शनिवार, 8 मई 2010

मातृ दिवस पर ….. माँ!

माँ

--- हरीश प्रकाश गुप्त

"मेरे पास बंगला है, मोटर है, बैंक-बैलेंस है.... ! तुम्हारे पास क्या है ?" पैंतीस साल पहले एक महानायक के भारी-भरकम संवाद पर हावी हो गया था एक छोटा सा वाक्य, "मेरे पास माँ है !" पीढियां बदल गयी लेकिन दीवार फिल्म के शशि कपूर के उस डायलोग की तासीर आज भी उतनी ही सिद्दत से महसूस की जा सकती है। सच में, माँ के दूध से बढ़ कर कोई मिठाई और माँ के आँचल से बढ़ कर कोई रजाई नहीं होती। "मातृ देवो भवः !" "माँ फ़रिश्ताहै...!!" "Mother.... thy name is God...!!" माँ.... धात्री ! अपने जीवन के कीमत पर हमें जीवन देती है। अपने रक्तसे सींच हमारा पोषण करती है। संस्कारों से सुवाषित कर 'जड़ता' नाश करती है। साक्षात ब्रहमा, विष्णु, महेश.... ! ९ मई को विश्व मातृ-दिवस मनाया जाता है। मुझे आश्चर्य है कि जिसके बिना हमारा वजूद नहीं है, उसको समर्पित साल में मात्र एक दिन.... ! फिर भी पूरी दुनिया के साथ हम अपने ब्लॉग पर हरीश प्रकाश गुप्त की एक भाव-भीनी कविताके साथ उस परब्रह्म रूप को सिर नवाते हैं। विश्व मातृ-दिवस पर - माँ तुझे सलाम !!

J0175428 माँ

बहुत अच्छी लगती है

जब

सहलाती है देह

छोटे से बड़े होने

और

बड़े हो जाने तक

अपने बेटे की,

इस क्रम में

मां की संवेदना

उसकी

अंगुलियों के पोरों से

होती हुयी

उतर जाती है

कलेजे में, और

समा जाती है

धड़कनों में।

माँ, बहुत अच्छी लगती है

जब तक वह

रिश्तों के चतुर्भुज में

कहीं

फिट नहीं होती,

एक सरल रेखा

बनी रहती है,

घूम जाती है

हमेशा

उसके अनुरूप

जिधर

उसका दूसरा सिरा

रहता है।

Picture 086 माँ

अपेक्षाओं की

ऊंची-ऊंची दीवारों के मध्य

तय कर लेती है, जब

अपना रास्ता,

तमाम आग्रहों के बीच

खोज लेती है

अपना कोना

एक बहु आयामी आकृति में

औऱ

धंसती चली जाती है

अपने ही कोने में,

बना लेती है

एक शून्य

अपने चारों ओर,

बढ़ाती रहती है उसे

अपने तर्कों, अर्थ

और अपनी ही व्याख्याओं से,

अनायास तैयार कर लेती है

एक विग्रह

जिससे उबरना

शायद उसके लिए भी

मुश्किल रहता है ।

जब-जब वह

काम से खाली होती है

ताकने लगती है

शून्य

और खो जाती है

स्वयं से ही

बातें करते-करते

तब

कुछ भी अच्छा नहीं लगता

माँ तो माँ है

बस,

किन्हीं भी

सीमाओं में बंधने से

परे!!

31 टिप्‍पणियां:

  1. Mere man me bhi hamesha yah khayal aata hai..usko samarpit kewal ek din?
    Ek dinhi sahi,samarpan to karen..aisi bhi aulad dekhi jo ek palbhi samarpit nahi kar sakti..

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  2. बहुत भावपूर्ण..माँ शब्द में ही जादू है.

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  3. बहुत ही उम्दा व भावपूर्ण रचना लगी ।

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  4. जो मां का नहीं वो किसी का नहीं हो सकता

    सुन्दर रचना के लिए बधाई स्वीकार करें

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  5. बहुत खुब जी, मां के प्यार से बढकर दुनिया मै ओर कोन सा सुख होगा?आप की आज की रचना एक आरती के समान पबित्र लगी. धन्यवाद

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  6. ek chitra sa khinch diyaa.........maa shabd mein hi sari kaynat chupi hai.....behad umda prastuti.

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  7. मात-दिवस की पूर्व सन्ध्या पर सुन्दर प्रस्तुति मनोज जी !

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  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 09.05.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  9. यह प्रस्तुति अच्छी लगी. धन्यवाद.

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  10. Mothers day के अव्सर पर सुन्दर प्रस्तुति.

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  11. विश्‍व मातृ दिवस पर श्री हरीश प्रकाश गुप्त जी की "मां" शीर्षक कविता अखिल मातृसता को नमन है। मातृसत्तात्मक सम्मान में भारतीय मनिषी कहता है - यत्र नारयस्तु पूज्यन्ते
    रमन्ते तत्र देवताः।
    महाराज मनु अपने स्मृति में मांस खाने की अनुमति देते समय मादा जानवर या पक्षी का मांस खाने से मना किया है। यह सब देखते हुए मातृ दिवस पर सम्पूर्ण मातृ सत्ता को नमन के साथ हरीश जी को बधाई!

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  12. भाव-भीनी कविता के साथ उस परब्रह्म रूप को सिर नवाते हैं। विश्व मातृ-दिवस पर - माँ तुझे सलाम !!

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  13. दिल को छुं गयी, बहुत सुन्दर रचना है !

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  14. ey maa teri surat se alag bhagwaan ki surat kya hogi..kya hogi?

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  15. बहुत ही सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने जो प्रशंग्सनीय है! दिल को छू गयी हर एक पंक्तियाँ! उम्दा रचना!

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  16. माँ की सोच और भावनाओं को बहुत अच्छे शब्दों में उकेरा है...

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  17. मदर्स डे के शुभ अवसर पर ...... टाइम मशीन से यात्रा करने के लिए.... इस लिंक पर जाएँ :
    http://my2010ideas.blogspot.com/2010/05/blog-post.html

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  18. दोनों होंठों के चुम्बन से उच्चारण होता है माँ

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  19. भाव पूर्ण ... मा के प्रति जो भी लिखा होता है दिल में उतर जाती है .... धड़क रही है ये रचना भी .......

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  20. मां के ऊपर इतनी अच्छी कविता प्रस्तुत करने के लिए आभार।

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  21. बहुत ही उम्दा व भावपूर्ण रचना।

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