मंगलवार, 4 मई 2010

नदिया डूबी जाए

नदिया डूबी जाए

-आचार्य परशुराम राय

स्वत्व 

किस अचेतन की तली से

चेतना ने बाँग दी

कि

काल का घेरा कहीं से

टूटने को आ गया है।

J0382930 नियति को देती चुनौती

विद्रोह करती वेदना,

आदिम इच्छा के

मात्र एक फल चख लेने की

काट रही सजा,

सृजन के कारागार से

अब बाहर निकल कर आ गई है।

Vista22 सोच तो लेते कि

मुक्त शीतल मन्द पवन

जब भी करवट बदलेगा

महाप्रलय की बेला में

हिमालय की गोद भी

शरण देने से तुम्हें कतराएगी।

 

मेरे तो सौभाग्य और दुर्भाग्य झंझाकी

सारी रेखाएं कट गई,

संस्कारों का विकट वन

जलाने से निकले

श्रम सीकर

अभी तक सूखे नहीं।

बन्धन मेरी सीमा नहीं,

मात्र बस ठहराव था।

साथ बैठकर रोया कभी28032010079

      तो मोहवश नहीं

      करुणा की धारवश।

 

जीवन की धार देख

नाव नदी में नहीं

नदी नाव में डूबने को है!

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28 टिप्‍पणियां:

  1. हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

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  2. जीवन की धार देख

    नाव नदी में नहीं

    नदी नाव में डूबने को है!

    बेहतरीन भाव

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  3. जीवन की धार देख

    नाव नदी में नहीं

    नदी नाव में डूबने को है!
    kya gazab ka khayal hai!

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  4. जीवन की धार देख
    नाव नदी में नहीं
    नदी नाव में डूबने को है!
    अति सुंदर - आभार

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  5. बहुत बढ़िया लगा! उम्दा प्रस्तुती!

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  6. बहुत गहरा व्यंग्य! जो अपने से बड़ों का अपमान करते उनकी नदी नाव में डूबेगी ही।

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  7. जीवन की धार देख

    नाव नदी में नहीं

    नदी नाव में डूबने को है!

    विपरीत लिख कर एक अच्छा व्यंग किया है....बहुत उम्दा प्रस्तुति

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  8. आधुनिक विकास के द्वन्द्व एवं पाखण्ड को उजागर करता है।

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  9. हमेशा की तरह आपकी रचना जानदार और शानदार है।

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  10. विद्रोह से भरी हुई आवाज को बुलन्द करती है।

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  11. बहुत सुन्दर धारदार रचना शुभकामनायें

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  12. अच्छी कविता और सुंदर चित्र..वाह!

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  13. कविता वह सुरंग है जिसमें से गुज़र कर मनुष्य एक विश्व को छोड़ कर दूसरे विश्व में प्रवेश करता है।
    आपकी कविता पढ़कर मैं तो दूसरी दुनिया में पहुंच गया।

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  14. नियति को देती चुनौती

    विद्रोह करती वेदना,

    आदिम इच्छा के

    मात्र एक फल चख लेने की

    काट रही सजा,


    सत्यम् ! शिवम् !! सुंदरम् !!! काव्य का आदि कारण -- वेदना.... ! आदिम इच्छा के एक फल..... सांसारिक लालसा का प्रतीक........ फलस्वरूप मिथ्या मोहपास मे आबद्ध.... विपरीत वारि में नैय्या में नदिया न डूबे तो क्या हो.... ? बरबस कबीर याद आ गए !!!

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  15. सत्यम् ! शिवम् !! सुंदरम् !

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  16. सबको लील लेने की क्षमता को प्रकाशित करते शब्द ।

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  17. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

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  18. अति महत्वाकांक्षा की नियति यही होती है।

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  19. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 08.05.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

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  20. आपकी कविता ... कल्पना शक्ति को दिशा देती है ...

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  21. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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