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रविवार, 27 नवंबर 2011

बच्चन जी के जन्मदिन पर


बच्चन जी
परशुराम राय

जी हाँ, इसी नाम से बचपन में हरिवंश राय को पहले माता-पिता, परिवार के अन्य सदस्य और फिर पड़ोसी तथा मित्र सम्बोधित करते थे। बाद में इन्होंने इसी को अपना पेन-नेम बनाकर साहित्य-सृजन किया और आज साहित्यिक जगत ही नहीं, बल्कि सभी उनके इसी नाम से परिचित हैं। उनकी संतानों ने भी अपने पारम्परिक वंशधरों के कुलनाम को छोड़कर इसी नाम को अपने लिए कुलनाम के रूप में व्यवहृत कर लिया।
आज हरिवंश राय बच्चन का 104थी वर्ष-गाँठ है। इनका जन्म आज ही के दिन 104 वर्ष पूर्व 1907 में इलाहाबाद में हुआ था। इनकी माँ सरस्वती देवी और पिता श्री प्रताप नारायण श्रीवास्तव थे। सम्भवतः इनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से प्रव्रजित होकर इलाहाबाद में बस गए थे। 19 वर्ष की आयु में इनका विवाह श्यामा जी से हुआ, जिनका 1936 में यक्ष्मा से देहान्त हो गया। बाद में फिर इन्होंने तेजी सूरी से विवाह किया। इनसे इनको दो सन्तानें- अमिताभ और अजिताभ हुईँ।
इन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी.एच.डी.। अपने कैरियर का प्रारम्भ इन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय में अध्यापन से किया। फिर स्वतंत्रता मिलने के बाद विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के रूप में काम किया। बाद में ये राज्य-सभा के मनोनीत सदस्य हुए। 18 जनवरी 2003 में मुम्बई में इनका देहावसान हुआ।  
बच्चन जी उपर्युक्त उपलब्धियों के लिए कम और अपनी साहित्यिक कृतियों के लिए अधिक जाने जाते हैं। विशेषकर उनकी कालजयी कृति मधुशाला के साथ उनका नाम सबसे अधिक जुड़ा है। उन्होंने लगभग सौ पुस्तकें लिखी हैं और इन्हें दो चट्टानें के लिए 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इसके अतिरिक्त इन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार और बिड़ला फाउंडेशन से सरस्वती सम्मान प्रदान किए गए। 1976 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार ने इन्हें पद्मभूषण की उपाधि से सम्मानित किया गया।
बच्चन जी ने वैसे तो अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें गद्य, कविता, अनूदित रचनाएँ हैं। लेकिन वे मधुशाला से जितना जाने जाते हैं, उतना अन्य के लिए नहीं।  इनकी प्रमुख रचनाएँ- मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशानिमन्त्रण, दो चट्टानें आदि हैं।
आज का उद्देश्य उनका परिचय देना नहीं बल्कि उन्हें याद करना है। बच्चन जी को बड़ी लम्बी आयु मिली थी। अपने अन्तिम दिनों में काफी लम्बे समय तक वे अस्वस्थ रहे। जब 2003 में उनका देहावसान हुआ था, उस समय मैं आन्ध्र प्रदेश स्थित आर्डनेन्स फैक्टरी, मेदक में था। उस दिन टी.वी. पर प्रायः सभी चैनल सूनी मधुशाला के नाम से उस घटना का प्रसारण कर रहे थे। इन दो शब्दों सूनी मधुशाला ने मुझे कब प्रेरित कर दिया श्रद्धा की मधुशाला लिखने के लिए, पता ही न चला।
उस दिन मुझे अपने एक मित्र के विरुद्ध चल रही अनुशासनिक कार्यवाही में बचाव अधिकारी के रूप में दिल्ली जाना था। शाम को ट्रेन में बैठा तो कोई गप-शप के लिए उपयुक्त सहयात्री नहीं मिला। अब मन में श्रद्धा की मधुशाला की पंक्तियाँ फड़कने लगीं। सोचा क्यों न मधुशाला में बच्चन जी द्वारा प्रयुक्त छंद में ही इसे लिखा जाय। अतएव दिल्ली पहुँचते ही पहले मधुशाला की एक प्रति खरीदी, उसे पढ़ा और मनन किया। वापसी में ट्रेन में ही श्रद्धा की मधुशाला लिख डाली। घर पहुँच कर मात्रा आदि ठीक कर इसका संस्कार किया। यह दस पंखुड़ियों की बच्चन जी को श्रद्धांजलि है। कई बार कवि-गोष्ठियों में इसे सुनाया, मित्रों ने काफी पसंद किया। बाद में आर्डनेन्स फैक्टरी मेदक की गृह-पत्रिका सारथ में इसका प्रकाशन हुआ और 18 जनवरी, 2010 को बच्चन जी की सातवीं पुण्यतिथि पर इसी ब्लॉग पर भी प्रकाशन हुआ। आदरणीय मनोज कुमार जी ने इच्छा व्यक्त की कि आज बच्चन जी को स्मरण करते हुए श्रद्धा की मधुशाला को पुनः आज पोस्ट किया जाए। इसी के अनुसरण में आज प्रस्तुत है श्रद्धा की मधुशाला

श्रद्धा की मधुशाला


साकी  बाला  के हाथों में
भरा  पात्र  सुरभित हाला
पीने वालों के सम्मुख था
भरा हुआ मधु का प्याला।
मतवालों के मुख पर फिर क्यों
दिखी  नहीं   थी    जिज्ञासा
पीने  वाले   मतवाले     थे
फिर  भी  सूनी  मधुशाला ।। 1 ।।
मधु का कलश भावना का था
नाम   आपका   था   हाला
पीने   वाले   प्रियजन   तेरे
कान  कान  था   मधुप्याला।
तेरी चर्चा की सुगंध सी
आती थी उनके मुख से
यहाँ बसी थीं तेरी  यादें
और सिसकती मधुशाला ।। 2 ।।   
छूट गए सब जग के साकी 
छूट  गई  जग  की हाला
छूट  गए  हैं  पीने  वाले
छूट गया जग का प्याला।
         
बचा न कुछ भी, सब कुछ छूटा
जग    की   मधुबाला   छूटी
छोड़  गए  तुम  अपनी  यादें
प्यारी  सी  यह     मधुशाला ।। 3 ।।
    
मृत्यु खड़ी साकी बाला थी
हाथ  लिए  गम का हाला
जन-जन था बस पीनेवाला
लेकर  साँसों  का  प्याला।
किंकर्तव्यमूढ़ सी महफिल
मुख पर कोई बोल न थे
चेहरों पर थे गम के मेघ
आँखों में थी मधुशाला ।। 4 ।।
पंचतत्व के इस मधुघट को 
छोड़   चले  पीकर   हाला
कूच कर गए इस जगती से
लोगों  को  पकड़ा   प्याला।
बड़ी अजब माया है जग की         
यह तो  तुम  भी जान चुके
पर चिंतित तू कभी न होना
वहाँ  मिलेगी     मधुशाला ।। 5 ।।
वहाँ मिलेंगे साकी तुमको
स्वर्ण  कलश में ले हाला
इच्छा की ज्वाला उठते ही
छलकेगा  स्वर्णिम प्याला।
करें वहाँ स्वागत बालाएँ
होठों का  चुम्बन  देकर
होगे तुम  बस पीने वाले
स्वर्ग  बनेगा   मधुशाला ।। 6 ।।
मन बोझिल था, तन बोझिल था
कंधों   पर   था    तन-प्याला
डगमग-डगमग   पग  करते  थे
पिए  विरह   का   गम   हाला।
                                  
राम नाम है सत्य न  बोला
रट  थी  सबकी  जिह्वा पर
अमर रहें बच्चन जी जग में,
अमर  रहे  यह    मधुशाला ।। 7 ।।    
दुखी न होना ऐ साकी तू             
छलकेगी फिर  से  हाला
मुखरित  होंगे  पीने वाले
छलकेगा  मधु का प्याला।
नृत्य  करेंगी मधुबालाएँ
हाथों में  मधुकलश लिए
सोच रहा हूँ कहीं बुला ले
फिर  से तुमको मधुशाला ।। 8 ।।
क्रूर  काल-साकी  कितना हूँ
भर  दे  विस्मृति  का हाला
खाली कर न सकेगा फिर भी
लोगों  की स्मृति  का प्याला।
इस जगती पर  परिवर्तन के
आएँ    झंझावात     भले,
अमर  रहेंगे  साकी  बच्चन,
अमर   रहेगी     मधुशाला ।। 9 ।।
अंजलि का प्याला  लाया हूँ
श्रद्धा  की  भरकर    हाला
भारी मन है मुझ साकी का
आँखों   में    ऑसू-हाला।
मदपायी का मतवालापन     
ठहर गया क्यों पता नहीं
अंजलि  में लेकर बैठा हूँ
श्रद्धा की यह मधुशाला ।। 10 ।।
******

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

बापू, एक मंत्र दो

बापू, एक मंत्र दो

आचार्य परशुराम राय

gandhi (10)वर्षों की फाइल से

निकला फिर आज

बापू का जन्म-दिन।

 

सद्ग्रंथों से

प्रार्थना की बूँद ले

राजनीति के

हाथों आचमन कर

दुकान से लाए गए-

मातहत के हाथ,

बुके चढ़ाकर

बापू की समाधि पर

सन्तुष्ट मैं।

 

जो कुछ कहा-सुना बापू ने

वह

आप समझें,

मेरे लिए बस, इतना ही।

 

वैसे भी,

आफिस में टाँगी गई

सदा मुस्कराती

बापू की प्रतिमा से

आशीर्वचनों की वर्षा

रोज सहते हम।

 

भ्रष्ट भूत का उपचार

अभी शेष था

कि सत्य और अहिंसा

की लाश लिए

धरने पर आ बैठा कोई

रामलीला मैदान में,

जनलोकपाल बिल के तर्पण से

जाग गए प्रेत दोनों,

गायब थी - आँखों से नींद,

मन में बेचैनी थी

रात-दिन एक से,

टोटके भी बहुत किए,

पर काम न आए।

 

इन भूतों से पिंड छूटे,

बापू !

आज अपने जन्मदिन पर

एक मंत्र ऐसा दो।

*****

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

कोटि-कोटि नमन बापू!

imageimage जनवरी १९४७ में गांधी जी नोआखाली में थे। उन्होंने अपने समर्थकों को बताया कि वो यहां एक नई तकनीक की तलाश में आए हैं और साथ ही अपने सिद्धांत की दृढता की जांच करने के लिए भी। वह सिद्धांत जिसने उनके अस्तित्व को अभी तक बरकरार रखा है। इन्हीं सिद्धांतों की बदौलत उनका जीवन सार्थक रहा। वो नंगे पांव पदयात्रा करने वाले थे।

सात दिनों में उन्होंने ११६ मील की यात्रा की। इस दौरान उन्हों ने ४७ गावों का भ्रमण किया। घर-घर, झोपड़ी-झोपड़ी घूम-घूम कर शांति बहाल का प्रयास करते रहे। उन्होंने यह यह भी घोषणा की कि उन्हें इस यात्रा के दौरान किसी सहयात्री की दरकार नहीं थी। इसका कारण उन्होंने बताया कि उनके साथ उनका ईश्वर था। सिर्फ़ उनके चार समर्थक उनके साथ थे। उनका यह मानना था कि अगर वे इन गांवों में शांति, सद्भाव और सौहार्द्र की भावन जगा सके तो यह सारे देश लिए उदाहरण बनेगा।

गांधी जी उन दिनों बंगाल में भड़क उठी हिंसा से चिंतित थे। समुदायों के बीच भड़की यह हिंसा उन्हें भीतर तक साल रही थी। यह रक्तपात ऐसे छोटे-छोटे गांवों में हुआ था जहां सभी समुदाय के लोग हिल-मिल कर रहा करते थे। नोआखाली और तिपेरा की पदयात्रा से वे यह जानना चाहते थे कि अब वहां क्या किया जा सकता है? हिंसा और रक्तपात से वो हतोत्साहित हो चुके थे, उन्हें लगा उनकी आवाज़ अब शक्ति खो चुकी है।

गांधी जी एक बार जब कलकता में थे तो उनकी मुलाक़ात अंग्रेज़ चार्ल्स फ़्रीअर एंड्रूज़ ने गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर से कराई थी। एक था फ़कीर, संन्यासी तो दूसरा चिंतक, कवि। पर दोनों में इतना आंतरिक साम्य था कि गुरुदेव ने गांधी में महात्मा के दर्शन किए और उन्हें सर्वप्रथम “महात्मा” कहकर संबोधित किया।

१९४६ के अक्तूबर अंत तक गांधी जी तीसरी श्रेणी की रेलगाड़ी यात्रा के द्वारा कोलकाता पहुंचे। उद्देश्य उनका था नोआखाली के दंगा प्रभावित इलाक़ों का दौरा करना। बंगाल का यह डेल्टा प्रदेश है। इस क्षेत्र के लोग अत्यंत ग़रीब हैं। न सड़कें, न यातायात का साधन था। गांधी जी गांव-गांव घूमे। हज़ारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने एकत्र होते रहे। गांधी जी, भाईचारे, निर्मल-मन, शत्रु को क्षमा का संदेश सुनाते थे। उनकी यह यात्रा समाप्त होते-होते, नोआखाली और तिपेरा ज़िलों में समुदायों के आपसी संबंध काफ़ी सुधरे। गांधी जी कहा करते थे,

“यदि मैं हिन्दू भाईयों के या किसी अन्य मनुष्य के दुराचारों का समर्थन करता हूं तो मुझे हिन्दू कहलाने का कोई अधिकार नहीं होगा।”

image जब वे करुणा की इस लंबी यात्रा पर चल रहे थे तब न केवल समूचा भारत, बल्कि सारी दुनिया बड़ी उत्सुकता से उन्हें देख रही थी।

बीसवीं सदी में यदि किसी व्यक्ति में जनता ने गहरी दिलचस्पी दिखाई तो वह है गांधी जी का व्यक्तित्व। उन्होंने जो कुछ कहा और किया वह इतिहास बन गया।

गांधी जी मूलतः एक संवेदनशील व्यक्ति थे। अपने सिद्धांतों की कद्र करने वाले। वे आत्मा की आवाज़ सुनते थे। उनकी संवेदना, उनके तर्क और आध्यामिकता के बीच एक निष्पक्ष जज की तरह आ खड़ी होती थी। फिर उनकी सोच एक सिद्धांत की तरह सामने आती थी।

नोआखाली में गांधी जी भड़क उठी साम्प्रदायिकता की आग बुझाने गए थे। ७७ वर्षीय गांधी जी बांस की लाठी के सहारे अपने खोए सपने को फिर से हासिल करने के लिए जब गांव-गांव घूम रहे थे तब अपना प्रिय गीत गाते रहते थे, जिसे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था, “जोदी केऊ तोहार डाक शुने ना आशे तबे एकला चोलो रे।”

गांधी जी सुहरावर्दी के निवेदन पर नोआखाली गए थे।

मदुरै में एक सभा में गांधी जी खादी पहनने की अपील कर रहे थे, तो कुछ लोगों ने शिकायत की कि खादी बहुत मंहगी है। इस पर गांधी जी ने एक सुझाव दिया कि कम कपड़े पहनिए। गांधी जी ने ख़ुद उस दिन से कुरता और धोती पहनना छोड़ दिया। लंगोटी पहनने लगे और जीवन भर नंगे फ़कीर की तरह रहे। ऐसे थे गांधी जी। कथनी और करनी में फ़र्क़ नहीं।

गांधी जी ने सामाजिक बदलाव के कार्य को धार्मिक दायरे से बाहर निकालकर उसमें अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण पक्ष भी जोड़ दिया। स्वावलंबन और ग्राम स्वराज्य की अवधारणा को स्थापित करके उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने पर बल दिया। अपनी ज़िन्दगी पर अपने नियंत्रण की बात ने जो धीरे-धीरे सामाजिक बदलाव के कार्य का उद्देश्य बन गया, सामाजिक कार्य को एक ठोस वैचारिक आधार प्रदान किया। गांधी जी ने समाज की जड़ता को भंग कर लोगों को सोचने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया और समाज में बदलाव के लिए आवश्यक ऊर्जा का संचार किया। सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में इन कार्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

भारत में गांधी जी को राष्ट्रीय नेता के साथ-साथ एक पैगम्बर और पिता का स्थान दिया जाता है। उनके नेतृत्व में देश आज़ाद हुआ। वो राजनेता के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। वो एक नए भारत के निर्माण के लिए सतत प्रयत्नशील रहे। जात-पात, छुआ-छूत, साप्रदायिक भेद-भाव को दूर करने के लिए सारी उम्र लड़ते रहे। साम्प्रदायिकता की आग ठंडी करने में उन्हें शहादत प्राप्त हुई। साम्प्रदायिक दंगों पर क़ाबू पाने के लिए गांधी जी अकेले जीवन के अंतीम क्षणों तक प्रयत्नशील रहे।

29 जनवरी 1948 को गांधीजी ने अपनी पौत्री मनु से कहा था,

यदि किसी ने मुझ पर गोली चला दी और मैंने उसे अपने सीने पर झेलते हुए राम का नाम लिया तो मुझे सच्चा महात्मा मानना।

और यह कैसा संयोग था कि 30 जनवरी 1948 के दिन उस महात्मा को प्रार्थना सभा में जाते हुए मनोवांछित मृत्यु प्राप्त हुई।

ठीक ही कहा था लॉर्ड माउंट बेटन ने,

सारा संसार उनके जीवित रहने से सम्पन्न था और उनके निधन से वह दरिद्र हो गया।

 

 

गांधी जी और नोबेल शांति पुरस्कार

आज तक गांधी जी को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया। प्रश्‍न उठना स्वाभाविक है कि क्या गांधी जी की शांतिपूर्ण तकनीकों में कोई कमी थी? क्या परोक्ष या प्रत्यक्ष तरीक़े से ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें इस सम्मान से वंचित रखा? या फिर यह पुरस्कार भी यूरोपीय रंग-भेद नीतियों और पश्‍चिमी साम्राज्यवादी योजनाओं का टोकन मात्र है?

१४ मार्च १९३४ में “क्रिश्‍चियन संचुरी” नामक एक पाश्‍चात्य पत्रिका के संपादकीय में यह बात बड़े सशक्त शब्दों में कही गई थी कि “अगर गांधी नोबेल पुरस्कार के सबसे योग्य प्रत्याशी नहीं होते तो ऐसे पुरस्कार के औचित्य पर विचार होना चाहिए।“

एक बार एक ब्रिटिश महिला अगाथा हैरिसन ने बिहार के भूकम्पग्रस्त इलाक़ों के दौरे पर गांधी जी को उस संपादकीय की प्रति दिखा कर जब उनकी प्रतिक्रिया जाननी तो गांधी जी ने बड़ी संज़ीदगी से काग़ज़ के एक टुकड़े पर लिख दिया था,

“क्या आपने कभी ऐसे सच्चे सेवाव्रती का नाम सुना है जो सेवा के लिए नहीं बल्कि अनुदान के लिए सेवा कार्य करता है।“ image

१९३७ में गांधी जी पहली बार नोबेल शांति पुरस्कार के प्रत्याशी के रूप में विश्‍व के सामने आए। १९३८ और १९३९ में भी गांधी को मनोनीत किया गया। पर पुरस्कार नहीं दिया गया। क्या उस समय मैदान में और बेहतर प्रत्याशी थे? ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रिटेन की साम्राज्यवादी और रंगभेदपूर्ण नीति का ही परिणाम रहा होगा कि गांधी जी को इस सम्मान से वंचित रखा गया।

फिर १९४४ तक कोई नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया। १९४४ में यह पुरस्कार रेड क्रॉस को दिया गया। १९४७ के लिए गांधी जी का नाम एक बार फिर मनोनीत किया गया। लेकिन इस बार भी इस पुरस्कार से उन्हें वंचित रखा गया।

१९४८ में अंतिम बार गांधी जी को नोबेल पुरस्कार के प्रत्याशी के रूप में मनोनीत किया गया। पर उनकी मौत मनोनीत किए जाने की तिथि के पहले ही हो चुकी थी इसलिए उन्हें “क़ानूनन”नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जा सकता था।

कुछ कवियो के विचार

महा कवि पंत ने कहा था

तुम मांसहीन, तुम रक्त हीन, हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीऩ,

तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुरान हे चिर नवीन !

तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन,

आधार अमर, होगी जिस पर, भावी संस्कृति समासीन।

पं. सोहन लाल द्विवेदी की ये पंक्तियां उस महापुरुष को समर्पित हैं जिन्होंने सारे विश्‍व को एक नयी दिशा दी।

चल पड़े जिधर दो पग डगमग, चल पड़े कोटि पग उसी ओर,

पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर।

बापू के प्रति अपने उद्गार प्रकट करते हुए कविवर सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है :-

“तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवलimage

हे चिर पुराण, हे चिर नवीन।

सुख भोग खोजने आते सब,

आये तुम करने सत्य खोज,

जग की मिट्टी के पुतले जन,

तुम आत्मा के, मन के मनोज”।

उन जैसे महामानव के बारे में जितना भी कहा जाए कम है। रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां यहां स्मरण हो रहें हैं :-

“तू कालोदधि का महास्तम्भ, आत्मा के नभ का तुंग-केतु,

वापू! तू मर्त्य, अमर्त्य, स्वर्ग, पृथ्वी, भू, नभ का महासेतु।

तेरा विराट यह रूप कल्पना पट पर नहीं समाता है,

जितना कुछ कहूं मगर कहने को शेष बहुत रह जाता है।”

बापू तेरे जन्म दिवस पर...

बापू तेरे जन्म दिवस पर...

करण समस्तीपुरी

दस साल पहले पिताजी ने पूछा था, "गांधीजी का जन्म कब हुआ था ?" मैं ने सगर्व कहा था, "2 अक्टूबर को।" "साल भी बोलो !", पिताजी किसी साक्षात्कार लेने वाले बॉस की तरह बोल रहे थे। मैं भी उसी तरह खुश हुआ जैसे कोई अभ्यार्थी आसान सवाल सुन कर होता है। सर उठा कर बोला, "2 अक्टूबर 1969। पिता जी का अगला सवाल चौंकाने वाला था, "गांधीजी तुमसे महज दस साल बड़े थे ?"

फिर मैं ने वर्षों की मनोगत गणना आरम्भ किया.... ! ओह  भारत में जन्मे, पले-बढे, स्नातक के छात्र को राष्ट्रपिता की जन्मतिथि याद नहीं है... ? ध्यान आया स्मरण शक्ति का पद्य-मोह। छंद, मात्रा, शिल्प, व्याकरण कुछ का पता नहीं मगर मैं ने बापू के बारे में कुछ प्रचलित बातों को पद्यबंध करने का प्रयास किया और मुझे ख़ुशी होती है कि अब मैं बापू से सम्बंधित महत्वपूर्ण तिथियों को नहीं भूलता हूँ। आप भी देखिये....

अठारह सौ उनहत्तर का शुभ अक्टूबर मास !

मंगलमय तिथि दूसरी, जन्मे मोहनदास !!

था यह दिवस सलोना पाया पोरबंदर गुजरात !

माँ पुतली ने जन्म दिया बालक जग-विख्यात !!

पिता रियासत राजकोट के ऊंचे दीवान !

नाम करमचंद गांधी, सरल-सहज पहचान !!

धर्मपारायण माताजी की पड़ी पुत्र पर छाया !

दया-क्षमा-परमार्थ-लोकहित बचपन से ही पाया !!

हरिश्चंद्र नाटक गांधी जी के मानस पर अटका !

सत्य से नाता जोड़ा ऐसा, फिर असत्य नहीं फटका !!

अल्प-वयस में हो गया कस्तूरबा संग व्याह !

पत्नी मिली सुलक्षणा, हुई प्रकाशित राह !!

ऊंची शिक्षा के लिए, गाँधी गए विदेश !

दिया जननी ने आशीष, आयुष और सख्त निर्देश !!

मद्य-मांस-महिलादि से रखना स्वयं को दूर !

याद सदा ईश्वर को रखना, होगे सफल जरूर !!

शिक्षा जब संपन्न हुई, गांधी स्वदेश को लौटे !

अहमदाबाद न्यायालय में फ़ौरन वकील बन बैठे !!

गए अफ्रीका दक्षिणी जहां श्वेत-अश्वेत में भेद !

देख दशा अश्वेत की हुआ हृदय में खेद !!

गोरों का अत्याचार कहाँ गांधी था सहने वाला !

उसी देश की धरती पर वह सत्याग्रह कर डाला !!

लौटे जब घर अपने तो सच्चाई समझ में आई !

अंग्रेजों ने माँ भारत की है दुर्दशा बनाई !!

जननी हो जंजीर में जकरी ऐसे जीवन को धिक्कार !
प्रेरित होकर इसी मन्त्र से किया ब्रिटिश का वहिष्कार !!

ईश्वर का उद्देश्य देश-हित सफल हुआ तब जा कर !

छोड़ दिया पेशा वकील का, शपथ सत्य का खाकर !!

बैठे व्रत ले देशभक्ति का सावारमती किनारे !

दिन-दलित लाचार मनुज के बन बैठे रखवारे !!

नील किसानो की हालत पर करुना उपजी मन में !

इन्कलाब का बिगुल बजाय आकर चंपारण में !!

गांधी की आवाज़ गयी जब आज़ादी के दीवानों को !

छोड़ चले सब काम-कचहरी, दफ्तर और मकानों को !!

सन अठारह में अंग्रेजों ने रौलेट एक्ट को लाया !

गांधी ने उसके विरोध में असहयोग चलाया !!

चौरी-चौरा की निर्मम घटना से होकर आहत !

गांधी जी ने छुब्ध हृदय से वापस लिया खिलाफत !!

नमक-नियम से नाखुश हो की कठिन मार्च दांडी की !

हुई विवश सरकार ब्रातानी ज़िद देख गांधी की !!

मुखर-प्रखर अगुआई की स्वातंत्र्य आन्दोलन की !

दृढ निश्कायी गाँधीजी को अंग्रेजों ने दी धमकी !!

क्रान्ति-काल में लाठी खाई, केस हुआ, गए कारागार !

लेकिन सत्य-अहिंसा से वे करते रहे शत्रु पर वार !!

नौ अगस्त बयालिस को भी इसी कड़ी में जोड़ो !

गांधीजी ने ललकार दिया, अंग्रेजों भारत छोड़ो !!

गांधी की आंधी को न कभी रोक सकी बालू की भीत !

सौ वर्षों तक चली लड़ाई, आखिर हुई सत्य की जीत !!

सैंतालिस पंद्रह अगस्त को सुलझा यह लम्बा षड्यंत्र !

हुआ इसी दिवस पावन पर अपना प्यारा देश स्वतंत्र !!

चक्र-सुदर्शन चरखा लेकर पहन वदन पर खादी !

सत्य-अहिंसा की शक्ति से दे दी हमें आज़ादी !!

हो गए हम आज़ाद मगर था नहीं विशेष कुछ सुधरा !

छुआ-छूत जैसी कुरीति से यह समाज था जकड़ा !!

दीन-दलित शोषित था, पिछरा हुआ वतन का !

गांधी उनको गले लगा कर नाम दिया हरिजन का !!

धूप-छाँव आते-जाते हैं, सब दिन होते नहीं समान !

भारत के इतिहास में आया एक काला-दिवस विषाण !!

तीस जनवरी अड़तालीस को थी प्रातः की बेला !

नाथूराम गोडसे ने एक खेल घिनौना खेला !!

राष्ट्रपिता के वक्ष-मध्य गोली लगी गंभीर !

हे राम कहते हुए, बापू तजे शरीर !!

था यह परम दुखद क्षण, अस्त हुआ जीवन दिनकर !

डूब गया आकंठ शोक में, भारतवर्ष का एक-एक घर !!

जीवन-पुष्प रहा नहीं तेरा पर खुशबू उसकी बनी हुई !

बापू तेरे वचन कर्म से भारत माता धनी हुई !!

तेरा जीवन एक दर्शन है, तेरी हर वाणी आदर्श !

कैसे करुण आभार व्यक्त, ऋणी है तेरा भारतवर्ष !!

तेरे जन्मदिवस पर हम सब याद तुझे करते हैं !

तेरा ही पथ दे ईश्वर, फरियाद यही करते हैं !!

श्रद्धा सुमन गांधी दर्शनः आज भी उतना ही प्रासंगिक

 

 

श्रद्धा सुमन

गांधी दर्शनः आज भी उतना ही प्रासंगिक

हरीश प्रकाश गुप्त

गांधी बीसवीं सदी के विराट व्यक्तित्व हैं जिनके सामने दुनियाँ की समकालीन विभूतियां भी बौनी दिखाई पड़ती हैं। उस काल-खण्ड की शायद ही कोई ऐसी महान शख्सियत रही हो जिस पर गांधी का प्रभाव न पड़ा हो। इस कड़ी में लियो तॉलस्टाय से लेकर नेल्सन मन्डेला या फिर अल्बर्ट आइन्सटीन तक कितने भी नाम गिनाए जा सकते हैं जो गांधी के दर्शन से प्रभावित रहे। आइन्सटीन ने तो यहाँ तक कहा था कि आने वाली पीढ़ी शायद ही इस पर विश्वास करेगी कि इस धरती पर हाड़ मांस के शरीर का ऐसा पुरुष जन्मा था जिसने शक्तिशाली साम्राज्य के विरुद्ध बिना किसी हथियार के लड़ाई लड़कर अहिंसा के माध्यम से स्वराज की कल्पना की और उसे हासिल भी किया था। आज हमें यह सब कितना सहज लगता है, लेकिन सौ साल पहले की परिस्थितियों में इस कल्पना के बीज फूटना भी सहज न रहा होगा। आज गांधी धरती पर नहीं हैं लेकिन उनके सत्य, अहिंसा, स्वराज और अस्पर्श्यता का जीवन सन्देश न केवल हमारे देश को बल्कि देश की भौगोलिक सीमा से बाहर निकलकर जन-जन को अनुप्राणित कर रहा है।

गांधी का दार्शनिक दृष्टिकोण तथा आम जन-मानस की पीड़ा और व्यथा से उनका रागात्मक सम्बंध आम विषय की समझ को दिशा और विस्तार ही नहीं देता बल्कि आम जन के और करीब भी ले जाता है। उनका दर्शन प्रयोग और अनुभव से दीप्त है इसलिए वह व्याव्हारिक है, स्वीकार्य है और व्यापक है। उनका ‘सत्य’ केवल सत्य भर नहीं है। वह ईश्वर में अखण्ड विश्वास से प्रेरित है, धर्म से वह प्राण ग्रहण करता है। सदाचार, सर्वधर्म समभाव और समन्वय उसके अनुषंगी हैं। गांधी के सत्य की बुनियाद इतनी मजबूत है कि वह हिंसा और अन्याय को सत्याग्रह से हराने का संकाल्प करते हैं। लोगों के अविश्वास से वह डिगते नहीं हैं, बल्कि अपने संकल्प पर पूर्ण आत्म विश्वास रखते हुए उसे सफल करके दिखलाते भी हैं। गांधी की अहिंसा कायरता नहीं है। वे अहिंसा की व्याख्या में वीरता, निडरता, सद्भावना और दृढ संकल्प को इसका अपरिहार्य अंग मानते हैं। उनकी अहिंसा पुरषार्थ है, चेतनामय है। नीरस और जड़ नहीं है। यह आत्मा में धारण योग्य है। अहिंसा का संबंध केवल भौतिक शरीर से ही न होकर मन और वचन से किसी अन्य को पीड़ा न देने से है। नफरत हिंसा है तो प्रेम अहिंसा है। लेकिन, जो हमसे प्रेम करते हैं, केवल उन्हीं से प्रेम करना अहिंसा नहीं है। गांधी की अहिंसा प्रेम का वह स्वरुप है जो नफरत और द्वेष के होने पर भी उसी सुगंध के साथ पुष्पित और पल्लवित होता है।

राजनीति उनका अभिप्रेत कभी नहीं रही। यह उनके लिए धर्मनीति का पर्याय रही। राजनीति में उनका महत्व राज पर कम, नीति पर अधिक रहा। इसीलिए उनकी राजनीति विश्व में मानवता की सेवा का उपकरण बनी। गांधी का अर्थशास्त्र धन संग्रह का विज्ञान नहीं है, बल्कि अधिक धन संग्रह धन की चोरी है। उनके अनुसार अर्थशास्त्र एक नैतिक विज्ञान है। धनार्जन का उद्देश्य केवल भौतिक सुख-साधन से सम्पन्न होना भर नहीं है। इसका मूल उद्देश्य स्वयं का नैतिक और आत्मिक विकास करना है। समाज के विकास के लिए उन्होंने व्यष्टि से समष्टि की दिशा में निजी तौर पर आत्मिक उत्थान पर अधिक बल दिया और उस समय समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन का बीड़ा उठाया। अस्पृश्यता ने हिन्दू समाज को सबसे अधिक कलंकित किया था। उन्होंने कहा कि इसका सम्बंध केवल शरीर से नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक विकार है। साथ उठने, बैठने और छू लेने भर से अस्पृश्यता नहीं मिटती। मैला उठाये व्यक्ति को छू लेना अस्पृश्यता मिटाना नहीं बल्कि मैलापन ही है। शरीर से भी और मन से भी। खोखलेपन के सिवाए कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि व्यावहारिकता अपनाए बिना अस्पर्श्यता दूर नहीं की जा सकती और जब तक हिन्दू समाज में अस्पृश्यता नहीं मिटती तब तक यह समाज को घुन की तरह ही भीतर ही भीतर चट करती रहेगी। समाज की एकजुटता के लिए भी यह परम आवश्यक है। वास्तव में अस्पृश्यता का मूल अर्थ ऊँच-नीच का भाव भूल जाना है। हम दैनिक चर्या में शौच और सफाई जैसे अस्पृश्य कर्म भी करते हैं। लेकिन मन में भाव और होता है। स्वयं की सफाई के पश्चात हम स्वच्छ हो जाते हैं। मन का यही भाव हर प्राणी के साथ लाना ही अस्पृश्यता मिटाने के गाँधी-दर्शन का मूल भाव है।

हमें स्वतंत्रता पाए 60 से भी अधिक वर्ष बीत चुके हैं। इन वर्षों में बहुत से सामाजिक राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं और देश को अनेक झंझावातों का सामना करना पड़ा है। पुरानी परिभाषाएं बदली हैं, अर्थ बदले हैं और मिथक टूटे हैं, लेकिन गांधी दर्शन भारतीय समाज के उत्थान के लिए तथा विश्व शांति कायम रखने के लिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि 100 वर्ष पहले था। गांधी की क्रांतिकारी विचारधारा आज भी सार्थक और अनुकरणीय है। आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर हम उन्हें श्रद्धा के साथ नमन करते हैं।