बुधवार, 6 अक्तूबर 2010

देसिल बयना - 50 : कविता से कवित्त भारी और ब्याह से विध भारी

दोस्तों,

 देसिल बयना का 50 वां अंक प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष हो रहा है। जब इस यात्रा की शुरुआत हमने की थी तो इतनी दूर तक पहुंच जाएंगे इसका अनुमान नहीं था। पर करण की लेखनी का जादू ही था कि इसे आप सबों का ढेर सारा प्यार मिलता रहा और उसका मनोबल बढता रहा। उसे तो कई लोगों ने आंचलिक शब्दों के जादूगर रेणु जी से तुलना करने लगे। शायद यह अतिशियोक्ति हो, पर इतना तो सच ज़रूर है कि इस स्तंभ को उन लोगों ने भी सराहा जिन्हें बिहार अंचल की इस बोली पर ज़्यादा पकड़ नहीं थी। आज इस मुकाम पर पहुंच कर उसने जो उपलब्धि क़ायम की है वह निश्चय ही तारीफ़ के क़ाबिल है।  मैं उसके सुंदर भविष्य़ की कामना करते हुए आपके समक्ष यह देसिल बयना पेश करता हूं।
सादर,
मनोज कुमार

कविता से कवित्त भारी और ब्याह से विध भारी

कवि कोकिल विद्यापति के लेखिनी की बानगी, "देसिल बयना सब जन मिट्ठा !"

दोस्तों हर जगह की अपनी कुछ मान्यताएं, कुछ रीति-रिवाज, कुछ संस्कार और कुछ धरोहर होते हैं। ऐसी ही हैं, हमारी लोकोक्तियाँ और लोक-कथाएं। इन में माटी की सोंधी महक तो है ही, अप्रतीम साहित्यिक व्यंजना भी है। जिस भाव की अभिव्यक्ति आप सघन प्रयास से भी नही कर पाते हैं उन्हें स्थान-विशेष की लोकभाषा की कहावतें सहज ही प्रकट कर देती है। लेकिन पीढी-दर-पीढी अपने संस्कारों से दुराव की महामारी शनैः शनैः इस अमूल्य विरासत को लील रही है। गंगा-यमुनी धारा में विलीन हो रहे इस महान सांस्कृतिक धरोहर के कुछ अंश चुन कर आपकी नजर कर रहे हैं

---करण समस्तीपुरी


पुरबरिया कोना पर लाउडिसपीकर गनगना रहा था। अरे महराज का बताएं, जहां तक उ लाउडिसपीकर का आवाज जाए उहाँ तक महीन दना बुनिय के गमक। आखिर खजूर छाप असली डालडा में बन रहा था। भकोसन भाई दुपहरे से इतर-गुलाव मल रहे थे। गोधन काका काकी से कह रहे थे, "सुन लेयो भकोसन की अम्मा ! दमरी झा पंडीजी भोरे-भोर पतरा बांच के गए हैं। ई अंतिम लगन है, उ भी जोगार जोड़ के। कल किरिन फूटते ही अतिचास शुरू। पहिले सांझ बारात लगाना पड़ेगा। वरना सबा साल के बादे पतोहिया आयेंगी दुआरी !"

"काकी शिव-शिव करते हुए बोली, "अरे काहे नहीं ! हम सब कुछ सांठ के तैय्यारे हैं। मोटर लगाइए और बराती ले जाइए। और फिर भकोसन के माथा पर साड़ी रख के शुरू होय गयी, "ऐले शुभ के लगनमा शुभे हो शुभे...!" हल्दी-महावर से भकोसन भाई का तेलिया चमरी भी चमचमा गया था।

तेसर पहर ढलते ही भकोसन भाई को ले बारात विदा हो गयी। पहिल सांझ दरवाजा भी लग गया। उ का कहते हैं माला-फेरौव्वल भी हुआ। ओकर बाद बरियतिया सब टूट पड़ा भोजन पर और भकोसन भाई कुर्सिय पर बैठे-बैठे सामियाना निहारते रहे।

हमलोग दुचार गो एकतुरिया अपना पत्तल मोड़ के उन्ही के पास बैठ गए। बेचारे घड़ी-घड़ी सुसराल में मिला नयका घड़ी देखे और मन मसोस के रह जाए। आखिर घंटा भर के बाद बेचारे के मंडप पर जाने का महूरत सिद्ध हुआ। लेकिन फिर भी कल्याण नहीं। तिरहुतिया विवाह में तिरपेक्खन (त्रिपेक्षण) हो जाता है। विधे-व्यवहार में भोर। सब तरफ तो गीत-नाद और हे-हे....ही...हे.... चल रहा था मगर भकोसन भाई का नजर ससुरारी घड़ी पर और गोधन काका का नजर भुरुकवा तारा पर अटका हुआ था।

इधर से दमरी झा तो पूरा शाट-कट मारे के चक्कर में थे मगर उधर के तिरहुतिया पंडीजी लगे कवित्त काढने। सच्चे कहे रहे कि उ इलाका का रिवाज है। विवाह हो कि मुंडन, एक-एक विध का व्यवहार पर मंतर कविता जैसे एकदम अलाप-अलाप के पढ़ते है। कौनो जमाना में उ के दादा परदादा दरभंगा महराज के चारण रहे थे।

अब का करें...? ब्याहे आये हैं तो विध तो करना ही होगा। गोधन काका बोले, "होऊ पंडीजी ! अरे महराज ! जौन कविता पढना है उ फटाफट पढ़िए और गठजोड़ करा के फटाक से चौदह फेरा घुमा दीजिये। हो जाएगा बंधन पक्का।" और से का मतलब है, ब्याह तो फेरे से होता है न.... !" काका फटाक से सौटकिया नमरी पर एकटकिया सिक्का रख के पंडीजी को परनाम कर लिए थे।

लच्छमी के दया से बात बनने लगा। पंडीजी हुंकारी भर के बोले, "हाँ ! सही बात ! बिआह का मतलब फेरा ही है कि.... मगर अब देखिये गौरी जी को मंडप में लाते हैं तो कौन सा मंतर है....!" पंडी जी मंतर का पहिला लाइन कविता के सूर में दोहरा के बोले और फिर उके बैकग्राउंड बांधे में ही पंडी जी सतयुग से कलयुग कर दिए। भकोसन भाई तो दम साधे बैठे रहे मगर काका का उठ-बैठ शुरू हो गया। कुशेशर थान वाले फूफा से रहा नहीं गया। बोले, "ओ पंडीजी ! मंतर भी कहियेगा कि कवित्ते बाँधने में भोर कर दीजियेगा... !"

"हें..हें...हें.... !" पंडीजी बत्तीसी निपोर के धरफर पढ़े लगे। कक्का खाली यही देख रहे थे कि गठजोड़ कब होता है। पंडीजी के एगो-एगो मंतर से पहिले कवित्त का देते थे पलौट बांच।

अब भुरुकवा निकलने ही वाला था। काका सर उठाए। पुरुब में आकाश लला रहा था। फिर बगले में कुर्सी पर बैठे दमरी झा से नजर मिली। झाजी का लटकल मुँह बता रहा था कि कहीं विदाई से पहिले ही अतिचार न लग जाए। काका से अब बर्दाश्त नहीं हुआ। लड़का के बाप थे ऊपर से पंडीजी को सौटकिया भी दिए थे। बमक गए, "बंद कीजये ई हो...लो...लो...लो.... ! अरे मरदे कहे कि शाट-काट में निपटा दीजिये तो लगे कवित्त छांटने.... ! अरे इहाँ ब्याह कराये आये हैं कि आपका विध पूजाए....?"

काका तो धोती से बाहर हुए जा रहे थे। मगर सरियाती में से एगो विरिद्ध समझाए, "अरे समधी साहेब का कीजियेगा.... ! ई तो है ही..... ! अपने मुलुक में बियाह-शादी सात जनम का बंधन है ! और उ पर से तिरहुत का मंतर का महत्तम कालिदास के कविता से कम नहीं है.... !"

काका घुरके, "धुर महाराराज ! का बियाह-शादी.... ? इहाँ तो कविता से कवित्त भारी और बियाह से विध भारी है ! मरदे एक सांझ से खाली कवित्त पढ़ रहे हैं और बेमतलब के विध कर रहे हैं। ई नहीं कि फटाफट मंगलम भगवान विष्णु-मंगलम गरुडध्वजः पढ़ के फटाफट फेरा करवा दिए।"

बेचारे सरियाती सज्जन बोले, "हा..हा...हा... ! ठीके कहते हैं ! ई तिरहुत का लच्छन है ! इहाँ सच में कविता से कवित्त भारी और विवाह से विध भारी होता है।"

इधर इतना बतकुच्चन हो गया मगर पंडीजी अपने इस्पीड से बढ़ रहे थे। उ भी का करेंगे.... सब कुछ का नियम है न... ! अब विवाह करने आये हैं तो उसका विध तो पूरा करना होगा।

कविता से कवित्त भारी और विवाह से विध भारी!” …. ई बात खाली ब्याहे काहे सब कुछ पर लागू होता है। एक्के बेर में माउंट एवरेस्ट पर नहीं चढ़ जाइएगा। अरे मरदे लक्ष्य पाने के लिए पहले बहुत सारी कवायद करनी पड़ती है। समझे। इसीलिये कहा जाता है, "कविता से कवित्त भारी और ब्याह से विध भारी !!"

21 टिप्‍पणियां:

  1. करण जी, मुझे जो कहना था पोस्ट के साथ कह ही दिया है। पर आज तो मुझे वह दिन याद आ रहा है जब आप तीन दिन भतीजी के उपचार में अस्पताल में थे, और घर लौटकर सबसे पहला काम आपने देसिल बयना के अंक को प्रस्तुत करने का किया था। इस तरह का समर्पण और निष्ठा बेमिसाल है। आज का अंक तो बस मिथिला संस्कृति को हमारे सामने सजीव कर गया है।
    शुभकामनाएं।

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  2. मिजाजे नॉस्टेल्जिया गया... ई कबित्त का चक्कर में भोर हो जाता था बिध पुजाते पुजाते रात के बईठल किरिन फूट जाता था. अऊर फेरा के टाइम पर काकी हऊ कोना में लोंघड़ल अऊर चच्चा मुँह बाए एगो कुर्सी पर डोल रहे… जब खोजाहट है तब पता चलता है कि कुस पानी का टाईम हो रहा है अऊर बिजोग का गीत फूटने लगा..
    जनवरी महीना का कनकना देने वाला जाड़ा में खुला छत पर हमरा बिआह हुआ था.. बाप रे, ई कबित्त अऊर बिध के फेरा में पंडित लोग अईसा फँसाया कि का कहें. लघुशंका का कोनो समाधानो नहीं..चौका से उठकर कीसे जाइएगा..
    बेजोड़ बरनन है. अऊर सिच्छा भी... पहिले कबित्त गढिए तब जाकर कबिता लिखाएगा, पहिले बिध निबाहिए तब बिआह के फेरा में पड़िए..फेरा माने ऊ वाला फेरा नहीं, सादी वाला फेरा..ई फेरा लेने के बादे ऊ वाला फेरा में आदमी पड़ता है जिन्नगी भर के लिए!!
    दिल खुस..मिजाज टंच! गोल्डेन जुबली मुबारक!! करन बाबू,सेंचुरियो जल्दिए लगेगा!

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  3. लक्ष्य पाने के लिए पहले बहुत सारी कवायद करनी पड़ती है
    इस कथा के माध्‍यम से ब‍हुत बढिया संदेश दिया है .. 50वी देसिल बयना के लिए आपको बधाई .. नियमित आगे बढते रहने के लिए शुभकामनाएं !!

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  4. कविता से कवित्त भारी और ब्याह से विध भारी...बिलकुल सही बहुत अच्छी प्रस्तुति रही.
    देसिल बयना के 50वे अंक के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएं !!

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  5. भई वाह..क्या बात है
    शानदार और मज़ेदार
    इसलिए आपको आभार

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  6. बिलकुल सही कहते हैं कारण बाबू,,, बियाह में बिध करते करते मनुख थक जाता है... अभी हमरो संग हुआ है... लेकिन कुछ पाने के लिए तो तयारी करना ही परता है न..
    खैर.. कारण जी को हाफ सेंचुरी के लिए हार्दिक बधाई..

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  7. 50वी देसिल बयना के लिए आपको बधाई

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  8. करण जी सबसे पहले स्वर्ण जयंती बयना की हार्दिक शुभकामना. अब कोई प्रकाशक आएगा और इसे किताब का रूप देगा. बाकी आज के पोस्ट पर. हम लोग तो सारी जिनगी इसी फेर में जुजारे हैं.. वियाह करने गए थे तो परिछन में ही भोर हो गया था.. सिनुरदान होते होते फरिछ हो गया था.. इसके मर्म से जुड़े हैं हम.. एक और आकर्षक पोस्ट के लिए आपको हार्दिक बधाई..

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  9. अति सुन्दर करण जी। धीरे-धीरे चलते चलते आप इतना आगे निकल आए कि देसिल बयना के रस में भींगे हम सबको इधर सोचने का अवसर ही नहीं मिला। सच, लगातार पचासवीं पोस्ट छोटी उपलब्धि नहीं है, वो भी सब एक से बढ़कर एक। पचासवीं पोस्ट की आपको बहुत बहुत बधाई। आशा है देसिल बयना का सफर आगे भी ऐसे ही सरसपूर्ण चलता रहेगा। एक बार पुनः बधाई।

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  10. Ram Ram Karan Ji...
    Sabse pahile to desil bayna ke ardhsatak par apko bahute bahute badhai....
    Aur desil bayna k madhayam se sandesh to bahute acha de diye hai ap...
    Aur ka kahe..ap etna acha likhte hai ki hum kucho tarif karna chahte hai kamme lagta hai humko...

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  11. "बंद कीजये ई हो...लो...लो...लो.... ! अरे मरदे कहे कि शाट-काट में निपटा दीजिये तो लगे कवित्त छांटने.... ! अरे इहाँ ब्याह कराये आये हैं कि आपका विध पूजाए....?"


    :):) ...बहुत बढ़िया ...कविता से कवित्त भारी ...अच्छे से समझ आ गया ...

    ५० वीं कड़ी के लिए बधाई

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  12. अति उत्तम जी,साथ ही ५० वी कडी के लिये बधाई

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  13. अपने मन में ही अचानक यूँ सफल हो जायेंगे !
    क्या खबर थी आपसे मिल कर ग़ज़ल हो जायेंगे !
    भोर की पहली किरण बन कर ज़रा छू दीजिये,
    आपकी सौगंध हम खिल कर कमल हो जायेंगे !!

    सदैव इसी स्नेह और शुभ-कामना की आवश्यकता रहेगी !

    सभी पाठकों को हृदय से आभार !!

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  14. इन कहानियों के माध्यम से संस्कृति से परिचय भी हो रहा है। संदेश जो दिया उसके लिए आभार।

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  15. bahut rochak aur sundar rachna... desil bayana ke iss ank ke liye bahut badhai.. sadhuvaad.

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  16. उफ़ मेरे जैसे निपट अज्ञानियों के लिए एक तो ये भाषा समझ पाना बहुत ही मुश्किल काम है..एक एक शब्द को बहुत ध्यान से पढ़ पूरी पोस्ट खतम करी...तब जा कर समझ में आया लोकोक्ति का मतलब. थेंक गोड अंत में समझ तो आया.

    :)

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  17. Bahut bahut badhai karan.......

    bhateejee ab kaisee hai?
    kya ho gaya tha...... ?
    mail karke batana ?
    mere layak kuch bhee kaam ho to batana jhijhakana nahee.


    aise hee aage badte raho.........aur DIN DOONEE RAAT CHOUGANEE UNNATI KARO .ye hee Aasheesh hai.......

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  18. आशा है कवित्त के चक्कर में भोर का तारा नही निकला होगा और दुल्हन शुभ मुहूर्त पर अपने घर पहुंच गई होगी । बहुत सुंदर कथा और उतनी ही मीठी भाषा ।

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  19. Bhasha ki mithaas ne mugdh kar diya.
    Desil bayana ke 50we paaydaan tak ka safar pura karane par hardik badhai aur shubhkamnaayen.
    -GyanChand Marmagya

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