सोमवार, 16 अगस्त 2010

जीवन पथ प्रदर्शक संत तुलसीदास --- आचार्य परशुराम राय

जीवन पथ प्रदर्शक संत तुलसीदास

आचार्य परशुराम राय

आज महाकवि संत तुलसीदास जी की पाँच सौ तेरहवीं वर्षगाँठ है। इस रचना के माध्यम से उस महान संत की कुछ बातें, जिनसे पाठकवृन्द पूरी तरह अवगत हैं, आप तक पहुँचा रहा हूँ। इसके पहले कि मैं अपनी बात शुरू करूँ, एक सुना हुआ संस्मरण यहाँ दे रहा हूँ।

हुआ यों कि एक रेलवे स्टेशन पर ट्रेन आकर रुकी। काफी भीड़ थी। डिब्बे में घुसना लोहे के चने चबाने जैसा था। एक मारवाड़ी महोदय सामान लिए किसी तरह डिब्बे में घुसे। पसीने से लथपथ सामान लोगों के सिर पर पटकते सीट तक पहुँचे। यहाँ तक कि कुछ-एक सामान वहाँ सीट पर बैठे एक साधु के ऊपर भी रख दिए। आस-पास बैठे लोगों को अच्छा नहीं लगा। उनकी आपत्ति के जवाब में वे बोलने लगे कि मैंने भी बहुत रामायण पढ़ी है और अपने सामानों की गिनती में जुट गए। बोले, अरे सुनती हो, देखो कुछ सामान छूटा तो नहीं। पर पत्नी वहाँ हो तो बतावे। पत्नी भीड़ के कारण चढ़ नहीं पायी। पत्नी को न पाकर मारवाड़ी महोदय की बेकली बढ़ गयी। इस पर वहाँ बैठे साधु ने कहा - आपने रामायण ठीक से नहीं पढ़ी, अन्यथा आपकी पत्नी न छूटतीं। क्योंकि भगवान राम नाव पर पहले माँ सीता को चढ़ाते हैं और बाद में खुद चढ़ते हैं – ‘सिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई।’

कहने का तात्पर्य यह कि तुलसीदास जी का हर वर्णन, हर कथन किसी गंभीर नीतिगत और व्यवहारगत उत्कर्ष को इंगित करता है। प्रस्तुत प्रसंग किष्किन्धाकाण्ड में वर्णित वर्षा ऋतु का है। जब माता सीता का अपहरण हो चुका है, सुग्रीव से मैत्री हो गयी है। शर्तों के अनुसार भगवान राम ने बालि-वध किया, सुग्रीव का राज्याभिषेक हुआ। दोनों भाई प्रवर्षण पर्वत पर ही वर्षा ऋतु व्यतीत करने का निश्चय कर वहीं अपना आवास बनाये। पावस की पहली वर्षा का दिन। आकाश घने बादलों से पूरी तरह आच्छन्न हैं। बिजली कड़क रही है। ऐसे परिवेश में वियोग का स्पर्श कर तुलसीदास जी ने वर्षा को और इससे बदलते वातावरण को आध्यात्मिक और नैतिक उपमाओं से बहुत ही रोचक ढ़ंग से सजाया है।

बादलों को देखकर नृत्य करते मोरों की ओर संकेत करते हुए भगवान राम कहते हैं कि ‘हे लक्ष्मण, ये ऐसे लग रहे हैं जैसे बैरागी गृहस्थ भगवान विष्णु के भक्त को देखकर आनन्दित हो उठता है।’ यहाँ ‘विष्णु’ शब्द का प्रयोग सतोगुण युक्त सृष्टि पालन की ओर संकेत करता है। वर्षा ऋतु जल और अन्न के उत्पादन के प्रमुख कारकों में से एक है।

बिजली का कड़ककर बादलों से अलग हो जाना या विलुप्त हो जाना दुर्जनों के अस्थिर प्रेम की तरह लगता है। पृथ्वी के पास आकर जल बरसाने वाले बादल विद्या को उपलब्ध कर नम्र बने विद्वानों की तरह लगते हैं। बूँदों की आघात सहने वाले पर्वत दुष्टों की कर्कश और अपनमान जनक वाणी को सहने वाले संतों की तरह प्रतीत होते हैं। जल से भरी किनारों को तोडकर बहती छोटी छोटी नदियाँ थोड़ा सा धन पाकर मर्यादा हीन बने दुष्टों की तरह दिखायी देती हैं। जमीन पर गिरते ही मिट्टीयुक्त हुआ गँदला जल शुद्ध चैतन्य जीव से लिपटी माया सी लगती है। धीरे-धीरे बहते हुए जल का तालाबों में जमा होना एक-एक कर सद्गुणों का सज्जनों के पास आने जैसा है। वर्षाकाल में चारों ओर घास उग आने से खोए हुए रास्ते पाखंड के प्रचार से सद्ग्रंथों के लुप्त होने की तरह प्रतीत होते हैं। चारों ओर से गूँजती मेढकों की आवाज ब्रह्मचारियों के वेदपाठ की ध्वनि की तरह सुहावनी लगती है। वृक्षों पर आए नव पल्लव साधकों को साधना द्वारा मिले विवेक जैसे हैं। और भी इस तरह के तथ्यों का प्रकरण में वर्णन दिया गया है। यहाँ केवल कुछ उदाहरण सन्दर्भ को अनुप्राणित करने हेतु लिए गए हैं।

इस प्रकार वर्षा ऋतु की छटा को आध्यात्मिक और नैतिक उपमाओं से नयी अर्थवत्ता प्रदान की गयी है। किसी भी रचना में प्रौढ़ता के लिए आवश्यक है कि अपने अध्ययन, अनुभव और चिन्तन को रक्त में प्रवाहित होने दिया जाय, ताकि वे रचनाकार में निहित प्रतिभा के गर्भ से शब्द-योजना में चमत्कार उत्पन्न कर सकें और पाठकों के चित्त को रस से आप्लावित कर सकें ।

हम संत तुलसीदास को शत-शत नमन करते हैं।

अगली प्रस्तुति १८.०० बजे

रामचरित मानस में लोक-संस्कृति की झलक

करण समस्तीपुरी

9 टिप्‍पणियां:

  1. इस अवसर पर तुलसी दास जी को कोटि कोटि नमन्………………आपने बहुत सुन्दर उल्लेख किया …………………बेहद सारगर्भित्।

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  2. pahle tulsidas ko shat shat naman aur aapke sansmaran ne to maza laga diya ,main to padhi hi saath me apne pati ko bhi sunai ,aage ka bhi lekh rochak raha .bahut sundar ,bahar rahi kal lauti hoon is karan aaj aapko badhai ,vande matram .

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  3. तुम्हहु बुझाई बहुत का कहउं ! परम चतुर मैं जानत अहउं !!
    धन्यवाद !!!

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  4. लोकमानस में रामचरित मानस जिस प्रकार समाया हुआ है उसका विश्व भर में दूसरा उदहारण नहीं मिलता.. मर्यादा पुरुषोत्तम राम को घर घर तक पहुचने का काम किया तुलसी दास जी ने साथ ही.. राम के बहाने समाज में समरसता लाने का कार्य भी किया.. आज भारत का कोई ऐसा घर नहीं है जहाँ रामचरित मनन का उद्हरण ना दिया जाता हो.. चाहे वे किसी प्रान्त के हो.. किसी धर्म के हो... राम आज राम हैं तो रामचरित मानस के कारण.. तुलसी दास के कारण.. सुंदर आलेख!

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  5. "लोकमानस में रामचरित मानस जिस प्रकार समाया हुआ है उसका विश्व भर में दूसरा उदहारण नहीं मिलता.. मर्यादा पुरुषोत्तम राम को घर-घर तक पहुचने का काम किया तुलसी दास जी ने। साथ ही.. राम के बहाने समाज में समरसता लाने का कार्य भी किया.. । आज भारत का कोई ऐसा घर नहीं है जहाँ रामचरित मनन का उद्हरण ना दिया जाता हो.. चाहे वे किसी प्रान्त के हो.. किसी धर्म के हो... । "

    सुंदर आलेख!

    अरुण राय जी के उद्गार से सहमत।

    तुलसी को नमन।

    आचार्य राय जी को आभार।

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  6. अपने सभी पाठकों को धन्यवाद।

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  7. सुंदर प्रस्तुति!


    “कोई देश विदेशी भाषा के द्वारा न तो उन्नति कर सकता है और ना ही राष्ट्रीय भावना की अभिव्यक्ति।”

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