बुधवार, 16 जून 2010

देसिल बयना - 34 : पूत सपूत तो का धन संचय....

-- करण समस्तीपुरी
राम-राम ! अरे ई दुनिया का है ? वृथा मोह-माया है। आदमी भौतिक सुख-सुविधा के पाछे रन-रन करते रहता है। कौनो-कौनो आदमी के लिए तो धने संपत्ति सबस बड़का चीज होता है। मगर लालटेन प्रसाद ऐसन में से नहीं थे। थोड़ा-बहुत मरौसी (पुर्वजी) जायदाद था, गाँव में मास्टरी कर के भी थोड़ा नून-सतुआ (नमक-सत्तू) कमा लेते थे मगर अपना संस्कार और सिद्धांत से कभियो समझौता नहीं किये। टोला-मोहल्ला में जौन भी अच्छा काम हो उ में तन-मन और धन सब से अआगे रहते थे। कैसनो कड़की रहे मगर अपने औकात भर किसी की मदद से पाछे नहीं हटने वाले में से थे। बालो-बच्चा को अच्छा संस्कार दिए। मगर दुन्नु परानी में शायदे ऐसन कोनो दिन होगा जो हरिया-खपरी नहीं फूटे। उ का है न कि सोहाग सुन्दरी देवी को लालटेन बाबू का दानवीर कर्ण वाला स्वाभाव फूटी आँखों भी नहीं सोहता था।
उ दिन तो खुशी के मौका पर भी उके घर में कोहराम मचा हुआ था। बड़का लड़का खदेरन इहे साल हायर सिकेंडरी फस्ट डिविजन में पास किया था। उको शहर बनारस से डाक्टरी के पढाई के लिए बोलाहट आया था। मगर बनारस भेजे के लिए खर्चा पानी भी तो चाहिए। लालटेन बाबू अपनी घरैतिन (घर वाली) को कहे कि जो भी गहना-जेवर है बेच कर दे देंगे। बेटा एक बार डाक्टर बन गया तो फिर कौन चीज का कमी रहेगा... ? यही बात पर सोहाग-सुन्दरी देवी रूपचंडी बन गयी। कहिस खबरदार जो दुबारा ई बात सोचा भी तो। आज-तक तो जिनगी में एक नकबुल्की तक दिया नहीं और हमरे नैहर का जेवर पर घात लगाए बैठे हैं। कुछ हो जाए हम अपने माय-बाप का दिया निशानी नहीं बेचने देंगे। पहिले हमरा प्राण लेलो फिर गहना लेना।
थक-हार कर लालटेन बाबू डोरा वाला छः कट्ठा खेत भरना रख कर खदेरन को पैसा दे दिया। उतो पढाई करे बनारस चला गया मगर उकी महतारी खटवास-पतवास दे दिहिस। एक हफ्ता से बिग्रह मचाये थी। उ दिन पानी सर से ऊपर चला गया तो लालटेन प्रसाद भी बिगड़ गए। फिर टोला-मोहल्ला का लोग-वाग गया दुन्नु के थोड़-थाम करे। सोहाग सुन्दर देवी विलख-विलख के खेत का मातम मना रही थी। तरस खा कर भकतु सिंघ पूछे, "का हुआ गुरु जी, ई सब काहे हो रहा है ? पूरे गाँव में तो एगो आपही पढ़े-लिखे हैं। आपका घर में भी ई 'अट्ठा-बज्जर' शोभा देता है ?"
लालटेन बाबू सिंघ जी को सब बात समझा कर बोले, "अब बताइये हम का गलती किये ?" सिंघ जी कुछ बोले से पहिले बिच्चे में सोहाग-सुन्दरी देवी आँख से गंगा-यमुना बहाते टपक पड़ीं, "बेटा डाक्टरी करे चाहे कुछ करे अपने बाला से.... ! उके खातिर अपना बाप-पुरखा के जमीन बिरहा देंगे ? कल कौन जाने... ? बेटा नहीं देखेगा तब का ले के रहेंगे ? ई से भले अपना बेटा भी गाँव में ही रहता, जमीन भी अपनी रहती। वही से हमरी भी जिनगी निमह जाती और उसकी भी।"
लालटेन बाबू समझाए, "कहती तो ठीक हो मगर 'पूत कपूत तो का धन संचय' ? अरे जब बाल-बच्चा बिगदिये जाएगा तो जमीन-जायदाद और धन संपत्ति ले के का होगा ? अभी तो उको डाक्टरी के लिए दे दिए। चलो, बाद मे हमें देखे या नहीं, उकी जिनगी तो बन गयी। अभी जमीन का मोह रखते तो का होता... ? उ पढता लिखता नहीं तो यही जमीन बेच के खाता..... ! और का पता कहीं गलत रास्ता पर निकल जाता, तो जमीन बेच के आवारगी करता, केस-मुकदमा लड़ता.... तो बढ़िया लगता ? अरे हम कोई अपना शौक-मौज के लिए बंधक रखे हैं ? समझिये कि बेटा सपूत हो गया। न तो 'पूत कपूत तो का धन संचय' ? कपूत हो जाने पर धन-संपत्ति ले के का होता ?
चलिए। तभी तो बहुत लोगों के हस्तक्षेप से ममला ठहर गया। फिर दुन्नु परानी मे सुल्लाह-सफाई हुआ। खट-पट तो जिनगी भर चलता रहा मगर खदेरन के बाद रगेदन भी इंजीनियरी का पढाई कर के बड़ा साहेब बन गया। बुधनी भी परफेसर बन गयी। पूरे गाँव-जवार में लालटेन प्रसाद का नाम रौशन हो गया।
बहुत दिन के बाद एक बार फिर वैसने कोहराम मच गया दुन्नु परानी में। दरअसल लालटेन बाबू गाँव मे सरकारी इस्कूल के लिए जमीन दान में दे रहे थे। अब ई सुन के तो सोहाग-सुन्दरी देवी का तलबा का लहर मगज पर चढ़ गया। ई बार तो सब पंच के सामने ही उबल पड़ीं थी देवीजी। एक बार बेटा पढ़ाने का बहाना कर के बंधक रख दिए उ में संतोष नहीं हुआ तो अब बाकलम ख़ास करने चले हैं... ? तभी तो शास्त्र पढ़ते थे, "पूत कपूत तो का धन संचय... !" अभी तो पूत कपूत नहीं हुआ जा रहा है न... ? तो अब काहे अपना पुश्तैनी संपत्ति बिरहा रहे हैं ?"
सोहागसुन्दरी देवी तो क्रोध में फुफकार रही थी। मगर लालटेन बाबू ठिठोली करते हुए बोले, 'अरे तभी पूत-कपूत तो का धन संचय... और अभी समझ लो कि 'पूत सपूत तो का धन संचय... !' अरे ! तुको अब का कमी है ? एक बेटा डाक्टर, एक इंजीनियर, बेटी परफेसर, दामाद कलक्टर... ? अब धन-संपत्ति ले के का करोगे ? आज तक कोई लाद के ले गया है... कि हम-तुम लाद के ले जायेंगे ? बाप-पुरखा की संपत्ति है, इस्कूल को दान कर देंगे तो उन्ही का नाम-यश होगा न... !! हमें का... अब सब बाल-बच्चा बन गया.... सपूत हो गया तो धन संचय कर के का होगा.... !! लाइए हो सरपंच बाबू कागज़... दस्तखत कर देते हैं।"
इधर सोहागसुन्दरी देवी अपना नाक-भौं चमकाती रही। उधर लालटेन प्रसाद कलम उठाए और एक बार दोहराये 'पूत कपूत तो का धन संचय और पूत सपूत तो का धन संचय....' और इस्टाम्प पेपर पर कलम रगर दिए। उहाँ खड़े सभी लोग ताली पीट कर लालटेन बाबू का जयजयकार कर उठे। उ दिन से उनकी वाणी कहावते बन गयी। बात भी सच्चे कहे हैं, "पूत कपूत तो का धन संचय... और पूत सपूत तो का धन संचय !" अर्थात असली धन तो संतान है। उन्हें सुशिक्षित और सुसंस्कृत बना दिया वही सब से बड़ा धन है। अन्यथा संतान कुमार्ग पर चला गया तो संचित धन का नाश ही करेगा और सुमार्ग पर चला तो धन संचय की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
समझे ! "पूत कपूत तो का धन संचय... पूत सपूत तो का धन संचय !!" यही था आज का देसिल बयना !!! बोल सियावर रामचंद्र की जय !!!!

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्‍तुत किया .. अच्‍छी बहावत भी याद करा दी !!

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  2. इस संदेशप्रद देसिल बयना की रोचक कथा के माध्यम से प्रस्तुति अद्वीतिय लगी।
    यदि आपके संकल्‍प शुद्ध हैं तो जो आप सोचते हैं, वह कहना तथा जो आप कहते हैं वह करना सरल हो जाता है।
    यही कथा के नायक ने किया।

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  3. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  4. सही है भाईजी! पूत सपूत तो का धन सन्चय। पूत कपूत तो का धन सन्चय। अच्छी प्रस्तुति। आभार!

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  5. आप की इस रचना को शुक्रवार, 18/6/2010 के चर्चा मंच पर सजाया गया है.

    http://charchamanch.blogspot.com

    आभार

    अनामिका

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  6. महोदय, बार बार साधुवाद दे देकर अब तो ये सामान्या घट्ना सि प्रतित होने लगीं है फ़िर भी ठेठ देशी भाषा कि उत्कृष्टता मुझे फणीष्वर नाथ रेनू कि याद दिला गयीं। आपकी रचनात्मक प्रतिभा को मेर सम्मान

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