बुधवार, 23 जून 2010

देसिल बयना - 35 : गरीब की जोरू सब की भौजाई

-- करण समस्तीपुरी
खखोरन चौधरी के मामू सूखल झा ऐसन भीगा के जोगार लगाए कि सुथनीगंज के मुसाई पाठक की किशोरी कन्या 'चुरमुन्नी देवी' से खखोरन चौधरी का हाथ-मुँह सब पीला करवा दिए। ख़ुशी के मारे चौधरी जी का पैर तो जमीन पर पड़ता ही नहीं था... !
चुरमुन्नी देवी के आये से अधबयस खखोरने चौधरी पर नहीं बकिये टोला-टप्पर में भी हरियाली आ गयी थी। अब जिधर से गुजरे उधरे हंसी-ठिठोली। समझिये कि पूरा गांवे देवर-ननदोसी [ननद का पति] हो गया था।
फगुआ में बुढौ हिरामन ठाकुर चुरमुन्नी देवी को गुलाल मल के लाले-लाल कर दिए थे। बेचारी खिसियाई तो झड़ी बतीसी निपोर कर कहे लगे, "भर फागुन बूढ़ा भी देवरे लगता है, भौजी! और खखोरन का विवाह न अभी हुआ है, मगर है तो हम लोग का लंगोटिए... का खखोरन ?"
उ दिन बेचारी गयी रही भौकू सिंघ के घर दूध देने। सिंघ जी का कौलेजिया बेटा लगा फ़िल्मी गीत गाए, "साँची कहें तोरे आवन से हमरे अंगना में आयेल बहार भौजी !" चुरमुन्नी देवी थोड़ा लजा के और थोड़ा तिलमिला के कही थी एक और गीत है बाबू साहेब, "रे छौरा ! तोरा बज्जर पड़तौ।" उ लड़का भी चुप रहे वाला नहीं था। चट से कह दिहिस, "अब का बताएं भौजी ! तोहे उ बुढौ चौधरी के गौहाली [गोशाला] में देख के तो सच्चे हमरा ऊपर बज्जर गिर जाता है।" उ उकी कलाई भी पकड़ना चाहा था मगर चुरमुन्नी देवी उ का हाथ झटक और अपना पैर पटकते हुए लौट आयी थी।
घर आ के चौधरी जी को भी बढ़िया से 'आशीर्वाद' सुनाई, ''लगता ही नहीं कि हमरे भी मरद है। जौन चाहे ठिठोली कर ले... ! किसी को एक मुँह बोल नहीं सकते ? अरे उ सिंघबा का बेटा... का लगता है उ हमरा ? अगर आपका सही उमर पर घर बस जाता तो उत्ता बड़ा बाल-बच्चा होता... !! उ निमोछिया भी हमसे.... हाय हो देवा.... ! जौन मरद अगिनदेवता के सामने सात जनम तक हमरे मान रखे का वचन दिया, आज वही के सामने ही पूरा गाँव फतुरिया के तरह हम से दिलग्गी करता है।''
औरत के ललकार पर तो हिजरो में पौरुष उमर आता है। चौधरी जी थे तो बेचारे मरदे। एकदम मर्यादा पुरुषोत्तम के तरह 'भुज उठाई प्रण किन्ह.... तुम निश्चिन्त रहो चुरमुन्नी ! देखते हैं आज से किसकी मैय्या बाघ बियाई है जो हमरी लुगाई पर नजर डाले। ससुर कौनो ऐसा-वैसा मजाक किया तो हम उका जीभ काट कर लौकेट बना तोहरे गला में पहना देंगे।"

आज चुरमुन्नी देवी को लगा था कि उका पति में भी पौरुष है। उका भी कोई भर्तार है जौन में उका रच्छा करे का कुवत है। बेचारी गदगद हो के भर थाल चूरा-दही परोस कर चौधरी जी के सामने सजा दी। चौधरी जी छक कर भोग लगाए फिर भैंस पर सवार होकर चल दिए चरवाही में।

एक दिन बेरिया [दोपहर] में चौधरी जी कलेऊ कर के बथाने पर लोट-पोट कर रहे थे। चुरमुन्नी देवी वहीं गोबर थाप रही थी। तभिये ढक्कन सेठ के छोटका भाई जिलेबिया बथान पर आ कर बोला, "चौधरी जी ! तम्बाकू खिलाइए।" चौधरी जी कमर में बंधी चिनौटी निकालते हुए बोले, "लो... हमरे लिए भी लगाना।" जिलेबिया हथेली पर तम्बाकू फैला कर बोला, "चूना दीजियेगा... तब न तम्बाकू लगायेंगे ?" चौधरी जी बोले, "ओह ! चूना तुम अपने निकालो... हमरा खाली हो गया है ?"

जिलेबिया बोला, "का खाली हो गया है मरदे ? आपके सामने तो पूरा चूनाभट्ठी बैठी हुई है। भौजी के गाल तो चूना से भी सफ़ेद है। औडर दीजिये तो वही को चुटकी में भर कर चुनिया देते हैं। सफेदी के सफेदी और लवनगर रस भी मिल जाएगा... !"

जिलेबिया का इतना कहना था कि चुरमुन्नी देवी की आँखों की ज्वाला सीधे खखोरन चौधरी पर पड़ीं। चौधारारी जी समझ गए कि महा-प्रलय का शंख-नाद हो गया। उ भी आँख लला कर बोले, "जवान संभाल लो जिलेबिया... वरना... !" जिलेबिया भी तैश में आ गया। फिर दोनों में गुत्थम-गुत्थी हो गया।

चुरमुन्नी देवी कलेजा पिट के और गला फार - फार के भीर को इकट्ठा कर ली तब जा कर दोनों अलग हुए। देख लेंगे... तो देख लेंगे... कि धमकी के बाद जिलेबिया अपने घर का रास्ता पाकर और चौधरी जी और चुरमुन्नी देवी भीर को जिलेबिया के बदतमीजी का तफसील देने लगे।

पहिल सांझ खखोरन झा के दरवाजे पर सरपंच बाबू का बैलगाड़ी आ लगा। उ के साथे ढक्कन सेठ, जिलेबिया, भौकू सिंघ, हिरामन झा और पांच-दस पंच भी थे। आते ही सरपंच बाबू दहारे, "का रे खखोरना... ! तेरा सिंघ निकल आया है का.... ?

"सरपंच बाबू... हम तो.... !" चौधरी इतना ही बोल पाए थे कि सरपंच बाबू फिर दहारे, "का हम तो... ! तोहरी इतनी हिम्मत कि गाँव घर के इज्जतदार लोग पर भी हाथ उठाएगा.... ? ढक्कन सेठ का कितना उधारी रक्खा है... भूल गया का... ? जरा मुँह से मजाक किया तो चाम छिलाता है। इहाँ सुलक्षण गली मोहल्ले में जवान लड़का सब को खराब कर रही है और तू चला है बलजोरी खेलने।

हिरामन ठाकुर, भौकू सिंघ ई सब भी सरपंच बाबू के ताल से ताल मिलाये। बेचारे खखोरन 'दोहाई सरकार की' करते रहे। सरपंच जी फिर पूछे, "ढक्कन सेठ अपना सारा बकाया अभी मांग रहे हैं... फिर अभी मार-पिट के लिए थाना पुलिस बुलायेंगे.... बोलो... का करोगे ? ढक्कन सेठ का बकाया तो था ही चौधरी पर ऊपर से थाना-पुलिस का नाम सुनते ही बेचारे का पैर कांपने लगा।

दोनों हाथ जोड़े गिरगिरा कर बोले, "सरपंच बाबू ! हम गरीब आदमी.... भारी गलती हो गया ! हम सेठ जी दुन्नु भाई से माफी मांगते हैं। कर्जा-बकाया तो जो भी है हम आज न कल अपना देहो बेच के चुका देंगे... आवेश में जिलेबी लाल जी पर हाथ उठ गया... हम अपना अपराध मानते हैं मगर हम कौनो समाज से बाहर नहीं हैं। आप ही लोग निपटारा कर दीजिये। थाना-पुलिस आप समाज से बढ़ कर थोड़े है... आप दस पंच जो सजा दीजिये हमें मंजूर है।"

फिर सेठ जी दुन्नु भाई के साथ थोड़ा खुसुर फुसुर के बाद सरपंच बाबू फैसला सुनाये, "चुकी ई अपराध में सबसे बड़ी दोषी है खखोरन की लुगाई सो उ सब के पैर पकर कर माफी मांगेगी और जब तक उ माफी मांगती है, खखोरन चौधरी दोनों कान पकर कर उठक-बैठक करेंगे। फिर महावीर थान के कमेटी में एक सौ एक रुपया जमा करायेंगे।"

रो-धो कर चौधरी जी दोनों परानी सजा काटने लगे। बेचारी चुरमुन्नी देवी जौन आदमी का कभी मुँह नहीं देखी उ का भी पैर पकर रही है। उ के सामने ही उ का पति-परमेश्वर कान पकर कर उठ-बैठ रहा है। आखिर में जिसके मुँह से अपशब्द सुनी उ जिलेबिया के पैर भी पकरी तब जा कर सरपंच बाबू खखोरन के उठक-बैठक पर ब्रेक लगाए।

भीड़ छट गयी तो देहरी पर सिर झुकाए बैठे खखोरन का हाथ अपने दोनों हाथों में ले के चुरमुन्नी देवी लगी सिसक-सिसक के रोये। रोते हुए ही बोला, 'हम का माफ़ कर दीजिये... ! हमरे खातिर आपका इतना बेइज्जती हुआ ... !" चुरमुन्नी देवी रोये जा रही थी।

खखोरन बीवी के आंसू पोछ कर बोला, "जाने दो चुरमुन्नी... ! तुम रो मत। अरे गरीब आदमी के पास कौन सा इज्जते होता है जो बेइज्जती होगी.... ? हम ने कहा था न, "गरीब की जोरू सब की भौजाई होती है।"

न जाने आज चुरमुन्नी देवी में कहाँ से इतनी बुद्धिमत्ता आ गयी थी। बोली, "हाँ जी ! आप सही कहते थे, "गरीब की जोरू सब की भौजाई"। सच ही तो है, गरीब अर्थात लाचार, बेवश लोगों की जिन्दगी ही सामर्थ्यवान लोगों की सुख, शौक, जरुरत और विलासिता की पूर्ति के लिए है। समर्थों के अत्याचारों को सहना असहायों का धर्म है, उनके शोषण का शिकार होना ही उनकी नियति है। बड़े लोगों के लिए छोटे लोगों की कीमत उनके मनोरंजन तक ही सीमित है।

हूँ.... ! देखिये, कथा तो थोड़ी लम्बी हो गयी और थोड़ी दुखद भी मगर आप समझे कि नहीं... कि गरीब की जोरू सब की भौजाई होती है .... ? जो भी हो टिपण्णी कर के बताइयेगा !!!

10 टिप्‍पणियां:

  1. देसिल बयना अपना संदेश प्रेषित करने में सफल रहा।

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  2. बड़े लोगों के लिए छोटे लोगों की कीमत उनके मनोरंजन तक ही सीमित है।

    दुखद सत्य

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  3. agar dehat me ye he mansikta hotee hai to man bharee ho utha hai......
    gareeb ke paas ek hee to poonjee hotee hai charitr vo bhee dharashayee hojae to jeevan me bacha kya ?

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  4. कित्ती लम्बी हो गई यह पोस्ट...अब तो पढने के लिए पापा की मदद लेनी पड़ेगी.


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    'पाखी की दुनिया' में 'पाखी का लैपटॉप' !

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  5. हमेशा ही शान्दार रहत है देसिल बयना का किस्त.

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  6. तमाम पाठकों का दिल से शुक्रगुज़ार हूँ !!

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  7. सही कहे ल।
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    क्या आप बता सकते हैं कि इंसान और साँप में कौन ज़्यादा ज़हरीला होता है?
    अगर हाँ, तो फिर चले आइए रहस्य और रोमाँच से भरी एक नवीन दुनिया में आपका स्वागत है।

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