शुक्रवार, 28 मई 2010

त्यागपत्र : भाग 31

पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, 'कैसे रामदुलारी तमाम विरोध और विषमताओं के बावजूद पटना आकर स्नातकोत्तर तक पढाई करती है। बिहार के साहित्यिक गलियारे में उसका दखल शुरू ही होता है कि वह गाँव लौट जाती है। फिर सी.पी.डब्ल्यू.डी. के अभियंता बांके बिहारी से परिणय सूत्र में बंध पुनः पटना आ जाती है। अब पढ़िए आगे॥ -- करण समस्तीपुरी
पटना शहर रामदुलारी के लिए नया नहीं था। इसी शहर की गोद में उसकी तरुनाई बीती थी। पिछले सात सालों से वह पटना में ही रह रही थी। हाँ अब क्षेत्र में थोडा अंतर आ गया था। कभी क्लास, नोट्स, किताबें, ट्यूशन और नारी उत्थान आन्दोलन में अशोक राज पथ, एनी-बेसेंट रोड, महेन्द्रू नया टोला और गोविन्द मित्र रोड की ख़ाक छान चुकी रामदुलारी अब अनीसाबाद के वातानुकूलित बंगले की शोभा थी। बांके की दिनचर्या बहुत ही व्यस्त है। सुबह जब तक तैयार हों बैठक-खाने में प्रांत के नामी-गिरामी ठेकदारों की भीड़ लगी रहती है। शाम ढले घर वापिस आते तो हैं पर फोन की खनकती घंटियाँ रामदुलारी की सौत की तरह वक़्त छीन लेती है। अब तो आर-ब्लोक और न्यू मार्केट भी किसी दूर शहर की तरह दीखते हैं। हाँ सासू माँ का मन हो गया तो मंगलवार की शाम महावीर मंदिर में माथा टेकने का मौका जरूर मिल जाता है।
परिवर्तन सिर्फ निवास-क्षेत्र में ही नहीं हुआ है। कभी अध्यन, वाद-विवाद, पत्र-पत्रिका और किताबों में डूबी रहने वाली रामदुलारी का समय इस विशाल घर में अपने लिए छोटे-छोटे काम के भी अवसर तलाशते बीतता है। कभी वह विद्रोह कर के पटना आयी थी। फिर पटना शहर ने उसे अपना लिया, उसने पटना शहर को अपना लिया। वर्षों में इतनी शिद्दत से कभी उसे अपने गाँव की याद नहीं आयी थी। लेकिन अब तो उसकी आँखों में हमेशा राघोपुर के कच्चे-पक्के रास्ते ही चक्कर काटते हैं। अब उसका मन करता है, काश कुछ दिन के लिए राघोपुर चले जाते.... !
हालांकि अब तक बाबू विदाई के लिए तीन बार आग्रह कर चुके थे लेकिन कभी बांके की व्यस्तता, कभी अतिथियों का आगमन और कभी सासू माँ की अस्वस्थता के कारण उनके निवेदन को निरस्त कर दिया गया था। रामदुलारी ने एक बार बांके से कहा भी था, "आप भी एक बार ससुराल का आनंद ले लेते, मेरा भी जी बहल जाता... !" लेकिन कितनी रुखाई से ताल गया था बांके, "ओह नो... डियर ! लोड्स ऑफ़ वर्क नावअडेज़। फिर अभी-अभी तो तुम आयी ही हो.... ! बात करनी है तो कॉल योर परेंट्स नो... ! घर में दो-दो टेलीफोन लगे हैं। इवेन योर फॅमिली हैस गोट अ टेलीफोन कनेक्शन नाव।" अभियंता बांके ने मशीन के उपयोग के बारे में खूब सीखा था। रामदुलारी मनमसोस कर रह गयी।
ऐसे में उस दिन रुचिरा का आना उसे बड़ा ही शुकून दिया था। उसे ऐसा महसूस हुआ था मानो जेठ की तपती दुपहरी में शीतल बतास मिल गया हो। पहले तो रुचिरा और रामदुलारी दोनों के मन में शंका थी किन्तु सासू माँ ने जिस उल्लास के साथ रुचिरा का स्वागत किया उस से सब शंकाएं निर्मूल हो गयी। बांके की माँ ने रुचिरा से बड़े स्नेह से कहा था, "अच्छा किया बेटी। घर में कोई रहता नहीं है... अकेली इस बेचारी का जी अकुलाता है... ! अब तुम दोनों बातें करो.... ! शर्मा जी के बहु के घर से फ्रीज़ आया है, मैं जरा देख के आती हूँ।"
सासू माँ के जाने के बाद दोनों सहेलियों ने खूब सारी बातें की। लगता था जैसे छः महीने से बंधी हुई गाँठ खुल गयी हो। बातो का सिलसिला था कि बढ़ता ही जा रहा था। अतीत की मधुर स्मृतियों के प्राचीर से जो चर्चा शुरू हुई तो वर्तमान की सब हदों को पार करती हुई भविष्य की योजनाओं तक पहुँच गयी। रामदुलारी ने जब समीर और समीर से उसके रिश्ते के बारे में पूछा तो रुचिरा की आँखों में शरारत तैर गयी थी। फिर रुचिरा ने बताया था कि अभी जल्दी भी क्या है... ? दोनों राजी हैं, मिलने-जुलने पर भी कोई पाबंदी नहीं है..... सिर्फ फेरे ही लेने हैं तो कभी भी ले लेंगे। फिलहाल तो समीर पटना से एक साप्ताहिक हिंदी पत्र निकालने की सोच रहा है।
रामदुलारी ने जानना चाहा था कि सेठ दीं दयाल को तो कोई आपत्ति नहीं होगी ? रुचिरा बहुत आश्वस्त थी। उसने कहा, 'नहीं! ऐसा होना तो नहीं चाहिए। सेठ जी आधुनिक विचारों के हैं और आज तक उन्होंने हमारी दोस्ती पर कोई आपत्ति नहीं जताई है उलटे हमारा सम्मान ही बढाया है। अब तो मैं उनके महाविद्यालय में हिंदी की विभाग की अध्यक्ष हो गयी हूँ। वैसे भी इतनी परवाह कौन करता है ? मैं और समीर स्वावलंबी हैं और एक-दुसरे को पसंद करते हैं तो किसी के विरोध करने से अपना लक्ष्य थोड़े बदल सकते हैं। तुम तो जानती ही हो कि परम्परा के नाम पर समाज की घिसी-पीती लकीरों पर मैं कितना विश्वास करती हूँ...!" रुचिरा की चुटीली हंसी पर रामदुलारी भी खुद को मुस्कराने से नहीं रोक पायी।
बहुत सारी बातों के बाद रुचिरा रामदुलारी को कंधो से मार कर पूछी, 'ये तो थी मेरी राम-कहानी। तू भी अपनी कुछ बतायेगी ? कैसे कट रहे हैं मस्ती भरे दिन ?" जवाब में रामदुलारी झेंप गयी थी। 'हाँ ! सब ठीक है।' के अलावे कुछ कह नहीं पायी थी वह। रुचिरा ने ही दूसरा सवाल दगा, "तो बता अभी तक कहाँ-कहाँ ले गए हैं तेरे बांके बिहारी ?" 'कहाँ जाउंगी ? उन्हें तो फुर्सत ही नहीं मिलती है.... जरा सी भी !" फिर दोनों में कुछ चुहलबाजियाँ भी हुई थी और मंद-मंद जुडुवा हंसी से कमरा चहक उठा था।
रुचिरा ने उसके 'शोध-प्रबंध' के विषय में पूछा। रामदुलारी ने बताया था कि विवाह से पहले जो बक्से में बाँध कर रखा सो अभी तक खोने का मौका नहीं लगा है। फिर रुचिरा ने कहा था कि उसकी रचना 'धर्मयुग' और 'सारिका' में छपी है। साप्ताहिक हिंदुस्तान से 'भाषा-विज्ञानं' पर नियमित कालम लिखने का निमंत्रण मिला है। उसने रामदुलारी को भी कुरेदा था, "क्यूँ चहारदीवारी में कैद कर अपनी रचनात्मक क्षमता को भी मार रही है ? तुम्हारे तो शोध के विषय से ही साहित्य और नारी विमर्श पर अनेक रचनाये निकल सकती हैं। तुम्हारी भाषा और दृष्टिकोण भी कितनी गहरी पैठ रखती है... और न जाने क्या-क्या कहा था रुचिरा ने। रामदुलारी सिर्फ हाँ-हूँ करती रही थी।
संध्या के धुंधले आँचल पर विद्युत् का धवल प्रकाश बिखरने लगा तो रुचिरा बोली, 'चल अब मुझे इजाजत दे। लगता है आज तेरे बांके-बिहारी किसी कुञ्ज गली में रास रचा रहे हैं। उन्हें देर लगेगी। उन से फिर कभी मिल लूंगी। अच्छा तू अपने घर का फोन नंबर दे दे। मैं कॉल-वाल करती रहूंगी। फिर अपने थैले से डायरी निकाल कर नंबर लिखने के बाद जब वह चलने को हुई तब तक सासू माँ वापस आ चुकी थी। रुचिरा ने उनके पैर छू कर विदाई की आज्ञा माँगी तो उन्होंने उसे गले से लगा कर फिर आते रहने के लिए कह कर उसका हाथ पकर कर सड़क तक छोड़ने आ गयी। रामदुलारी मुख्य-द्वार से हाथ हिला-हिला कर रुचिरा को जाते हुए देखती रही।
रुचिरा तो मिल कर चली गयी। लेकिन रामदुलारी के लिए छोड़ गयी कई प्रश्न। क्या रामदुलारी को मिल पता है उन प्रश्नों का उत्तर ? पढ़िए अगले हफ्ते ! इसी ब्लॉग पर !!

4 टिप्‍पणियां:

  1. achee chal rahee hai aapkee kahanee naam bhee ek se ek rakhe hai shayad gaon ka feel dene ke liye jarooree laga hoga..........

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  2. कहनी धीरे धीरे आगे बढ रही है. आभार

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  3. यह अन्क अच्छा लगा. आगे का इन्तज़ार रहेगा.

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  4. रोचकता लेते हुए कहानी बढ़ रही है..काफी पसंद आई.

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