मंगलवार, 15 जून 2010

निःशब्द नीड़

निःशब्द नीड़
-- करण समस्तीपुरी


दिन भर दूर नीड़ से श्रम कर,
चना-चबेना दाना चुन कर,
सांझ पड़े खग आया थक कर,
किन्तु यहाँ क्या पाया ?
नीड़ देख निःशब्द,
विहग का उर आतुर घबराया !!


क्षुधा तृषित क्या सो गए परिजन,
या फिर से आया कोई रावण ?
पड़ीं नीड़ पर बाज की छाया,
या ब्याधे ने वाण चलाया ?
विस्मय और विषाद में डूबा,
असहाय अकुलाया !
नीड़ देख निःशब्द,
विहग का उर आतुर घबराया !!


नहीं रहे अब वीर जटायु,
इत-उत दशमुख फिरे चिरायु !
कौन मार्ग रोकेगा इनका,
नीति-व्यवस्था है एक तिनका !
कौन बताये कहाँ जानकी ?
सबको चिंता है स्वप्राण की,
मृग-तरुवर भी वधिर हुए,
संकट कैसा गहराया !
नीड़ देख निःशब्द,
विहग का उर आतुर घबराया !!

*****

22 टिप्‍पणियां:

  1. यह कविता काफी मर्मस्पर्शी बन पड़ी है। ये करूणा के स्वर नहीं है। ऐसी निरीह, विवश, और अवश अवस्था में भी उनके संघर्षरत छवि को आपने सामने रखा है। यह प्रस्तुत करने का अलग और नया अंदाज है।

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  2. Bahut bhavuk karne vali panktiyan.Kisi pratiyogita men shamil hoti to puraskaar mil sakta tha.

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  3. बहुत सुन्दर शब्दों के संयोजन से खूबसूरत भावों को प्रस्तुत किया है...सुन्दर रचना

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  4. Samaj aur desh mein faili asuraksha ki bhavana samanvit ek achi rachana. Jatayu ke sahas ke abhav se sankramit samajik,rajanitik aur natik paristhiti se utpann nirasha ki achi abhivyakti ho saki hai.

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  5. नहीं रहे अब वीर जटायु,
    इत-उत दशमुख फिरे चिरायु !
    कौन मार्ग रोकेगा इनका,
    नीति-व्यवस्था है एक तिनका !
    कौन बताये कहाँ जानकी ?
    सबको चिंता है स्वप्राण की,
    मृग-तरुवर भी वधिर हुए,
    संकट कैसा गहराया !
    नीड़ देख निःशब्द,
    विहग का उर आतुर घबराया !
    bhawpoorn rachna

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  6. Kya beettee hogi aise me parinde pe..anumaan bhi nahi kar sakte..aapne dard ka kitna sahi chitran kiya hai..mano panchhee ne khud apni wyatha sunayi ho!

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  7. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  8. मर्मस्पशी एवं प्रेरक रचना .............
    सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

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  9. यथार्थपरक और मर्मस्पर्शी रचना

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  10. सुन्दर शब्द योजना, प्रांजलता और प्रवाहमयता के साथ भाव भी मार्मिक हैं. वर्तमान सामाजिक परिवेश में आमजन एसे ही निरीह और अवश हैं तथा व्यवस्था भी उनके लिए एक तिनका से अधिक नहीं है.

    नहीं रहे अब वीर जटायु,

    नीति-व्यवस्था है एक तिनका !

    मृग-तरुवर भी वधिर हुए,
    संकट कैसा गहराया !

    नीड़ देख निःशब्द,
    विहग का उर आतुर घबराया.

    पंक्तियों का एक-एक शब्द अनुपम अर्थ का भण्डार है. सुन्दर गीत के लिए करण जी धन्यवाद.

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  11. Aj bahot dino bad aplogon ke blog par comment post karne ka sobhagya prapt hua hai...aur aj ki kavita inni achi hai ki kuch b kahungi to kam he hoga...Karan ji humesa ki tarah ye apki ye kavita b dil ko chhu gai :)
    Is saandar prastuti ke liye apko bahoooot bahooooooooooooooot dhanyawad...

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  12. सभी पाठकों का हृदय से आभार !
    @ मनोज कुमार,
    आप तो प्रेरणास्रोत हैं.... !
    @ शिक्षामित्र जी,
    मोहतरम जनाब, प्रतियोगिता से तो हम दूर ही रहते हैं! रही बात पुरस्कार की तो आप जैसे सहृदय पाठक की नजर-ए-इनायत हुई, ये क्या किसी पुरस्कार से कम है ? --- आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !
    @ डॉ. डंडा लखनवी, शास्त्री जी, इंडलि, क्षमा, संगीता जी एवं रश्मि प्रभा जी,
    आपका हमरे ब्लॉग पर आना किसी आशीर्वचन से कम नहीं है !
    @ अजय कुमार एवं रचना जी,
    अरसे बाद ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया देख बहुत ही अच्छा लगा !!!

    आप सबो को कोटिशः साधुवाद !!!!

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  13. @ हरीश जी,
    आप में एक समर्थ समीक्षक एवं निर्देशक की दृष्टि निहित है.... ! आपके संकेत मात्र से ही मेरा श्रम धन्य-धन्य हुआ !! बहुत-बहुत धन्यवाद !!!

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  14. bahut sunder rachana hai karan ye.......
    man ko bhigo gayee...........

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  15. कविता काफी मर्मस्पर्शी बन पड़ी है।

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  16. मर्मस्पशी एवं प्रेरक रचना ..!

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  17. सुन्दर कविता, भाव प्रणव व मर्मस्पर्शी ।

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  18. bahut hi marmshparshi kavita...sundar bhav...vichalit nahi karte lekin :)

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