शुक्रवार, 11 जून 2010

त्यागपत्र : 33

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, 'कैसे रामदुलारी तमाम विरोध और विषमताओं
केबावजूद पटना आकर स्नातकोत्तर तक पढाई करती है। बिहार के साहित्यिक गलियारे में
उसका दखल शुरू ही होता है कि वह गाँव लौट जाती है। फिर सी.पी.डब्ल्यू.डी. के
अभियंताबांके बिहारी से परिणय सूत्र में बंध पुनः पटना आ जाती है। अब पढ़िए
आगे॥
-- करण समस्तीपुरी
कल दोपहर अस्पताल से लौटने के बाद से ही रामदुलारी बहुत खुश थी। डॉ ने कहा था वह माँ बनने वाली है। पहले से ही रूपवती रामदुलारी का सौन्दर्य पूर्ण चन्द्र की सोलहो कला समा रही थी। घर आते ही सासू माँ ने सबसे पहले बांके को दफ्तर में ही फोन कर बता दिया था। उत्सुकतावस बच्चन सिंघ भी ड्राइंग रूम में आ गए थे। फिर जो खबर सुनी उस पर सिंघजी उछल ही पड़े। चरित्तर को मिठाई लाने का हुकुम देकर बैठ गए फोन लगाने।
दफ्तर से वापसी में शाम को बांके मनेर के लड्डू का बड़ा सा दोना ले के आये थे। लड्डू का दोना माँ को देकर सोफा पे बैठी रामदुलारी के बाजू में बैठ गया था। फिर चन्द्रकला देवी खुद ही बेटे से चुहल करते हुए स्टील के छोटे-छोटे प्लेटों में पड़ोसियों के घर भिजवाने के लिए लड्डू निकालने लगी। बच्चन सिंघ की ख़ुशी आज दबते नहीं दब रही है। आराम-कुर्सी छोड़ श्रीमती जी के पास आ रामदुलारी की देख-भाल के टिप्स देना जैसे ही शुरू किया कि चन्द्रकला देवी की दोनों हाथें चमक गयी, "हाँ..हा... ! बड़े आये सीख देने वाले.... ! मुझे तो जैसे कुछ पता ही नहीं.... यूँही चार-चार बच्चों की माँ बन गयी... !! बड़े आये सीख देने वाले !!!"
बच्चन बाबू झेंप कर बत्तीसी दिखाते हुए एक लड्डू को आधा तोड़ मुँह मे डालने लगे कि देवी जी फिर चिल्ला पड़ीं, "लड्डू डायबिटीज वालों के लिए नहीं है.... !" लेकिन आज सिंघ जी लड्डू छोड़े नहीं। चबाते हुए बोले, "धत तेरे कि... ! अब डायबिटीज हो या हायपर टेंशन... कोई फर्क नहीं... ! यह ख़ुशी का मौका बिना मुँह मीठा किये हुए कैसे निकल जाने देंगे.... ?
आज घर का हर कोना भविष्य के चिराग के आगमन का समाचार सुन कर जैसे उल्लसित हो उठा था। लड्डू निकालने के बाद चन्द्रकला देवी ने पूजा घर में घी के पांच-पांच दिए जलाए। फिर रामदुलारी से बोली, "बहुत तुम आराम करो। मैं जरा शामरा जी के घर से हो कर आ जाती हूँ।" आखिर प्रौढ़ नारी का सुकोमालय हृदय हर्ष का आवेग कब तक सहन करे.... ? जब तक दो चार कानो तक मुँहे-मुँह बात नहीं पहुंची तब तक क्या नारी का सूचना तंत्र। वैसे यह बात भी तो इतनी ही खुशी की थी।
चन्द्रकला देवी के जाने के बाद बांके और रामदुलारी अपने कक्ष में आ गए। घर का काम आज से चरित्तर और शांति के जिम्मे हो गया है। हालांकि करते तो पहले भी वही थे किन्तु पर्यवेक्षण की जिम्मेबारी रामदुलारी पर होती थी। आज से सासु माँ का सख्त आदेश है कि रामदुलारी सिर्फ आराम उन्हें कार्य समझा देगी खड़े हो कर देखने की भी जरुरत नहीं है।
बांके को आज फिर रामदुलारी पर बहुत प्यार आ रहा था। बहुत सारी बातें होती रही। बीच में बांके अपनी हाथों से रामदुलारी के लिए अनार का रस भी ले के आये थे। माता जी के पड़ोस से आने के बाद रात के खाने में भी रामदुलारी के लिए विशेष व्यवस्था थी। चन्द्रकला देवी ने डायनिंग टेबल पर ही घोषणा कर दिया था कि आज से रामदुलारी के खाने में पाव भर घी, मसूर की दाल, पालक का साग और चुकंदर का सलाद जरूर होना चाहिए।
उस रात नींद दोनों के पास फटक भी नहीं पायी थी। बांके ने तो होने वाले लड़के का नाम भी सोच लिया था 'संभव' और निक-नेम होगा सैम... ! रामदुलारी के अधरों पर सलज्ज मुस्कान दौड़ गयी थी। 'हाँ !', उसने बांके से सहमति जताते हुए कहा था, "और अगर लड़की हुई तो हम उसका नाम 'काव्या' रखेंगे। बांके रामदुलारी का दोनों हाथ अपनी हथेलियों में भरते हुए बोला था, "ओके....! बट आई एम क्वाईट स्योर... इट विल बी अ बॉय।" एकबारगी रामदुलारी का हृदय किसी अज्ञात आशंका में डूबने लगा था किन्तु बांके के स्नेहिल स्पर्श ने जैसे उसकी खुशियों को थाम लिया। भविष्य की योजना बनाते-बनाते कब आँख लग गयी पता ही नहीं चला।
सुबह जब रामदुलारी की आँखें खुली तो उसने बांके को ऑफिस के लिए तैयार होते पाया। वह धरफरा कर उठने को हुई कि बांके ने अपना बेल्ट बांधना छोड़ उसे कंधो से पकर कर बिस्तर पर बिठा दिया। फिर बहुत प्यार से समझाया, "आज तक तुम मेरा, मम्मी-पापा का, इस घर का ख्याल रखती थी..... नाव लेट अस टेक केयर ऑफ़ यू। आज कुछ जरूरी काम है इसीलिए मैं अभी निकल रहा हूँ। शाम को जल्दी आऊंगा... ! तुम अपना ख्याल रखना... एंड यू डोंट नीड टू डू एनी हाउसहोल्ड वोर्क्स। जस्ट कीप फोलोविंग डॉक्टर्स अडवायस।"
पति का ऐसा उदगार पाकर रामदुलारी का अंग-अंग प्रफुल्लित हो उठा। वह मुख्या द्वार पर खड़े हो बांके को ओझल होने तक जाते देखती रही। रामदुलारी की एक खुशी अभी परवान पर ही थी कि एक और मौके ने फोन पर दस्तक दे दिया। प्रो सहाय बाबू का फोन था। कह रहे थे बहुत खुशी हुई जान कर कि वह पटना आ गयी है। फिर शिकायत भी करने लगे कि उसने उन से बताया क्यूँ नहीं। वो तो रुचिरा और समीर आये थे तो उसका नंबर मिला.... वरना ! फिर बात घुमा-फिरा कर उसके पी एच डी पर आ गयी। उसने बताया कि वह गाँव से अपना 'शोध प्रबंध' ले आयी है। अभी पुनरावलोकन कर रही है। शीघ्र ही उन से मिलेगी। सहाय बाबू ने अपने मन से ही भरोसा दिया था कि इसी सत्र में उसे डाक्टरयेट की उपाधि मिल जायेगी।
रुचिरा की खुशियों को तो जैसे पंख लग गया। स्नान-पूजा और जलपान के बाद वह बिस्तर पर लेटे-लेटे सच में वह अपना 'शोध-प्रबंध' पलटने लगी। एक बार चन्द्रकला देवी झाँकने आयी थी। कहा था, 'अच्छा करती हो बहू ! इस अवस्था में धार्मिक किताबें पढने से औलाद में अच्छे संस्कार आते हैं। रामदुलारी इस से पहले कि उठने का उपक्रम करती, चन्द्रकला देवी लेटो-लेटो... आराम करो, कहती हुई कमरे से निकल गयी।
अपराह्न में दरवाजे पर घंटी बजी। चरित्तर दरवाजा खोल कर बोला, "मालकिन ! वही दिन वाली मैडमजी आयी हैं।" दरवाजे पर रुचिरा और समीर थे। चन्द्रकला देवी खुद दरवाजे से उन्हें लेकर अन्दर आयी। रामदुलारी को अब विश्वास हो चला था कि ऊपर वाला जो भी देता है छप्पर फार के देता है। खुशियों की लरी है कि थमने का नाम ही नहीं ले रही। दोनों से हुलास कर मिलने के बाद अपनी सासू माँ से समीर का परिचय करवाया। फिर चन्द्रकला देवी झट से दोनों का मुँह मीठा करवाते हुए बताने में देर नहीं की कि वे जल्द ही अंकल-आंटी बनने वाले हैं।
वार्तालाप के बाद समीर ने सुनहरे रंग का आमंत्रण कार्ड देते हुए कहा कि कल ही उसके प्रकाशन की पहली पत्रिका 'नवज्योति' का लोकार्पण है। रुचिरा जी ही इस पत्रिका की संपादिका हैं। आप लोग अवश्य आइयेगा। कल के समारोह में विषय-प्रवेश तो रामदुलारी के भाषण से ही होगा। फिर दोनों चन्द्रकला देवी के चरण स्पर्श कर चले गए।
रुचिरा-समीर के जाने के बाद से ही रामदुलारी द्वार पर आँखे बिछा कर बांके की प्रतीक्षा करने लगी। उसे लग रहा था कि कल से भी बड़ी खुशी उसे आज मिली है। सच में उसके अरमान तो आकाश को स्पर्श करने लगे थे। वह अपने मन में ही शब्दों को टटोलने लगी जो वह कल उदघाटन भाषण में बोलेगी। सहसा उसकी आँखें फिर से द्वार की ओर मुड़ गयी, "उफ़ ये भी कितनी देर लगाते हैं..... ? कहा तो था कि जल्दी आयेंगे... पता नहीं कब आयेंगे... ? उन्हें कुछ पता भी है मैं आज कितनी खुश हूँ... ! आज मैं उन्हें कितनी बड़ी बात बताने वाली हूँ .... ? कल जब वो मुझे शहर के विशिष्ट लोगों के बीच मंच पर मेरा साहित्यिक भाषण सुन कर कितने खुश होंगे... ?" हालांकि अभी उतनी शाम भी नहीं हुई थी मगर रामदुलारी का मन बांके से बात करने के लिए व्यग्र हो रहा था।
'रामदुलारी की खुशियों पर क्या होगा बांके का प्रतिकार ? पढ़िए अगले हफ्ते! इसी ब्लॉग पर !!

3 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक पोस्ट, पढ़कर अच्छा लगा

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  2. रामदुलारी का प्रकरण बहुत ही रोचक और प्रभावशाली है! इसे जारी रखिए!

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  3. वैसे तो पिछली कडी को अभी पढा नहीं .. फिर भी बहुत रोचक है .. शीघ्र ही सारी कडियों को पढने का समय निकालती हूं !!

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