्या उसी ने किया हैपहला व्यक्ति रिहा हो गया। उसे कुछ समझ नहीं रहा था


"लेकिन वकील साहब, बाहर जाकर मैं खाऊंगा क्या... ? रहूँगा कहाँ... ? जेल में तो कम से एक छत और और दोनों टाइम भोजन तो मिलता.... ! अरे माना कि वह हत्या मैं ने नहीं की थी मगर सजा पाकर मैं खुश थाआपने यह क्या कर दिया.... पांच-पांच लोगों को..... !", वह अधिवक्ता से गुहार कर रहा थावकील साहब ने हिकारत भरे लहजे में कहा, "अबे चुप कर.... ! ज्यादा सयाना बनने की कोशिश मर करोसजा उतनी ही मिलती है जितना वो खर्च-वर्च करता हैआखिर मुफ्त में चौदह साल रोटी तोड़ने को नहीं मिलती।"


वकील साहब के पान चबाने से काले दांत चमक उठे थे जबकि उसकी आँखों के आगे अँधेरा गया था।


मूल कथा मैथिली में "अहीं कें कहै छी" में संकलित "सजायक मूल्य" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

लघुकथा -- दोष किसका..... ?

दोष किसका..... ?


लघुकथा -- सत्येन्द्र झा

युवावस्था में प्रेम-विवाह के आन्दोलनकारी समर्थक। प्रेम-विवाह किये। माँ-बाप से अनबन और घोर निराशा।

वक़्त-बेवक्त सास-ससुर से भी तल्खी। "प्रेम-विवाह का मतलब यह तो नहीं कि दामाद के हर अरमान में आग ही लगा दें।" तिलक-दहेज़ नहीं देना पड़ा... कम से कम 'अन्य आवश्यक सामग्री' के साथ ससम्मान विदाई तो करते।

वृद्धावस्था में प्रेम-विवाह के कट्टर विरोधी।

इच्छा के प्रतिकूल सामाजिक क्रांतिकारी पुत्र ने एक युवती का हाथ थाम लिया।  न पंडित न बारात, ना ही दहेज़। कोर्ट-मैरिज।

अब पुत्र से भी अनबन।

पहले से भी अधिक निराशा। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि दोष किसका था और गलती कहाँ हो गयी ?

(मूल कथा मैथिली में "अहीं के कहैं छी" में संकलित "तीन चित्र" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)चित्र : आभार गूगल सर्च