रविवार, 27 नवंबर 2011
बच्चन जी के जन्मदिन पर
रविवार, 2 अक्टूबर 2011
बापू, एक मंत्र दो
बापू, एक मंत्र दो
आचार्य परशुराम राय
निकला फिर आज
बापू का जन्म-दिन।
सद्ग्रंथों से
प्रार्थना की बूँद ले
राजनीति के
हाथों आचमन कर
दुकान से लाए गए-
मातहत के हाथ,
बुके चढ़ाकर
बापू की समाधि पर
सन्तुष्ट मैं।
जो कुछ कहा-सुना बापू ने
वह
आप समझें,
मेरे लिए बस, इतना ही।
वैसे भी,
आफिस में टाँगी गई
सदा मुस्कराती
बापू की प्रतिमा से
आशीर्वचनों की वर्षा
रोज सहते हम।
भ्रष्ट भूत का उपचार
अभी शेष था
कि सत्य और अहिंसा
की लाश लिए
धरने पर आ बैठा कोई
रामलीला मैदान में,
जनलोकपाल बिल के तर्पण से
जाग गए प्रेत दोनों,
गायब थी - आँखों से नींद,
मन में बेचैनी थी
रात-दिन एक से,
टोटके भी बहुत किए,
पर काम न आए।
इन भूतों से पिंड छूटे,
बापू !
आज अपने जन्मदिन पर
एक मंत्र ऐसा दो।
*****
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
कोटि-कोटि नमन बापू!
जनवरी १९४७ में गांधी जी नोआखाली में थे। उन्होंने अपने समर्थकों को बताया कि वो यहां एक नई तकनीक की तलाश में आए हैं और साथ ही अपने सिद्धांत की दृढता की जांच करने के लिए भी। वह सिद्धांत जिसने उनके अस्तित्व को अभी तक बरकरार रखा है। इन्हीं सिद्धांतों की बदौलत उनका जीवन सार्थक रहा। वो नंगे पांव पदयात्रा करने वाले थे।
सात दिनों में उन्होंने ११६ मील की यात्रा की। इस दौरान उन्हों ने ४७ गावों का भ्रमण किया। घर-घर, झोपड़ी-झोपड़ी घूम-घूम कर शांति बहाल का प्रयास करते रहे। उन्होंने यह यह भी घोषणा की कि उन्हें इस यात्रा के दौरान किसी सहयात्री की दरकार नहीं थी। इसका कारण उन्होंने बताया कि उनके साथ उनका ईश्वर था। सिर्फ़ उनके चार समर्थक उनके साथ थे। उनका यह मानना था कि अगर वे इन गांवों में शांति, सद्भाव और सौहार्द्र की भावन जगा सके तो यह सारे देश लिए उदाहरण बनेगा।
गांधी जी उन दिनों बंगाल में भड़क उठी हिंसा से चिंतित थे। समुदायों के बीच भड़की यह हिंसा उन्हें भीतर तक साल रही थी। यह रक्तपात ऐसे छोटे-छोटे गांवों में हुआ था जहां सभी समुदाय के लोग हिल-मिल कर रहा करते थे। नोआखाली और तिपेरा की पदयात्रा से वे यह जानना चाहते थे कि अब वहां क्या किया जा सकता है? हिंसा और रक्तपात से वो हतोत्साहित हो चुके थे, उन्हें लगा उनकी आवाज़ अब शक्ति खो चुकी है।
१९४६ के अक्तूबर अंत तक गांधी जी तीसरी श्रेणी की रेलगाड़ी यात्रा के द्वारा कोलकाता पहुंचे। उद्देश्य उनका था नोआखाली के दंगा प्रभावित इलाक़ों का दौरा करना। बंगाल का यह डेल्टा प्रदेश है। इस क्षेत्र के लोग अत्यंत ग़रीब हैं। न सड़कें, न यातायात का साधन था। गांधी जी गांव-गांव घूमे। हज़ारों की संख्या में लोग उन्हें सुनने एकत्र होते रहे। गांधी जी, भाईचारे, निर्मल-मन, शत्रु को क्षमा का संदेश सुनाते थे। उनकी यह यात्रा समाप्त होते-होते, नोआखाली और तिपेरा ज़िलों में समुदायों के आपसी संबंध काफ़ी सुधरे। गांधी जी कहा करते थे,
“यदि मैं हिन्दू भाईयों के या किसी अन्य मनुष्य के दुराचारों का समर्थन करता हूं तो मुझे हिन्दू कहलाने का कोई अधिकार नहीं होगा।”
जब वे करुणा की इस लंबी यात्रा पर चल रहे थे तब न केवल समूचा भारत, बल्कि सारी दुनिया बड़ी उत्सुकता से उन्हें देख रही थी।
बीसवीं सदी में यदि किसी व्यक्ति में जनता ने गहरी दिलचस्पी दिखाई तो वह है गांधी जी का व्यक्तित्व। उन्होंने जो कुछ कहा और किया वह इतिहास बन गया।
गांधी जी मूलतः एक संवेदनशील व्यक्ति थे। अपने सिद्धांतों की कद्र करने वाले। वे आत्मा की आवाज़ सुनते थे। उनकी संवेदना, उनके तर्क और आध्यामिकता के बीच एक निष्पक्ष जज की तरह आ खड़ी होती थी। फिर उनकी सोच एक सिद्धांत की तरह सामने आती थी।
नोआखाली में गांधी जी भड़क उठी साम्प्रदायिकता की आग बुझाने गए थे। ७७ वर्षीय गांधी जी बांस की लाठी के सहारे अपने खोए सपने को फिर से हासिल करने के लिए जब गांव-गांव घूम रहे थे तब अपना प्रिय गीत गाते रहते थे, जिसे गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा था, “जोदी केऊ तोहार डाक शुने ना आशे तबे एकला चोलो रे।”
गांधी जी सुहरावर्दी के निवेदन पर नोआखाली गए थे।
गांधी जी ने सामाजिक बदलाव के कार्य को धार्मिक दायरे से बाहर निकालकर उसमें अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण पक्ष भी जोड़ दिया। स्वावलंबन और ग्राम स्वराज्य की अवधारणा को स्थापित करके उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने पर बल दिया। अपनी ज़िन्दगी पर अपने नियंत्रण की बात ने जो धीरे-धीरे सामाजिक बदलाव के कार्य का उद्देश्य बन गया, सामाजिक कार्य को एक ठोस वैचारिक आधार प्रदान किया। गांधी जी ने समाज की जड़ता को भंग कर लोगों को सोचने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया और समाज में बदलाव के लिए आवश्यक ऊर्जा का संचार किया। सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया में इन कार्यों का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
भारत में गांधी जी को राष्ट्रीय नेता के साथ-साथ एक पैगम्बर और पिता का स्थान दिया जाता है। उनके नेतृत्व में देश आज़ाद हुआ। वो राजनेता के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। वो एक नए भारत के निर्माण के लिए सतत प्रयत्नशील रहे। जात-पात, छुआ-छूत, साप्रदायिक भेद-भाव को दूर करने के लिए सारी उम्र लड़ते रहे। साम्प्रदायिकता की आग ठंडी करने में उन्हें शहादत प्राप्त हुई। साम्प्रदायिक दंगों पर क़ाबू पाने के लिए गांधी जी अकेले जीवन के अंतीम क्षणों तक प्रयत्नशील रहे।
29 जनवरी 1948 को गांधीजी ने अपनी पौत्री मनु से कहा था,
“यदि किसी ने मुझ पर गोली चला दी और मैंने उसे अपने सीने पर झेलते हुए राम का नाम लिया तो मुझे सच्चा महात्मा मानना।”
और यह कैसा संयोग था कि 30 जनवरी 1948 के दिन उस महात्मा को प्रार्थना सभा में जाते हुए मनोवांछित मृत्यु प्राप्त हुई।
ठीक ही कहा था लॉर्ड माउंट बेटन ने,
“सारा संसार उनके जीवित रहने से सम्पन्न था और उनके निधन से वह दरिद्र हो गया।”
कुछ कवियो के विचार
महा कवि पंत ने कहा था
तुम मांसहीन, तुम रक्त हीन, हे अस्थिशेष! तुम अस्थिहीऩ,
तुम शुद्ध बुद्ध आत्मा केवल, हे चिर पुरान हे चिर नवीन !
तुम पूर्ण इकाई जीवन की, जिसमें असार भव-शून्य लीन,
आधार अमर, होगी जिस पर, भावी संस्कृति समासीन।
पं. सोहन लाल द्विवेदी की ये पंक्तियां उस महापुरुष को समर्पित हैं जिन्होंने सारे विश्व को एक नयी दिशा दी।
चल पड़े जिधर दो पग डगमग, चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
पड़ गयी जिधर भी एक दृष्टि, गड़ गये कोटि दृग उसी ओर।
“बापू के प्रति” अपने उद्गार प्रकट करते हुए कविवर सुमित्रानंदन पंत ने लिखा है :-
हे चिर पुराण, हे चिर नवीन।
सुख भोग खोजने आते सब,
आये तुम करने सत्य खोज,
जग की मिट्टी के पुतले जन,
तुम आत्मा के, मन के मनोज”।
उन जैसे महामानव के बारे में जितना भी कहा जाए कम है। रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियां यहां स्मरण हो रहें हैं :-
“तू कालोदधि का महास्तम्भ, आत्मा के नभ का तुंग-केतु,
वापू! तू मर्त्य, अमर्त्य, स्वर्ग, पृथ्वी, भू, नभ का महासेतु।
तेरा विराट यह रूप कल्पना पट पर नहीं समाता है,
जितना कुछ कहूं मगर कहने को शेष बहुत रह जाता है।”
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बापू तेरे जन्म दिवस पर...
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| दस साल पहले पिताजी ने पूछा था, "गांधीजी का जन्म कब हुआ था ?" मैं ने सगर्व कहा था, "2 अक्टूबर को।" "साल भी बोलो !", पिताजी किसी साक्षात्कार लेने वाले बॉस की तरह बोल रहे थे। मैं भी उसी तरह खुश हुआ जैसे कोई अभ्यार्थी आसान सवाल सुन कर होता है। सर उठा कर बोला, "2 अक्टूबर 1969। पिता जी का अगला सवाल चौंकाने वाला था, "गांधीजी तुमसे महज दस साल बड़े थे ?"
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मंगलमय तिथि दूसरी, जन्मे मोहनदास !! था यह दिवस सलोना पाया पोरबंदर गुजरात ! माँ पुतली ने जन्म दिया बालक जग-विख्यात !! पिता रियासत राजकोट के ऊंचे दीवान ! नाम करमचंद गांधी, सरल-सहज पहचान !! धर्मपारायण माताजी की पड़ी पुत्र पर छाया ! दया-क्षमा-परमार्थ-लोकहित बचपन से ही पाया !! हरिश्चंद्र नाटक गांधी जी के मानस पर अटका ! सत्य से नाता जोड़ा ऐसा, फिर असत्य नहीं फटका !! अल्प-वयस में हो गया कस्तूरबा संग व्याह ! पत्नी मिली सुलक्षणा, हुई प्रकाशित राह !! ऊंची शिक्षा के लिए, गाँधी गए विदेश ! दिया जननी ने आशीष, आयुष और सख्त निर्देश !! मद्य-मांस-महिलादि से रखना स्वयं को दूर ! याद सदा ईश्वर को रखना, होगे सफल जरूर !! शिक्षा जब संपन्न हुई, गांधी स्वदेश को लौटे ! अहमदाबाद न्यायालय में फ़ौरन वकील बन बैठे !! गए अफ्रीका दक्षिणी जहां श्वेत-अश्वेत में भेद ! देख दशा अश्वेत की हुआ हृदय में खेद !! गोरों का अत्याचार कहाँ गांधी था सहने वाला ! उसी देश की धरती पर वह सत्याग्रह कर डाला !! लौटे जब घर अपने तो सच्चाई समझ में आई ! अंग्रेजों ने माँ भारत की है दुर्दशा बनाई !! जननी हो जंजीर में जकरी ऐसे जीवन को धिक्कार ! ईश्वर का उद्देश्य देश-हित सफल हुआ तब जा कर ! छोड़ दिया पेशा वकील का, शपथ सत्य का खाकर !! बैठे व्रत ले देशभक्ति का सावारमती किनारे ! दिन-दलित लाचार मनुज के बन बैठे रखवारे !! नील किसानो की हालत पर करुना उपजी मन में ! इन्कलाब का बिगुल बजाय आकर चंपारण में !! गांधी की आवाज़ गयी जब आज़ादी के दीवानों को ! छोड़ चले सब काम-कचहरी, दफ्तर और मकानों को !! सन अठारह में अंग्रेजों ने रौलेट एक्ट को लाया ! गांधी ने उसके विरोध में असहयोग चलाया !! चौरी-चौरा की निर्मम घटना से होकर आहत ! गांधी जी ने छुब्ध हृदय से वापस लिया खिलाफत !! नमक-नियम से नाखुश हो की कठिन मार्च दांडी की ! हुई विवश सरकार ब्रातानी ज़िद देख गांधी की !! मुखर-प्रखर अगुआई की स्वातंत्र्य आन्दोलन की ! दृढ निश्कायी गाँधीजी को अंग्रेजों ने दी धमकी !! क्रान्ति-काल में लाठी खाई, केस हुआ, गए कारागार ! लेकिन सत्य-अहिंसा से वे करते रहे शत्रु पर वार !! नौ अगस्त बयालिस को भी इसी कड़ी में जोड़ो ! गांधीजी ने ललकार दिया, अंग्रेजों भारत छोड़ो !! गांधी की आंधी को न कभी रोक सकी बालू की भीत ! सौ वर्षों तक चली लड़ाई, आखिर हुई सत्य की जीत !! सैंतालिस पंद्रह अगस्त को सुलझा यह लम्बा षड्यंत्र ! हुआ इसी दिवस पावन पर अपना प्यारा देश स्वतंत्र !! चक्र-सुदर्शन चरखा लेकर पहन वदन पर खादी ! सत्य-अहिंसा की शक्ति से दे दी हमें आज़ादी !! हो गए हम आज़ाद मगर था नहीं विशेष कुछ सुधरा ! छुआ-छूत जैसी कुरीति से यह समाज था जकड़ा !! दीन-दलित शोषित था, पिछरा हुआ वतन का ! गांधी उनको गले लगा कर नाम दिया हरिजन का !! धूप-छाँव आते-जाते हैं, सब दिन होते नहीं समान ! भारत के इतिहास में आया एक काला-दिवस विषाण !! तीस जनवरी अड़तालीस को थी प्रातः की बेला ! नाथूराम गोडसे ने एक खेल घिनौना खेला !! राष्ट्रपिता के वक्ष-मध्य गोली लगी गंभीर ! हे राम कहते हुए, बापू तजे शरीर !! था यह परम दुखद क्षण, अस्त हुआ जीवन दिनकर ! डूब गया आकंठ शोक में, भारतवर्ष का एक-एक घर !! जीवन-पुष्प रहा नहीं तेरा पर खुशबू उसकी बनी हुई ! बापू तेरे वचन कर्म से भारत माता धनी हुई !! तेरा जीवन एक दर्शन है, तेरी हर वाणी आदर्श ! कैसे करुण आभार व्यक्त, ऋणी है तेरा भारतवर्ष !! तेरे जन्मदिवस पर हम सब याद तुझे करते हैं ! तेरा ही पथ दे ईश्वर, फरियाद यही करते हैं !! |
श्रद्धा सुमन गांधी दर्शनः आज भी उतना ही प्रासंगिक
श्रद्धा सुमन
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गांधी का दार्शनिक दृष्टिकोण तथा आम जन-मानस की पीड़ा और व्यथा से उनका रागात्मक सम्बंध आम विषय की समझ को दिशा और विस्तार ही नहीं देता बल्कि आम जन के और करीब भी ले जाता है। उनका दर्शन प्रयोग और अनुभव से दीप्त है इसलिए वह व्याव्हारिक है, स्वीकार्य है और व्यापक है। उनका ‘सत्य’ केवल सत्य भर नहीं है। वह ईश्वर में अखण्ड विश्वास से प्रेरित है, धर्म से वह प्राण ग्रहण करता है। सदाचार, सर्वधर्म समभाव और समन्वय उसके अनुषंगी हैं। गांधी के सत्य की बुनियाद इतनी मजबूत है कि वह हिंसा और अन्याय को सत्याग्रह से हराने का संकाल्प करते हैं। लोगों के अविश्वास से वह डिगते नहीं हैं, बल्कि अपने संकल्प पर पूर्ण आत्म विश्वास रखते हुए उसे सफल करके दिखलाते भी हैं। गांधी की अहिंसा कायरता नहीं है। वे अहिंसा की व्याख्या में वीरता, निडरता, सद्भावना और दृढ संकल्प को इसका अपरिहार्य अंग मानते हैं। उनकी अहिंसा पुरषार्थ है, चेतनामय है। नीरस और जड़ नहीं है। यह आत्मा में धारण योग्य है। अहिंसा का संबंध केवल भौतिक शरीर से ही न होकर मन और वचन से किसी अन्य को पीड़ा न देने से है। नफरत हिंसा है तो प्रेम अहिंसा है। लेकिन, जो हमसे प्रेम करते हैं, केवल उन्हीं से प्रेम करना अहिंसा नहीं है। गांधी की अहिंसा प्रेम का वह स्वरुप है जो नफरत और द्वेष के होने पर भी उसी सुगंध के साथ पुष्पित और पल्लवित होता है।
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बापू तेरे जन्म दिवस पर...
फिर मैं ने वर्षों की मनोगत गणना आरम्भ किया.... ! ओह भारत में जन्मे, पले-बढे, स्नातक के छात्र को राष्ट्रपिता की जन्मतिथि याद नहीं है... ? ध्यान आया स्मरण शक्ति का पद्य-मोह। छंद, मात्रा, शिल्प, व्याकरण कुछ का पता नहीं मगर मैं ने बापू के बारे में कुछ प्रचलित बातों को पद्यबंध करने का प्रयास किया और मुझे ख़ुशी होती है कि अब मैं बापू से सम्बंधित महत्वपूर्ण तिथियों को नहीं भूलता हूँ। आप भी देखिये....
अठारह सौ उनहत्तर का शुभ अक्टूबर मास !
गांधी दर्शनः आज भी उतना ही प्रासंगिक
गांधी बीसवीं सदी के विराट व्यक्तित्व हैं जिनके सामने दुनियाँ की समकालीन विभूतियां भी बौनी दिखाई पड़ती हैं। उस काल-खण्ड की शायद ही कोई ऐसी महान शख्सियत रही हो जिस पर गांधी का प्रभाव न पड़ा हो। इस कड़ी में लियो तॉलस्टाय से लेकर नेल्सन मन्डेला या फिर अल्बर्ट आइन्सटीन तक कितने भी नाम गिनाए जा सकते हैं जो गांधी के दर्शन से प्रभावित रहे। आइन्सटीन ने तो यहाँ तक कहा था कि आने वाली पीढ़ी शायद ही इस पर विश्वास करेगी कि इस धरती पर हाड़ मांस के शरीर का ऐसा पुरुष जन्मा था जिसने शक्तिशाली साम्राज्य के विरुद्ध बिना किसी हथियार के लड़ाई लड़कर अहिंसा के माध्यम से स्वराज की कल्पना की और उसे हासिल भी किया था। आज हमें यह सब कितना सहज लगता है, लेकिन सौ साल पहले की परिस्थितियों में इस कल्पना के बीज फूटना भी सहज न रहा होगा। आज गांधी धरती पर नहीं हैं लेकिन उनके सत्य, अहिंसा, स्वराज और अस्पर्श्यता का जीवन सन्देश न केवल हमारे देश को बल्कि देश की भौगोलिक सीमा से बाहर निकलकर जन-जन को अनुप्राणित कर रहा है।
राजनीति उनका अभिप्रेत कभी नहीं रही। यह उनके लिए धर्मनीति का पर्याय रही। राजनीति में उनका महत्व राज पर कम, नीति पर अधिक रहा। इसीलिए उनकी राजनीति विश्व में मानवता की सेवा का उपकरण बनी। गांधी का अर्थशास्त्र धन संग्रह का विज्ञान नहीं है, बल्कि अधिक धन संग्रह धन की चोरी है। उनके अनुसार अर्थशास्त्र एक नैतिक विज्ञान है। धनार्जन का उद्देश्य केवल भौतिक सुख-साधन से सम्पन्न होना भर नहीं है। इसका मूल उद्देश्य स्वयं का नैतिक और आत्मिक विकास करना है। समाज के विकास के लिए उन्होंने व्यष्टि से समष्टि की दिशा में निजी तौर पर आत्मिक उत्थान पर अधिक बल दिया और उस समय समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन का बीड़ा उठाया। अस्पृश्यता ने हिन्दू समाज को सबसे अधिक कलंकित किया था। उन्होंने कहा कि इसका सम्बंध केवल शरीर से नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक विकार है। साथ उठने, बैठने और छू लेने भर से अस्पृश्यता नहीं मिटती। मैला उठाये व्यक्ति को छू लेना अस्पृश्यता मिटाना नहीं बल्कि मैलापन ही है। शरीर से भी और मन से भी। खोखलेपन के सिवाए कुछ भी नहीं है। उन्होंने कहा कि व्यावहारिकता अपनाए बिना अस्पर्श्यता दूर नहीं की जा सकती और जब तक हिन्दू समाज में अस्पृश्यता नहीं मिटती तब तक यह समाज को घुन की तरह ही भीतर ही भीतर चट करती रहेगी। समाज की एकजुटता के लिए भी यह परम आवश्यक है। वास्तव में अस्पृश्यता का मूल अर्थ ऊँच-नीच का भाव भूल जाना है। हम दैनिक चर्या में शौच और सफाई जैसे अस्पृश्य कर्म भी करते हैं। लेकिन मन में भाव और होता है। स्वयं की सफाई के पश्चात हम स्वच्छ हो जाते हैं। मन का यही भाव हर प्राणी के साथ लाना ही अस्पृश्यता मिटाने के गाँधी-दर्शन का मूल भाव है।
हमें स्वतंत्रता पाए 60 से भी अधिक वर्ष बीत चुके हैं। इन वर्षों में बहुत से सामाजिक राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं और देश को अनेक झंझावातों का सामना करना पड़ा है। पुरानी परिभाषाएं बदली हैं, अर्थ बदले हैं और मिथक टूटे हैं, लेकिन गांधी दर्शन भारतीय समाज के उत्थान के लिए तथा विश्व शांति कायम रखने के लिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि 100 वर्ष पहले था। गांधी की क्रांतिकारी विचारधारा आज भी सार्थक और अनुकरणीय है। आज उनके जन्मदिवस के अवसर पर हम उन्हें श्रद्धा के साथ नमन करते हैं।