शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

बापू को शत बार नमन

बापू को शत बार नमन

आचार्य परशुराम राय

राष्ट्र ब्रह्म के

हे आराधक

कर्मयोग के

हे अवतार,

सत्य, अहिंसा

प्राण तुम्हारे

श्रद्धा, प्रेम हैं

नेत्र तुम्हारे

निष्ठा, संयम

चरण तुम्हारे

सत्याग्रह की लाठी से

किए नीति विस्तार।

भयमुक्त,

परिणामयुक्त,

अस्पृश्यता के

हे संहारक,

पौरुष के हाथों में

लेखनी ले आचरण की

लिखते रहे

जीवन पर अपने

ग्रंथ निहित आदर्श।

देख तुम्हारा निश्चय

बापू,

होता हिमगिरि था गर्वोन्नत।

आज तुम्हें शतबार नमन

हे निराकार।

16 टिप्‍पणियां:

  1. बापू जी को हमारा भी शत शत नमन। बहुत उमदा रचना है। शुभकामनायें

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  2. क्‍या बात है आज तो सभी गजब ढा रहे हैं? बहुत ही सशक्‍त रचना है। मन कर रहा है कि डायरी में लिख कर रखा जाए। आपको बधाई और बापू को नमन।

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  3. समसामयिक प्रश्नों को उठाती यह कविता सार्थक है।
    बापू को शत-शत नमन!

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  4. Aapki kavita achchi aur sahi hai.Bapu ko naman hi na karen unka ANUSARAN karney ka SANKALP bhi karen-sabhi log meri yahi kamna hai.

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  5. बहुत ही सशक्त शब्द कोष से सजाई इस रचना के लिए बधाई.
    बापू को नमन.

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  6. आचार्य जी,सार्थक श्रद्धांजलि! नमन,बापू को भी और लाल बहादुर को भी!

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  7. बापू को नमन! सुन्दर प्रस्तुति।

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  8. बापू भारतीय जीवन-दर्शन और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक हैं। उनकी स्मृति मात्र साहस और गौरव का भाव जगाती है।

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  9. बापू पर लिखी गई सशक्त रचनाओं में से एक रचना है। बापू को नमन। और राय जी को आभार।

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