गुरुवार, 10 जून 2010

आंच - 21

आंच के बीसवें अंक से...

-- आचार्य परशुराम राय


आँच का यह अंक पिछले अंक के क्रमिक विकास में औपचारिकता के लिए है। इसमें
लिए गए तथ्य से लगभग सभी पाठक परिचित होंगे। काव्यार्थ में पुराने बिम्ब
परिस्थिति विशेष से संयुक्त होकर किस प्रकार नविनता का झरोखा खोल देते
हैं, इसके उदाहरण हेतु महाकवि तुलसीदास, द्वारा विरचित रामचरित मानस के
किष्किन्धाकाण्ड में वर्षा ऋतु का वर्णन है।

उक्त वर्णन के पूर्व माता सीता का अपहरण हो चुका है, सुग्रीव से मैत्री
हो गयी है। शर्तों के अनुसार भगवान राम ने बालि-वध किया, सुग्रीव का
राज्याभिषेक हुआ। दोनों भाई प्रवर्षण पर्वत पर ही वर्षा ऋतु व्यतीत करने
का निश्चय कर वहीं अपना आवास बनाये। पावस की पहली वर्षा का दिन। आकाश घने
बादलों से पूरी तरह आच्छन्न हैं। बिजली कड़क रही है। ऐसे परिवेश में
वियोग का स्पर्श कर तुलसीदास जी वर्षा को और इससे बदलते वातावरण को
आध्यात्मिक और नैतिक उपमाओं से बहुत ही रोचक ढ़ंग से सजाया है।

बादलों को देखकर नृत्य करते हुए मोरों की ओर संकेत करते हुए भगवान राम
कहते हैं कि हे लक्ष्मण, ये ऐसे लग रहे हैं जैसे बैरागी गृहस्थ भगवान
विष्णु के भक्त को देखकर आनन्दित हो उठता है। यहाँ ‘विष्णु’ शब्द का
प्रयोग सतोगुण युक्त सृष्टि पालन की ओर संकेत करता है। वर्षा ऋतु जल और
अन्न के उत्पादन के प्रमुख कारकों में से एक है।

बिजली का कड़ककर बादलों से अलग हो जाना या विलुप्त हो जाना दुर्जनों के
अस्थिर प्रेम की तरह लगता है। पृथ्वी के पास आकर जल बरसाने वाले बादल
विद्या को उपलब्ध कर नम्र बने विद्वानों की तरह लगते हैं। बूँदों की आघात
सहने वाले पर्वत दुष्टों की कर्कश और अपनमान जनक वाणी को सहने वाले संतों
की तरह प्रतीत होते हैं। जल से भरी किनारों को तोडकर बहती छोटी छोटी
नदियाँ थोड़ा सा धन पाकर मर्यादा हीन बने दुष्टों की तरह दिखायी देती
हैं। जमीन पर गिरते ही मिट्टीयुक्त हुआ गँदला जल शुद्ध चैतन्य जीव से
लिपटी माया सी लगती है। धीरे-धीरे वहते हुए जल का तालाबों में जमा होना
एक-एक कर सद्गुणों का सज्जनों के पास आने जैसा है।
वर्षाकाल में चारों ओर घास उग आने से खोए हुए रास्ते पाखंड के प्रचार
से सद्ग्रंथों के लुप्त होने की तरह प्रतीत होते हैं। चारों ओर से गूँजती
मेढकों की आवाज ब्रह्मचारियों के वेदपाठ की ध्वनि की तरह सुहावनी लगती
है। वृक्षों पर आए नव पल्लव साधकों को साधना द्वारा मिले विवेक जैसे हैं।
और भी इस तरह के तथ्यों का प्रकरण में वर्णन दिया गया है। यहाँ केवल कुछ
उदाहरण आँच के इस अंक के सन्दर्भ को अनुप्राणित करने हेतु लिए गए हैं।


इस प्रकार वर्षा ऋतु की छटा को आध्यात्मिक और नैतिक उपमाओं से नयी
अर्थवत्ता प्रदान की गयी है। किसी भी रचना में प्रौढ़ता के लिए आवश्यक है
कि अपने अध्ययन, अनुभव और चिन्तन को रक्त में प्रवाहित होने दिया जाय,
ताकि वे रचनाकार में निहित प्रतिभा के गर्भ से शब्द-योजना में चमत्कार
उत्पन्न कर सकें और पाठकों के चित्त को रस से आप्लावित कर सकें ।

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6 टिप्‍पणियां:

  1. इस पोस्ट के लिेए साधुवाद

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  2. सही बात है. शब्द नए नहीं होते... उनकी योजना नयी होती है... दृष्टिकोण नए होते हैं... तभी तो नवीन अर्थ की उत्पत्ति होती है. बहुत सुन्दर ! सुबह-सुबह रामचरित मानस की चर्चा से ही हृदय गद-गद हो गया. धन्यवाद !!!

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  3. मनोज जी, आज एक समग्र तरीके से आपे ब्लॉग को देखता हूं तो बहुत विस्तार पाता हूं, पोस्टों में -आंच/देसिल बयना/कवितायें और संस्मरणात्मक अंश!
    इस आधे वर्ष मेँ वर्षमेँ 175 पोस्टेँ। वे भी पूरे लेंथ की!

    आपकी ऊर्जा बहुत जबरदस्त है मनोज जी!

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