बुधवार, 30 जून 2010

देसिल बयना - 36 : खस्सी की जान गयी, खाने वाले को स्वाद नहीं

-- करण समस्तीपुरी
बाप रे बाप ! फुलसुंघी के ब्याह में जो पापर बेलना पड़ा सो जिनगी भर यादे रहेगा। माय-बाप के एक संतान मगर बाबू तो उके गोदिये खिला के सरंग (स्वर्ग) सिधार गए। महतारी बड़ी सिनेह से पाल-पोस के रखी थी। हमरे परोस में उका एकचारी (एक छप्पर वाला) मकान था। बड़का कक्का को फुलसुंघी और उ के महतारी पर बड़ा दरेग (दया) रहता था। समझिये कि एक तरह से उहे उ दुन्नो के गार्जियन थे।
वैसे तो फुलसुंघी थी रूप-गुण के संपन्न। ई किसिम-किसिम के तरकारी और अंचार बनाती थी कि खाए वाला हाथ चाट के उज्जर कर दे। उन-काँटा और सुइया-डोरा भी खूब चलना जानती थी। भूच देहात में रह कर भी हाई-इस्कूल के परीक्षा में जिला-टॉप की थी। बड़का कक्का कोठा पर से बतासा माँगा कर पूरा टोला में बंटवाये थे। पूरा टोला में ख़ुशी का लहर था मगर उ की महतारी तो तरे-तर घुट रही थी। कक्का के अआगे में उका दरद फुटिये गया, "पछारण बाबू ! एक तो मुसमात की बेटी ऊपर से ई जिद कर के एट्रिक-मेट्रिक कर ली... मगर ई का डोली कौन उठाएगा ?
काका उको धीरज बंधा के बोले, "का भौजी ! आप भी खुशी के मौका पर ऐसा गप्प छेड़ते हैं ? अरे झम्मन भाई नहीं हैं तो का हुआ... ? हम हैं न... हमरा पूरा परिवार है न... अरे फुल्सुन्घिया तो पूरे गाँव-जवार का नाम रोशन कर दिहिस... आप कौनो चीज का फिकिर मत कीजिये। हम लायेंगे उ के लिए लाट-बलिस्टर (लोर्ड-बैरिस्टर) खोज के। आप लीजिये, ई बतासा खाइए।
बड़का कक्का सच्चे फुलसुंघी को अपनी बेटिय जैसे मानते थे। अपने वचन का निर्बाहो किये। हम तो उनके साथे-साथ थे। भागलपुर से छपरा तक छानते-छानते कए जोड़ी चप्पल खिया गया। बात पक्का हुआ मजफ्फर पुर के बौधा कातिब के बेटा से। लड़का हाई कोट पटना में पेशकारी करता था। हजारन टका नगद पर से पांच भर सोना, रेडिओ, घड़ी और बराती के बट-खर्चा पर बात पक्का हुआ।
वैसे तो कक्का सब कुछ करिए रहे थे मगर फुलसुंघी की महतारी खिलहा चौरी वाला चार बीघा खेत बेच कर बड़का कक्का के हाथ में सब व्यवस्था के जिम्मेबारी थमा दी। ई बैसक्खा हलफा में पूरा चौहद्दी में दौर-दौर के टेंट, बाजा, हलुअई सब का व्यवस्था किये थे। बौधा कातिब था भीतरिया। माधुरी वाणी बोल-बोल के कक्का को पाटिया लिया और फिर लगा चलनी में पानी भराए।
खैर चलो मुसमात की बेटी है। बेटी दस समाज के होती है। लगन, मंडप, घिढारी मटकोर के बाद ब्याहों के दिन आ गया। लपकू भैय्या गए रहे समस्तीपुर टीशन से बराती को हकारे। अब आएगा तब आएगा... बरतिया आया पहर रात बिता के। ऊपर से जनवासा से उठबे नहीं करे। महफा नहीं घोड़ा-हाथी लाओ तब लड़का द्वार लगेगा... ! बड़का कक्का का तो बिलड-पिरसर हाई हो गया। उ छेका दिन से बौधा कातिब के हाँ में हाँ मिला रहे थे। अजिया के बोले, "ई चार डेग चलने के लिए आपको हाथी आ घोड़ा चाहिए... मजफ्फरपुर से बरौनी पसिंजर में कोचा के आये तभी काहे नहीं वायु-यान कर लिए थे... समाधी भरुआ कही के !" हा..हा..हा... कक्का शुरू तो किये गुस्सा में मगर अंतिम में ठहक्का बजर गया।
खैर द्वार लगा। लड़का गया मंडप पर और इधर बरियतिया सब के जे खेल शुरू हुआ... बाबू रे... ! शरबत दिए तो कहा कि कौन कुआं का पानी उड़ेल रहे हैं ? हमको तो देह में लहरा फूंक दिया जब ससुरा सब खाना में गुलाब जामुन को बकरी का भेनारी कहे लगा। हम भी चोटाहिये के कहे, "भेनारी खाए का इत्ता शौक था तो पहिले बताते। हमलोग वही का पुख्ता इन्तिजाम रखते।"
कल होके फरमाईस करे लगा कि भातखाई में दाल साग खाए नहीं जायेंगे। रोहू के मूडा खस्सी का रान (जांघ से लेकर घुटने तक का हिस्सा) होना चाहिए। सब लोग कहिस किसान कुजरा कवारी है। रोहू तो चलो भाई मिथिला के सिंगार है मगर ई ब्याह-शादी के मंगल घड़ी में खस्सी कैसे कटेगा ? मगर बौधा कातिब एकदम अड़ गया। बिना मांस के भातखाई नहीं करेंगे।
उ झरकल दुपहरी में केवस वाला अन्जरबा कसाब को बुलाया गया। राम कहो... ! इधर शहनाई और उधार चितकबरा खस्सी के मिमियाहट। हमरा तो कलेजा काँप गया। खैर चलो किसी का जन्मे होता है किसी को खुशी देने के लिए। फुलसुंघी कितना जतन से पोसी थी दुन्नु खस्सी को। उ को तो पतो नहीं था कि दुधिया घास खिला कर जौन जीव को पोसे आज वही उके बराती का भोजन बन रहा है। मिमियाहट सुन के बड़का कक्का के आँख से भी आंसू चालक पड़े। बेचारे जनम से वैष्णव थे। सिरिफ इतना ही बोले कि आज "आज फुल्सुन्घिया का रिश्ता ई घर से और उका पोसा पाठा का रिश्ता ई संसार से टूट गया।"
खस्सी बन के हो गया तैयार। बराती बैठे दरवाजे पर भातखाई के लिए। समधी पांच जने मंडप पर बैठे। पचतिमना परोसा गया। मगर भुक्खर बरियतिया सब को तो भरोसा ही नहीं था कि पत्ता पर मछली-मांस भी पड़ेगा। लहसुन में छानल रोहू और प्याज में पका खस्सी का मांस पत्ता पर पड़ा तब उ लोग का नथुन्ना फुल्ला और हाथ सरपट चलने लगा।
लेकिन कहते हैं न कि उहो में एकाध गो कोलपत (आधा सडा हुआ छोटा आम) था। लहसुन-अदरक और गरम मसाला के सुगंध से पूरा टोला गमक रहा था मगर एगो-एगो बरियतिया ऐसन उकपाती कि कहे लगा, "मार ससुर.... ई मांस बनाया है कि बैगन का भुरता... ? तेल-मसाला के कौनो दरसे नहीं है।" मतलब ऐसन-ऐसन पिंगिल छांट रहा था कि देह झरक जाए।
बड़का कक्का से रहा नहीं गया। पत्तल पर से उठ के गरजे, "जिसको खाना है सो खाइए और नहीं खाना है तो मुँह-हाथ धो के जाइए बैठिये जनवासा पर। हम लड़की वाले हैं...., नहीं कुछ कहते हैं ई का मतलब का सिर पे चढ़ के लघुशंका कीजियेगा... ? पचहत्तर गो फरमाईश। ई चाहिए... ई हो गया तो अब ई चाहिए। इतना प्यार-दुलार से पोसल खस्सी कटवा दिए। "बेचारे खस्सी की जान गयी... खाने वाले को स्वादे नहीं।"
बड़का कक्का का तमसाया रूप देख कर बरतिया सब के नाड़ी शुद्ध हो गया। सब चुप-चाप भातखाई किया और आराम से विदाई लिया। बाप रे बाप ! राम जी के इच्छा से ई बिकट बरियतिया सब तो गया वापस मजफ्फर पुर मगर पीछे एगो कहावत छोड़ गया, "खस्सी की जान गयी... खाने वाले को स्वादे नहीं।" अर्थात एक का सर्वस्व बलिदान करने के बाद भी दूसरे को संतुष्टि न मिले तो इस से बेहतर और का कह सकते हैं, "खस्सी की जान गयी... खाने वाले को स्वाद नहीं।" समझे ! यही था आज का देसिल बयना !!!

18 टिप्‍पणियां:

  1. करण जी इस बार का देसिल बयना अब तक की प्रस्तुति मे सर्वश्रेष्ठ है। कहानी के मध्य की कुछ पंक्तियां बड़ी ही सार्गर्भित है और जीवन के यथार्थ को चित्रित करती हैं। जैसे
    "चलो किसी का जन्मे होता है किसी को खुशी देने के लिए।"
    एक निरीह जीव की हत्या कर हम स्वाद और आनंद लेते हैं।
    और
    "आज फुल्सुन्घिया का रिश्ता ई घर से और उका पोसा पाठा का रिश्ता ई संसार से टूट गया।"
    ये करूणा के स्वर है।
    सच ही कहा है आपने
    "एक का सर्वस्व बलिदान करने के बाद भी दूसरे को संतुष्टि न मिले!"
    इस देसिल बयना का अंक पढने के बाद हेनरी जार्ज की पंक्तियां याद आ गई
    "इंसान अकेला ऐसा जानवर है, जिसे जितना खिलाते जाओ उसकी भूख बढ़ती ही जाती है।"

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  2. सुन्दर प्रस्तुति। रचना कई रसों को सहेजे है। अर्थपूर्ण है। देसिल बयना अपने उद्देश्य में पूर्णतया सफल है।

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  3. करन जी.. ई देसिल बय्ना पर त हम अपना आज तक का जेतना लिखल है सब नेछाबर करने के लिए तैयार हैं. चच्चा का बरियाती इयाद आ गया..ऐसहीं ऊ हो रूस गे थे कि बिना लाइट के दुआरी लगएबे नहीं करेंगे..लाइटवा वाला का कहीं अऊर साटा था, एही से भाग गया... अंत में बड़्का बाबू बोले, चलो दिनेस बराती लगाओ, काहे कि कल्हे से त तुम अंधरिओ में दुआरी लगाने को तइयार रहोगे. तब बराति लगा...
    ई नौटंकी जो आप लिखे हैं देख कर देह में आग लग जाता था, बाकी लड़की का मुँह देखला के कारन चुप रहे पड़ता था.. खैर! हिला दिए आप.

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  4. @ मनोज कुमार,
    ये आपकी हौसला-अफजाई है सच... ? खैर जो भी हो एक सच मैं भी कहना चाहूँगा, "इस श्रृंखला के प्रेरणास्रोत तो आप ही हैं !" अब आप बताएं मैं शुक्रिया भी अदा कैसे करूँ ?

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  5. @ शास्त्री जी,
    देसिल बयना पर आपकी नजर-ए-इनायत किसी पाक दुआ से कम नहीं ! आभार !!

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  6. @ हरीश जी,
    क्या यह आपकी समीक्षा है ? जो भी हो आपकी प्रतिक्रिया मेरे लेखन में निखार और उत्साह का उद्दाम संसाधन होते हैं !! ऋणी हूँ आपका !!! धन्यवाद !!!!

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  7. @ चला बिहारी....
    समीर जी,
    ये आपकी जर्रानवाजी है.... ! टिपण्णी में आपके दिली जज़्बात साफ़ झलकते हैं. इन से रु-ब-रु हो कर ऐसा लगा जैसे वर्षों से बिछड़ा कोई अपना मिल गया हो. आप पहली बार हमारे ब्लॉग पर आये हैं, और मेरा सौभाग्य है कि आपका अहले कदम 'देसिल बयना' पर आया,.... हम आपका तह-ए-दिल से इस्तकवाल करते हैं... खुशामदीद !! उम्मीद है कि यह सिलसिला जारी रहेगा !!! शुक्रिया !!!!

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  8. @ गीत उर्फ़ संगीता जी,
    ब्लॉग पर आप जब तक नहीं आती हैं तो ऐसा लगता है जैसे आँगन में अम्मा की आवाज़ नहीं गूंजी.... ! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !!

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. करन बाबू ! शुक्रिया अदा करके आप हमारे जज़्बाए बिरादराने बिहार की तौहीन कर रहे हैं. कभी हमारे ब्लॉग पर भी तशरीफ फरमाँ होकर हमारी इज़्ज़त अफ्ज़ाई करें और ख़ातिर तवाज़ो का मौक़ा अता फ़रमाएँ. वहाँ भी आपको वही ख़ुलूस नज़र आएगा जो मुझे यहाँ आकर हुआ.
    माटी की महँक बरकरार रखें. मैं नाम के लिबास का मोहताज नहीं, लेकिन नाम सही नहीं लिखा आपने!

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  11. marmik chitran seedha asar karata huaa.........
    kya gaono me abhee bhee ye sab chal raha hai.....?

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  12. देसिल बयना अपने उद्देश्य में पूर्णतया सफल है।

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  13. जीवन के यथार्थ को चित्रित करती हैं।

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