शनिवार, 15 मई 2010

मीडिया की डुगडुगी

Irises by Vincent van Gogh --- Image by © J.P.GETTY TRUST/CORBIS SYGMA आज बाजारवाद शवाब पर है। हर तरफ़। किस तरह से अपने उत्पाद को सर्वश्रेष्‍ठ घोषित कर उसकी मार्केटिंग की जाए, यह भी एक कला है। जो इस कला में निपुण है उनकी तो बल्‍ले-बल्‍ले! वरना कई ऐसे उत्पाद हैं जो गुणवत्ता में किसी से कम न होते हुए भी प्रचार/मार्केटिंग के अभाव में किसी कोने में दुबके पड़े होते हैं।

ब्‍लॉग जगत में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिलता है।

लगता है बाजारवाद की संस्‍कृति ने हमारी सृजनशीलता एवं सोच को गहरे तक प्रभावित किया है।

ऐसा नहीं है कि सार्थक सृजन बंद हो गया है या मंद पड़ गया है। विचारों एवं शब्‍दों के धनी सदा ही रहे हैं, रहेंगे।

लेकिन बाजार ने लोगों की जरूरतों को जरूर बदल दिया है। रचनाकारों की सोच अब भी स्‍वतंत्र एवं उर्वर है।

ज्‍वलंत और विचारणीय समस्‍याओं पर ब्‍लागर्स की उंगलियां की-बोर्ड को खड़खड़ाती है। ब्‍लागर्स एक संवेदनशील प्राणी है। वह न केवल महसूस करता है, बल्कि अपनी रंग-बिरंगी अनुभूतियों को, संवेदना के रंग में डूबो कर, कुंजी पटल के द्वारा अंतरजाल की दुनिया में उतार देने की विशेष क्षमता से युक्‍त होता है।

पर वही बाजारवाद का उतावलापन, कहीं खबर बासी न हो जाए, सारे तथ्‍य सामने आने से पहले, निष्‍कर्षों का पिटारा खुला पड़ा होता है।

हम कुछ ऐसा सृजन करें कि समाज को अपने जिंदा होने का अहसास हो, उसके विचारों को भी अभिव्‍यक्ति मिल पाए। वरना आम आदमी तो रोटी-दाल के चक्‍कर में अपनी सारी जिन्‍दगी गुजार देता है।

पेश है एक कविता …

मीडिया की डुगडुगी-- -- -- मनोज कुमार

 

image मीडिया की डुग डुगी सुन

जुट गई भीड़

पिटारे के ईर्द गिर्द

रहस्य की उत्सुकता में।

सब ने

अपने अपने ढ़ंग से किया

उस सत्य का विश्‍लेषण

जिससे उनका

परिचय ही नहीं था।

अटक कर रह गई बहस

ख़ूबसूरत रिश्ते पर,

रिश्‍ते की ख़ूबसूरती पर,

मर्यादा पर

और

ग़लतफ़हमी में दबा हुआ सच।

image आज़ाद हैं हम,

आज़ादी अभिव्यक्ति की

लेकिन किसे फ़िक्र!

… अपने सृजन का तो

हम करते हैं सम्मान

सबसे ज़्यादा …!

हमारा मान-सम्मान

और पहचान

इसी से है।

लेकिन,

दूसरों की

अज़ादी का अतिक्रमण

हमारी आज़ादी नहीं।

image ***     ***

22 टिप्‍पणियां:

  1. हर व्यक्ति जब न्यायसंगत और तर्कसंगत व्यवहार अपनाएगा तब जाकर एक सार्थक शुरूआत होगी / विचारणीय प्रस्तुती /

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  2. आपका लेख पढकर अच्छा लगा ... दरअसल मीडिया वही परोसती है जो आम आदमी पढ़ना चाहता है ... आजकल अच्छी खबरों में किसीकी कोई रूचि नहीं रही ... और फिर ये नापना भी मुश्किल है कि कौन सी खबर ज्यादा चल रही है ...

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  3. पता नहीं, काफी खबर सोशल मीडिया - ट्विटर/फेसबुक/बज़ बनाने लग गया है। यह शायद उत्तरोत्तर बढ़े।
    परिवर्तन होंगे और तेजी से होंगे। कैसे होंगे कहा नहीं जा सकता।

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  4. लेकिन,

    दूसरों की

    अज़ादी का अतिक्रमण

    हमारी आज़ादी नहीं।

    बहुत सटीक बात कही है....अभिव्यक्ति ऐसी होनी चाहिए जो दूसरों कि भावनाओं को ठेस ना पहुंचाए..

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  5. जब हम दूसरों की अज़ादी का अतिक्रमन करते है तो हमारी आजादी भी सही रुप मै आजादी नही रहती, जहां हमरी नाक खत्म होती है वही तक हमारी आजादी भी है, ओर उस के बाद गुंडा गर्दी या जबर्दस्ती कहलाती है, मेरी आजादी से जब कोई दुसरा परेशान हो तो मुझे समभल जाना चाहिये

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  6. बहुत बढ़िया लिखा आपने...कविता भी सुन्दर.

    ________________
    पाखी की दुनिया में- 'जब अख़बार में हुई पाखी की चर्चा'

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  7. डा. रमेश मोहन झा की टिप्पणी :- (ई-मेल से प्राप्त)

    प्रस्तुत कविता में कवि स्वयं अपनी ’छवि’ (इमेज) बदलते नज़र आते हैं। इस कविता में एक ऐसी दुनिया का बिंब प्रस्तुत करते हैं, जहां धैर्य नहीं, जहां चीज़ें शीघ्र पुरानी हो जाती हैं। इस भागती और हांफती दुनियां में हड़बड़ाहट इतनी है कि चीज़ों के देखने से पूर्व ही राय प्रकट कर दी जाती है। अतिशियोक्ति अलंकार पढ़ते समय एक उदाहारण दिया करते थे
    हनुमान की पूंछ में लग न पाई आग
    लंका सिगरी जल गई, गये निशाचर भाग!
    अर्थात घटना घटित होने के पूर्व ही विश्लेषण। कवि अपने बाह्य जगत में रोज़ इस त्वरा से उपजी स्थितियों का सामना करते हैं, और उनसे पैदा हुई खिन्नता मूल्यहीनता और अपूर्णता उनके मनोजगत को आंदोलित करता है - फल्स्वरूप वे इस प्रकार की रचना को लेकर आते हैं।
    कविता में प्रयुक्त भाषा उनकी काव्य अभिव्यक्ति को विश्वसनीय और प्रासंगिक बनाती है।

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  8. ... प्रसंशनीय .... लाजवाब !!!

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  9. आपकी बात, लेख और कविता दोनों , अच्छी लगी.

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  10. बाजारवाद मे जब सामान्य को विशेष कह प्रचारित किया जाता है तो कष्ट होता है ।

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  11. जनता वह पढती है जो हम पढवाते हैं । हम क्या पढवाते हैँ . यह विचारणीय है ।
    पोस्ट प्रशंसनीय ।

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  12. वाह सर! एकदम सच उतार दिया है। आज का हालत बयानी है।

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  13. हुत सटीक....अभिव्यक्ति !

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  14. मीडिया की डुगडुगी भीड़ ही जुटाति है। फिर भेड़चाल। कविता बहुत ही विचारणीय है।

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  15. bazarvaad men midiyaa ki is dugdugi ki vjh se jnta thgi jaa rhi he aap ne aek achchaa sndrbh pyaare triqe se uthaayaa he bdhaai ho. akhtar khan akela kota rajasthan my hind blog akhtarkhanakela.blogspot.com

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  16. दूसरों की

    अज़ादी का अतिक्रमण

    हमारी आज़ादी नहीं...... सच !!!

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  17. "मीडिया की डुगडुगी" कविता मीडिया द्वारा दिखाए जा रहे तमाशे की ओर इशारा करती बढिया कविता है। वर्तमान मीडिया, चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, मदारी की तरह लगने लगी है। पांच मिनट की सूचना के समाचार को आधे घंटे से लेकर एक घंटे तक का समय मदारी की तरह डुगडुगी बजा कर बार-बार रहस्य की तरफ़ संकेत करते हुए नष्ट कर देते हैं।

    ये लोगों के स्वतंत्र चिंतन को भी अनावश्यक दिशा की ओर प्रभावित कर प्रेरित करते हैं और समय का दुरुपयोग करते हैं।

    लोगों के व्यक्तिगत ज़िन्दगी पर अनावश्यक बकवास कर उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण करते हैं।

    इस भाव-भूमि पर रचना लगभग खड़ी उतरी है। आशा है मीडिया के लोग इसे पढ कर दर्शकों की संवेदना को समझेंगे।

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  18. 'अपने सृजन का तो
    हम करते हैं सम्मान

    सबसे ज़्यादा …!

    हमारा मान-सम्मान

    और पहचान

    इसी से है।


    लेकिन,

    दूसरों की

    अज़ादी का अतिक्रमण

    हमारी आज़ादी नहीं।,



    - आज के समय में अत्यंत सामयिक (ब्लॉग जगत के संदर्भ में भी )

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