निःशब्द नीड़
-- करण समस्तीपुरी
दिन भर दूर नीड़ से श्रम कर,
चना-चबेना दाना चुन कर,
सांझ पड़े खग आया थक कर,
किन्तु यहाँ क्या पाया ?
नीड़ देख निःशब्द,
विहग का उर आतुर घबराया !!

क्षुधा तृषित क्या सो गए परिजन,
या फिर से आया कोई रावण ?
पड़ीं नीड़ पर बाज की छाया,
या ब्याधे ने वाण चलाया ?
विस्मय और विषाद में डूबा,
असहाय अकुलाया !
नीड़ देख निःशब्द,
विहग का उर आतुर घबराया !!

नहीं रहे अब वीर जटायु,
इत-उत दशमुख फिरे चिरायु !
कौन मार्ग रोकेगा इनका,
नीति-व्यवस्था है एक तिनका !
कौन बताये कहाँ जानकी ?
सबको चिंता है स्वप्राण की,
मृग-तरुवर भी वधिर हुए,
संकट कैसा गहराया !
नीड़ देख निःशब्द,
विहग का उर आतुर घबराया !!
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