शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

कोटि-कोटि नमन बापू!

imageimage जनवरी १९४७ में गांधी जी नोआखाली में थे। उन्होंने अपने समर्थकों को बताया कि वो यहां एक नई तकनीक की तलाश में आए हैं और साथ ही अपने सिद्धांत की दृढता की जांच करने के लिए भी। वह सिद्धांत जिसने उनके अस्तित्व को अभी तक बरकरार रखा है। इन्हीं सिद्धांतों की बदौलत उनका जीवन सार्थक रहा। वो नंगे पांव पदयात्रा करने वाले थे।

सात दिनों में उन्होंने ११६ मील की यात्रा की। इस दौरान उन्हों ने ४७ गावों का भ्रमण किया। घर-घर, झोपड़ी-झोपड़ी घूम-घूम कर शांति बहाल का प्रयास करते रहे। उन्होंने यह यह भी घोषणा की कि उन्हें इस यात्रा के दौरान किसी सहयात्री की दरकार नहीं थी। इसका कारण उन्होंने बताया कि उनके साथ उनका ईश्वर था। सिर्फ़ उनके चार समर्थक उनके साथ थे। उनका यह मानना था कि अगर वे इन गांवों में शांति, सद्भाव और सौहार्द्र की भावन जगा सके तो यह सारे देश लिए उदाहरण बनेगा।

गांधी जी उन दिनों बंगाल में भड़क उठी हिंसा से चिंतित थे। समुदायों के बीच भड़की यह हिंसा उन्हें भीतर तक साल रही थी। यह रक्तपात ऐसे छोटे-छोटे गांवों में हुआ था जहां सभी समुदाय के लोग हिल-मिल कर रहा करते थे। नोआखाली और तिपेरा की पदयात्रा से वे यह जानना चाहते थे कि अब वहां क्या किया जा सकता है? हिंसा और रक्तपात से वो हतोत्साहित हो चुके थे, उन्हें लगा उनकी आवाज़ अब शक्ति खो चुकी है।

गांधी जी एक बार जब कलकता में थे तो उनकी मुलाक़ात अंग्रेज़ चार्ल्स फ़्रीअर एंड्रूज़ ने गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर से कराई थी। एक था फ़कीर, संन्यासी तो दूसरा चिंतक, कवि। पर दोनों में इतना आंतरिक साम्य था कि गुरुदेव ने गांधी में महात्मा के दर्शन किए और उन्हें सर्वप्रथम “महात्मा” कहकर संबोधित किया।

१९४६ के अक्तूबर अंत तक गांधी जी तीसरी श्रेणी की रेलगाड़ी यात्रा के द्वारा कोलकाता पहुंचे। उद्देश्य उनका था नोआखाली के दंगा प्रभावित इलाक़ों का दौरा करना। बंगाल का यह डेल्टा प्रदेश है। इस क्षेत्र के लोग अत्यंत ग़रीब हैं। न सड़कें, न यातायात का साधन था। गांधी जी गांव-गांव घूमे। हज़ारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने एकत्र होते रहे। गांधी जी, भाईचारे, निर्मल-मन, शत्रु को क्षमा का संदेश सुनाते थे। उनकी यह यात्रा समाप्त होते-होते, नोआखाली और तिपेरा ज़िलों में समुदायों के आपसी संबंध काफ़ी सुधरे। गांधी जी कहा करते थे,

“यदि मैं हिन्दू भाईयों के या किसी अन्य मनुष्य के दुराचारों का समर्थन करता हूं तो मुझे हिन्दू कहलाने का कोई अधिकार नहीं होगा।”

image जब वे करुणा की इस लंबी यात्रा पर चल रहे थे तब न केवल समूचा भारत, बल्कि सारी दुनिया बड़ी उत्सुकता से उन्हें देख रही थी।

बीसवीं सदी में यदि किसी व्यक्ति में जनता ने गहरी दिलचस्पी दिखाई तो वह है गांधी जी का व्यक्तित्व। उन्होंने जो कुछ कहा और किया वह इतिहास बन गया।

गांधी जी मूलतः एक संवेदनशील व्यक्ति थे। अपने सिद्धांतों की कद्र करने वाले। वे आत्मा की आवाज़ सुनते थे। उनकी संवेदना, उनके तर्क और आध्यामिकता के बीच एक निष्पक्ष जज की तरह आ खड़ी होती थी। फिर उनकी सोच एक सिद्धांत की तरह सामने आती थी।

नोआखाली में गांधी जी भड़क उठी साम्प्रदायिकता की आग बुझाने गए थे। ७७ वर्षीय गांधी जी बांस की लाठी के सहारे अपने खोए सपने को फिर से हासिल करने के लिए जब गांव-गांव घूम रहे थे तब अपना प्रिय गीत गाते रहते थे, जिसे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था, “जोदी केऊ तोहार डाक शुने ना आशे तबे एकला चोलो रे।”

गांधी जी सुहरावर्दी के निवेदन पर नोआखाली गए थे।

मदुरै में एक सभा में गांधी जी खादी पहनने की अपील कर रहे थे, तो कुछ लोगों ने शिकायत की कि खादी बहुत मंहगी है। इस पर गांधी जी ने एक सुझाव दिया कि कम कपड़े पहनिए। गांधी जी ने ख़ुद उस दिन से कुरता और धोती पहनना छोड़ दिया। लंगोटी पहनने लगे और जीवन भर नंगे फ़कीर की तरह रहे। ऐसे थे गांधी जी। कथनी और करनी में फ़र्क़ नहीं।

गांधी जी ने सामाजिक बदलाव के कार्य को धार्मिक दायरे से बाहर निकालकर उसमें अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण पक्ष भी जोड़ दिया। स्वावलंबन और ग्राम स्वराज्य की अवधारणा को स्थापित करके उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने पर बल दिया। अपनी ज़िन्दगी पर अपने नियंत्रण की बात ने जो धीरे-धीरे सामाजिक बदलाव के कार्य का उद्देश्य बन गया, सामाजिक कार्य को एक ठोस वैचारिक आधार प्रदान किया। गांधी जी ने समाज की जड़ता को भंग कर लोगों को सोचने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया और समाज में बदलाव के लिए आवश्यक ऊर्जा का संचार किया। सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में इन कार्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

भारत में गांधी जी को राष्ट्रीय नेता के साथ-साथ एक पैगम्बर और पिता का स्थान दिया जाता है। उनके नेतृत्व में देश आज़ाद हुआ। वो राजनेता के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। वो एक नए भारत के निर्माण के लिए सतत प्रयत्नशील रहे। जात-पात, छुआ-छूत, साप्रदायिक भेद-भाव को दूर करने के लिए सारी उम्र लड़ते रहे। साम्प्रदायिकता की आग ठंडी करने में उन्हें शहादत प्राप्त हुई। साम्प्रदायिक दंगों पर क़ाबू पाने के लिए गांधी जी अकेले जीवन के अंतीम क्षणों तक प्रयत्नशील रहे।

29 जनवरी 1948 को गांधीजी ने अपनी पौत्री मनु से कहा था,

यदि किसी ने मुझ पर गोली चला दी और मैंने उसे अपने सीने पर झेलते हुए राम का नाम लिया तो मुझे सच्चा महात्मा मानना।

और यह कैसा संयोग था कि 30 जनवरी 1948 के दिन उस महात्मा को प्रार्थना सभा में जाते हुए मनोवांछित मृत्यु प्राप्त हुई।

ठीक ही कहा था लॉर्ड माउंट बेटन ने,

सारा संसार उनके जीवित रहने से सम्पन्न था और उनके निधन से वह दरिद्र हो गया।

 

 

गांधी जी और नोबेल शांति पुरस्कार

आज तक गांधी जी को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया। प्रश्‍न उठना स्वाभाविक है कि क्या गांधी जी की शांतिपूर्ण तकनीकों में कोई कमी थी? क्या परोक्ष या प्रत्यक्ष तरीक़े से ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें इस सम्मान से वंचित रखा? या फिर यह पुरस्कार भी यूरोपीय रंग-भेद नीतियों और पश्‍चिमी साम्राज्यवादी योजनाओं का टोकन मात्र है?

१४ मार्च १९३४ में “क्रिश्‍चियन संचुरी” नामक एक पाश्‍चात्य पत्रिका के संपादकीय में यह बात बड़े सशक्त शब्दों में कही गई थी कि “अगर गांधी नोबेल पुरस्कार के सबसे योग्य प्रत्याशी नहीं होते तो ऐसे पुरस्कार के औचित्य पर विचार होना चाहिए।“

एक बार एक ब्रिटिश महिला अगाथा हैरिसन ने बिहार के भूकम्पग्रस्त इलाक़ों के दौरे पर गांधी जी को उस संपादकीय की प्रति दिखा कर जब उनकी प्रतिक्रिया जाननी तो गांधी जी ने बड़ी संज़ीदगी से काग़ज़ के एक टुकड़े पर लिख दिया था,

“क्या आपने कभी ऐसे सच्चे सेवाव्रती का नाम सुना है जो सेवा के लिए नहीं बल्कि अनुदान के लिए सेवा कार्य करता है।“ image

१९३७ में गांधी जी पहली बार नोबेल शांति पुरस्कार के प्रत्याशी के रूप में विश्‍व के सामने आए। १९३८ और १९३९ में भी गांधी को मनोनीत किया गया। पर पुरस्कार नहीं दिया गया। क्या उस समय मैदान में और बेहतर प्रत्याशी थे? ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रिटेन की साम्राज्यवादी और रंगभेदपूर्ण नीति का ही परिणाम रहा होगा कि गांधी जी को इस सम्मान से वंचित रखा गया।

फिर १९४४ तक कोई नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया। १९४४ में यह पुरस्कार रेड क्रॉस को दिया गया। १९४७ के लिए गांधी जी का नाम एक बार फिर मनोनीत किया गया। लेकिन इस बार भी इस पुरस्कार से उन्हें वंचित रखा गया।

१९४८ में अंतिम बार गांधी जी को नोबेल पुरस्कार के प्रत्याशी के रूप में मनोनीत किया गया। पर उनकी मौत मनोनीत किए जाने की तिथि के पहले ही हो चुकी थी इसलिए उन्हें “क़ानूनन”नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जा सकता था।

कुछ कवियो के विचार

महा कवि पंत ने कहा था

तुम मांसहीन, तुम रक्त हीन, हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीऩ,

तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुरान हे चिर नवीन !

तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन,

आधार अमर, होगी जिस पर, भावी संस्कृति समासीन।

पं. सोहन लाल द्विवेदी की ये पंक्तियां उस महापुरुष को समर्पित हैं जिन्होंने सारे विश्‍व को एक नयी दिशा दी।

चल पड़े जिधर दो पग डगमग, चल पड़े कोटि पग उसी ओर,

पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर।

बापू के प्रति अपने उद्गार प्रकट करते हुए कविवर सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है :-

“तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवलimage

हे चिर पुराण, हे चिर नवीन।

सुख भोग खोजने आते सब,

आये तुम करने सत्य खोज,

जग की मिट्टी के पुतले जन,

तुम आत्मा के, मन के मनोज”।

उन जैसे महामानव के बारे में जितना भी कहा जाए कम है। रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां यहां स्मरण हो रहें हैं :-

“तू कालोदधि का महास्तम्भ, आत्मा के नभ का तुंग-केतु,

वापू! तू मर्त्य, अमर्त्य, स्वर्ग, पृथ्वी, भू, नभ का महासेतु।

तेरा विराट यह रूप कल्पना पट पर नहीं समाता है,

जितना कुछ कहूं मगर कहने को शेष बहुत रह जाता है।”

16 टिप्‍पणियां:

  1. Aapki is post ne kaphi rochak jaankari Bapu ji bare main prastut ki hai, Sach main rashtar bhakti se otproot is MAHATAMA JI ke jivan ke anchue prasngon ki jaankari dekar aapne apne kartvye ka palan kiya hai

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  2. मेहनत से सजाई गयी इस प्रस्तुति के लिए आभार. बहुत कुछ जानने को मिला आज गांधी जी के बारे में इस प्रस्तुति द्वारा.आपका लेखन सराहनीय है.

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  3. आइंस्टीन ने यों ही नहीं कहा कि आने वाली पीढ़ियां बमुश्किल यह यक़ीन करेंगी धरती पर कभी ऐसा कोई व्यक्ति हुआ था।

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  4. थोड़े समय पहले ही,उत्तराखंड में कौसानी जाने का अवसर मिला जहां पंतजी के बुलावे पर गांधीजी थोड़े दिनों के लिए स्वास्थ्य लाभ के वास्ते रुके थे। पूरी यात्रा कार में ही की मगर कई घंटों की यात्रा के कारण,लौटते-लौटते बीमार-सा हो गया। हैरानी होती है कि गांधीजी कैसे इतना पैदल चलते थे।

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  5. बहुत सारी और अच्छी जानकारी मिली इस लेख से ...सुरुचि पूर्ण लगायी यह पोस्ट बहुत अच्छी है ..आभार

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  6. गांधीजी के जीवन से जुड़े दुर्लभ चित्र और सामिग्री उपलब्ध कराकर बड़ा उपकार किया है! साधुवाद! बापू को शत-शत नमन!

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  7. बापू कि प्रेरणा औऱ उनके सपनों को उनके ही चेलों ने आग लगा दी। पहले एक भाई ने देश बांट दिया फिर बाकी लोगो ने ग्राम स्वालंबन की बात को हाशिए पर पहुंचा दिया।

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  8. बहुत ही तथ्यपरक एवं ज्ञानवर्धक आलेख है आपका !
    कितना सच लिखा है आपने !
    गांधी जी मूलतः एक संवेदनशील व्यक्ति थे। अपने सिद्धांतों की कद्र करने वाले। वे आत्मा की आवाज़ सुनते थे। उनकी संवेदना, उनके तर्क और आध्यामिकता के बीच एक निष्पक्ष जज की तरह आ खड़ी होती थी। फिर उनकी सोच एक सिद्धांत की तरह सामने आती थी।
    वे सच्चे अर्थों में महात्मा थे !
    गांधी जी को एक भावभीनी श्रद्धांजलि मैंने भी दी है 'सुधीनामा' ! आपकी प्रतिक्रया की प्रतीक्षा रहेगी ! धन्यवाद !

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  9. गाँधी जी के जन्म दिवस पर उनका स्मरण करते हुए उनको श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ।
    जानकारीपरक लेख के लिए आपको आभार।

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  10. Bahut aundah prastuti...ek hi post mein Mahatma ji ke baare mein itni jaankari dekhkar acha laga...Sadhuwaad

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  11. बहुत सार गर्भीत लेख है ...
    मुझे नही लगता की गाँधी जी नोबेल पुरूस्कार के मोहताज़ हैं ... ये संकीर्ण विचारों वाले देशों पर तमाचा है की उन्हे नोबेल पुरूस्कार के लिए नामांकित नही किया गया ...

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  12. .

    निश्चय ही वे सही मायनों में एक महात्मा थे। इस बढ़िया जानकारी भरे लेख के लिए साधुवाद !

    .

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  13. bahut durlabh aur rochak jankariyan...gandhiji logo ke dilo me hamesha jeevvit rahenge....

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  14. बहुत मेहनत से लगाई है आपने ये पोस्ट ..बेहतरीन और बहुत सारी जानकारियां मिलीं ..धन्यवाद.

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  15. गांधीजी पर आपकी ये पोस्ट बहुत ही सुंदर लगी पठनीय लगी मननीय लगी । बधाई ऐसी सुंदर प्रस्तुति के लिये ।

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