मंगलवार, 22 जून 2010

… बस मेरा है!!!

बस मेरा है!!!

SDC11128 --मनोज कुमार

सन्‍तुष्‍टता और खुशी साथ-साथ रहते हैं। हम जो हमें मिला है उससे कितने संतुष्ट रहते हैं? यह बात निर्विवाद सत्य है कि संतुष्टि ही हमें सच्ची प्रसन्नता देती है। जीवन एक नाटक है। यदि हम इसके कथानक को समझ लें तो सदैव प्रसन्‍न रह सकते हैं। सभी परिस्थितियों में सन्‍तुलन बनाये रखना प्रसन्‍नता की चाबी है। दु:खों से भरी इस दुनिया में वास्‍तविक सम्‍पत्ति धन नहीं, संतुष्‍टता है। यदि मैं एक क्षण खुश रहता हूँ तो इससे मेरे अगले क्षण में भी खुश होने की सम्‍भावना बढ़ जाती है। फिर क्यों हम इस जगत की आपाधापी में फंसे पड़े हैं? अपनी इन्द्रियों पर सम्‍पूर्ण नियन्‍त्रण ही सच्‍ची विजय है। ईमानदार व्‍यक्ति स्‍वयं से स्‍वयं भी संतुष्‍ट रहता है तथा दूसरे भी उससे सन्‍तुष्‍ट रहते हैं। यदि हमें हमारे ही अन्‍दर शान्ति नहीं मिल पाती तो भला इस विश्‍व में उसे कहीं और कैसे पा सकते हैं? मन की शान्ति के बिना क्‍या खुशी सम्‍भव है? शांति को बाहर खोजना व्‍यर्थ है क्‍योंकि वह हमारे गले में पहना हुआ हार है।

प्रस्तुत है एक कविता।

बस मेरा है!!!

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22 टिप्‍पणियां:

  1. Sach kaha...apne aapme santusht rahna bada kathin karm hai. Aur adhik,aur adhik ki lalsa bani rahti hai.

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  2. बहुत सुन्दर...मन के मंथन से निकले उद्दगार ...प्रेरणा देते हुए

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  3. वाह जी बहुत बहुत सुंदर हे मन के बोल, आप के विचार

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  4. बात तो प्रसन्नता की कही गई है मगर इस कविता को लिखने से पहले कितना दर्द सहा होगा कवि ने ..! सोच कर सिहर उठता हूँ.

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  5. बहुत सुन्दर। ये केवल भावुकता या भावनाओं की उड़ान भर नहीं है, जीवन दर्शन है। एक आध्यात्मिक कविता है यह। एक बार फिर कहँगा - बहुत सुन्दर।

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  6. कविता के जज़्बात बाकी गहरे हैं........ धन्यवाद ! यह कविता आलोच्य है ! इसकी समीक्षा अवश्य होनी चाहिए !!!

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  7. सच्चे ,गहरे जज्बात। मन के मंथन से निकले उद्दगार!

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  8. एक अत्यंत ही गंभीर और सार्थक पोस्ट.

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  9. Rachana achhi lagi.Bimbon ke samuchit prayog aur shabdon ke chunav kavita men navinata paida karane men samarth ho sake hain. Karan ji se ise AANCH par chadhane ka anuradh hai.

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  10. वाह जी बहुत बहुत सुंदर हे मन के बोल!

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  11. आपने सही कहा .. संतुष्ट इंसान से सभी संतुष्ट रहते हैं ... और संतुष्टि तो मन की एक अवस्था है ... मेरे तेरे के बंधन से बाहर आना असल मकसद है ...

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  12. आपके विचार सचमुच बहुत सुंदर लगे!
    --
    ख़ुशी ही सच्चा जीवन है!

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  13. मंगलवार 29 06- 2010 को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार


    http://charchamanch.blogspot.com/

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  14. satya vachan..aise surabhikan to apne hi hote hain

    bahut achchhi lagi yah rachna...dhanyawaad

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