शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

त्यागपत्र : 36


मन में कई कथानक आकार लेते पर उसे कलमबद्ध करने के लिए घर बाहर की जिम्मेदारी से मुक्त, जिस निर्विधा समय और मानसिक शांति की जरूरत थी, वह सब अनीसाबाद के घर में मिल पाना संभव ही नहीं था । कभी –कभी मन में आता राधोपुर ही चली जाए कुछ शांति में लिख तो पाएगी ।


बाहर के संकट और व्यवधान का समाधान तो राधोपुर प्रवास के रूप में वह ढूंढ चुकी थी पर आंतरिक संकट का क्या हल ढुंढ पाई थी ।

राधोपुर जाने का निर्णय तो रामदुलारी ने ले लिया पर रात भर उसे न जाने कितने अगर मगर मथते रहे । अगर बांके नाराज हो गया तो अगर सास आहत हुई तो ….. अगर श्वसुर दुखी हुए तो….!

पर राधोपुर में भी जब वह मैय्या, चाची, अड़ोस पड़ोस की स्त्रियों को देखती हो उसे यह लगता की स्त्री का न तो कई स्वतंत्र व्यक्तिव है… न ही कोई स्वतंत्र पहचान वह या तो मात्र रिश्तों से पहचानी जाती है जैसे फलां की बेटी, बहन, पत्नी मां, चाची, बुआ, भाभियाँ फिर नैहा स्थान में कोवला वाली, फुलगछियावाली । इससे परे कोई स्वतंत्रत व्यक्तित्व भी हो उनका … उनका अपना कोई नाम, इस बात का उसे बोध आजतक नहीं हुआ । जबसे उसे अक्ल हुई तब से आज तक वह कोनेलावाली द्वारा लाया पानी पीति रही पर उसका क्या नाम है उसे आज भी मालूम नहीं ।

उसका अपना क्या अस्तित्व है । शिक्षा, जागरूकता, आर्थिक स्वतंत्रता और बाहरी दुनिया से रिश्ता इन सबकी प्राप्ति होने के बाद भी क्या उसकी अपनी अस्मिता है । क्या वह एक स्वतंत्र जीवन्त ईकाई है । उसे भी तो रिश्तों के टक्कर लेने पड़ रहे हैं । पति के वर्चस्व को यदि चुनौती दे तो परमेश्वर अहं को ठेस लगती है और दरार संबंध में पड़ने लगती है पर ये रिश्ते टूटते हैं तो क्या रामदुलारी नहीं टूटी । वह भी तो टूटन झेलती है कर्म स्तरों पर …. लेकिन बर्दाश्त करने की भी एक हद होती है । लेकिन अब तो स्थिति असह्य हो गई है ।

संबंध विच्छेद के बारे में तो रामदुलारी सोच ही नहीं सकती । मैय्या बाबू पर क्या गजरेगी ? और स्वयं उसका जीवन क्या कम त्रासदायक होगा । जब शादी नहीं हुई थी तो अपने मन पसंद जीवन साथी के साथ एक सुनहरे भविष्य की कल्पना जो उसने देखी थी वह पूरा नहीं हो पाया । संबंध विच्छेद के बाद के अकेलेपन के सन्नाटे को क्या वह झेल पाएगी । और उसका बेटा...

क्या पता उसके हिस्से आए या नहीं । यदि नहीं आ पाया तो मातृत्व के स्नेह से वंचित रह जाएगा । उसके व्यक्तित्व के विकास में क्या बाधा नहीं डालेगा ?

एक लेखक की और उसके लेख्न की असलजी कसौटी है उसकी संवेदना, उसके सामाजिक सरोकार और उसका अभिव्यक्ति कौशल इस पर यह रचना खरी उतरती है। अपने शोधग्रंथ बचे हुए अंश लिखने के संकल्प के साथ रामदुलारी ने अपने को कमरे के एकांत में कैद कर लिया ।


पढ़िए रामदुलारी की जिन्दगी का अगला अध्याय। अगले हफ्ते॥ इसी ब्लॉग पर !!!

त्याग पत्र के पड़ाव

भाग ॥१॥, ॥२॥. ॥३॥, ॥४॥, ॥५॥, ॥६॥, ॥७॥, ॥८॥, ॥९॥, ॥१०॥, ॥११॥, ॥१२॥,॥१३॥, ॥१४॥, ॥१५॥, ॥१६॥, ॥१७॥, ॥१८॥, ॥१९॥, ॥२०॥, ॥२१॥, ॥२२॥, ॥२३॥, ॥२४॥, ॥२५॥, ॥२६॥, ॥२७॥, ॥२८॥, ॥२९॥, ॥३०॥, ॥३१॥, ॥३२॥, ॥३३॥, ॥३४॥, ॥३५॥, ||36||, ||37||, ॥ 38॥

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी चल रही है कहानी ।धन्यवाद।

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  2. बहुत सारे प्रश्न हैं कहानी की नायिका के समक्ष। देखें आगे क्या होता है?

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  3. अच्छी चल रही है कहानी ।धन्यवाद।

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