मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

लघुकथा :: वसुधैव कुटुम्बकम्

लघुकथा

वसुधैव कुटुम्बकम्

सत्येन्द्र झा

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एक पत्रिका के प्रकाशन की योजना बन रही थी। प्रकाशक और सम्पादक विचार-विमर्श कर रहे थे।

"राजनितिक चर्चा कौन लिखेगा?"

"मेरा छोटा पुत्र। उसे राजनीति में गहरी दिलचस्पी है।"

"और महिला कॉलम?"

"मेरी पत्नी। दिन भर मोहल्ले की औरतों को ज्ञान बांटती रहती है।"

"सिनेमा का पन्ना?"

"मेरा मंझला पुत्र। इस पद के लिए उस से अच्छा उम्मीदवार कौन हो सकता है? वह तो एक दिन में तीन-तीन सिनेमा देखता है।"

"खेल-जगत?"

"अरे.... मेरा बड़ा बेटा। खेलों से उसे इतनी अभिरूचि है कि वह इसके चक्कर में अपनी पढाई-लिखाई भी चौपट कर चुका है।"

"बहुत बढ़िया। किन्तु आवरण चित्र?"

"मेरी बेटी है न।  वह तो बात-बात में आपका चित्र खींच दे।”

पत्रिका प्रकाशित हुई। शीर्षक के नीचे मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था, "आपके लिए, आपके द्वारा, आपकी पत्रिका!”

(मूलकथा मैथिली में 'अहीं के कहै छी' में संकलित "बन्न कोठली" से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।)

37 टिप्‍पणियां:

  1. Translated version gives actual fragrance of source laguage.This short story is really entertaining from inception and up to the last.
    A word of appreciation from my side to you.Good Morning.

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  2. इस सुंदर लघुकथा को हम तक पहुचाने के लिए आभार।

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  3. भरा पूरा परिवार है तो बाहर वालों की जरुरत ही कहाँ रह जाती है. :)

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  4. .

    @--भरा पूरा परिवार है तो बाहर वालों की जरुरत ही कहाँ रह जाती है. :)

    बहुत सुन्दर बात कही समीर लाल जी ने॥

    सहमत हूँ।

    सुप्रभात !--मनोज जी !

    .

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  5. यथार्थ को चित्रित करती अच्छी लघुकथा है। ऐसा बहुतायत में देखने को मिलता जाता है।

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  6. लघुकथा की व्यंजना प्रभावशाली है। पत्रिका प्रकाशन ही क्यों, राजनीति सहित कई क्षेत्रों में कुटुम्ब की यह प्रतिभा दिख जाती है।

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  7. यह सत्येन्द्र जी की श्लिष्ट लेखनी की विशेषता है कि चन्दा शब्दों में ऐसा मारक व्यंग्य छोड़ जाते हैं कि...... ! रायजी ने सही फरमाया है. पत्रिका प्रकाशन तो सिर्फ एक संकेत मात्र है. दरअसल यही पारिवारिक व्यवस्था आज हर कहीं है..... ! अब क्या किया जाए.... ? महादेव को देवाधिदेव की उपाधि मिली तो महोदय झट से पत्नी को अन्नपूर्ण (खाद्यमंत्री), बड़े पुत्र को सुरसेनापति और छोटे को प्रथमपूज्य बना दिया..... ! धन्य है भारत-भूमि जहां आज भी इस परंपरा का अनुसरण हो रहा है है ! जय हो............ !!!!

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  8. एकदम लोकतंत्र की तर्ज़ पर

    "आपके लिए, आपके द्वारा, आपकी पत्रिका!”

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  9. bhai bhatijawad ko pust kar rahe ho manoj bhai.
    sunder rachana pasand aaye.

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  10. बहुत खूब ... पत्रिका भी जैसे गाँधी परिवार की तरह हो गयी ...
    ग़ज़ब की लघु कथा है ...

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  11. बहुत ही सटीक लघु कथा.....अक्सर यही हाल है...सब जगह.

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  12. thought provoking, a true reflection of our present realities. thanks.

    thanks for your blessings, and bestowing such an honour by choosing my poem to be showcased on your next 'charca manch'.
    regards,
    Dorothy.

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  13. लघुकथा बहुत अच्छी लगी. पत्रिका का शीर्षक भी मजेदार था.

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  14. pathak bhi dhoondh lete bhayiya apne ghar me hi to kitna achchha hota. lekin aisa na kar pate. pathak dhoondhne ke liye pathako ke bich aana hi padata. kash yahi pahle soch lete to kam se kam itana kachara sahitya na racha gaya hota.

    aaj kal blog par isi tarah ho raha hai aur hum sabko kachara sahitya padhane ko mil raha hai.

    aabhar,

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  15. ऐसी टीम तो कुछ भी कर सकती है.. पत्रिका ही क्यों.. राजनितिक पार्टी भी शुरू किया जा सकता है.. बहुत गहरा व्यंग्य छुपा है...

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  16. वाह मजा आ गया ..क्या सटीक बात कही है ..बेहतरीन लघु कथा.वाकई आजकल ऐसी ही तो पत्रकाएँ छाप रही हैं.

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  17. अनुदित पाठ जब इतना अच्छा है तो मूल पाठ निश्चित रूप से बहुत बढ़िया होगा ।

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  18. लेकिन इसे पढने के लिये तो बाहर वालो की जरुरत ही पडेगी ना, या वो भी खुद ही पढेगे:) मस्त जी

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  19. लघुकथा :: वसुधैव कुटुम्बकम्
    को पढ़वाने के लिए आभार!
    --
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी पोस्ट को बुधवार के
    चर्चा मंच पर लगा दिया है!
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  20. Manoj ji,
    Sorry for misunderstanding your message, "mea culpa". Thanks for pointing out my mistake. And, thanks once again for your blessings, and bestowing such an honour by choosing my poem to be showcased on your blog.
    regards,
    Dorothy.

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  21. सुन्दर लघुकथा और सुन्दर शीर्षक.
    आभार

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  22. इस सुंदर लघुकथा को हम तक पहुचाने के लिए आभार।

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  23. सटीक व्यंग्य.....



    सचमुच यही तो हाल है...

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  24. 2/10

    पंच लाईन के रूप में सिर्फ अंतिम पंक्ति ही थोड़ी असरदार है अन्यथा बहुत ही स्तरहीन लघुकथा है. हो सकता है कि अनुवाद का असर हो.
    [दो अंक में एक अंक यहाँ भीड़ को देखते हुए है]

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