गुरुवार, 27 मई 2010

आँच 18 : 'बौराए हैं बाज फिरंगी'

आँ

- आचार्य परशुराम राय

आँच के इस अंक में श्री रावेन्द्र कुमार रवि द्वारा विरचित 'बौराए हैं बाज फिरंगी' नामक कविता (गीत) को समीक्षा के लिए चुना गया है।

कविता में आज की आतंकवाद और नक्सलवाद की समस्याजनित भावभूमि पर अच्छे और आकर्षक बिम्बों से कविता को सजाने का कवि ने अच्छा प्रयास किया है। यद्यपि कि बिम्ब पुराने हैं, लेकिन जिस तरह शब्द-योजना में उन्हें पिरोया गया है, नये-से प्रतीत होते हैं और इसीलिए भाषा में ताजगी आ गई है।

कविता में तीन बन्द हैं। पहले बंद में विदेशी आतंकवादी गतिविधि और उससे उत्पन्न परिस्थिति को कवि ने बड़े ही शब्द-संयम के साथ व्यंजित किया है। दूसरे बन्द में आंतरिक सुरक्षा के ध्वंसक नक्सलवादी गतिविधियों और उससे निकली अव्यवस्था की ओर संकेत किया गया है। तीसरे बन्द में उपर्युक्त दोनों समस्याओं के परिणामस्वरूप सामाजिक ताने-बाने का भंग होना और उससे जुड़े़ असमंजस भाव को व्यक्त करते हुए एक तरह से उपसंहार किया है।

प्रथम बन्द में 'बौराए हैं बाज फिरंगी' पंक्ति में बड़ी ही अभिव्यंजक शब्द-योजना है। वैसे जो भी हिंसक पशु-पक्षी हैं, वे हिंसा का मार्ग केवल अपने उदर की पूर्ति के लिए करते हैं। भूख शान्त होने पर वे पुन: किसी भक्ष्य की तब तक हत्या नहीं करते जब तक उन्हें पुन: उदर-पूर्ति की आवश्यकता न हो। लेकिन जब वे बौरा जाएं अर्थात् मानसिक संतुलन खो जाने की स्थिति में उपर्युक्त संयम के अभाव में ध्वंसक हो जाते हैं, अनावश्यक भक्ष्य पशु-पक्षियों को मार डालते हैं। यहाँ प्रयुक्त 'फिरंगी' शब्द का लक्षणा शक्ति से 'विदेशी' अर्थ लेना अभिप्रेत है। वैसे 'फिरंगी' शब्द अंग्रेजों या यूरोपवासियों के अर्थ में रूढ़ हैं, जो यहाँ अपना लक्ष्यार्थ 'विदेशी' इंगित कर रहा है। अतएव यहाँ पूरी शब्द-योजना विदेशी आतंकवाद की ओर संकेत करती हैं, जिसने पक्षियों के प्रात:काल के स्वागत में आह्लादित कलरव पर प्रश्नचिह्न लगा रखा है। यहाँ 'चिड़िया' शब्द से 'निर्दोष जनता' को व्यंजित किया गया है। 'रागिनी' का चिर निद्रा में 'जाना' इस शब्द योजना से 'आतंकी माहौल के सुधरने की आशा दिखाई न देना' रेखांकित किया गया है। वैसे यदि इस बन्द में आयी अन्तिम दो पंक्तियों को पहले रखा जाता तो अर्थक्रम का प्रवाह बाधित नहीं होता।

दूसरे बन्द में 'कौए' में समाज के वे तत्व हो सकते हैं जो 'कांव-कांव' करके अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए विकास का आरम्भ होने से पहले ही उस पर विराम लगा दते हैं। न तो उन्हें स्वाभाविक विकास की सभ्यता की जानकारी होती है और यदि होती भी है तो मात्र अपने अस्वाभाविक विकास की। दूसरे वे तत्व हैं जो इन कौवों की भाषा सीख कर केवल विरोध के स्वर में जिन्दगी खोजते हैं और हथियार उठाकर व्यक्ति, बच्चे, महिलाओं आदि की निर्मम हत्या करते हैं। 'तितली' यहाँ उन्हीं निर्दोष लोगों का प्रतिनिधित्व करती है। यथार्थ में इसका दूसरा काम है वनस्पतियों में परागण की क्रिया को अंजाम देना। इस संदर्भ में आइंस्टीन की पंक्ति याद आ रही है कि जिस दिन मधुमक्खियाँ नष्ट हो जाएंगी, उस दिन सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश हो जाएगा। इसका तात्पर्य यही है कि परागण में सर्वाधिक कार्य इन्हीं जंतुओं का होता है। इनके जीवन के अभाव में परागण क्रिया रुक जाएगी। परिणामस्वरूप वनस्पति जगत समाप्त हो जाएगा जिससे प्राकृतिक संतुलन बिगड़ेगा और महाप्रलय का होना अवश्यम्भावी है। इस प्रकार ये पंक्तियाँ दोनों ओर संकेत करती हैं।

अन्तिम बन्द में कवि ने उपर्युक्त परिस्थितियों का आकलन करते हुए 'नाली' का अर्थ बन्दूक की नली से लिया है जो निर्दोष लोगों की हत्या कर सामाजिक समरसता को तोड़ रही है। जो इस्पात दहशत फैलाने के लिए बंदूक बनाने में खप रहा है, वह बाँसुरी बनाने का समय आते-आते चुक जाएगा अर्थात् लोगों में इतना वैमनस्य हो जाएगा कि लोग प्यार का संगीत समझने का विवेक खो देंगे।

कविता में प्रांजलता पूरी तरह बनी हुई है, केवल एक स्थान को छोड़कर- 'फूलों से आ सुमुखी तितली' पंक्ति में। पहले बंद को छोड़कर पूरी कविता में अर्थ प्रवाह का वृत्त पूरी तरह सशक्त है।

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7 टिप्‍पणियां:

  1. कविता साथ में रहती तो शायद समीक्षा का आनन्द आता और समझ भी.

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  2. बहुत अच्छी समीक्षा है....समीर जी की बात सही है..कविता साथ में होती तो और अच्छा लगता....लिंक भी नहीं है...वैसे मेरी पढ़ी हुई है..

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  3. बहुत ही सुन्दर समीक्षा! अच्छा लगा पढ़कर!

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  4. समीक्षा बहुत अच्छी लगी। कवित का लिंक देना ज़रूरी है।

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  5. बहुत ही विस्तृत और व्यापक अर्थ वाली समीक्षा है यह. मुझे लगता है ऐसी व्याख्यात्मक समीक्षाऔं से समीक्षा को नया आयाम मिल पहा है. इसके लिए मैं राय जी का आभारी हूँ. कविता पढ़ी हुई हो तब भी समीक्षा के साथ कविता का होना आवश्यक है, समीक्षा के माध्यम से एक-एक शब्द अथवा पंक्ति को गहराई से समझने के लिए. इसलिए कविता का लिंक देना ज़रूरी है हालाँकि पिछली समीक्षा में कविता से लिंक दिया गया था. इस बार शायद चूक हुई है.

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  6. आतंकवाद का साया
    विषयक
    नवगीत की पाठशाला
    पर प्रकाशित मेरे दोनों नवगीतों के लिंक्स
    क्रमश: निम्नांकित हैं -
    --
    कर पाएँगे नहीं नाज़
    --
    बौराए हैं बाज फिरंगी

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  7. समीक्षक द्वारा किया गया श्रम अभिनंदनीय है!
    --
    इस समीक्षा के संदर्भ में इतना कहना मैं आवश्यक समझता हूँ -
    --
    समीक्षक को समीक्षित रचना की विधा का
    समुचित ज्ञान होना भी आवश्यक है!
    --
    समीक्षित रचना में
    एक मुखड़ा और दो अंतरे (बंद) हैं,
    जिन्हें समीक्षक द्वारा तीन बंद कहा गया है!
    --
    बौराए हैं बाज फिरंगी
    और
    प्यूपा बनने से पहले ही,
    कौए ने खाया इल्ली को!
    --
    उक्त बिंब यदि नवीन नहीं हैं,
    तो क्या उन रचनाओं के बारे में जानकारी
    मिल सकती है,
    जिनमें इससे पूर्व इनका उल्लेख किया गया है!

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