सोमवार, 26 जुलाई 2010

बड़ा अपराध ? (लघुकथा) -- -हरीश प्रकाश गुप्त

बड़ा अपराध ?

मेरा फोटोहरीश प्रकाश गुप्त

पूर्ण आकार की छवि देखेंशाम धुआँ सी चारो ओर फैल चुकी थी। रोज की तरह आज भी शहर की बत्ती गुल थी। छोटे शहरों की नियति भी यही होती है कि जरूरत के समय चीज नदारत होती है।

बदहवास रामसजीवन ने अस्पताल के गेट पर पहुँचकर हड़बड़ी में स्कूटर स्टैण्ड पर लगाने की कोशिश की। बैलेंस कुछ बिगड़ा लेकिन उसने उसे सँभाल लिया। भीतर जेनरेटर की रोशनी थी, पर चेहरा पहचानना मुश्किल था। उसने स्कूटर से बंधी रस्सी ढीलीकर दोनों हाथों से गठरी सँभाली, भीतर भागा और डाक्टर के कमरे के बाहर गठरी खोल दी।

चारो तरफ भीड़ इकट्ठी हो गई। सबकी जुबान पर प्रश्न चिपक गए।

पूर्ण आकार की छवि देखें‘डाक्टर साहब, इसे बचा लो ! ये मेरी बहन है। ह.....हर....र....राम.....जादों ने इसे आग लगा दी। ......किसी ने मेरी मदद तक नहीं की। जल्दी में ऐसे ही उठा लाया हूँ, अकेले।’ आहत रामसजीवन की करुण चीत्कार पर सन्नाटा छा गया।

‘यह तो जिन्दा है......’

‘श्च...श्च.......। बताओ, ऐसी हालत में भी किसी ने मदद नहीं की। बहुत हिम्मत की है इसने।’

‘बेचारे गरीब के घर परिवार में कोई न था तो अड़ोस-पड़ोस वाले तो कुछ साथ दे सकते थे।’

‘हुँ..ह...। आज के जमाने में तो सबको अपनी पड़ी है। किसी को दूसरे की पीर- पीड़ा से वास्ता ही कहाँ है?’

खुसर-पुसर ने सन्नाटे को चीरना आरम्भ किया।

‘अरे ! यह तो यह तो एक्सीडेन्टल केस है....... ।’ डाक्टर बुदबुदाया।

पूर्ण आकार की छवि देखेंऔपचारिकताएं पूरी की जाने लगीं।......नाम, .....पति का नाम.......? ......थाना......चौकी...? लोग दो-दो कदम पीछे खिसक गए। बेसुध-सा रामसजीवन कभी डाक्टर की ओर देखकर चिल्लाता तो कभी अचेत शरीर का हाथ पकड़ खून की गर्मी देखता, नाक-मुँह पर हाथ रखकर साँसे महसूस करता। उपचार में पल-पल की देरी उसे हलकान किए दे रही थी। उसके बस में होता तो वह किसी की परवाह किए बिना उसकी साँसों को गति दिए रहता।

एकाएक उसने महसूस किया की बहन की साँसें थम रही हैं। उसने और तेजी से अपने हाथ-पैर चलाए ताकि डाक्टर के इलाज शुरू करने तक वह उसे जिलाए रख सके। वह बहुत चीखा-चिल्लाया लेकिन उसकी एक न चली। सहसा उसका शरीर ठहर गया। केवल ऊपर से शांत लेकिन भीतर से नहीं।

पूर्ण आकार की छवि देखेंवह जड़वत चादर समेटने लगा। एक मोटी सी गाली उसके मुँह से निकली और सूख चुके हलक में आकर फँस गई। एक भारी भरकम आक्रोश बाहर निकलकर फट पड़ना चाहता था। उसने चाहा कि वहाँ मौजूद एक-एक आदमी का हलक पकड़कर कसकर भींच दे। खड़े-खड़े खोखली बातें करने वालों का भी और उनका भी जो यंत्रवत अपना काम निबटा रहे थे। उन्हें दिखाए कि अपनी मौत का दर्द क्या होता है। एक-एक साँस जब तमाम कोशिशों के बावजूद रुकती चली जाती है तो उसकी पीड़ा क्या होती है। अपने सामने अपनों की असमय मौत होते हुए देखने की लाचारी लहू को भी आँसू बनने नहीं देती। लेकिन, उसका पूर्ण आकार की छवि देखेंअन्तर्मन इस द्वन्द्व में उलझकर रह गया कि इस हत्या में बड़ा अपराध किसका है। उनका, जिन्होंने और पाने की हवस में आग लगाकर जघन्य पाप किया और मौत की दहलीज पर लाकर छोड़ दिया या फिर उनका, जिन्हें उसे मौत के मुँह से वापस खींच लाना चाहिए था, वे मानवीय संवेदना पर कु़ण्डली मारे बैठे रहे। उन्होंने औपचारिकताओं के रूप में कर्तव्य भर निभाया और अपनी उदासीनता से मौत की ओर एक धक्का और दे दिया।

अमानवीयता और पाप में स्वयं को एक दूसरे से छोटा साबित न होने देने की होड़ के बीच उसे नृशंसता और उदासीनता एक ही पंथ की सहगामिनी लगीं।

15 टिप्‍पणियां:

  1. गुप्त जी कि लघुकथा बहुत ही मर्मस्पर्शी और विचारणीय है ...
    जलाने वाला हो या हमारा लचर समाज व्यवस्था हो ... हम इसे गाली तो बहुत देते हैं पर बदलने की कोशिश नहीं करते हैं ...

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  2. बहुत मर्मस्पर्शी कथा....एक कटु सत्य को उजागर करती हुई

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  3. जीवन संघर्ष को पूरे बोल्डनेस से खोलती कथा के जरिये जीवन की देखी-सुनी विडंबनाओं को पूरे पैनैपन से बेनकाब किया गया है।
    यह लघुकथा सशक्त भाषा में लिखी होने के साथ-साथ अन्त:संघर्ष का सफलतापूर्वक निर्वाह करती नज्ञर आती हैं।

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  4. अमानवीयता और पाप में स्वयं को एक दूसरे से छोटा साबित न होने देने की होड़ के बीच उसे नृशंसता और उदासीनता एक ही पंथ की सहगामिनी लगीं।
    बहुत सही कहा ,दर्द की इन्तिहा है यह

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  6. उफ़....... अपने सामने अपनों की असमय मौत होते हुए देखने की लाचारी लहू को भी आँसू बनने नहीं देती। मर्मभेदी रचना... !!!!

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  7. सत्य को आपने बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! मर्मस्पर्शी कथा!

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  8. बहुत सुन्दर लघुकथा..बधाई.

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  9. आपकी यह प्रस्तुति कल २८-७-२०१० बुधवार को चर्चा मंच पर है....आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा ..


    http://charchamanch.blogspot.com/

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  10. बच्चों की पढ़ाई के कारण नगर में बसे परंतु खेती के कारण बारम्बार गांव की ओर भागना पड़ता है। यह देखकर मन प्रसन्न है कि जो काम मैं करना चाहता था वह चल रहा है। भंडाफोड़ कार्यक्रम मूलतः स्वामी दयानंद जी का ही अभियान है। इसमें मेरी ओर से सदैव सहयोग रहेगा। कामदर्शी की पोल मैंने अपने ब्लॉग पर खोल ही दी है। अनवर को मैं आरंभ से ही छकाता थकाता आ रहा हूं। http://rajeev2004.blogspot.com/2010/04/5-headed-snake-found-in-kukke.html

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