देखो बह न जाएं कहीं ये अश्क के मोती |
देखो बह न जाएं कहीं
ये अश्क के मोती।
उद्वेगों के समन्दर में
व्यथाओं का
हुआ मंथन
शिराएं जब हुईं आहत
बहीं/बन-
जलधार अन्तर से।
सहना
है बड़ा दुश्वर
पदाहत इनके होने का
न कोई मोल जाने
जब ये ढुलकें
बन जल बूँद नयनों से।

हृदय की पीर से
उपजी है धारा
कौन ये समझे,
वेदनाओं के उदधि से
फूट करुणा -
मेघ बन बरसे।
सम्भालो इनको
रख लो तुम
सुनहरे पल के
आँचल में
बिखेरो खुशबुओं के साथ
चम्पा और चमेली के।
हरीश प्रकाश गुप्त
वाह ! एहसासों की सुन्दर छवि ....
प्रत्युत्तर देंहटाएंwaah!sundar sanyojan shabdo or chitro ka,,,,....
प्रत्युत्तर देंहटाएंkunwar ji,
सुन्दर अभिव्यक्ति ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंअंतर्मन भीग गया!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंउद्वेगों के समन्दर में
प्रत्युत्तर देंहटाएंव्यथाओं का
हुआ मंथन
शिराएं जब हुईं आहत
बहीं/बन-
गहरे एहसास, सुन्दर अभिव्यक्ति। शुभकामनायें
हरीश जी इस कविता में बहुत बेहतर, बहुत गहरे स्तर पर एक बहुत ही छुपी हुई करुणा और गम्भीरता है। आपने इस कविता में अपने-आपको बहुत अच्छी तरह से बखूबी ढ़ाला है, और ऐसा लग रहा है कि आप बोल रहें हो या नहीं, आपकी कविता ज़रूर बोल रही है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंBahut sundar...
प्रत्युत्तर देंहटाएंहृदय की पीर से
प्रत्युत्तर देंहटाएंउपजी है धारा
कौन ये समझे,
वेदनाओं के उदधि
वेदना को व्यक्त करते हैं आँसू
सुन्दर रचना
बहुत सुंदर रचना जी
प्रत्युत्तर देंहटाएं@ मनोज जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंकविता की सफलता है कि वह भावों के स्तर पर, संवेदना के स्तर पर पाठक के अन्तर्मन को स्पर्श करे। इस कविता ने आप सहित सभी पाठकगण में यह अवुभूति जगाई, इसकी मुझे खुशी है और मैं सबका आभारी हूँ।
कविता पढने के उपरान्त बहुत देर तक पता नहीं मैं मुझ से कहाँ दूर चला गया था... जब लौटा तो तीन शे'र याद आये,
प्रत्युत्तर देंहटाएं'दर्द को दिल में जगह दे अकबर !
इल्म से शायरी नहीं आती !!
मेरे सीने में हो या कि तेरे सीने में !
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए !!
अब ये भी नहीं अच्छा कि हर ग़म ही मिटा दें,
कुछ ग़म तो सीने से लगाने के लिए भी हैं !!
अगर आशुतोष ने कालकूट को ग्रीवास्थ नहीं किया होता तो सृष्टि में जीवन का हास कैसे आता ! देखो बह न जाएं कहीं
ये अश्क के मोती............. बिखेरो खुशबुओं के साथ, चम्पा और चमेली के.......... !! बहुत सुन्दर रचना... !!!
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंकविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंवेदना, करुणा और दुःखानुभूति का अच्छा चित्रण।
प्रत्युत्तर देंहटाएंsunder abhivykti....
प्रत्युत्तर देंहटाएंएहसासों को खूबसूरत शब्दों में ढला है....सुन्दर रचना ....चित्रों ने और सुन्दर बना दिया..
प्रत्युत्तर देंहटाएंअरे ये हरीश जी की है ....मैंने सोचा आपकी है ......!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुंदर .....!!
थोडा सा इंतज़ार कीजिये, घूँघट बस उठने ही वाला है - हमारीवाणी.कॉम
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी उत्सुकता के लिए बताते चलते हैं कि हमारीवाणी.कॉम जल्द ही अपने डोमेन नेम अर्थात http://hamarivani.com के सर्वर पर अपलोड हो जाएगा। आपको यह जानकार हर्ष होगा कि यह बहुत ही आसान और उपयोगकर्ताओं के अनुकूल बनाया जा रहा है। इसमें लेखकों को बार-बार फीड नहीं देनी पड़ेगी, एक बार किसी भी ब्लॉग के हमारीवाणी.कॉम के सर्वर से जुड़ने के बाद यह अपने आप ही लेख प्रकाशित करेगा। आप सभी की भावनाओं का ध्यान रखते हुए इसका स्वरुप आपका जाना पहचाना और पसंद किया हुआ ही बनाया जा रहा है। लेकिन धीरे-धीरे आपके सुझावों को मानते हुए इसके डिजाईन तथा टूल्स में आपकी पसंद के अनुरूप बदलाव किए जाएँगे।....
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बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना..बधाई.
प्रत्युत्तर देंहटाएं___________________________
'पाखी की दुनिया' में स्कूल आज से खुल गए...आप भी देखिये मेरा पहला दिन.
खूबसूरत भावाभिव्यक्ति...साधुवाद.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुन्दर कविता. कोमल अभिव्यक्ति.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना
प्रत्युत्तर देंहटाएंवेदना को व्यक्त करते हैं आँसू
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर रचना
बहुत सुंदर रचना!
प्रत्युत्तर देंहटाएंकोई चाहे न चाहे,इस कविता से गुजरते हुए भावुक हो ही जाएगा।
प्रत्युत्तर देंहटाएं@ करण जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी भावनाओं का मैं आदर करता हूँ।
गीत के सन्दर्भ में आप द्वारा कहे गए चन्द शेर गीत की आभा में श्रीवृद्धि कर रहे हैं।
आभार,
@ हरकीरत जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंमैं कोई प्रतिष्ठित रचनाकार तो हूँ नहीं, अतः भ्रम होना स्वाभाविक है।
आपकी प्रतिक्रिया का मैं आदर करता हूँ।
आप की इस रचना को शुक्रवार, 2/7/2010 के चर्चा मंच के लिए लिया जा रहा है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंhttp://charchamanch.blogspot.com
आभार
अनामिका