-- सत्येन्द्र झा
किसी साहित्यिक दिवस पर लेख प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। लेख का विषय था 'पशु की उपयोगिता'।
पुरस्कृत लेखक ने लिखा था, "पशु की उपयोगिता मनुष्य से अधिक होती है, क्यूंकि प्रत्येक मनुष्य के अन्दर एक पशु रहता है। जब यह पशु बाहर आ कर मनुष्य को परास्त कर देता है तो शहर की सडकों से लेकर गाँव की पगडण्डी तक रक्त से लाल हो जाते हैं। बाहर निकला पशु सत्ता तक को आंदोलित कर देता है। हमलोग अपना अस्तित्व दूसरे पशु को समर्पित कर देते हैं।"
मूल कथा 'अहींकें कहै छी में संकलितपशु' से हिंदी में केशव कर्ण द्वारा अनुदित।
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